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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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     ब्राह्मणों ने शूद्रों को शिक्षा से वंचित कर, क्षत्रियों को सेना के काम में लगाकर और वैश्यों को व्यापार की ओर प्रेरित कर और शिक्षा को अपने लिए सुरक्षित कर केवल स्वयं को शिक्षित वर्ग के रूप में संगठित किया। वे सारे समाज को गलत दिशा में मोड़ने और उसका गलत मार्गदर्शन करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हो गए। वर्ण को जाति में परिवर्तित कर उन्होंने यह घोषित कर दिया कि मनुष्य की योग्यता का वास्तविक और अंतिम मानदंड यह है कि वह किस जाति में पैदा हुआ है। जाति और वर्गीकृत असमानता से फूट और वैमनस्य एक आम बात हो गई ।

     अगर मूल वर्ग पद्धति का यह विकृतीकरण केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित रहता, तब तक तो सहन हो सकता था। लेकिन ब्राह्मण धर्म इतना कर चुकने के बाद भी संतुष्ट नहीं रहा। उसने इस चातुर्वर्ण्य पद्धति के परिवर्तित पद्धति मनुस्मृति में व्यक्ति और गृहस्थ के धर्म के रूप में उपलब्ध है। इनमें किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता।

     मनु ने यह विधान किया कि अगर निचली जाति का कोई व्यक्ति अपने को उच्च जाति के स्तर का होने या उच्च जाति का होने की अनधिकार चेष्टा करता है, तब वह अपराध माना जाएगा।

     10.96. निचली जाति का कोई व्यक्ति यदि लोभवश ऊंची जातिवाले व्यक्ति के व्यवसाय को अपनाकर जीवन यापन करता है तब राजा उसकी संपत्ति छीन ले तथा उसे निर्वासित कर दे।

brahmanvad ki Vijay Raja Hatya Athva Prati Kranti ka Janm dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     11.56. असत्य रूप में अपने को ऊंचे कुल में जन्मा बताना, राजा को (किसी अपराध के बारे में) सूचना देना और अपने गुरु की झूठी निंदा करना (ऐसे अपराध हैं जो ) किसी ब्राह्मण की हत्या करने के समान हैं।

     यहां दो अपराधों का वर्णन है, सामान्य छद्म व्यक्तिता (रूप धारण करना, 10.96 ) और शूद्र द्वारा छद्म व्यक्तिता । कृपया यह देखिए, कितना भयंकर दंड है। पहले अपराध के लिए दंड है संपत्ति का छीन लिया जाना और निर्वासन दूसरे अपराध के लिए वही दंड है जो किसी ब्राह्मण की मृत्यु का कारण बनने के लिए है ।

     आधुनिक न्याय व्यवस्था में छद्म व्यक्तिता का अपराध जाना-पहचाना अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 419 इसी के बारे में है। लेकिन भारतीय दंड संहिता छद्म व्यक्तिता के लिए क्या दंड देती है? जुर्माना, और अगर कैद तो तीन साल की, या दोनों। मनु अपने जाति वाले कानून को अंग्रेज सरकार द्वारा इतना हल्का बना दिए जाने पर स्वर्ग में जरूर अपना सिर धुन रहा होगा।

     मनु इसके बाद राजा को निर्देश देता है कि उसे इस नियम को कार्यान्वित करना चाहिए। पहले, वह राजा से उसे उसके पवित्र कर्तव्य की साक्षी देते हुए अपील करता है:

     8.172. जातियों के एक- दूसरे में विलय को रोकने से राजा की शक्ति बढ़ती है और वह उस जीवन में और मृत्यु के बाद समृद्धिवान होता है।

     मनु संभवतः जानता था कि वर्णों के परस्पर विलय से संबंधित नियम राजा को संभवतः रुचिकर न हो और वह इसे कार्यान्वित न करे। इसलिए मनु राजा को यह बताता है कि नियमों को कार्यान्वित करने के संबंध में उसे किस प्रकार का आचरण करना चाहिए।

     8.177. इसलिए राजा को अपनी रुचि या अरुचि पर ध्यान नहीं देना चाहिए तथा ठीक यम की तरह व्यवहार करना चाहिए, अर्थात् उसे उसी तरह पक्षपात रहित होना चाहिए जिस प्रकार यम, मृत्यु का न्यायकर्ता होता है।

     मनु, तथापि इसे राजा के पवित्र कर्तव्य के सहारे नहीं छोड़ देना चाहता । मनु इसे राजा के लिए अनिवार्य कर देता है। तदनुसार मनु इसे दायित्व घोषित करता है:

     8.410. राजा को वैश्य को व्यापार करने, रुपया सूद पर देने, कृषि करने, पशु उधार देने और शूद्र को द्विजों की सेवा करने का आदेश देना चाहिए।

     मनु इस विषय पर आगे प्रकाश डालता है:

     8.418. राजा सावधानीपूर्वक वैश्यों और शूद्रों को अपना-अपना कर्तव्य (जो उनके लिए निर्धारित है) करने के लिए बाध्य करे, क्योंकि यदि वे अपने कर्तव्य से विरत होते हैं तो वे इस समस्त संसार को अस्त-व्यस्त कर डालेंगे।

     अगर राजा अपने इस दायित्व को पूरा न करे तब क्या होगा? मनु की दृष्टि में चातुर्वर्ण्य के इस नियम की सत्ता इतनी परम है कि वह उस राजा के सामने झुकने को तैयार नहीं है जो इस नियम को कार्यान्वित करने के बारे में अपने दायित्व को पूरा नहीं करता। वह दृढ़प्रतिज्ञ हो, एक नए नियम का सृजन कर देता है कि ऐसे राजा को राज-सिंहासन से च्युत कर दिया जाएगा। इससे हम कल्पना कर सकते हैं कि चातुर्वर्ण्य की पद्धति मनु को कितनी प्रिय थी।

     जैसा कि मैंने कहा है, चातुर्वर्ण्य की वैदिक पद्धति जाति-व्यवस्था की अपेक्षा उत्तम थी। लेकिन यह पद्धति ऐसे समाज के सृजन के पक्ष में नहीं थी, जिसे एक पूरा समाज कहा जा सके, जहां आदर्श समाज में मिलने वाली एकता हो । चातुर्वर्ण्य सिद्धांत में ही चार वर्गों का जन्म हुआ। इन चार वर्गों का आपस में कोई मैत्रीभाव नहीं था। ये आपस में झगड़ते थे और ये झगड़े कभी-कभी इतने कटु हो जाते थे कि वे वर्गयुद्ध का रूप ले लेते। फिर भी, प्राचीन चातुर्वर्ण्य पद्धति में दो अच्छाइयां थीं, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने स्वार्थ में अंधे होकर निकाल दिया। पहली वर्णों की आपस में एक-दूसरे से पृथक स्थिति नहीं थी। एक वर्ण का दूसरे वर्ण में विवाह, और एक वर्ण का दूसरे वर्ण के साथ भोजन, दो बातें ऐसी थीं जो एक-दूसरे को आपस में जोड़े रखती थीं। विभिन्न वर्णों में असामाजिक भावना के पैदा होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, जो समाज के आधार को ही समाप्त कर देती है। हालांकि क्षत्रिय ब्राह्मणों के, और ब्राह्मण क्षत्रियों के विरुद्ध लड़ते थे तो भी ऐसे क्षत्रियों की कमी नहीं थी जो ब्राह्मण के लिए क्षत्रियों के विरुद्ध लड़े हों और इसी प्रकार ऐसे ब्राह्मणों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने क्षत्रियों से मिलकर ब्राह्मणों को न दबाया हो ।

     दूसरी बात यह है कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था रूढ़िगत थी । यह समाज का आदर्श थी, लेकिन यह शासन का नियम नहीं थी। ब्राह्मणवाद ने वर्णों को अलग-अलग कर दिया और उनकी एक-दूसरे से पृथक स्थिति हो गई। उसने परस्पर बैर के बीज बो दिए। जो रूढ़िगत था, ब्राह्मणवाद ने उसे नियम बना दिया। इस नियम का आधार बनाकर उसने दुष्कृत्य कर डाला। यदि वैदिक चातुर्वर्ण्य व्यवस्था हानिकर थी, तब वह काल और परिस्थितियों के आघात से स्वतः मिट जाती । ब्राह्मणवाद ने इसे नियम का रूप प्रदान


1. क्षत्रियों के विरुद्ध परशुराम के युद्धों की कहानी के बारे में यह मेरी व्याख्या है।
2. बौद्ध धर्म ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक विद्रोह था। तो भी प्रारंभ में बुद्ध और बौद्ध धर्म के अधिकांश अनुयायी ब्राह्मण थे।


कर शाश्वत बना दिया। संभवतः यह सबसे महान कुकृत्य था, जो ब्राह्मणवाद ने हिंदू समाज के प्रति किया।

     इस प्रश्न पर विचार करते समय हर व्यक्ति के ध्यान में यह बात आती है कि चातुर्वर्ण्य के नियम को, जो वर्गीकृत असमानता का एक दूसरा रूप हैं, कार्यान्वित करने का जो दायित्व राजा को सौंपा गया है, उसका अभिप्राय यह नहीं कि राजा इस नियम को ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर भी लागू करे। यह दायित्व इस नियम को वैश्यों और शूद्रों पर लागू करने तक सीमित है। इस बात को ध्यान में रखने के बाद कि ब्राह्मणवाद इस पद्धति को नियम का रूप देने के बारे में दृढ़संकल्प था, यह कहला कोई अधिक अनुचित नहीं कि इसके परिणाम बड़े ही भयावह रहे। इस व्यवस्था को नियम बनाने की इन कोशिशों के बावजूद यह व्यवस्था आधी रूढ़िगत रही और आधी ही नियम बनी। वह वैश्यों और शूद्रों के लिए नियम बन गई और ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संबंध में केवल रूढ़िगत रही ।

     इस अंतर को स्पष्ट करना आवश्यक है। क्या ब्राह्मणवाद इस व्यवस्था को नियम का रूप देने में कपटरहित था? क्या उसका यह अभिप्राय था कि चारों वर्णों में से प्रत्येक वर्ण पर यह नियम लागू हो ? तथा तथ्य कि ब्राह्मणवाद ने अपने बनाए इस नियम को ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए अनिवार्य नहीं किया, इस बात को सिद्ध करता है कि ब्राह्मणवाद पूरी तरह निष्कपट नहीं था । यदि उसे यह विश्वास था कि यह एक आदर्श व्यवस्था है, तो वह इसे सभी पर लागू करने में कोई कोर-कसर न उठा रखता ।

     इस कूट-कर्म में कपट के अतिरिक्त कुछ और भी है। हम यह समझ सकते हैं कि ब्राह्मणों को उस नियम से क्योंकर मुक्त और अनियंत्रित रखा गया। मनु ने उन्हें पृथ्वी के देवता कहा और देवता तो नियम के ऊपर होते हैं। लेकिन ब्राह्मण को जिस प्रकार मुक्त रखा गया, उस प्रकार क्षत्रियों को क्यों मुक्त रखा गया? वह जानते थे कि क्षत्रिय ब्राह्मणों के सम्मुख अपना सिर नहीं झुकाएंगे। इसलिए वह क्षत्रियों को चेतावनी देते हैं कि अगर वे उद्धृत होते हैं और विद्रोह की योजना बनाते हैं तो ब्राह्मण उनको किस प्रकार दंडित कर सकते हैं।

     9.320. जब क्षत्रिय किसी भी प्रकार ब्राह्मणों के प्रति निरंकुश हो जाएं तो ब्राह्मण स्वयं उसे विधिवत कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए हैं।

     9.321. जल से अग्नि, ब्राह्मणों से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा उत्पन्न हुए हैं। इन (तीनों) की बेधन शक्ति का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता, जहां से ये उत्पन्न हुई।

     हम यह कह सकते हैं कि मनु क्षत्रिय पर नियम लागू करने का दायित्व राजा को इसलिए नहीं सौंपता कि ब्राह्मणों ने यह अनुभव किया कि वे अपनी शक्ति से और राजा की सहायता के बिना क्षत्रियों से निबट सकते हैं और जब समय आएगा, परिणाम के विषय में चिंता किए बिना वे क्षत्रियों का निषेध कर सकते हैं। मनु एकाएक शांत हो जाता है और क्षत्रियों से सहयोग करने और ब्राह्मणों के साथ मिलकर एक मिला- -जुला मोर्चा बनाने की वकालत करने लगता है। जिस श्लोक में मनु क्षत्रियों के विरुद्ध गर्जन - तर्जन और अभिशाप आदि की चर्चा करता है, उसके आगे के श्लोक में वह कहता है:

     9.323. लेकिन (जो राजा यह अनुभव करता है कि उसका अंत निकट है), वह अपनी समस्त संपत्ति जो उसने अर्थ दंड लगाकर संग्रहीत की ब्राह्मणों को सौंप दे। अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दे तथा युद्ध में मृत्यु का वरण करे।

     अभिशाप के बाद अनुनय-विनय के स्वर विचित्र अलाप लगते हैं। क्षत्रियों के विरुद्ध आचार-व्यवहार में इस नरमी की वजह क्या है? ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच इस सहयोग का उद्देश्य क्या है? यह मोर्चा किसके विरुद्ध बनाया जा रहा है? मनु इसे स्पष्ट नहीं करता। इस पहेली को सुलझाने और प्रश्नों का संतोषप्रद रीति से उत्तर देने के पहले एक हजार वर्ष का संपूर्ण इतिहास बताया जाना चाहिए ।