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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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     इन पंडितों के दृष्टिकोण से नितांत भिन्न दृष्टिकोण शंकराचार्य और श्री तिलक का है। दोनों ही विद्वानों को परंपरावादी लेखकों की श्रेणी में रखा जा सकता है। शंकराचार्य का दृष्टिकोण यह था कि भागवत्‌गीता में ज्ञान मार्ग का उपदेश दिया गया है और ज्ञान मार्ग ही मोक्ष का एकमात्र सही मार्ग है। श्री तिलक¹ अन्य विद्वानों में से किसी विद्वान के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। वे इस दृष्टिकोण का खंडन करते हैं कि गीता में अनेक विसंगतियां हैं। वे उन पंडितों से भी सहमत नहीं हैं जो कहते हैं कि भगवद्गीता मोक्ष के तीन मार्गों को उचित मानती हैं। शंकराचार्य के समान उनका अभिमत है कि भागवत्‌गीता निश्चित सिद्धांत के बारे में उपदेश देती है। परंतु उनका मत शंकराचार्य से भिन्न है और उनकी धारणा है कि गीता ने कर्म योग का नहीं, बल्कि ज्ञान योग का उपदेश दिया है।

Bhagwat Geeta par nibandh Prati Kranti ki darshnik pushti Krishna aur Unki Geeta

     गीता में जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में इतने भिन्न-भिन्न मतों का होना केवल आश्चर्य की बात नहीं है । कोई भी व्यक्ति यह पूछ सकता है कि विद्वानों में इतना मतभेद क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में मेरा निवेदन है कि विद्वानों ने ऐसे लक्ष्य की खोज की है जो मिथ्या है। वे इस अनुमान पर भागवत्‌गीता के संदेश की खोज करते हैं कि कुरान, बाइबिल अथवा धम्मपद के समान गीता भी किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रतिपादन करती है। मेरे मतानुसार यह अनुमान ही मिथ्या है। भागवत्‌गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, इसलिए उसमें कोई संदेश नहीं है और इसमें किसी संदेश की खोज करना व्यर्थ है। निस्संदेह यह प्रश्न पूछा जा सकता है: यदि भगवत् गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, तो फिर यह क्या है? मेरा उत्तर है कि भागवत्‌गीता न तो धर्म ग्रंथ है, और न ही यह दर्शन का ग्रंथ है। भागवत्‌गीता ने दार्शनिक आधार पर धर्म के कतिपय सिद्धांतों की पुष्टि की है। यदि कोई व्यक्ति इस आधार पर भगवद्गीता को धर्मग्रंथ अथवा दर्शन का ग्रंथ कहता है, तो वह अपने मुंह मियां मिट्टू बन सकता है। परंतु यह वस्तुतः दोनों में से एक भी नहीं है। इस ग्रंथ में दर्शन का प्रयोग धर्म की पुष्टि के लिए किया गया है। मेरे प्रतिद्वंद्वी केवल राय बताने से ही संतुष्ट नहीं होंगे। वे इस बात पर बल देंगे कि मैं अपनी स्थापना को विशिष्ट तथ्यों का संदर्भ देकर सिद्ध करूं। यह कोई कठिन बात नहीं है। वास्तव में यह सबसे सरल कार्य है।

     भागवत्‌गीता का अध्ययन करने पर सबसे पहली बात जो हमें मिलती है, वह यह कि इसमें युद्ध को संगत ठहराया गया है। स्वयं अर्जुन ने युद्ध तथा संपत्ति के लिए लोगों की हत्या करने का विरोध किया। कृष्ण ने युद्ध तथा युद्ध में हत्याओं की दार्शनिक आधार पर पुष्टि की। युद्ध की यह दार्शनिक पुष्टि भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 2 से 28 तक दी गई है। युद्ध की दार्शनिक पुष्टि तर्क की दो कसौटियों पर आधारित है। पहला तर्क यह है कि संसार नश्वर है तथा मनुष्य मृत्युधर्मी है। वस्तुओं का अंत होना निश्चित


1. देखिए, गीता रहस्य ( दूसरा संस्करण), खंड 2 अध्याय 14 स्फुट


है। मनुष्य की मृत्यु निश्चित है। जो बुद्धिमान हैं, उनके लिए इस बात से क्या अंतर पड़ेगा कि मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु होती है अथवा वह हिंसा के फलस्वरूप मृत्यु को प्राप्त करता है? जीवन अस्वाभाविक है, इस बात पर आंसू क्यों बहाए जाएं कि उसका अंत हो गया है? मृत्यु अनिवार्य है, फिर इस बात पर क्यों विचार किया जाए कि मृत्यु किस प्रकार हुई ? दूसरा तर्क प्रस्तुत करते हुए युद्ध की आवश्यकता को सिद्ध किया गया है। और यह सोचना भ्रम है कि शरीर और आत्मा एक हैं। वे अलग-अलग हैं। वे केवल स्पष्ट रूप से अलग-अलग ही नहीं, परंतु वे दोनों अलग-अलग इसलिए हैं कि शरीर नश्वर है, जब कि आत्मा अमर और अविनाशी है। जब मृत्यु होती है तो शरीर का अंत हो जाता है। आत्मा का कभी भी विनाश नहीं होता। और आत्मा कभी भी नहीं मरती, यहां तक कि वायु इसे सुखा नहीं सकती, अग्नि इसे जला नहीं सकती और हथियार इसे काट नहीं सकते। इसलिए यह कहना भूल है कि जब व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी आत्मा भी मर जाती है। वास्तव में स्थिति यह है कि शरीर मर जाता है। उसकी आत्मा मृत शरीर को उसी प्रकार त्याग देती है, जैसे व्यक्ति अपने पुराने वस्त्रों को त्याग देता है। वह नए वस्त्र धारण करता है तथा अपना जीवन बिताता है। चूंकि आत्मा कभी भी नहीं मरती है, अतः व्यक्ति की हत्या होने से उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए युद्ध और हत्या - जनित पश्चाताप अथवा संकोच, यही भागवत्‌गीता का तर्क है।


     एक अन्य सिद्धांत जिसे भागवत्‌गीता में प्रस्तुत किया गया है, वह चातुर्वर्ण्य की दार्शनिक पुष्टि है। निस्संदेह भागवत्‌गीता में बताया गया है कि चातुर्वर्ण्य ईश्वर का सृजन है और इसलिए यह अति पवित्र है। परंतु गीता में यह इस कारण वैध नहीं बताया गया है। इसके लिए दार्शनिक आधार प्रस्तुत किया गया है तथा इसे मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों के साथ जोड़ दिया गया है। भागवत्‌गीता में कहा गया है कि पुरुष के वर्ण का निर्धारण मनमाने ढंग से नहीं हुआ है। परंतु उसका निर्धारण मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों¹ के आधार पर किया जाता है।

     भागवत्‌गीता में तीसरा सिद्धांत कर्म योग की दार्शनिक पृष्ठभूमि बताकर प्रस्तुत किया गया है। भागवत्‌गीता के अनुसार कर्म मार्ग का अर्थ है मोक्ष के लिए यज्ञ आदि संपन्न करना। भागवत्‌गीता में कर्म योग का प्रतिपादन किया गया है और इस हेतु उन बातों का निराकरण किया गया है जो अनावश्यक रूप से कर्मयोग में पैदा हो गई हैं, जिन्होंने उसे ढक दिया है और विकृत कर दिया है। पहली बात है, अंधविश्वास । गीता का उद्देश्य कर्म योग की आवश्यक शर्त के रूप में बुद्धि योग² के सिद्धांत का निरूपण कर उस अंधविश्वास को समाप्त करना है। यदि व्यक्ति स्थित प्रज्ञ, अर्थात् संयत बुद्धि हो जाए तो कर्मकांड करना कोई गलत बात नहीं है। दूसरा दोष यह है कि कर्मकांड के


1. भगवद्गीता, 4.13
2. वही, 2, 39-53


पीछे स्वार्थ निहित था और यही स्वार्थ कर्म-संपादन के लिए प्रेरणा रहा। इस दोष के निराकरण के लिए भगवत् गीता में अनासक्ति, अर्थात् कर्म के फल की इच्छा किए बिना कर्म¹ के संपादन के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। गीता में कर्म मार्ग² की पुष्टि यह तर्क प्रस्तुत करके की गई है कि अगर इसके मूल में बुद्धि योग हो और कर्म के कारण किसी फल की इच्छा की भावना न हो तो कर्मकांड के सिद्धांत में कोई त्रुटि नहीं है। इसी क्रम में अन्य सिद्धांतों के संबंध में विचार करना उचित ही है कि गीता में दार्शनिक आधार पर इनकी पुष्टि किस प्रकार की गई है, जो पहले अस्तित्व में ही नहीं थे। परंतु यह तभी हो सकता है, यदि कोई व्यक्ति भागवत्‌गीता पर कोई शोध प्रबंध लिखे। यह इस अध्याय के कार्य क्षेत्र के परे की बात है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय साहित्य में गीता के समुचित महत्व का आकलन करना है। इसलिए मैंने मुख्य-मुख्य सिद्धांतों को चुना है, ताकि मैं अपनी व्याख्या की पुष्टि कर सकूं। निश्चित ही मेरी व्याख्या को लेकर दो और प्रश्न हो सकते हैं। भागवत्‌गीता में जिन सिद्धांतों की दार्शनिक पुष्टि की गई है, वे किन व्यक्तियों के हैं? भगवत्‌गीता के लिए इन सिद्धांतों की पुष्टि करना क्यों आवश्यक हो गया था?

     प्रथम प्रश्न से प्रारंभ किया जाए। गीता में जिन सिद्धांतों की पुष्टि की गई है, वे प्रतिक्रांति के सिद्धांत हैं जो प्रतिक्रांति की बाइबिल, अर्थात् जैमिनि कृत पूर्वमीमांसा में वर्णित हैं। इस तर्क को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यदि कोई कठिनाई है, तो यह मुख्यतः कर्म योग शब्द का गलत अर्थ करने से संबंधित है। भगवत् गीता के अधिकांश भाष्यकार 'कर्म योग' शब्द का अनुवाद 'कार्य' और 'ज्ञान योग' शब्द का अनुवाद 'ज्ञान' करते हैं और भागवत्‌गीता पर यह समझकर विचार करते हैं कि इसमें सामान्य रूप में ज्ञान और कर्म में तुलना और उनके अंतर का विवेचन किया गया है। यह बिल्कुल गलत है। भगवद्गीता का उद्देश्य कर्म बनाम ज्ञान विषय पर कोई सामान्य या दार्शनिक चर्चा करना नहीं है। वास्तव में गीता का संबंध विशेष विषय से है, सामान्य विषय से नहीं है। कर्मयोग अथवा कर्म के बारे में गीता का आशय उन सिद्धांतों से है, जो जैमिनि के कर्मकांड में दिए गए हैं और ज्ञान योग अथवा ज्ञान का आशय उन सिद्धांतों से है, जो बादरायण के ब्रह्म सूत्र में दिए गए हैं। गीता में कर्म की चर्चा का आशय कर्म या अकर्म, निवृत्तिवाद या प्रवृत्तिवाद से नहीं है, सामान्य अर्थ में इस चर्चा का आशय धार्मिक अनुष्ठान तथा उनके पालन से है, और जिसने भी गीता को पढ़ा है, वह इस बात से इंकार नहीं करेगा। गीता को एक ऐसे दल की प्रचार सामग्री ( पेम्फलेट) के स्तर से ऊंचा उठाकर लिखने का प्रयास किया गया, जो क्षुद्र विवाद में उलझ गया था और जिससे ऐसा लगे कि वह उच्च दर्शन के विषयों पर लिखा गया कोई अच्छा-खासा भाष्य हो। इसलिए कर्म और ज्ञान शब्दों के अर्थ का


1. भगवद्गीता, 2, 47
2. यह भगवद्गीता, 2, 48 में निष्कर्ष के रूप में मिलता है।


विस्तार किया गया और इन्हें सामान्य शब्दों के रूप में ग्रहीत किया गया। देशभक्त भारतीयों के इस रहस्य के लिए मुख्य दोष श्री तिलक को दिया जाना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि इन गलत अर्थों ने लोगों को भ्रम में डाल दिया और वे यह विश्वास करने लगे कि भागवत्‌गीता एक स्वतंत्र स्वतः पूर्ण ग्रंथ है तथा इसका उस साहित्य से कोई संबंध नहीं है, जो इस ग्रंथ से पूर्व था। परंतु यदि कोई व्यक्ति कर्म योग शब्द के अर्थ को वैसा ही ग्रहण करना चाहता है, जैसा कि भागवत्‌गीता में दिया गया है, तो वह व्यक्ति इस बात से सहमत हो जाएगा कि भगवद्‌गीता में कर्म योग के बारे में कोई अन्य बात नहीं कही गई है, परंतु वहां आशय कर्मकांड के उन सिद्धांतों से है, जिनका प्रतिपादन जैमिनि द्वारा किया गया था तथा जिन्हें गीता द्वारा पुनर्जीवित और पुष्ट करने का प्रयास किया गया है।

     अब दूसरे प्रश्न पर विचार किया जाए। भागवत्‌गीता में प्रतिक्रांति के सिद्धांतों की पुष्टि करना क्यों आवश्यक समझा गया? मैं सोचता हूं कि इसका उत्तर सरल है। यह इसलिए किया गया जिससे इन सिद्धांतों की बौद्ध धर्म के जबरदस्त प्रभाव से रक्षा की जा सके और यही कारण है कि भागवत्‌गीता की रचना की गई। बुद्ध ने अहिंसा का उपदेश दिया। उन्होंने अहिंसा का उपदेश ही नहीं दिया, अपितु ब्राह्मणों को छोड़कर अधिकांश लोगों ने अहिंसा को जीवन शैली के रूप में स्वीकार भी कर लिया था। उनके मन में हिंसा के प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी। बुद्ध ने चातुर्वर्ण्य के विरुद्ध उपदेश दिए। उन्होंने चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत का खंडन करने के लिए बड़ी कटु उपमाएं दीं। चातुर्वर्ण्य का ढांचा चरमरा गया। चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था उलट-पुलट थी । शूद्र और महिलाएं संन्यासी हो सकते थे, ये ऐसी प्रतिष्ठा थी, जिससे प्रतिक्रांति ने उन्हें वंचित कर दिया। बुद्ध ने कर्मकांड और यज्ञ कर्म की भर्त्सना की। उन्होंने इस आधार पर भी उनकी भर्त्सना की कि इन कर्मों के पीछे अपनी स्वार्थ सिद्धि की भावना छिपी हुई थी। इस आक्रमण के विरुद्ध प्रतिक्रांतिवादियों का क्या उत्तर था? केवल यही कि ये बातें वेदों के आदेश हैं, वेद भ्रमातीत है, अतः इन सिद्धांतों के बारे में शंका नहीं की जानी चाहिए ।