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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

IV

    बलि के विरुद्ध दूसरा प्रबल प्रहार कूटदंत सुत्त के नाम से विख्यात उनके प्रवचनों में निहित है। यह इस प्रकार है:

उचित और अनुचित बलि

     1. इस प्रकार मैंने सुना है। जब एक बार महाभाग लगभग पांच सौ बांधवों की भारी भीड़ के साथ यात्रा करते समय मगध से गुजर रहे थे, तो वह ब्राह्मणों के खानुमाता नामक एक गांव में पहुंचे और वहां अम्बलत्तिका विहारोद्यान में ठहरे।

     उस समय ब्राह्मण कूटदंत खानुमाता में ही रहता था। वह एक ऐसा स्थान था, जिसमें जीवन का स्पंदन था, काफी हरित भूमि और वन्य भूमि थी, पर्याप्त मात्रा में जल और अनाज था। मगध के राजा बिम्बसार ने उपहार स्वरूप उसे यह क्षेत्र भेंट किया था। उस पर उसका ऐसा अधिकार था, मानो वह वहां का राजा हो। और तभी ब्राह्मण कूटदंत की ओर से एक विशाल बलि की तैयारी की जा रही थी। सौ सांडों, सौ बछड़ों, सौ बछियों सौ बकरियों और भेड़ों को बलि-स्थल पर लाया गया था ।

     2. जब खानुमाता के ब्राह्मणों और परिवारवालों ने श्रमण गौतम के पहुंचने का समाचार सुना, तो उन्होंने साथियों और भृत्यों के साथ अम्बलत्तिका विहारोद्यान जाने के लिए खानुमाता से प्रस्थान करना शुरू कर दिया।

    3. और तभी ब्राह्मण कूटदंत मध्याह्न विश्राम के लिए अपने मकान के ऊपर की छत पर चला गया था। इस प्रकार लोगों को जाते हुए देखकर उसने अपने द्वारपाल से इसका कारण पूछा। द्वारपाल ने उसे कारण बताया।

uchit aur anuchit Bali - Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    4. तब कूटदंत ने सोचा: 'मैंने यह सुना है कि श्रमण गौतम तीन उपायों और उसके सोलह सहायक उपकरणों से बलि के सफल निष्पादन के बारे में समझ रखते हैं। लेकिन मुझे इस सबकी जानकारी नहीं है, फिर भी मैं बलि देना चाहता हूं। मेरे लिए यह अच्छा रहेगा कि मैं श्रमण गौतम के पास जाऊं और उसके बारे में उनसे पूछूं।'

    इसलिए उसने अपने द्वारपाल को खानुमाता के ब्राह्मणों और अन्य गृहस्थों के पास यह कहने के लिए भेजा कि वे उसकी प्रतीक्षा करें, जिससे कि वह उनके साथ ही महाभाग से मिलने जा सके।

    5. लेकिन उस समय विशाल बलि में भाग लेने के लिए बहुत से ब्राह्मण गांव में ठहरे हुए थे। और जब उन्होंने इस बारे में सुना तो वे कूटदंत के पास गए और उसे वहां न जाने के लिए उसी आधार पर समझाया, जिस आधार पर ब्राह्मणों ने पहले सोनदंड को समझाया था। लेकिन उसने भी उन्हें उसी प्रकार का उत्तर दिया, जैसा कि सोनदंड ने उन ब्राह्मणों को दिया था। तब वे संतुष्ट हो गए और उसके साथ ही महाभाग से मिलने चले गए।

     9. कूटदंत ब्राह्मण ने आसन ग्रहण करने के बाद महाभाग को वह सब कुछ बताया, जो उसने सुना था और उनसे प्रार्थना की कि वे उसे तीन उपायों और सोलह प्रकार के सहायक उपकरणों से बलि के सफल निष्पादन के बारे में बताएं।

    'अच्छा, तो हे ब्राह्मण, ध्यान से सुनो और मैं बताऊंगा । '

    'बहुत अच्छा, श्रीमन्', कूटवंत ने उत्तर में कहा, और महाभाग ने निम्न प्रकार से बखान किया:

    10. हे ब्राह्मण, बहुत समय पहले महाविगत नामक शक्तिशाली राजा था। उसके पास बहुत धन और विपुल संपत्ति थी, चांदी और सोने के भंडार थे, आनंद के अपार साधन थे, वस्तुओं और अनाज के आगार थे और उसके कोष तथा धान्यागार भरे रहते थे। जब एक बार राजा महाविगत अकेले ध्यानमग्न था, उसे इस विचार से चिंता हुई कि मेरे पास सभी अच्छी वस्तुओं की प्रचुरता है, जिसका कोई नश्वर व्यक्ति जी भरकर उपभोग कर सकता है, संपूर्ण पृथ्वी वृत्त विजय द्वारा मेरे स्वामित्व में है, कितना अच्छा होता अगर मैं एक महान बलि दे सकता, जिससे बहुत दिनों तक मेरा सुख और कल्याण सुनिश्चित हो जाता । और उसने ब्राह्मण को जो उसका पुरोहित था, बुलाया, जो कुछ भी उसने सोचा था, उसे बताया और कहा, हे ब्राह्मण, मैं बहुत दिनों तक अपने सुख-शांति और कल्याण के लिए एक विशाल बलि देना चाहता हूं, इसलिए, श्रद्धेय मुझे अनुदेश दें कि यह कृत्य कैसे संपन्न कराया जा सकता है।'

    11. इस पर ब्राह्मण ने, जो पुरोहित था, राजा से कहा: 'श्रीमन्, राजा का देश संकट-ग्रस्त तथा लूटपाट से उत्पीड़ित है। देश से बाहर जो डाकू हैं, वे गांवों और नगरों में डाका डालते हैं और सड़कों को असुरक्षित बनाते हैं। जब तक ऐसी स्थिति रहती है, तब तक राजा कोई नया कर लगा दें, तो सचमुच महामहिम का यह कार्य अनुचित होगा। लेकिन संयोगवश महामहिम यह भी सोच सकते हैं कि मैं, अपमानित तथा देश - निष्कासित करके, दंडित करके और कारावास तथा मृत्यु-दंड द्वारा शीघ्र ही इन दुष्टों का प्रपंच समाप्त कर दूंगा। लेकिन उनका स्वेच्छाचार पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता, जो दंडित होने से बच निकलेंगे, वे राज्य में परेशानी पैदा करते रहेंगे। इस अव्यवस्था को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिए एक उपाय काम में लाया जा सकता है। राजा के राज्य में जो भी लोग पशुपालन और खेती करते हैं, उन्हें महामहिम खाद्य तथा बीज प्रदान करें । राजा के राज्य में जो भी लोग व्यापार करते हैं, उन्हें महामहिम पूंजी प्रदान करें। राजा के राज्य में जो भी लोग सरकारी सेवा करते हैं, उन्हें महामहिम वेतन और खाद्य प्रदान करें। तब वे लोग अपना-अपना कारोबार करते हुए कभी भी राज्य में संकट उत्पन्न नहीं करेंगे। राजा का राजस्व बढ़ेगा, देश में शांति रहेगी और एक-दूसरे के साथ सुख-चैन से निर्वाह करते हुए सामान्य जन अपनी बाहों में अपने बच्चों को झुलाते हुए द्वार खुला रखकर रहेंगे। '

    हे ब्राह्मण, राजा महाविगत ने अपने पुरोहित की बात मान ली और उसी के कथनानुसार कार्य किया। और अपना-अपना कारोबार करते हुए उन लोगों ने कभी राज्य में कठिनाई उत्पन्न नहीं की। राजा का राजस्व बढ़ गया और देश में सुख-शांति छा गई। सामान्य जन एक-दूसरे के साथ सुख-चैन से निर्वाह करते हुए अपनी बाहों में अपने बच्चों को झुलाते हुए द्वार खुले रखकर रहने लगे।

    12. तब राजा महाविगत ने अपने पुरोहित को बुलवाया और उससे कहा: 'अव्यवस्था समाप्त हो गई है। देश में शांति है। मैं बहुत दिनों तक अपनी सुख-शांति और कल्याण के लिए महान बलि देना चाहता हूं, इसलिए श्रद्धेय मुझे अनुदेश दें कि यह कृत्य कैसे संपन्न कराया जा सकता है।'

   'तो राजा के राज्य में जो भी क्षत्रिय हों, उनके भृत्य हों, चाहें वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, अथवा जो उनके मंत्री और कर्मचारी हों, चाहे वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, अथवा जो मान्य ब्राह्मण हों, चाहे वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, अथवा जो महत्वपूर्ण परिवार हों, चाहे वे देहात में हों अथवा नगरों में हों, उन्हें वह यह कहते हुए निमंत्रण भेजे मैं एक बलि देना चाहता हूं, जिससे बहुत दिनों तक मुझे सुख-शांति और कल्याण प्राप्त हो सके।' श्रद्धेय उसके लिए अपनी स्वीकृति प्रदान करें। '

    हे ब्राह्मण, राजा महाविगत ने अपने पुरोहित की बात मान ली और निमंत्रण भेजे। क्षत्रियों, ब्राह्मणों और अन्य गृहस्थों ने एक जैसा उत्तर दिया: महामहिम, बलि संपन्न कराएं। राजन् समय उपयुक्त है।

    इस प्रकार ये चारों सहमति से सहयोगी के रूप में बलि कराने के लिए साधन बन गए।

     13. राजा महाविगत निम्नलिखित आठ गुणों से युक्त थे उनका जन्म मातृ पक्ष और पितृ पक्ष, दोनों की ओर से अच्छे कुल में हुआ था, उनकी पिछली सात पीढ़ियां पवित्र तथा शालीन थीं, जन्म के संबंध में उन पर कोई कलंक नहीं लगा और किसी ने अंगुली नहीं उठाई।

    वह सुंदर, आकर्षक, विश्वासोत्पादक, अत्यंत मनोहर स्वरूप वाले, गौर वर्ण और देखने में भव्य थे।

    वह शक्तिशाली थे, प्रचुर धन-संपदा और विपुल संपत्ति से युक्त थे, चांदी और सोने, विलासिता सामग्री और अनाज के भंडारों से उनके कोष और धान्यागार परिपूर्ण रहते थे।

    वह ताकतवर थे, स्वामिभक्त तथा अनुशासित चतुरंगिणी सेना (हाथी, घुड़सवार, रथ और धनुर्धर) उनके आदेशाधीन थी, मेरे विचार में अपनी कीर्ति द्वारा ही वह अपने शत्रुओं का दलन करते थे।

     वह आस्थावान और उदार थे, शालीन दानी थे, घर खुला रखते, और उनके कुएं से सामान्य-जन और ब्राह्मण, निर्धन और राहगीर, भिखारी और याचक पानी भर सकते थे, वह अच्छे कार्यों के कर्ता थे।

     वह सभी प्रकार के ज्ञान में अग्रणी थे।

     वह कही गई बात का अर्थ समझते थे, और उसे समझा सकते थे, वह कहावत इस प्रकार है और इसका ऐसा अर्थ है।

     वह बुद्धिमान, विशेषज्ञ और चतुर थे तथा वर्तमान अथवा भूत अथवा भविष्य के बारे में विचार कर सकते थे।

     और उनके ये आठ गुण भी उस बलि के लिए साधन बन गए थे।

     14. उनका ब्राह्मण (पुरोहित) इन चार गुणों से संपन्न था उसका जन्म मातृ पक्ष और पितृ पक्ष, दोनों की ओर से अच्छे कुल में हुआ था, उसकी पिछली सात पीढ़ियां पवित्र तथा शालीन थीं, जन्म के संबंध में उस पर कोई कलंक नहीं लगा और किसी ने अंगुली नहीं उठाई।

     वह आवृत्तिकर्ता विद्यार्थी था जिसे रहस्यवादी पद्य कंठस्थ थे, वह तीन वेदों का ज्ञाता था और उसके अनुक्रम, उनकी क्रिया-पद्धति, ध्वनि - शास्त्र और भाष्य से परिचित था। उसे पुराणों की जानकारी थी, वह मुहावरों और व्याकरण में निष्णात था, लोकायत (जनश्रुति संकलन) का अच्छा ज्ञान रखता था और एक महापुरुष के शरीर में विद्यमान तीस लक्षणों से परिचित था ।

     वह सदाचारी था, सदाचार के लिए सिद्ध हो गया था और ऐसे गुणों से जिनको महान माना जाता है, युक्त था।

     वह बुद्धिमान, विशेषज्ञ और चतुर था। आदर-सत्कार करने वालों में उसका पहला नहीं, तो दूसरा स्थान अवश्य था । इस प्रकार उसके चार गुण भी बलि कराने के लिए साधन बन गए।

     15. और, हे ब्राह्मण, पुरोहित ने बलि प्रारंभ कराने से पहले राजा महाविगत को तीन विधियां समझाई 'अगर महामहिम राजा विशाल बलि प्रारंभ कराने से पूर्व इस प्रकार का कोई खेद महसूस करें, जैसे- हाय, इसमें मेरी धन-संपत्ति का काफी हिस्सा चला जाएगा, तो राजा को इस प्रकार के खेद को स्थान नहीं देना चाहिए। अगर महामहिम राजा विशाल बलि प्रस्तुत कराते हुए इस प्रकार का कोई खेद महसूस करें, जैसे- हाय, इसमें मेरी धन-संपत्ति का काफी हिस्सा चला जाएगा, तो राजा को इस प्रकार के खेद को स्थान नहीं देना चाहिए। अगर महामहिम राजा विशाल बलि कराने के बाद इस प्रकार का कोई खेद महसूस करें, जैसे- हाय, इसमें मेरी धन-संपत्ति का काफी हिस्सा चला जाएगा, तो राजा को इस प्रकार के खेद को स्थान नहीं देना चाहिए। '

     इस प्रकार, हे ब्राह्मण, बलि प्रारंभ कराने से पूर्व पुरोहित ने राजा महाविगत को तीन विधियां समझाई।

     16. और इसके आगे, हे ब्राह्मण, बलि प्रारंभ होने से पूर्व किसी भी ऐसे पश्चाताप के निवारण के लिए, जो बाद के दस दिनों में उन लोगों के संबंध में उत्पन्न हो सकता है जिन्होंने उसमें भाग लिया हो, पुरोहित ने कहा, 'हे राजन्, आपके द्वारा आयोजित बलि में ऐसे मनुष्य आएंगे जो जीवित प्राणियों का जीवन नष्ट करते हैं। और ऐसे भी जो उससे दूर रहते हैं, ऐसे मनुष्य जो उन चीजों को ग्रहण करते हैं जो उनको न दी गई हों और ऐसे भी जो उनसे दूर रहते हैं। ऐसे मनुष्य जो झूठ बोलते हैं और ऐसे भी जो झूठ नहीं बोलते, ऐसे मनुष्य जो पर निंदा करते हैं और ऐसे भी जो ऐसा नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो अशिष्टता से बोलते हैं और ऐसे भी जो ऐसा नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो व्यर्थ की बातें करते हैं और ऐसे भी जो उनसे अलग रहते हैं, ऐसे मनुष्य जो लोभ करते हैं और ऐसे भी जो लोभ नहीं करते, ऐसे मनुष्य जो दुर्भावना रखते हैं और ऐसे भी जो दुर्भावना नहीं रखते, ऐसे मनुष्य जिनके विचार अनुपयुक्त होते हैं और ऐसे भी जिनके विचार उपयुक्त होते हैं। इनमें से जो भी बुरा कार्य करता है, उसे उसके कर्म पर छोड़ दें। जो अच्छा कार्य करते हैं, उन्हें महामहिम भेंट प्रदान करें। राजन्, उनके लिए अनुष्ठानों की व्यवस्था करें, उन्हें संतुष्टि दें, जिससे हमें भी आंतरिक शांति प्राप्त हो सकेगी। '

     17. और फिर, हे ब्राह्मण, जब कि राजा बलिदान करा रहे थे तो पुरोहित ने सोलह उपायों से उनको अनुदेश दिया, प्रेरित किया और हर्षित किया। उसने कहा, 'जब कि राजा बलिदान करा रहे हैं, उनके बारे में लोग अगर यह कहें: राजा महाविगत अपनी प्रजा के चार वर्णों को आमंत्रित किए बिना, स्वयं आठ व्यक्तिगत गुणों से संपन्न न होने पर भी और चार व्यक्तिगत गुणों से मुक्त ब्राह्मण की सहायता के बिना बलिदान करा रहे हैं, तो उनका यह कथन तथ्य के अनुसार नहीं होगा । क्योंकि चार वर्णों की सहमति प्राप्त कर ली गई है और राजा आठ व्यक्तिगत गुणों से तथा उनके ब्राह्मण चार व्यक्तिगत गुणों से संपन्न हैं। जहां तक इन सोलह शर्तों में से प्रत्येक का संबंध है, राजा को इस बात से आश्वस्त किया जा सकता है कि हर शर्त पूरी कर ली गई। वह बलिदान करा सकते हैं, प्रसन्न हो सकते हैं और अपने मन की शांति प्राप्त कर सकते हैं। '

     18. और फिर, हे ब्राह्मण, उस बलिदान में न तो कोई बैल, न बकरियां, न मुर्गे, न मांसल सुअर और न किसी प्रकार के जीवित प्राणी ही मारे गए। खंभों के रूप में इस्तेमाल करने के लिए कोई वृक्ष नहीं काटे गए और बलिदान स्थल के चारों ओर विकीर्ण करने के लिए न कोई घास ही काटी गई। और वहां नियुक्त किए गए दासों, दूतों और कर्मचारियों को न तो डंडों से हांका जा रहा था और न वे भय से त्रस्त थे। काम करते हुए न तो वे रो रहे थे और न उनके चेहरे अश्रुपूरित थे। जो भी मदद करना चाहता था, वह काम करता था। जो मदद नहीं करना चाहता था, वह काम नहीं करता था। सभी अपनी रुचि के अनुकूल कार्य करते थे। जिस कार्य में उनकी रुचि नहीं थी, उसे वे बिना किए छोड़ देते थे। घी और तेल, दूध और मक्खन, शहद और खांड से ही वह बलिदान संपन्न किया गया।

    19. और फिर, हे ब्राह्मण, क्षत्रिय, भृत्यु और मंत्री तथा कर्मचारी, प्रतिष्ठित ब्राह्मण और महत्वपूर्ण गृहस्थ, चाहे वे देहात के हों अथवा नगरों के, अपने साथ काफी धन-संपत्ति लेकर राजा महाविगत के पास गए और उन्होंने कहा, 'यह प्रचुर धन संपत्ति हम राजा के उपयोग के लिए लाए हैं। महामहिम, हमारे हाथों से इसे ग्रहण कर लें। इस पर राजा महाविगत ने कहा 'मित्रों, मेरे पास पर्याप्त धन-संपत्ति है । कराधान की राशि ही बहुत है। आप अपनी संपत्ति रखिए और अपने साथ और भी ले जाइए। '

     इस प्रकार राजा द्वारा उनकी बात मानने से इंकार कर दिए जाने पर, वे एक तरफ चले गए और उन्होंने एक-दूसरे के साथ इस प्रकार विचार-विमर्श किया-यदि हम इस धन-संपत्ति को पुनः अपने घरों को वापस ले जाएं, तो यह हमारे लिए उचित नहीं होगा। राजा महाविगत महान बलिदान कर रहे हैं। हमें भी इस कार्य में योगदान करना चाहिए।

     20. इसलिए राजा द्वारा निर्मित बलिदान स्थल के पूर्व में क्षत्रियों ने दक्षिण में कर्मचारियों ने, पश्चिम में ब्राह्मणों ने और उत्तर में अन्य गृहस्थों ने निरंतर दान की व्यवस्था की। उसमें जो वस्तुएं और उपहार दिए गए, वे स्वयं राजा महाविगत के महान बलिदान के अनुरूप थे।

    इस प्रकार, हे ब्राह्मण, यह एक चहुमुखी सहयोग था । राजा महाविगत आठ व्यक्तिगत गुणों से और उनके पालक ब्राह्मण चार गुणों से संपन्न थे, और उस बलिदान को कराने की तीन विधियां थीं। हे ब्राह्मण, इस सोलह प्रकार के उपस्कारों से युक्त त्रिगुणात्मक विधि से निष्पादित बलिदान को उपयुक्त उत्सव कहा जा सकता है।

    21. और तब, उन ब्राह्मणों ने ऊंचे स्वर में कहा: 'कितना भव्य है यह बलिदान और कितना पवित्र है इसका निष्पादन । '

    लेकिन कूटदंत ब्राह्मण वहां मौन बैठा रहा ।

    तब उन ब्राह्मणों ने कूटदंत से कहा : 'आप श्रमण गौतम के सही कथन का यह कहकर अनुमोदन क्यों नहीं करते कि उन्होंने ठीक कहा है?'

    ब्राह्मण कूटदंत ने कहा, 'मैं अवश्य अनुमोदन करता हूं, क्योंकि श्रमण गौतम के सही कथन का जो यह कहकर अनुमोदन नहीं करता है कि उन्होंने ठीक कहा है, तो सचमुच उसका सिर दो भागों में विभक्त हो जाएगा। लेकिन मैं इस बात पर विचार कर रहा था कि श्रमण गौतम यह नहीं कहते हैं कि इस प्रकार मैंने सुना है। न वह यह कहते हैं कि 'इस प्रकार यह अवश्य अनुपालनीय है।' वह केवल यह कहते हैं - तब यह इस प्रकार था', अथवा वह कहते हैं, 'तब वह वैसा था।' इसलिए मेरी यह धारणा है कि निश्चित रूप से उस समय श्रमण गौतम ही स्वयं राजा महाविगत रहे होंगे, अथवा वह ब्राह्मण रहे होंगे जिसने उस बलिदान में उनके कार्यपालक के रूप में कार्य किया होगा। क्या श्रद्धेय गौतम यह स्वीकार करते हैं कि जो इस प्रकार के बलिदान का उत्सव मनाता है, अथवा मनवाता है, वह मृत्यु के पश्चात शरीर के विलीन हो जाने पर स्वर्ग में किसी आनंद की अवस्था में पुनर्जन्म लेता है। '

    ‘हां, हे ब्राह्मण, मैं यह स्वीकार करता हूं। और उस समय मैं वही ब्राह्मण था, जिसने पुरोहित के रूप में वह बलिदान कराया था। '

    22. 'हे गौतम, क्या कोई ऐसा अन्य बलिदान है, जो इसकी तुलना में कम कठिन और कम कष्टकर हो और जिसका फल और लाभ इससे अधिक हो?'

    'हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है। '

    'हे गौतम, वह क्या हो सकता है?'

    'एक परिवार में निरंतर रखे जाने वाले वे उपहार जो विशेष रूप से सदाचारी संन्यासियों को प्रदान किए जाते हैं। '

    23. ‘लेकिन इसका क्या कारण है कि एक परिवार में रखे गए उपहारों का, विशेष रूप से सदाचारी संन्यासियों को निरंतर प्रदान किया जाना, तीन विधियों और सोलह प्रकार के उपसाधनों से संपन्न किए जाने वाले अन्य बलिदान की तुलना में कम कठिन और कम कष्टकर हैं, अधिक फलदायक और लाभप्रद हैं? "

    'हे ब्राह्मण, बाद में बताए गए बलिदान को न तो अर्हत और न अर्हत मार्ग पर प्रवत्त कोई अन्य कराएगा । और ऐसा क्यों नहीं होगा ? क्योंकि उसमें लाठियों से प्रहार किया जाता है और गले से पकड़ा जाता है। लेकिन वे पूर्वोक्त बलिदान में जाएंगे, क्योंकि उसमें ऐसा नहीं होता है। इसलिए इस प्रकार के निरंतर उपहार अन्य प्रकार के बलिदान से श्रेष्ठ होते हैं। '

    24. 'और, हे गौतम, इन दोनों में से किसी की भी तुलना में कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?"

    'हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है।'

    'और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?'

    'संघ की ओर से चारों दिशाओं में विहारों का निर्माण।'

    25. 'और, हे गौतम, इन तीनों में से किसी एक और तीनों की तुलना में क्या कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?"

     'हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है । '

     'और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?"

     'जो निष्ठापूर्ण हृदय से एक बुद्ध को अपने मार्गदर्शक के रूप में ग्रहण करता है, सत्य और संघ को ग्रहण करता है, वह एक ऐसा बलिदान है, जो खुले दान गृह से श्रेष्ठ है, सतत भिक्षादान से श्रेष्ठ है और आवास स्थान के उपहार से श्रेष्ठ है।

     26. ‘और, हे गौतम, इन चारों की तुलना में क्या कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो?"

     'जब कोई मनुष्य निष्ठापूर्ण हृदय से संयम के द्वारा जीवन को नष्ट होने से बचाता है, जो वस्तुएं उसको नहीं दी गई हैं, उनको लेने से परहेज करता है, ऐंद्रिय आसक्तियों के संबंध में बुरे आचरण का परित्याग करता है, मिथ्या वचनों का परित्याग करता है, मादक और पागल करने वाले पेय का त्याग करता है जो लापरवाही की जड़ है, तो वह एक ऐसा बलिदान है, जो खुले दान गृह से श्रेष्ठ है, निरंतर भिक्षादान से श्रेष्ठ है, आवास स्थानों के उपहार से श्रेष्ठ है और पथ-प्रदर्शन स्वीकार करने से श्रेष्ठ है।

     27. ‘और हे गौतम, इन पांचों की तुलना में कोई अन्य बलिदान है, जो अपेक्षाकृत कम कठिन और कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद हो ?'

     'हां, हे ब्राह्मण, ऐसा है । '

     'और, हे गौतम, वह क्या हो सकता है?"

     (इसका उत्तर श्रमण फल सुत्त 40 से 75 में ( पुस्तक के पृष्ठ 62 से 74 ) प्रथम गाथा के एक लंबे उद्धरण में निम्न रूप में दिया गया है:

    1. बुद्ध के आविर्भाव, उनके उपदेश, श्रोता के मतांतरण, और उनके द्वारा संसार के परित्याग के संबंध में परिचयात्मक अनुच्छेद।

    2. शील ( सहज नैतिकता) ।

    3. विश्वास के संबंध में परिच्छेद ।

     4. 'इंद्रियों के द्वारा सुरक्षित है' के संबंध में परिच्छेद ।

     5. 'सावधान तथा आत्मलीन' के संबंध में परिच्छेद ।

     6. 'संतोष' के संबंध में परिच्छेद ।

     7. एकाकीपन के संबंध में परिच्छेद ।

     8. पांच बाधाओं के संबंध में अनुच्छेद ।

     9. प्रथम गाथा का वर्णन ।

     'हे ब्राह्मण, पूर्वोक्त बलिदानों की तुलना में यह बलिदान कम कठिन, कम कष्टकर है, किंतु अधिक फलदायक और लाभप्रद है।'

     दूसरी, तीसरी और चौथी गाथा में क्रमशः यही बात कही गई है (जैसा कि श्रम फल सुत्त 72.82 में है) और ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अंतर्दृष्टि ( तदैव 83.84) और (85.96 सम्मिलित किसी भी प्रकार सीधा वर्णन न करते हुए) आसवों, घातक मादक द्रव्यों से विनाश का ज्ञान ( तदैव 97.98)

     'और, हे ब्राह्मण, इससे अधिक श्रेष्ठ और मधुर बलिदानोत्सव मनुष्य नहीं मना सकता।'

     28. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो कूटदंत ब्राह्मण ने महाभाग से कहा: 'परम श्रेष्ठ, हे गौतम, आपके मुख से निकले शब्द अत्युत्तम हैं, जैसे कोई मनुष्य उसे स्थापित करे जो कुछ फेंक दिया गया हो, अथवा उसे प्रकट करे जो कुछ छिपाया गया हो, अथवा भटके हुए को कोई उचित मार्ग बताया जाए, अथवा अंधेरे में कोई प्रकाश दे जाए, जिससे आंखों वाले बाह्य स्वरूपों को देख सकें, ठीक वैसे ही जैसे श्रद्धेय गौतम ने मुझे सत्य का ज्ञान कराया है। मैं सिद्धांत तथा आदेश के अनुशीलन के लिए श्रद्धेय गौतम को अपने मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करता हूं। श्रद्धेय मुझे एक ऐसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें, जिसने आज के दिवस से जीवन-पर्यंत आपको अपना मार्गदर्शक चुन लिया है। और है गौतम, मैं स्वयं सात सौ सांडों, सात सौ बछियों और सात सौ बछड़ों, सात सौ बकरियों और सात सौ भेढ़ों को मुक्त कराऊंगा। मैं उन्हें जीवन दान देता हूं। वे हरी घास खाएं, ताजा पानी पिएं और उनके चारों ओर ठंडी हवा बहे । '

     29. तब महाभाग ने ब्राह्मण कूटदंत से समुचित क्रमानुसार बातचीत की, अर्थात उन्होंने उसे उदारता, सम्यक आचरण, स्वर्ग, जोखिम, मिथ्या अहंकार, इंद्रिय आसक्तियों की अपवित्रता और परिवर्जन के लाभों के बारे में बताया। और जब महाभाग को यह ज्ञात हो गया कि कूटदंत ब्राह्मण तैयार हो गया है, मृदुल, पूर्वाग्रह रहित, उन्नत और हृदय से निष्ठावान बन गया है, तो उन्होंने उस सिद्धांत की घोषणा की, जिस पर केवल बुद्धों को ही विजय प्राप्त है, अर्थात दुःख, उसके मूल और उसकी समाप्ति तथा सन्मार्ग का सिद्धांत और जिस प्रकार सभी प्रकार के धब्बों के धुल जाने पर कोई स्वच्छ वस्त्र शीघ्र ही रंग ग्रहण कर लेगा, ठीक वैसे ही कूटदंत ब्राह्मण को वहीं बैठे-बैठे ही सत्य के दर्शन के लिए शुद्ध तथा निष्कलंक दृष्टि प्राप्त हो गई। उसे यह ज्ञान हो गया कि जिस किसी का प्रारंभ होता है, उस प्रारंभ में उसके विलोपन की अनिवार्यता भी निहित है।
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     30. और तब एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने सत्य के दर्शन कर लिए हों, उस पर विजय प्राप्त कर ली हो, उसे समझ लिया हो और उसका गहन चिंतन कर लिया हो, जो संदेह के परे पहुंच गया हो, जिसने विमूढ़ता को भगा दिया हो और पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया हो, और जो गुरु के उपदेशों के  अपने ज्ञान के लिए किसी अन्य पर अवलंबित न हो, ब्राह्मण कूटदंत ने महाभाग को संबोधित करते हुए कहा: ‘श्रद्धेय गौतम, कृपया संघ के सदस्यों सहित कल का भोजन मेरे साथ करने की स्वीकृति प्रदान करें।' और महाभाग ने मौन रहकर अपनी सहमति प्रदान कर दी। यह देखते हुए कि महाभाग ने स्वीकृति प्रदान कर दी है, कूटदंत ब्राह्मण अपने स्थान से उठे और उनके दाईं ओर से गुजरते हुए, वहां से विदा हो गए। और तड़के ही उन्होंने बलिदान के लिए निर्मित वेदी पर पुष्ट और मृदु, दोनों ही प्रकार का मधुर भोजन तैयार करवाया और महाभाग के लिए समय की घोषणा की, हे गौतम, समय हो गया है, भोजन तैयार है। और महाभाग ने जो प्रातःकाल ही तैयार हो चुके थे, अपना चीवर पहना और अपना पात्र लेकर बांधवों सहित कूटदंत के बलिदान स्थल पर पहुंचे और वहां अपने लिए तैयार किए गए आसन पर बैठ गए और कूटदंत ब्राह्मण ने बुद्ध तथा बांधवों को अपने हाथों से पुष्ट और मृदु, दोनों ही प्रकार का मधुर भोजन तब तक परोसा, जब तक वे तृप्त नहीं हो गए, और जब महाभाग ने अपना भोजन कर लिया, अपना पात्र और हाथ धो लिए, कूटदंत ब्राह्मण ने नीचे का स्थान लिया और उनके पार्श्व में बैठ गए। और जब वह इस प्रकार आसीन हो गए, महाभाग ने धार्मिक प्रवचन द्वारा कूटदंत ब्राह्मण को अनुदिष्ट, प्रेरित, उत्साहित तथा हर्षित किया, उसके बाद वह अपने आसन से उठे और वहां से विदा हो गए।

( कूटदंत सुत्त समाप्त हुआ)