प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
उद्योग पर्व
1. अभिमन्यु के विवाह के बाद यादव तथा पांडव सम्राट विराट की सभा में एकत्र हुए। कृष्ण उन्हें संबोधित करते हैं कि भविष्य में क्या करना है। हमें वही करना चाहिए जो कौरवों और पांडवों, दोनों के ही हित में हो। धर्म कुछ भी स्वीकार कर सकता है। यहाँ तक कि एक गांव भी धर्म स्वीकार कर सकता है। यदि उसे दुर्योधन का पूरा साम्राज्य भी दिया जाए तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी तक पांडवों ने नीति का पालन किया है। परन्तु यदि कौरव अनीति का पालन करते हैं, तो पांडवों को कौरवों का नाश करने में कोई हिचक नहीं होगी। किसी को भी इस तथ्य से भयभीत नहीं होना चाहिए कि पांडव अल्पसंख्यक हैं। उनके मित्र हैं जो उनकी सहायता करने आ जाएंगे। हमें कौरवों की इच्छा का पता करना चाहिए। मेरा सुझाव है कि हमें दुर्योधन के पास एक संदेशवाहक भेजना चाहिए और उससे यह कहा जाए कि वह अपने साम्राज्य का एक भाग पांडवों को दे दे। - (वही, अध्याय-1 )
2. बलराम कृष्ण के सुझाव का समर्थन करता है, परंतु आगे कहता है कि यह धर्म की भूल थी, जब कि वह जानता था कि वह शकुनि के हाथों से पराजित हो रहा है। इसलिए कौरवों के साथ युद्ध न करके यह ठीक होगा कि संधि-वार्ता से जो कुछ भी मिले, उसे प्राप्त करना चाहिए। - (वही, अध्याय-2 )
3. सात्यकी उठ खड़े हुए और उन्होंने बलराम की प्रवृत्ति की भर्त्सना की । - (वही, अध्याय-3)
4. द्रुपद ने सात्यकी का समर्थन किया। द्रुपद इस बात पर सहमत हो गए कि वह अपने पुरोहित को संदेशवाहक के रूप में भेजेंगे। - (वही, अध्याय - 4 )
5. कृष्ण ने द्रुपद का समर्थन किया और वह द्वारका चले जाते हैं। द्रुपद और विराट द्वारा आमंत्रित सभी सम्राट आ पहुंचते हैं। इसी प्रकार दुर्योधन द्वारा जिन सम्राटों को आमंत्रित किया गया, वे भी पहुंच गए। - (वही, अध्याय-5 )
6. द्रुपद अपने पुरोहित को निर्देश देता है कि उसे सभा में किस प्रकार बोलना है तथा इस मामले को सुलझाना है । - (वही, अध्याय - 6 )
7. अर्जुन और दुर्योधन, दोनों ही द्वारका जाते हैं तथा युद्ध के लिए उनसे सहायता की याचना करते हैं। उसने कहा कि वह उन दोनों की सहायता करेगा। मैं एक को अपनी सेना दे सकता हूँ और दूसरे के साथ अकेला रह सकता हूँ। आप यह चुनें कि आपको क्या चाहिए। दुर्योधन ने सेना को चुना। अर्जुन ने कृष्ण को चुना। - (वही, अध्याय - 7 )
8. शल्य का बृहद् सेना के साथ पांडवों के पास आना । दुर्योधन उसे निम्न वर्ग का मानता है। शल्य और पांडवों की बैठक। पांडव शल्य से निवेदन करते हैं कि युद्ध में कर्ण को हतोत्साहित किया जाए। शल्य के साथ समझौता । - (वही, अध्याय-8 )
9. अध्याय-9- असंगत।
10. अध्याय-10-असंगत ।
11. अध्याय-11- असंगत ।
12. अध्याय-12- असंगत।
13. अध्याय-13- असंगत।
14. अध्याय-14- असंगत ।
15. अध्याय-15- असंगत।
16. अध्याय-16- असंगत।
17. अध्याय-17- असंगत ।
18. अध्याय-18 - असंगत ।
19. सात्यकी अपनी सेना सहित पांडवों के पास आता है और भागदत्ता दुर्योधन के पास जाता है।- (वही, अध्याय-19 )
20. द्रुपद का पुरोहित कौरवों की सभा में प्रवेश करता है । पुरोहित ने कहा कि पांडव कौरवों के कुकृत्यों को भूल जाने के लिए तैयार हैं और उनके साथ संधि करना चाहते हैं। उसने बताया कि पांडवों के पास भारी सेना है फिर भी वे संधि करना चाहते हैं। - (वही, अध्याय-20 )
21. भीष्म पुरोहित का समर्थन करता है। कर्ण आपत्ति करता है। भीष्म और कर्ण के बीच वाद-विवाद । धृतराष्ट्र सुझाव देता है कि संजय को उनकी ओर से समझौता करने के लिए भेजा जाए। (वही, अध्याय-21 )
22. धृतराष्ट्र संजय को पांडवों के पास भेजता है और उससे कहता है कि इस अवसर पर जो भी उचित समझो, वही कहो जिससे दोनों के बीच शत्रुता न बढ़े। - (वही, अध्याय-22)
23. संजय का पांडवों के पास जाना। - (वही, अध्याय-23)
24. संजय और युधिष्ठिर के बीच बातचीत । - (वही, अध्याय-24 )
25. संजय युद्ध की निंदा करता है। - (वही, अध्याय-25)
26. धर्म का कहना है, 'मैं समझौता करने के लिए तैयार हूँ, यदि कौरव हमारे इंद्रप्रस्थ साम्राजय को हमें वापस कर दें।'- (वही, अध्याय-26)
27. गुरुजन का वध करना और साम्राज्य को प्राप्त करना अधर्म है। यदि कौरव बिना युद्ध के किसी साम्राज्य को वापस करने से इंकार करते हैं तो यह अच्छा रहेगा कि आप वृष्णि और अंधक के साम्राज्य में भिक्षा मांगकर जीवनयापन करें। - (वही, अध्याय-27)
28. इस अध्याय में कहा गया है कि क्या संजय उन्हें धर्म के विरुद्ध कार्य करने अथवा धर्म के विरुद्ध किए गए कार्य का दोषी मानता है। संजय कहता है कि 'मैं स्वधर्म अथवा क्षमा को चाहता हूँ । ' - (वही, अध्याय-28)
29. कृष्ण संजय से कहते हैं कि युद्ध क्यों वैध है और संजय को बताते हैं कि वह धृतराष्ट्र को उनके विचारों से अवगत करा दें । - (वही, अध्याय-29)
30. संजय कौरवों के पास आता है और दुर्योधन को युद्ध करने के लिए कहता है। दुर्योधन को या तो इंद्रप्रस्थ पांडवों को वापस कर देना चाहिए अथवा युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। - (वही, अध्याय-30 )
31. संजय दुर्योधन से कहता है कि वह स्वयं जीवित रहे और उन्हें जीवित रहने दे। यदि वह इंद्रप्रस्थ वापस नहीं कर सकता तो उन्हें कम से कम पांच गांव दे देने चाहिए।- (वही, अध्याय - 31 )
32. संजय रात्रि में धृतराष्ट्र के पास पहुंचता है और उससे कहता है कि मैं प्रातः धर्म के संदेश को बताऊंगा। - (वही, अध्याय-32 )
33. धृतराष्ट्र बेचैन होता है और उस संदेश के बारे में जानना चाहता है जो संजयलाया है। इसलिए वह संजय को शीघ्र बुलाता है। संजय उनका संदेश देता है और कहता है कि साम्राज्य का उनका भाग उन्हें देकर समझौता कर लिया जाए। - (वही,अध्याय-33)
34. धृतराष्ट्र विदुर को आमंत्रित करता है और उसका परामर्श मांगता है। उसका परामर्श यह हैं कि पांडवों को उनके साम्राज्य का भाग दे दिया जाए। - (वही, अध्याय-34)
35. अध्याय-35- असंगत।
36. असंगत । विदुर का कहना है कि दोनों पक्षों को मित्र होना चाहिए। - (वही, अध्याय-36)
37. अध्याय-37- असंगत।
38. अध्याय-38- असंगत।
39. धृतराष्ट्र विदुर से कहता है कि मैं दुर्योधन को छोड़ नहीं सकता, यद्यपि वह बुरा है।- (वही, अध्याय-39)
40. विदुर चातुर्वर्ण्य का वर्णन करता है।- (वही, अध्याय - 40 )
41. धृतराष्ट्र विदुर से बह्मा के बारे में पूछता है। वह कहता है कि मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं शूद्र हूं। इसके बाद सनत सुजाता आता है । - (वही, अध्याय-41 )
42. ब्रह्म विद्या के बारे में धृतराष्ट्र और सनत सुजाता में परस्पर वार्तालाप होता है।-(वही, अध्याय-42)
43. सनत सुजाता और धृतराष्ट्र के बीच एक ही विषय पर विचार-विमर्श किया जाता है।- (वही, अध्याय-43)
44. ब्रह्म विद्या पर सनत सुजाता के विचार । - (वही, अध्याय - 44 )
45. सनत सुजाता योग का उपदेश देता है । - (वही, अध्याय - 45 )
46. सनत सुजाता आत्मा के बारे में बताता है । - (वही, अध्याय-46 )
47. कौरवों संजय द्वारा लाए गए संदेश को सुनने के लिए सभा में आते है। - (वही, अध्याय-47 )
48. संजय संदेश सुनाता है। (संदेश का, विशेषकर वह अंश, जो अर्जुन ने कहा था) । - (वही, अध्याय-48 )
49. भीष्म द्वारा कृष्ण और अर्जुन की प्रशंसा । कर्ण क्रोधित हो उठता है । द्रोण भीष्म का समर्थन करता है और समझौता करने का परामर्श देता है।- (वही, अध्याय-49)
50. धृतराष्ट्र संजय से मालूम करता है कि पांडवों और उनके कौन-कौन मित्र हैं तथा उनकी कितनी शक्ति है? संजय उलाहना देता है तथा उत्तर देता है। - (वही, अध्याय-50 )
51. धृतराष्ट्र के पराक्रम का विचार करता है और चिंतित होता है । - (वही, अध्याय-51)
52. धृतराष्ट्र अर्जुन के पराक्रम का विचार करता है और चिंतित होता है। (वही, अध्याय-52)
53. धृतराष्ट्र धर्म और उसके मित्रों के पराक्रम का विचार करता है। वह अपने पुत्रों से कहता है कि वे पांडवों के साथ संधि कर लें।- (वही, अध्याय - 53 )
54. संजय कौरवों की पराजय की भविष्यवाणी करता है। - (वही, अध्याय - 54 ) 55. दुर्योधन कहता है कि पांडव हमें पराजित नहीं कर सकते, क्योंकि हमारा सैन्य बल अधिक है। - (वही, अध्याय-55)
56. संजय पांडवों द्वारा सेना की सुव्यवस्था का वर्णन करता है । - (वही, अध्याय-56)
57. संजय यह बताता है कि पांडवों ने कौरवों के योद्धाओं को मौत के घाट उतारने की किस प्रकार की योजना तैयार की है। दुर्योधन कहता है कि वह पांडवों से भयभीत नहीं है कि वे कौरवों को पराजित कर देंगे। कौरवों के पास अधिक सेना है । - (वही, अध्याय 57 )
58. धृतराष्ट्र दुर्योधन से कहता है कि वह युद्ध न करे। दुर्योधन शपथ लेता है कि वह युद्ध से विमुख न होगा। धृतराष्ट्र रो पड़ता है।- (वही, अध्याय-58)
59. धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि वह उसे बताए कि कृष्ण और अर्जुन के बीच क्या वार्तालाप हुआ ? - (वही, अध्याय - 59 )
60. धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को बताया कि देवता पांडवों की सहायता करेंगे और कौरवों का विनाश कर देंगे। - (वही, अध्याय-60 )
61. दुर्योधन कहता है कि वह इससे भयभीत नहीं है । - (वही, अध्याय-61)
62. कर्ण कहता है कि वह स्वयं अर्जुन का वध करने में सक्षम है। - (वही, अध्याय-62)
63. दुर्योधन कहता है कि वह कर्ण पर निर्भर होकर युद्ध कर रहा है और उसे भीष्म, द्रोण आदि पर उतना विश्वास नहीं है। - (वही, अध्याय-63)
64. विदुर दुर्योधन से कहता है कि शत्रुता त्याग दे । - (वही, अध्याय-64)
65. धृतराष्ट्र दुर्योधन की भर्त्सना करता है । - (वही, अध्याय-65)
66. संजय अर्जुन का संदेश धृतराष्ट्र को बताता है । - (वही, अध्याय-66)
67. जो सम्राट कौरवों के सभागार में एकत्र हुए थे, से अपने-अपने गृहों को लौट गए। व्यास और गांधारी विदुर के साथ आते है । व्यास ने संजय से कहा कि वह धृतराष्ट्र को वह सभी बताए, जो उसे कृष्ण के वास्तविक स्वरूप और अर्जुन के बारे में ज्ञात है। - (वही, अध्याय-67)
68. संजय धृतराष्ट्र को कृष्ण के बारे में बताते हैं । - (वही, अध्याय - 68 )
69. धृतराष्ट्र दुर्योधन से कहता है कि वह कृष्ण के आगे आत्म समर्पण कर दे। दुर्योधन इंकार करता है। गांधारी दुर्योधन से अपशब्द कहती है। - (वही, अध्याय-69)
70. कृष्ण के अलग-अलग नाम और उनका मूल।- (वही, अध्याय-70 )
71. धृतराष्ट्र कृष्ण को समर्पित हो जाता है।- (वही, अध्याय - 71)
72. युधिष्ठिर और कृष्ण में संवाद । युधिष्ठिर बताता है कि संजय ने उससे कहा है कि धृतराष्ट्र पर विश्वास न किया जाए। युधिष्ठिर संपत्ति के महत्व पर बल देता है। क्षात्रधर्म के बारे में बताता है तथा उसके पालन की आवश्कता पर बल देता है। कृष्ण स्वयं कौरवों के पास जाने का सुझाव देता है। युधिष्ठिर को वह विचार अच्छा नहीं लगता, परंतु वह यह कहता है कि कृष्ण जो कहते हैं, वही सर्वोत्तम है। - (वही, अध्याय-72)
73. कृष्ण धर्म को वह रहस्य बताते हैं, जो उनके मन में है। कृष्ण धर्म से कहते हैं कि कौरवों के साथ मधुर वचन कहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे अन्य कई कारण हैं कि आपको कौरवों के साथ समझौता क्यों नहीं करना चाहिए। इस बात पर बल देना है कि कौरवों ने द्रौपदी को कितना अपमानित किया? इसलिए हे धर्म! उनको मारने में न हिचकिचाओ | - (वही, अध्याय-73)
74. भीम कृष्ण से कहता है कि कौरवों के साथ सौहार्द्र से बातचीत की जाए। - (वही, अध्याय-74)
75. कृष्ण भीम का उपहास करते हैं। - (वही, अध्याय-75 )
76. भीम युद्ध करने के लिए अपना मन पक्का कर लेता है। - (वही, अध्याय-76)
77. कृष्ण भीम को दैव और पौरुष का अंतर समझाते हैं। - (वही, अध्याय-77)
78. अर्जुन कृष्ण से कहता है कि 'क्षमा' अर्थात् युद्ध न करने का विचार किया जाए। - (वही, अध्याय-78)