प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
बलि की कहानी
जिनके हृदय पवित्र हैं, वे दुष्टों के बहकावे में नहीं आते। यह जानते हुए हृदय की पवित्रता के लिए संघर्षरत रहना है। यही उपदेश निम्नलिखित से प्राप्त होगा :
यह कहा जाता है कि बहुत समय पहले बोधिसत्व नाम के एक राजा थे, जिन्होंने अपना राज्य आनुवांशिक उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त किया था। वह अपने पुण्य कार्यों के प्रभाव से इस स्थिति तक पहुंचे थे। वह शांतिपूर्वक अपने राज्य पर शासन करते थे। किसी प्रतिद्वंद्वी ने अशांति उत्पन्न नहीं की। उनकी प्रभुसत्ता को सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त थी। उनका देश किसी भी प्रकार के कोप, प्रकोप अथवा विपदा से मुक्त था। अपने देश और बाहर के देशों के साथ उनके संबंध हर प्रकार से मधुर थे, और उनके सभी अधीनस्थ उनके आदेशों का पालन करते थे।
1. इस राजा ने अपने इच्छा रूपी शत्रुओं का दमन किया था और उसको ऐसे लाभों

के प्रति कोई झुकाव नहीं था जिनका भोग करना बुरा माना जाता है, बल्कि उसकी मनोकामना अपनी प्रजा के सुख-संवर्धन की रहती थी। उसके कर्मों का एकमात्र प्रयोजन धर्माचरण था, वह एक मुनि की तरह व्यवहार करता था ।
2. वह मानव स्वभाव को जानता था, लोग सबसे श्रेष्ठ मानव के व्यवहार का अनुकरण करना महत्वपूर्ण मानते हैं, इसलिए अपनी प्रजा को निर्वाण दिलाने की इच्छा से उसने खासतौर से धार्मिक कृत्यों के निष्पादन की ओर विशेष ध्यान दिया।
3. वह भिक्षा-दान करता था, नैतिक आचरण (शील) के सिद्धांतों का कठोरता से पालन करता था, सहिष्णुता की ओर ध्यान देता था और प्राणियों के लाभ के लिए संघर्ष करता था। अपने विचारों के अनुरूप विनम्र स्वरूप था, वह अपनी प्रजा की प्रसन्नता के लिए समर्पित रहता था और धर्म का साकार रूप दिखाई देता था।
एक बार ऐसा हुआ कि उसके द्वारा रक्षित रहते हुए भी उसके राज्य के कई जिले, उनके निवासियों के दोषपूर्ण कार्यों और वर्षा का ध्यान रखने वाले देवों की गलती के परिणाम-स्वरूप सूखे और इस आपदा के विक्षोभकारी प्रभावों से पीड़ित हो गए। अतः राजा को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि उस पर यह विपत्ति स्वयं उसके अथवा उसकी प्रजा द्वारा धर्मपरायणता का उल्लंघन किए जाने के फलस्वरूप आई है। और जिन लोगों के कल्याण के प्रति वह दृढ़-प्रतिज्ञ था, उनके कष्ट से उसे हार्दिक वेदना हुई, इसलिए उसने धार्मिक मामलों में अपने ज्ञान के लिए प्रख्यात ज्ञानियों और क्षमता-संपन्न लोगों से सलाह ली। उसने अपने परिवार के पुरोहित की अध्यक्षता में वयोवृद्ध ब्राह्मणों और अपने मंत्रियों को सलाह के लिए बुलाया और उनसे इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए कुछ उपाय पूछे। उन्होंने वेदों के अनुसार बलि में विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि इससे ही पर्याप्त वर्षा हो सकती है। उन्होंने राजा को इस प्रकार की भयावह बलि देने का सुझाव दिया, जिसमें सैंकड़ों जीवधारियों की हत्या अपेक्षित है। लेकिन इस प्रकार की हत्या से संबंधित ऐसी हर बात की सूचना प्राप्त कर लेने पर जोकि बलि के लिए विहित है, उसके सहज करुणाभाव ने उनकी सलाह मानने से मन ही मन में इंकार कर दिया। फिर भी शिष्टतावश अस्वीकृति के कठोर शब्दों से वह उन्हें आहत नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस मुद्दे से हटकर बातचीत का रुख अन्य विषयों की तरफ मोड़ दिया। दूसरी ओर, राजा के मनोभावों से अनभिज्ञ उन लोगों को जब भी धार्मिक मामलों पर राजा से बातचीत का मौका मिलता, तभी वे बलि के लिए उन्हें सचेत करते रहते ।
4. ‘आप भूमि पर अधिकार प्राप्त करने और उस पर शासन करने के लिए निर्धारित विभिन्न प्रकार के राजकीय कर्त्तव्यों का समय पर निष्पादन करने का निरंतर ध्यान रखते हैं। इन कार्यों की संपन्नता धर्मपरायणता के सिद्धांतों के अनुरूप है।
5. ‘जब कि आप (सभी अन्य मामलों में ) 'त्रयी' (धर्म, अर्थ और काम) का अनुपालन इतनी चतुराई से करते हैं, अपने लोगों के हित में रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, तब क्या कारण है कि आप देवों की दुनिया तक पहुंचाने वाले उस पुल के संबंध में, जिसका नाम 'बलि' है, इतने लापरवाह और लगभग निष्क्रिय हैं?
6. 'सेवकों की तरह राजा (आपके अधीनस्थ ) आपके आदेशों का इस विश्वास के साथ आदर करते हैं कि उनसे सफलता निश्चित है। अपने शत्रुओं का विनाश करने वाले, हे राजन, अब समय आ गया है कि आप बलि के जरिए अपने यश में वृद्धि करने वाले वरदान प्राप्त करें।
7.8. 'दान की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति और संयम ( अच्छा आचरण) बरतने में कठोरता के कारण एक दीक्षित के लिए अपेक्षित पवित्रता पहले से ही आपके पास है, तथापि आपके लिए यह उपयुक्त होगा कि आप ऐसी बलि द्वारा, जिनके वर्ण्य विषय वेद हैं-देवों का ऋण चुकाएं। उपयुक्त तथा निर्दोष रूप से कराई गई बलि से संतुष्ट होकर देवता बदले में वर्षा भेजकर प्राणियों का सम्मान करते हैं। इस प्रकार विचार करते हुए अपने प्रजाजन और स्वयं अपने कल्याण के बारे में सोचिए और नियमित रूप से बलि की स्वीकृति दीजिए, जिससे आपकी कीर्ति बढ़ेगी । '
इस पर राजा के मन में यह विचार आया, 'ऐसे नेताओं के विश्वास पर अवलंबित मुझमें निरीह व्यक्ति वास्तव में असम्यक रूप से रक्षित है। विधान पर निष्ठापूर्वक विश्वास करते हु और उसका आदर करते हुए भी दूसरों के शब्दों पर निर्भरता मेरी सहृदयता के गुण को समूल नष्ट कर देगी।
9. 'लोगों में जो सर्वोत्तम आश्रयदाता के रूप में विख्यात हैं, वही लोग विधि-विधान के आधार पर अपने तर्कों द्वारा नुकसान पहुंचाने का इरादा रखते हैं। ऐसा व्यक्ति जो उनके द्वारा दिखाए गए गलत रास्ते का अनुसरण करता है, वह शीघ्र ही स्वयं को संकटग्रस्त पाएगा, क्योंकि वह बुराइयों से घिर जाएगा।
10. ‘धर्मपरायणता और पशुओं के उत्पीड़न के बीच क्या संबंध हो सकता है? देव लोक में मेरे आवास अथवा देवताओं की आराधना का उत्पीड़ितों की हत्या से क्या सरोकार है?
11-12. ‘उनका कहना है कि अनुष्ठानों के अनुसार विहित प्रार्थनाओं से, मानो कि वे पवित्र सूत्र उसे घायल करने के लिए अनगिनत बर्छियां हों, वध किया गया पशु स्वर्ग लोक को जाता है और इसी उद्देश्य से उसकी हत्या की जाती है। इस प्रकार व्याख्या करके इस कार्रवाई को विधिसम्मत माना जाता है। तथापि यह मिथ्या है। क्योंकि यह कैसे संभव है कि परलोक में कोई भी प्राणी दूसरों के द्वारा किए गए कार्य का फल भोग सकता है? और किस कारण से वह पशु, जिसकी बलि दी गई है, स्वर्गारोहण करेगा जब कि वह बुरे कार्मों से दूर न रहा हो और अच्छे कार्यों के लिए उसने स्वयं को समर्पित न किया हो? क्या केवल इसलिए वह स्वर्ग को जाएगा क्योंकि अपने स्वयं के कार्यों के आधार पर उसका वध नहीं हुआ है, बल्कि उसकी बलि दी गई है।
13. 'और अगर बलि में वध किया गया उत्पीड़ित प्राणी वास्तव में स्वर्ग को जाता है, तो क्या हमें ब्राह्मणों से यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि वे बलि में आत्मदाह के लिए स्वयं को प्रस्तुत करें। लेकिन इस प्रकार की कोई प्रथा कहीं भी उनमें नहीं देखी जाती। तो फिर इन सलाहकारों द्वारा दी गई सलाह को कौन हृदगगंम कर सकता है?
14. ‘जहां तक देवताओं का प्रश्न है, क्या हम यह विश्वास करें कि जो सुंदर अप्सराओं द्वारा परोसे गए स्वच्छ तथा अतुलनीय सुगंधियुक्त, स्वादिष्ट और गुणकारी व्यंजन ग्रहण करते हैं, क्या वे उसका त्याग करके दयनीय प्राणी के वध का आनंद उठाएंगे? क्या वे बलि में उन्हें भेंट किए गए प्राणी की ओझड़ी अथवा ऐसे अन्य अंगों का आनंदपूर्वक आस्वादन करेंगे?
'इसलिए यह समय अमुक कार्य करने के लिए उपयुक्त है', इस प्रकार इरादा करके राजा ने यह ढोंग किया कि वह बलि का आयोजन करने के लिए तत्पर हैं, और उनका समर्थन करते हुए वह उनसे इस प्रकार बोले : 'यह सच है कि आप जैसे महान सलाहकारों के होते हुए, जो कि मेरी प्रसन्नता के लिए कटिबद्ध हैं, मैं बहुत ही सुरक्षित और संतुष्ट हूं। इसलिए मैं एक हजार वध्य पुरुषों की बलि ( पुरुषमेध) कराऊंगा। हर कारोबार के क्षेत्र में रत मेरे कर्मचारियों को इस प्रयोजन के लिए अपेक्षित वस्तुएं जुटाने के आदेश दे दिए जाएं। साथ ही सबके लिए डेरे डालने और अन्य भवनों का निर्माण करने हेतु सर्वोत्तम भूमि का पता चलाया जाए। साथ ही शुभ चंद्र दिवसों, करणों, मुहूर्तों और नक्षत्रों के बारे में विचार करके ( ज्योतिषियों द्वारा ) बलि के लिए उपयुक्त समय निश्चित किया जाए।' पुरोहित ने उत्तर दिया, 'अपने उद्यम में सफलता प्राप्त करने के लिए महामहिम को एक बलि के अंत में अवभृथ (अंतिम स्नान) करना होगा और तत्पश्चात् आप क्रमानुसार बलि करा सकते हैं। क्योंकि अगर एक हजार वध्य पुरुषों को एकदम पकड़ लिया जाए तो यह निश्चित है कि आपकी प्रजा आपको दोष देगी और वह एक बड़ा विद्रोह खड़ा कर देगी।' अन्य ब्राह्मणों द्वारा पुरोहित की बात का अनुमोदन किए जाने पर राजा ने उत्तर दिया, 'जनता के क्रोध की आशंका मत कीजिए। आदरणीय महानुभावों, मैं ऐसे कदम उठाऊंगा, जिससे मेरी प्रजा में किसी प्रकार का विद्रोह नहीं होगा। '
इसके पश्चात् राजा ने नगर - पुरुषों और भूधारकों की सभा बुलाई और कहा, 'मेरा इरादा एक हजार नर-बलियां कराने का है। लेकिन मैं समझता हूं कि ईमानदारी से कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति अग्निदाह के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी विचार से मैं आपको यह सलाह देता हूं कि आपमें से जिस किसी को आज के बाद नैतिक आचरण की सीमाओं का उल्लंघन और राजकीय इच्छा का निरादर करते हुए देखूंगा, उसे बलि के लिए पकड़वाने का आदेश दूंगा, क्योंकि मेरे विचार में ऐसा व्यक्ति अपने परिवार के लिए कलंक और मेरे देश के लिए खतरा होगा। इस संकल्प को लागू करने के उद्देश्य से दोष रहित और पैनी दृष्टि तथा सदैव सचेत रहने वाले दूत आपका निरीक्षण करते रहेंगे और आपके आचरण के संबंध में मुझे सूचना देंगे । '
तत्पश्चात सभा में अग्रिम पंक्ति के लोग हाथ जोड़कर और उन्हें माथे तक ले जाकर बोले :
15-16. 'महामहिम, आपके सभी कार्य आपकी प्रजा की प्रसन्नता के लिए होते हैं और उस आधार पर आपकी अवज्ञा करने का कारण ही क्या हो सकता है? यहां तक कि ब्रह्मा (देवता) भी केवल आपके व्यवहार का अनुमोदन ही कर सकता है। महामहिम, जो गुणीजनों पर अधिकार रखते हैं, वही हमारे लिए सर्वोत्तम अधिकारी हैं। इस कारण जिससे भी महामहिम को प्रसन्नता होती है, उससे हमें भी अवश्य प्रसन्नता होगी। । वास्तव में आपको हमारे आनंद और हमारी भलाई के अलावा किसी भी चीज से प्रसन्नता नहीं मिलती। '
उसके पश्चात नगर और देश के गण्यमान्य लोगों ने जब इस प्रकार उनके आदेश को मान लिया, तो राजा ने सभी नगरों और देश भर में ऐसे अधिकारियों को भेज दिया जो बाहरी शक्ल-सूरत से लोगों को इस कार्य के लिए उपयुक्त प्रतीत होते थे और उन्हें बुरा कार्य करने वालों को पकड़ने का काम सौंपा गया और प्रतिदिन डुगडुगी बजाकर सर्वत्र इस प्रकार के आदेश की घोषण करने का आदेश दिया गया।
17. 'राजा सुरक्षा प्रदान करता है और उस नाते वह हमेशा ईमानदारी से रहने वाले, अच्छे आचरण वाले, संक्षेप में गुणीजन की सुरक्षा का आदेश देता है, फिर भी अपनी प्रजा के लाभ के लिए वह नर बलि के इरादे से ऐसे लोगों में से हजारों वध्य मानवों को अलग कर लेना चाहता है, जो दुराचरण में आनंद लेते हैं।
18. ‘इसलिए आज के बाद जो भी मनमाने तौर पर दुर्व्यवहार करेगा, हमारे राजा के आदेश की अवज्ञा करेगा, जिसके आदेश का पालन उसके अधीनस्थ राजा भी करते हैं, उसे उसी के कार्यों के कारण बलि के वध्य व्यक्ति के रूप में ले जाया जाएगा और लोग उसकी यातनापूर्ण पीड़ा को देखेंगे, जब कि वह पीड़ा से तड़पेगा और उसके शरीर को बलि स्तंभ से कसकर बांध दिया जाएगा। '
जब राज्य के निवासियों को उनके राजा द्वारा बलि के लिए भेंट चढ़ाने के इरादे से बुरे कर्म करने वालों की सावधानी से की जा रही खोज के बारे में जानकारी मिली, क्योंकि वे दिन-प्रतिदिन अत्यंत भयावह राज उद्घोषणा सुनते थे और दुष्टजन को खोजने और पकड़ने के लिए नियुक्त किए गए राजा के सेवकों को अक्सर सर्वत्र देखते थे, तो उन्होंने बुरे आचरण के प्रति आसक्ति का त्याग कर दिया और नैतिक सिद्धांतों तथा आत्म-संयम का कठोरता से पालन करने का इरादा कर लिया। वे घृणा और शत्रुता के हर अवसर का त्याग करते रहे और अपने झगड़ों और मतभेदों को निपटाते हुए उन्होंने आपसी प्रेम और आदर भाव को बढ़ावा दिया। उनमें माता-पिता तथा गुरुजन की आज्ञा का पालन, उदारता और दूसरों से सहयोग की सामान्य भावना, शिष्ट व्यवहार और नम्रता जैसे गुणों का समावेश हो गया। संक्षेप में, वे ऐसे रहते थे, जैसे कि कृत-युग (ब्राह्मण-काल) में रहते हों।
19. मृत्यु के भय ने उनमें परलोक के विचार जागृत कर दिए थे, अपने परिवारों के सम्मान को कलंकित करने के जोखिम ने उन्हें अपनी ख्याति की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया था, उनके हृदय की महान पवित्रता ने उनके लोकलाज के भाव को मजबूत बना दिया था। इन कारणों से शिष्ट व्यवहार वाले लोगों की शीघ्र ही पहचान कर ली जाती थी।
20. यद्यपि हर व्यक्ति पवित्र आचरण बनाए रखने के बारे में पहले से कहीं अधिक कटिबद्ध था, तथापि राज के सेवकों ने बुरे कर्म करने वालों की सतर्कता पूर्वक की जा रही खोज में कमी नहीं आने दी। इस कारण से भी लोगों की धर्मपरायणता में गिरावट नहीं आई।
21. राजा को अपने दूतों से जब राज्य की इस स्थिति की जानकारी प्राप्त हुई, तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने शुभ समाचार लाने वाले संदेशवाहकों को पुरस्कार के रूप में बहुमूल्य उपहार प्रदान किए और अपने मंत्रियों को कुछ इस प्रकार बोलते हुए आदेश दिया:
22-24. 'आपको मालूम है कि मेरी सर्वोच्च इच्छा अपनी प्रजा की रक्षा करना है। अब वे बलि के उपहारों को प्राप्त करने योग्य बन गए हैं और बलि के उद्देश्य से ही मैंने यह संपत्ति प्रदान की है। मेरे विचार से बलि को उचित रूप से जिस प्रकार संपन्न किया जाता है, मैं उसे उसी तरह पूरा करना चाहता हूं। जो भी व्यक्ति इस आशय से धन की कामना करता है कि इससे उसकी प्रसन्नता में वृद्धि होगी, उसे अपनी इच्छा की संतुष्टि के लिए मुझसे धन प्राप्त करने के लिए मेरे पास आने दें। इस प्रकार जिस कष्ट और अभाव से हमारा देश पीड़ित है, वह शीघ्र ही दूर हो जाएगा। वास्तव में जब भी मैं अपनी प्रजा की रक्षा के प्रति अपने दृढ़ संकल्प और इस कार्य में आप सरीखे उत्कृष्ट साथियों से प्राप्त होने वाले असीम सहयोग के बारे में सोचता हूं, तो अक्सर मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मेरे लोगों की पीड़ाएं मेरे क्रोध को भड़का कर मेरे मस्तिष्क में ज्वाला की तरह प्रज्ज्वलित हो रही हैं।'
मंत्रियों ने राजाज्ञा को स्वीकार किया और उसे शीघ्र अमल में लाने लगे। उन्होंने सभी गांवों, नगरों और बाजारों और उसी तरह सड़कों पर सभी स्थानों पर भिक्षा - गृहों की स्थापना के लिए आदेश दिए। इस कार्य के संपन्न हो जाने के बाद उन्होंने उन सभी के लिए जो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भीख मांगते थे, दिन-प्रतिदिन वे सभी चीजें उसी प्रकार दान स्वरूप देने की व्यवस्था की जिस प्रकार राजा ने आदेश दिया था।
·
25. इस प्रकार निर्धनता दूर हो गई और राजा से धन मिलने पर विविध और अच्छी पोशाकें तथा आभूषण पहन-संवरकर लोगों ने उत्सव जैसे दिनों की भव्यता का प्रदर्शन किया।
26. आनंदित उपहार प्राप्तकर्ताओं के गुणगानों से राजा की कीर्ति सभी दिशाओं में उसी प्रकार फैल गई, जैसे झील की छोटी-छोटी तरंगों द्वारा संवाहित कमल-पुष्पों का पराग सतह पर फैलता ही चला जाता है।
27. और अब अपने शासक द्वारा उठाए गए विवेकपूर्ण कदमों के परिणाम स्वरूप सभी लोग शिष्ट व्यवहार के अभ्यस्त हो गए, तो समृद्धि के प्रेरक इन सभी गुणों के विकास द्वारा पराजित कष्ट और विपत्तियां लुप्त हो गईं।
28. सदा समय से ऋतुएं आने लगीं और अपनी नियमित रूप से प्रत्येक व्यक्ति को आनंदित करने लगीं और राजा के नए स्थापित कार्य - व्यापार की भांति विधिसम्मत रूप से चलने लगीं। इसलिए पृथ्वी पर्याप्त मात्रा में विभिन्न प्रकार के अनाज उगाने लगी और वहां भरपूर जल सुलभ रहता और सभी जलाशय कमलों से भरे रहते ।
29. संक्रामक रोग मानव जाति को ग्रसित नहीं करते थे, चिकित्सीय जड़ी-बूटियां बहुत ही प्रभावशाली बन गई थीं। वर्षा सदा समय से और नियमित रूप से आने लगी ओर तारामंडल शुभ मार्ग से गुजरने लगा।
30. बाहर से अथवा राज्य के भीतर से या अव्यवस्था फैलाने वाले खतरनाक तत्वों की ओर से कहीं भी कोई भय नहीं था। धर्मपरायणता, आत्म-संयम, शिष्ट व्यवहार और नम्रता का जीवनयापन करते हुए इस देश के लोगों को लग रहा था, मानो वे कृत युग के लाभों का उपयोग कर रहे हैं।
इस प्रकार विधि के सिद्धांतों के अनुसार त्याग तपस्या करने की राजा की शक्ति द्वारा कष्ट और विपत्तियों की समात्ति के साथ निर्धनों की पीड़ाएं भी दूर हो गईं और देश समृद्ध हो गया तथा उसकी संपन्न जनता को आनंद की अनुभूति प्राप्त हुई । तद्नुसार वहां के लोग अपने राजा का गुणगान करने और सभी दिशाओं में उसकी ख्याति का विस्तार करने से कभी नहीं थकते थे।
एक दिन एक उच्च अधिकारी जिसका हृदय सत्य (निष्ठा) में प्रवृत्त था, इस प्रकार राजा से बोला, 'सच ही, यह एक सच्ची कहावत है।
31. 'राजा अपने विवेक से कितने ही बुद्धिमान लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें सदा सभी प्रकार के कार्यों और सबसे ऊंचे, सबसे निचले और मध्यम वर्ग के लोगों से निबटना पड़ता है। महामहिम, क्योंकि आपने पशु हत्या का दोषी बनने के पाप से मुक्त होकर धर्मपरायणता में जो त्याग तपस्या का अनुष्ठान किया है, उसके प्रभाव से अपनी प्रजा के लिए इस लोक और परलोक का सुख प्राप्त कर लिया है। अब संकट के दिन बीत गए हैं और गरीबी के कष्ट समाप्त हो गए हैं, क्योंकि लोग अच्छे आचरण के सिद्धांतों में परिपक्व हो चुके हैं। अधिक कहने से क्या लाभ? आपकी प्रजा प्रसन्न है।
32. ‘आपके अंगों को आच्छादित करने वाला काले हिरन का चर्म उज्ज्वल चंद्रमा में विद्यमान काले धब्बे के समान है, और न ही आपके ऊपर दीक्षित होने के कारण जो संयम थोपा गया है, वह आपके व्यवहार के सहज सौंदर्य को बाधित नहीं कर सकता। दीक्षा के अनुष्ठानों के अनुरूप आपने सिर पर जो वस्त्र धारण किया है, उसकी चमक आपके द्वारा पहले से धारण किए गए राज- छत्र की भव्यता से कम नहीं है। और अंत में यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि आपकी विशाल हृदयता ने ख्याति प्राप्त लोगों को पीछे छोड़ दिया है और एक सौ बलि देने वाले की प्रसिद्धि के अंहकार को चूर कर दिया है।
33. 'हे बुद्विमान राजन्, नियमानुसार किसी कामना की प्राप्ति की आकांक्षा रखने वाले लोगों द्वारा कराई गई बलि एक कुकृत्य है, क्योंकि उसके द्वारा जीवधारियों की हत्या की जाती है। इसके विपरीत आपके द्वारा किया गया त्याग आपकी कीर्ति का स्मारक है और आपके सुंदर व्यवहार और बुराई के प्रति आपकी विमुखता के पूर्णरूप से अनुरूप है।
34. 'आपकी प्रजा प्रसन्न है, जिसे आप जैसा संरक्षक प्राप्त है। यह निश्चित है कि कोई भी पिता अपने बच्चों का आपसे बेहतर अभिभावक नहीं बन सकता । '
एक अन्य अधिकारी ने कहा:
35. 'अगर समृद्ध व्यक्ति दान देते हैं, तो वे सदगुण अपनाने की आशाओं से प्रेरित होते हैं। अच्छा अचारण भी लोगों में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने अथवा मृत्यु के पश्चात स्वर्ग पहुंचाने की अभिलाषा से किया जाता है। लेकिन ये दोनों प्रकार के कार्य, जिनका प्रतिपादन दूसरों को लाभान्वित करने के लिए आपकी दक्षता में दुष्टिगोचर होता है, केवल उन्हीं लोगों द्वारा किए जा सकते हैं, जो ज्ञान और सद्गुणों के प्रयास से परिपूर्ण हैं। इस प्रकार पवित्र हृदय की पवित्रता के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। ( राजा के लिए आध्यात्मिक उपदेशों में यह भी कहा जाना चाहिए जो अपनी प्रजा की भलाई की कामना करते हुए स्वयं प्रयास करता है, और इस प्रकार निर्वाण, कीर्ति और प्रसन्नता लाता है, इसके सिवाय जिसका कोई कार्य नहीं है, वही राजा है।'
और इसमें निम्नलिखित यह जोड़ा जा सकता है: 'जो (राजा) भौतिक समृद्धि के लिए प्रयास करता है, उसे यह सोचते हुए कि उसकी प्रजा का धार्मिक आचरण ही समृद्धि का स्त्रोत है, स्वयं धर्म के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए।'
इसमें आगे यह कहा जाना चाहिए: 'पशुओं की हत्या करने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि इसे प्राप्त करने की शक्ति दान, आत्म-संयम, इंद्रिय निग्रह आदि में निहित है और इसी कारण से जो भी मोक्ष की कामना करता है, उसे इन गुणों के लिए स्वयं प्रयास करना चाहिए।' और तथागत के संबंध में चर्चा करते समय यह भी कहा गया है: ‘इस प्रकार स्वामी ने, जब कि वह अभी तक अपने पूर्व अस्तित्व में थे, विश्व के हितों का ध्यान रखने की प्रवृत्ति जताई। '