प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
गीता को महाभारत के साथ उसकी रचना के संबंध में सहयोजित करने में श्री तिलक का उद्देश्य नितांत स्पष्ट है। वह महाभारत के रचना काल के आधार पर, जो उनके अनुसार ज्ञात है, गीता का रचना - काल निर्धारित करना चाहते हैं जो अज्ञात है। खेद है कि श्री तिलक ने जिस आधार पर महाभारत और भागवत्गीता के बीच निकट संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है, वह उनके सिद्धांत का सबसे दुर्बल पक्ष है। अगर हम यह स्वीकार करें कि गीता महाभारत का भाग इसलिए है कि इन दोनों ही ग्रंथों के रचयिता व्यास हैं और यही श्री तिलक का तर्क है तो यह कल्पना को सच समझने जैसी बात होगी। इस तर्क में यह स्वीकार कर लिया जाता है कि व्यास किसी व्यक्ति विशेष का नाम है जो काफी प्रसिद्ध रहा है। यह उस तथ्य से स्पष्ट है कि हमारे सम्मुख व्यास महाभारत के रचयिता हैं, व्यास पुराणों के रचयिता हैं, व्यास भागवत्गीता के रचयिता हैं और यही व्यास ब्रह्म सूत्रों के भी रचयिता हैं। इसलिए यह बात सच नहीं मानी जा सकती कि वही व्यास इन सभी ग्रंथों के रचयिता हैं, जो शताब्दियों तक अलग-अलग लिखे गए। हम सभी जानते हैं कि धार्मिक लेखक अपना नाम छिपाकर उसके बदले किसी पूज्य नाम का उपयोग करके किस प्रकार अपनी कृति को प्रतिष्ठित करा देते हैं और उन दिनों छद्मनाम या उपनाम के रूप में व्यास नाम का उपयोग करना उनका स्वभाव बन गया था । यदि गीता के रचयिता व्यास हैं तो कोई दूसरा ही व्यक्ति होना चाहिए, जिसने व्यास नाम का उपयोग किया है।
एक अन्य तर्क भी है जो भगवद्गीता और महाभारत की एक ही काल में रचना किए जाने के श्री तिलक के सिद्धांत का विरोध करता है। महाभारत में 18 पर्व हैं। इसके अलावा 18 पुराण भी हैं। यह आश्चर्यजनक बात है कि भागवत्गीता में भी 18 अध्याय हैं। प्रश्न यह है कि यह एक जैसा क्यों है? इसका उत्तर यह है कि प्राचीन भारतीय लेखक कुछ नामों और कुछ संख्याओं के बारे में यह समझते थे कि ये अधिक पवित्र हैं। इस तथ्य का उदाहरण व्यास का नाम और 18 की संख्या है, परंतु भगवद्गीता के अध्यायों को 18 तक निर्धारित करने में जो कुछ ऊपरी तौर से दिखता है, उसकी अपेक्षा कोई और विशेष बात है। किसने 18 को पवित्र संख्या निर्धारित किया। क्या महाभारत ने या गीता ने 18 तक निर्धारित करने में जो कुछ ऊपरी तौर से दिखता है, उसकी अपेक्षा कोई और विशेष बात है किसने 18 को पवित्र संख्या निर्धारित किया। क्या महाभारत ने या गीता ने? यदि महाभारत ने इसे पवित्र संख्या निर्धारित किया, तब गीता महाभारत के बाद ही रची गई। यदि भागवत्गीता ने इसे पवित्र संख्या निर्धारित किया, तो महाभारत की रचना गीता के बाद होनी चाहिए। स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न हो, इन दोनों ग्रंथों की रचना एक ही समय में नहीं की गई होगी।
इस विवेचन को हो सकता है, श्री तिलक के पहले प्रस्ताव की दृष्टि से निर्णायक स्वीकार न किया जाए, परंतु एक तर्क है जिसे मैं निर्णायक समझता हूं। मेरा संकेत महाभारत और भागवत्गीता में कृष्ण की तुलनात्मक स्थिति की ओर है। महाभारत में कृष्ण को कहीं भी भगवान नहीं बताया गया है, जो सभी लोगों को मान्य थे। स्वयं महाभारत में ही यह दिखाया गया है कि जन-समुदाय कृष्ण को प्रथम स्थान देने के लिए भी तैयार नहीं था। राजसूय यज्ञ में जब धर्मराज ने अतिथियों के सत्कार के समय कृष्ण को प्राथमिकता देनी चाही, तब शिशुपाल ने, जो कृष्ण का निकट संबंधी था, कृष्ण का विरोध किया और उन्हें अपशब्द भी कहे। उन्होंने उन्हें निम्न वंश में पैदा हुआ ही नहीं कहा, परंतु उन्हें चरित्रहीन और ऐसा षड्यंत्रकारी कहा जिसने विजय के लिए युद्ध के नियमों का भी उल्लंघन किया। स्वयं महाभारत के गदा पर्व में इसका उल्लेख है कि कृष्ण के ये कुकृत्य इतने घृणित लेकिन सत्यतापूर्ण हैं कि जब दुर्योधन कृष्ण के सामने इनका बखान करता है तब दोषारोपण सुनने के लिए स्वर्ग से देवता आ गए जो दुर्योधन ने कृष्ण के विरुद्ध लगाए थे और उन अभियोगों के सुनने के बाद उन्होंने अपनी सहमति के प्रतीक स्वरूप पुष्पों की वर्षा की कि ये अभियोग पूर्ण सत्य हैं और सत्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। दूसरी ओर भागवत्गीता में कृष्ण को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, पवित्र, प्रिय और सद्गुण के सार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये दोनों रचनाएं, जिनमें एक ही व्यक्ति का परस्पर विरोधी आकलन का इस प्रकार से उल्लेख है, एक ही लेखक द्वारा एक ही काल में नहीं लिखी जा सकतीं। खेद की बात है कि श्री तिलक भगवद्गीता को बौद्ध काल के पूर्व की रचना सिद्ध करते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य को बिल्कुल ही भूल गए ।
श्री तिलक का दूसरा तर्क भी निर्मूल है। भगवद्गीता के रचना - काल को निर्धारित करने का कार्य मृगमरीचिका के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इस तर्क की विफलता निश्चित है। इसका कारण यह है कि गीता अकेली पुस्तक नहीं, जिसे एक ही लेखक ने लिखा होगा । इस ग्रंथ में अलग-अलग अध्याय हैं जिन्हें अलग-अलग लेखकों ने अलग-अलग समय पर रचा है।
प्रोफेसर गार्बे एकमात्र ऐसे विद्वान हैं, जिन्होंने इस प्रकार परीक्षण किया जाना आवश्यक समझा है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भगवद्गीता में अलग-अलग चार भाग हैं। वे एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि आज जिस स्थिति में यह ग्रंथ विद्यमान है, उसमें इन्हें सरलता से निर्दिष्ट किया जा सकता है।
(i) मूल गीता चरणों द्वारा वर्णित या गाई गई वीर गाथा मात्र है कि अर्जुन किस प्रकार युद्ध करने के लिए तैयार नहीं था तथा कृष्ण ने उन्हें युद्ध करने के लिए किस प्रकार प्रेरित किया और अर्जुन ने यह बात मान ली आदि-आदि। यह कौतूहल भरी कहानी रही होगी, परंतु इसमें कुछ भी धार्मिक अथवा दार्शनिक नहीं था।
मूल गीता अध्याय 1 अध्याय 2 और अध्याय 11 के श्लोक 32-33 में मिलती है जिसमें कृष्ण ने अपने तर्क का समापन इस प्रकार किया है :
“मेरे साधन बनो, मेरी इच्छा का पालन करो। युद्ध-जन्य पाप और अनिष्ट की चिंता मत करो, वही करो जैसा कि मैं कहूं। धृष्ट मत बनो।”
यही वह तर्क है जिसका कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए बाध्य करने के लिए प्रयोग किया था और प्रेरणा और आग्रह भरे इसी तर्क ने अर्जुन को राजी कर लिया था । कृष्ण ने संभवतः यह धमकी दी होगी कि अगर उसने युद्ध नहीं किया तो वह बल प्रयोग करेंगे। कृष्ण द्वारा अपने विश्व रूप का अहंकार जताना इस बल प्रदर्शन का केवल एक रूप है। इसी सिद्धांत के आधार पर वर्तमान गीता में विश्व रूप से संबंधित अध्याय का मूल भगवद्गीता का एक भाग होना संभव हो सकता है।
(ii) मूल भागवत्गीता में प्रथम क्षेपक उसी अंश का एक भाग है जिसमें कृष्ण को ईश्वर कहा गया है और उन्हें भागवत धर्म में परमेश्वर कहा गया है। गीता का यह भाग वर्तमान भागवत्गीता के उन श्लोकों में मिलता है जहां भक्ति योग का विवेचन है।
(iii) मूल भागवत्गीता में दूसरा क्षेपक वह भाग है जहां उस पूर्व मीमांसा के सिद्धांतों की पुष्टि के रूप में सांख्य और वेदांत दर्शन का वर्णन है जो उनमें पहले नहीं था । गीता प्रारंभ में एक ऐतिहासिक आख्यान था जिसमें कृष्ण भक्ति बाद में समाविष्ट कर दी गई। भागवत्गीता में दर्शन संबंधी अंश बाद में जोड़ा गया, यह मूल संवाद की शैली और उसके क्रम से सरलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है।
अध्याय 1, श्लोक 20-47 में अर्जुन उन कठिनाइयों का वर्णन करते हैं। अध्याय 2 में कृष्ण अर्जुन द्वारा बताई गई कठिनाइयों को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार तर्क-वितर्क का क्रम चलता है। कृष्ण का प्रथम तर्क श्लोक दो और तीन में दिया गया है। जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उसका यह आचरण अकीर्तिकर है और आर्य के लिए अशोभनीय है, वह अपुरुषोचित कार्य न करे, यह उसकी जो उनके मर्यादा के प्रतिकूल है। इस तर्क का अर्जुन ने जो उत्तर दिया है, वह श्लोक 4 से 8 तक वर्णित है।
श्लोक 4 और 5 में अर्जुन कहता है कि 'मैं भीष्म और द्रोण की हत्या कैसे कर सकता हूं जो सर्वोच्च आदर के पात्र हैं। इनकी हत्या करने की अपेक्षा भिक्षार्जन करके जीवन यापन करना श्रेयस्कर है। मैं इन वृद्ध और पूज्य जनों का वध कर राज्य-सुख भोगने के लिए जीवनयापन नहीं करना चाहता । ' श्लोक 6 से 8 तक अर्जुन कहता है: 'इन दो में क्या श्रेयस्कर है, यह मैं नहीं जानता। क्या हमें कौरवों का समूल नाश करना श्रेयस्कर है अथवा उनके द्वारा हमें पराजित होना श्रेयस्कर है।' अर्जुन के इस प्रश्न का जो उत्तर कृष्ण ने दिया, वह 11 से 39 तक के श्लोकों में मिलता है। इस उत्तर में कृष्ण यह प्रतिपादित करते हैं (1) कि शोक करना अनुचित है क्योंकि सारी वस्तुएं नाशवान होती हैं, (2) यह धारणा असत्य है कि व्यक्ति मर जाता है क्योंकि आत्मा शाश्वत है, और (3) उसे युद्ध करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय का कर्तव्य युद्ध करना होता है । '
जो भी व्यक्ति इस संवाद को पढ़ता है, उसके मन में निम्नलिखित विचार आते हैं:
(1) अर्जुन ने जो प्रश्न प्रस्तुत किए, वे दार्शनिक प्रश्न नहीं हैं। वे स्वाभाविक प्रश्न हैं जो ऐसे लौकिक व्यक्ति द्वारा किए गए हैं जो सांसारिक समस्याओं से जूझ रहा है।
(2) कुछ सीमा तक कृष्ण इन प्रश्नों को स्वाभाविक प्रश्न मानते हैं और इनका नितांत स्वाभाविक उत्तर भी देते हैं।
(3) यह संवाद एक नया मोड़ ले लेता है। अर्जुन ने जब कृष्ण को यह सूचित कर दिया कि वह निश्चय ही युद्ध नहीं करेगा तब वह एक नया प्रश्न करता है और यह संदेह व्यक्त करता है कि कौरवों को मारना श्रेयस्कर है अथवा उनके हाथों मारा जाना श्रेयस्कर है।
यह परिवर्तन सोद्देश्य किया गया जिससे कृष्ण युद्ध की दार्शनिक दृष्टि से पुष्टि कर सके जो अर्जुन के कथन के संदर्भ में अनावश्यक था ।
(4) इसके बाद श्लोक 31 से 38 तक कृष्ण की वाणी मृदु हो जाती है। वह प्रश्न को स्वाभाविक बताते हैं और अर्जुन से युद्ध करने के लिए कहते हैं क्योंकि क्षत्रिय का कर्तव्य युद्ध करना है।
कोई भी पाठक इससे यह समझ सकता है कि वेदांत दर्शन का विवेचन नितांत अप्रासंगिक है और बाद में जोड़ा गया है। जहां तक सांख्य दर्शन का संबंध है, स्थिति बड़ी ही स्पष्ट है। अर्जुन के प्रश्न न करने पर भी इसका अक्सर विवेचन किया गया है। जब कभी इसका किसी प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रतिपादन किया गया है, तब उस प्रश्न का युद्ध से कोई संबंध नहीं है। इससे यह पता चलता है कि भगवद्गीता का दार्शनिक अंश मूल गीता के अंश नहीं हैं परंतु इन्हें बाद में जोड़ा गया है और उनके लिए स्थान देने के लिए अर्जुन से कुछ नवीन, समुचित और प्रमुख प्रश्न करवाए गए हैं जिनका युद्ध की लौकिक समस्याओं से कोई संबंध नहीं है।