प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
(iv) मूल भागवत्गीता के तीसरे क्षेपक में वे श्लोक आते हैं, जिसमें कृष्ण को ईश्वर के स्तर से परमेश्वर के स्तर पर पहुंचा दिया गया है। यह क्षेपक अध्याय 10 और 15 में मिलता है।
जैसा कि मैंने कहा था कि भागवत्गीता के रचना - काल का सटीक निर्धारण करना व्यर्थ का कार्य है और इसकी तभी कोई उपयोगिता हो सकती है, जब हर क्षेपक के रचना - काल का पता लगाने की कोशिश की जाए। अगर इस दिशा में प्रयत्न किया जाए तब, जैसा कि मैंने कहा, दर्शन रहित मूल गीता महाभारत के मूल पाठ, अर्थात् जय का भाग हो सकती है। मूल भगवद्गीता में पहला क्षेपक जिसमें कृष्ण को ईश्वर के रूप में व्यक्त किया गया है, मेगस्थनीज के कुछ बाद के समय का होना चाहिए जब कृष्ण केवल जनजातियों के ईश्वर थे।¹ यह कितने बाद का समय है, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह काफी बाद का समय होना चाहिए क्योंकि यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शुरू में कृष्ण मत के प्रति ब्राह्मणों की मैत्री नहीं थी । वस्तुतः वे इसके विरोधी थे।² ब्राह्मणों को कृष्ण पूजा स्वीकार करने में कुछ समय अवश्य लगा होगा।³
मूल भगवद्गीता में दूसरा क्षेपक वह अंश है जहां सांख्य और वेदांत का विवेचन है। यह जैमिनि और बादरायण के सूत्रों के बाद रखे जाने चाहिए जिसका कारण दिया जा रहा है। इन सूत्रों के रचना - काल के बारे में प्रो. जैकोबी ने सतर्कतापूर्वक जांच की है। ⁴ उनका कहना है कि इन सूत्रों की रचना लगभग 200 से 300 ईसवी के बीच हुई।
मूल भगवद्गीता में तीसरा क्षेपक, जहां कृष्ण को ऊंचा उठाकर परमेश्वर का दर्जा दिया है, गुप्त सम्राटों के शासन काल में जोड़ा गया होगा। इसका कारण स्पष्ट है। जिस प्रकार शक सम्राटों ने महादेव को अपना इष्ट देवता स्वीकार किया था उसी प्रकार गुप्त वंश के सम्राटों ने कृष्ण - वासुदेव को अपना इष्टदेव स्वीकार कर लिया था। ब्राह्मणों
1. डॉ. भंडारकर अपनी पुस्तक शैविज्म एंड वैष्णविज्म ( शैववाद और वैष्णववाद) में कहते हैं, 'यदि वासुदेव कृष्ण की उपासना प्रथम मौर्य सम्राट के राज्य काल में प्रचलित थी तो यह उपासना मौर्य वंश की स्थापना से बहुत पूर्व काल से ही शुरू हुई होनी चाहिए।' यह एक ऐसा अपवादित कथन है जिस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। परंतु मुझे ऐसा लगता है कि जनजातीय ईश्वर के रूप में कृष्ण और विश्वव्यापी ईश्वर के रूप में कृष्ण के बीच अंतर किया जाना चाहिए। जनजातीय ईश्वर के रूप में कृष्ण का वही समय हो सकता है जिसका सुझाव डॉ. भंडारकर ने दिया है लेकिन यह उनके विश्वव्यापी रूप में पूजे जाने का नहीं हो सकता। गीता में हम उनके दूसरे रूप से संबंधित है।
2. देखें, श्याम शास्त्री मेमोरियल वोल्यूम ।
3. कृष्ण मत का विरोध बहुत बाद में शंकराचार्य जैसों ने भी किया।
4. अमेरिकन ओरिएंटल सोसायटी की पत्रिका में दि डेट्स ऑफ दि फिलोसोफिल सूत्राज ऑफ दि ब्राह्मणाज
शीर्षक लेख, खंड 31, 1911
ने, जिनके लिए धर्म एक व्यापार था और जो कभी भी एक ईश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं रहे, अपने शासकों को प्रसन्न करने के लिए उनके इष्टदेव को एक उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर के रूप में स्वीकार कर उसकी पूजा करनी आरंभ कर दी। अगर यह सही व्याख्या है तब मूल भगवद्गीता में यह क्षेपक 400 से 464 ई. के बीच जोड़ा गया होगा।
इन सब प्रमाणों से इस मत को सिद्ध करने में सहायता मिलती है कि भागवत्गीता को बौद्ध धर्म से पूर्व की रचना बताने के प्रयत्न सफल नहीं हो सकते। यह उन लोगों की हवाई कल्पना का नतीजा है जिन्हें बुद्ध और उनके क्रांतिकारी सिद्धांतों के प्रति तिरस्कार की भावना पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई है। इतिहास इसे सिद्ध नहीं करता । इतिहास इस बात को बड़ी ही स्पष्टतापूर्वक सिद्ध करता है कि भगवद्गीता के वे अंश जिनका कुछ सैद्धांतिक महत्व है, हर प्रकार से बौद्ध सिद्धांतों और जैमिनि और बादरायण के सूत्रों के काफी बाद के हैं।
रचना - काल के बारे में विवेचन से केवल यही सिद्ध नहीं होता कि भागवत्गीता हीनयान बौद्ध धर्म के, बल्कि यह भी सिद्ध होता है कि महायान बौद्ध धर्म के भी बाद की है। प्रायः लोगों की यह धारणा है कि महायान बौद्ध धर्म का उद्भव बाद में हुआ था। कहा जाता है कि इसका उद्भव 100 ईसवी में हुआ, जब कनिष्क ने बौद्ध धर्म में आपसी मतभेद पर निर्णय करने के लिए तृतीय बौद्ध परिषद का आयोजन किया था। यह नितांत भ्रम है।¹ यह कहना सच नहीं कि परिषद होने के बाद बौद्ध धर्म के एक नए संप्रदाय का जन्म हुआ। जो कुछ हुआ, वह यह कि जो लोग वृद्ध हो चले थे, उनके लिए व्यंग्य के रूप में कुछ नए नाम चल पड़े। श्री किमूर का कहना है कि महायान बौद्धों के उस वर्ग का नाम है जिन्हें महासंघिक कहा जाता था। महासंघिकों का यह संप्रदाय उससे बहुत पहले बन गया था जितना कि कहा जाता है। अगर जनश्रुति पर विश्वास किया जाए तब हम कह सकते हैं कि बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद अर्थात् 307² ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में बौद्ध सिद्धांतों को निश्चित करने के लिए हुई प्रथम बौद्ध परिषद के बाद यह अस्तित्व में आया और इस संप्रदाय ने बौद्ध धर्म के थेरवाद संप्रदाय के विरोध का नेतृत्व किया जिसे बाद में तिरस्कार स्वरूप हीनयान ( अर्थात् निम्न पथ के अनुगामी) कहा गया। जिस समय महासंघिकों का, जिन्हें बाद में महायानवादी कहा गया, उदय हुआ, उस समय भागवत्गीता का कहीं पता भी नहीं था।
1. इस सारे विषय पर देखिए, ए हिस्टोरिकल स्टडी ऑफ दि टर्म्स हीनयान एंड महायान और दि ओरिजिन ऑफ महायान बुद्धिज्म, लेखक रीकन किमूर, कलकत्ता यूनिवर्सिटी 1927
2. यह तब है जब बुद्ध के परिनिर्वाण की तिथि 543 ईसा पूर्व की मान ली जाए, लेकिन अगर उनके परिनिर्वाण की तिथि 453 ईसा पूर्व मानी जाती है तब यह 217 ईसा पूर्व होगी।
महायानियों ने भगवत्गीता से क्या ग्रहण किया? वास्तव में ये भगवत् गीता से ग्रहण ही क्या कर सकते थे? जैसा कि श्री किमूर बताते हैं - बौद्ध धर्म के प्रत्येक संप्रदाय की चिंता कम से कम तीन मुख्य सिद्धांतों को लेकर थी 1. ऐसे सिद्धांत जिनमें ब्रह्मांड के अस्तित्व का विवेचन हो, 2. ऐसे सिद्धांत जिनमें बुद्ध के उपदेशों का विवेचन हो, और 3. जो मानव जीवन की अवधारणा से संबंधित हो । महायान इसके लिए कोई अपवाद नहीं था। महायान बुद्ध के उपदेशों के अतिरिक्त भगवत् गीता से कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता था। विभिन्न सिद्धांतों को लेकर इनके दृष्टिकोण में इतना अंतर है कि वह संभावना भी समय के अंतर के कारण नहीं दीखती ।
पूर्ववर्ती विवेचन मेरी स्थापना के विरुद्ध किए जा सकने वाले अकेले इस आरोप को पूर्णतः खंडित कर देता है, अर्थात् भगवत्गीता अति प्राचीन है, बौद्ध काल से पहले रची गई थी और इसलिए इसका जैमिनि की पूर्व - मीमांसा से कोई संबंध नहीं है और इसमें उनके प्रतिक्रियावादी सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करने का प्रयत्न नहीं किया गया है।
सार रूप में, मेरी स्थापना के तीन पक्ष हैं। दूसरे शब्दों में, इसमें तीन भाग हैं। पहला यह कि भगवत्गीता मूलत: प्रतिक्रांति की उसी वर्ण की कृति है जैसी जैमिनि की पूर्व-मीमांसा नामक कृति है - प्रतिक्रांति की आधिकारिक बाइबिला कुछ लोग अध्याय 2 के 40 से 46 तक के श्लोकों का सहारा लेते हैं और यह विचार व्यक्त करते हैं कि भगवत् गीता.... |
(हमारे पास इस लेख की जितनी भी प्रतियां उपलब्ध हैं, उनमें यह लेख इसी स्थान पर अधूरा छोड़ दिया गया है जैसा कि उपर्युक्त वाक्य से स्पष्ट है ) - संपादक