प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
79. कृष्ण का अर्जुन से संवाद। मैं शांति के समझौते के लिए प्रयत्न करुंगा। यदि वह समझौता संभव नहीं हो तो युद्ध करने के लिए तैयार रहना। मैं दुर्योधन को धर्म की उस सहमति के बारे में नहीं बताऊंगा कि वह पांच गांव स्वीकार करने के लिए सहमत है । - (वही, अध्याय-79)
80. नकुल कृष्ण से कहता है, जो सर्वश्रेष्ठ हो, वही किया जाए। - (वही, अध्याय-80)
81. सहदेव कृष्ण से मिलता है तथा कहता है कि कौरवों के साथ युद्ध किया जाए। सात्यकी ने कहा कि यहां जितने भी योद्धा एकत्र हुए हैं, वे सभी सहदेव के विचार से सहमत हैं। - (वही, अध्याय - 81 )
82. द्रोपदी कृष्ण से भेंट करती है और उन्हें बताती है कि वह तब तक संतुष्ट नहीं होगी, जब तक दुर्योधन का विनाश नहीं हो जाता। कृष्ण उसे आश्वासन देते हैं । - (वही, अध्याय-82)
83. अर्जुन और कृष्ण के बीच अंतिम बैठक होती है। अर्जुन क्षमा, अर्थात् शांति के लिए भरसक प्रयत्न करता है । युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं कि कुंती को आश्वासन दिया जाए। कृष्ण अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए जाते हैं। - (वही, अध्याय-83)
84. कृष्ण जब हस्तिनापुर जाते हैं, तो मार्ग में उन्हें अच्छे और बुरे शकुन होते दिखाई पड़ते हैं।- (वही, अध्याय-84)
85. दुर्योधन कृष्ण के लिए हस्तिनापुर की यात्रा में स्थान-स्थान पार विश्रामालय बनवाते हैं। - (वही, अध्याय-85 )
86. धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि कृष्ण को कौन-कौन से उपहार दिए जाएं। - (वही, अध्याय-86)
87. विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि वह कृष्ण को पांडवों से अलग नहीं मानते। - (वही, अध्याय-87)
88. दुर्योधन का कहना है कि कृष्ण पूज्य हैं। परन्तु यह समय नहीं है कि उनकी पूजा की जाए। भीष्म दुर्योधन से कहते हैं कि पांडवों के साथ समझौता कर लिया जाए। दुर्योधन की इच्छा कृष्ण से साक्षात्कार करने की है। भीष्म दुर्योधन का घोर विरोध करता है।- (वही, अध्याय-88 )
89. कृष्ण हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं। धृतराष्ट्र से भेंट। वे विदुर के यहां ठहरते हैं। - (वही, अध्याय-89)
90. कुंती और कृष्ण की भेंट । कुंती अपने दुःख से आहत है, कृष्ण उसको सांत्वना देते हैं। कुंती कृष्ण से कहती है: (1) मेरे पुत्रों से कहो कि वे अपने साम्राज्य के लिए युद्ध करें। (2) मैं द्रौपदी के लिए दुःखी हूं। - (वही, अध्याय-90)
91. कौरव कृष्ण को भोजन करने के लिए बुलाते हैं। कृष्ण इंकार कर देते हैं। कृष्ण विदुर के साथ भोजन करते हैं।
92. विदुर कृष्ण से कहता है कि वह नहीं चाहता कि कृष्ण कौरवों के बीच जाएं।- (वही, अध्याय-92 )
93. कृष्ण विदुर को बताते हैं कि कौरव उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं। मैं केवल यहां इसलिए आया हूं क्योंकि क्षमा, अर्थात् शांति पुण्यकार्य है । - (वही, अध्याय-93)
94. कृष्ण कौरवों के सभागार में प्रवेश करते हैं। - (वही, अध्याय-94 )
95. कृष्ण सभा को संबोधित करते हैं। उन्होंने कौरवों से कहा कि पांडव शांति और युद्ध, दोनों के लिए ही तैयार हैं। उन्हें उनका आधा साम्राज्य दे दिया जाए । - (वही, अध्याय-95)
96. जामदग्नि दंभ के विरोध में एक कहानी कहता है। - (वही, अध्याय-96) 97. मातलि आख्यान । (वही, अध्याय-97-105)
98. नारद का दुर्योधन को परामर्श । - (वही, अध्याय-106)
99. गाल्व आख्यान। (वही, अध्याय-106-123)
100. धृतराष्ट्र कृष्ण से कहता है कि वह दुर्योधन को परामर्श दे। - (वही, अध्याय-124)
101. भीष्म का दुर्योधन को परामर्श । द्रोण का समर्थन । विदुर दुर्योधन की भर्त्सना करते हैं। धृतराष्ट्र का परामर्श - (वही, अध्याय-125)
102. भीष्म और द्रोण दूसरी बार दुर्योधन को समझाते हैं।- (वही, अध्याय-126)
103. दुर्योधन यह घोषणा करता है कि पांडवों को कुछ भी नहीं दिया जाएगा। - (वही, अध्याय-127)
104. कृष्ण दुर्योधन की भर्त्सना करते हैं। दुर्योधन सभा त्याग देता है। दुःशासन का भाषण। कृष्ण भीष्म को चेतावनी देते हैं।- (वही, अध्याय-128)
104. धृतराष्ट्र विदुर से कहते हैं कि गांधारी को सभागार में लाया जाए। दुर्योधन वापस आता है। गांधारी उससे कहती हैं कि साम्राज्य का आधा भाग पांडवों को दिया जाए।- (वही, अध्याय-129)
104. दुर्योधन सभा का त्याग करता है। उसका इरादा है कि कृष्ण का वध कर दिया जाए। सात्यकि धृतराष्ट्र को इस गुप्त कुचक्र की सूचना देता है। कृष्ण का भाष । धृतराष्ट्र दुर्योधन को सभा में फिर बुलाता है, उसे चेतावनी देता है। विदुर द्वारा भर्त्सना । - (वही, अध्याय-130)
105. भगवान का विश्व रूप दर्शन, धृतराष्ट्र को दिव्य चक्षु प्राप्त होते हैं। कृष्ण सभा छोड़ देते हैं और कुंती के पास जाते हैं। - (वही, अध्याय-131)
106. कृष्ण कुंती से कहते हैं कि सभा में क्या-क्या हुआ। कुंती कृष्ण से कहती है कि क्षत्रियों के लिए युद्ध अनिवार्य है। इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं है। - ( वही अध्याय-132)
107. कुंती अपने मत को पुष्ट करने के लिए कृष्ण से विदुला की कहानी कहती है । - (वही, अध्याय-133)
108. विदुला की कहानी । - (वही, अध्याय-134)
109. विदुला की कहानी । - (वही, अध्याय-135)
110. विदुला की कहानी । - (वही, अध्याय-136)
111. कुंती की अपने पुत्रों को सलाह । कृष्ण का कर्ण को परामर्श और कृष्ण का उपप्लव्य नगरी के लिए प्रस्थान । - (वही, अध्याय - 137 )
112. भीष्म और द्रोण द्वारा दुर्योधन को परामर्श । - (वही, अध्याय-138)
113. भीष्म का दुःख । द्रोण फिर दुर्योधन को परामर्श देता है । - (वही, अध्याय-139)
114. धृतराष्ट्र और संजय के मध्य वार्तालाप | कर्ण को कृष्ण परामर्श देता है । - (वही, अध्याय-140)
115. कर्ण का कृष्ण को उत्तर - (वही, अध्याय-141)
116. कृष्ण का कर्ण को आश्वासन, पांडवों की विजय होगी। - (वही, अध्याय-142)
117. कर्ण को अपशकुन होते हैं। पांडवों को समाप्त करने का उसका दृढ़ निश्चय । उसका गृह को प्रस्थान । - (वही, अध्याय-143)
118. विदुर और पृथु के मध्य वार्तालाप । उसे पता चलता है कि दुर्योधन युद्ध करने के लिए दृढ़ है। कुंती का दुःख । कर्ण को उसके मूल के बारे में बताने की इच्छा। कुंती नदी के किनारे जाती है। - (वही, अध्याय-144 )
119. कुंती कर्ण से भेंट करती है। वह कर्ण को उसके मूल के बारे में बताती है तथा उससे निवेदन करती है कि वह पांडवों के साथ हो जाए।- (वही, अध्याय-145)
120. सूर्य कुंती से प्रस्ताव का समर्थन करता है। कर्ण उसको अस्वीकार कर देता है अर्जुन को छोड़कर सभी पांडवों को बचाने का वचन देता है। - (वही, अध्याय-146) 121. कृष्ण पांडवों के पास जाते हैं। युधिष्ठिर पूछता है कि कौरव - सभा में क्या-क्या हुआ।- (वही, अध्याय-147)
122. कृष्ण पूरी कहानी सुनाता है। - (वही, अध्याय- 147, 148, 149, 150 )
123. पांडवों की सेना के सेनापति की नियुक्ति । कुरुक्षेत्र में पांडवों की सेना का प्रवेश।- (वही, अध्याय-151 )
124. सेना को रसद पहुंचाने के लिए पांडवों की व्यवस्था के विवरण । - (वही, अध्याय-152)
125. कौरवों की ओर प्रबंध हमारी सेना को कल प्रातः ही कुरुक्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। - (वही, अध्याय-153)
126. धर्म को यह भय है कि वह युद्ध करने के लिए गया तो वह अपने नैतिक औचित्य से गिर जाएगा। कृष्ण ने उसे संतुष्ट किया। अर्जुन ने कहा कि तुम्हें युद्ध करना चाहिए। - (वही, अध्याय-154 )
127. दुर्योधन की सेना का विवरण। - (वही, अध्याय-155)
128. भीष्म को कौरव सेना का सेनापति बनाया गया।- (वही, अध्याय- 156 )
कर्ण इससे नाराज होते हैं। वह निर्णय करता है कि भीष्म की मृत्यु होने तक वह कौरव सेना की बागडोर नहीं संभालेगा।
129. कृष्ण पांडवों की सेना के सेनापति बन जाते हैं। - (वही, अध्याय-157)
130. बलराम तीर्थयात्रा पर यह कहकर चले जाते हैं कि मैं कौरवों को नष्ट होते नहीं देखना चाहता।
131. रुक्मिणी को न तो अर्जुन चाहता है और न दुर्योधन चाहता है अतः वह घर चली जाती है। - (वही, अध्याय-158)
132. संजय और धृतराष्ट्र के बीच वार्तालाप । वह धृतराष्ट्र को दोषी ठहराता है। - (वही, अध्याय-159)
133. पांडवों की सेना हिरण्यवती नदी के किनारे ठहरी हुई है। दुर्योधन पांडवों को आक्रमण के लिए ललकारता है और कृष्ण कहते हैं कि यदि तुम युद्ध कर सकते हो तो युद्ध करो। - (वही, अध्याय-160)
134. उल्का संदेश लेकर जाता है। - (वही, अध्याय-164)
135. क्रोधित पांडव गुस्से से भरे संदेश भेजते हैं। वे कल से युद्ध आरंभ करने का आदेश देते हैं।- (वही, अध्याय-162)