सुधारक और उनकी नियति ( भाग 6 ) - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
III
वास्तव में यह किसी भी व्यक्ति द्वारा अनुसरण करने के लिए नैतिक जीवन का सर्वोच्च मानदंड था। गौतम बुद्ध के समय के आयों के समाज के लिए नैतिक जीवन का इतना ऊंचा मानदंड बिल्कुल अविदित था।
वह पवित्र जीवन व्यतीत करने का उदाहरण प्रस्तुत करके ही नहीं रुक गए। वह समाज में सामान्य पुरुषों और स्त्रियों के चरित्र को भी बनाना चाहते थे। उनके मार्ग दर्शन के लिए उन्होंने दीक्षा का एक ऐसा स्वरूप विकसित किया, जिसके बारे में आर्यों का समाज बिल्कुल अनभिज्ञ था। दीक्षा में यह व्यवस्था थी कि बौद्ध धर्म को अंगीकार करने वाले व्यक्ति को बुद्ध द्वारा निर्धारित कुछ नैतिक सिद्धांतों का पालन करने के लिए वचन देना पड़ता था। इन सिद्धांतों को पंचशील नाम से जाना जाता है। ये हैं:
(1) हत्या न करना,
(2) चोरी न करना,
(3) झूठ न बोलना,
(4) कामुक न बनना, और
(5) मादक पेयों का सेवन न करना ।
ये पांच सिद्धांत आम लोगों के लिए थे। भिक्षुकों के लिए निम्न पांच और सिद्धांत थे :
(6) वर्जित समयों पर भोजन न करना,
(7) नृत्य, गायन में भाग न लेना अथवा नाट्य अथवा अन्य तमाशों में उपस्थित न होना,
(8) फूलमालाओं, इत्रों और आभूषणों के इस्तेमाल से दूर रहना,
(9) ऊंचे अथवा चौड़ी शैयाओं के उपयोग से दूर रहना, और
(10) कभी भी धन ग्रहण न करना ।
इन शीलों अथवा सिद्धांतों से एक आचरण संहिता बन गई थी, जिसका प्रयोजन स्त्रियों और पुरुषों के विचारों और कार्यों को नियमित करना था ।
उन्होंने अन्य सिद्धांतों को भी इसी प्रकार के सकारात्मक और व्यापक अर्थ प्रदान किए । बुद्ध के एक साधारण अनुयायी ने उन्हें एक बार अबौद्ध संन्यासी के इस उपदेश के बारे में बताया कि सर्वोच्च आदर्श, बुरे कार्यों, बुरे शब्दों, बुरे विचारों और बुरे जीवन की अनुपस्थिति में निहित है । बुद्ध की इस संबंध में टिप्पणी उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा:
'अगर, यह सच होता तो हर दूध पीता बच्चा जीवन का आदर्श प्राप्त कर लेता.... अच्छे और बुरे का ज्ञान जीवन है, और उसके बाद बुरे कार्यों, शब्दों, विचारों और जीवन के बदले अच्छे कार्यों, अच्छे शब्दों, अच्छे विचारों और अच्छे जीवन की प्राप्ति है। यह स्थिति केवल दृढ़ संकल्प और सतत प्रयास द्वारा लाई जा सकती है........"
बुद्ध के उपदेश केवल नकारात्मक नहीं थे। वे सकारात्मक और रचनात्मक हैं। बुद्ध अपने सिद्धांतों का अनुसरण करने वाले व्यक्ति से संतुष्ट नहीं होते थे। वह आग्रह करते थे कि दूसरों को उनका अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उदाहरणार्थ, अंगुत्तरनिकाय में बुद्ध ने एक अच्छे मनुष्य और बहुत अच्छे मनुष्य में भेद करते हुए बताया है कि वह जो हत्या, चोरी, कामुकता, झूठ और नशे से दूर रहता है, उसे अच्छा मनुष्य कहा जा सकता है, लेकिन बहुत अच्छा कहलाने योग्य केवल वही मनुष्य होता है, जो स्वयं इन बुरी चीजों से दूर रहता है और दूसरों को भी इससे दूर रखने के लिए प्रेरित करता है।
जैसाकि ठीक कहा गया है, बौद्ध धर्म के दो महत्वपूर्ण गुण प्रेम और विवेक हैं।
वह गुण के रूप में प्रेम के व्यवहार को कितनी गंभीरता से हृदयगंम कराते थे, उन्हीं के शब्दों से स्पष्ट हो जाता है - ' जिस प्रकार अपने जीवन का खतरा उठाते हुए मां अपने शिशु की देख-भाल करती है, उसी प्रकार व्यक्ति को सभी प्राणियों के प्रति अपार प्रेम प्रदान करने के लिए मन बनाना चाहिए। उसे संपूर्ण विश्व के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए, ऊपर-नीचे और उस पार सभी के लिए उसके मन में घृणाहीन और शत्रुता रहित अबाध प्रेम होना चाहिए। ऐसी जीवन-पद्धति विश्व में सर्वोत्तम है ।' बुद्ध ने ऐसा उपदेश दिया था।
'सभी पीड़ित प्राणियों के प्रति व्यापक दयाभाव, संवेदना, प्रत्येक प्रकार के संवेदनशील जीवन के प्रति सद्भावना तथागत (बुद्ध) की विशेषता थी, जैसे कि कुछ अन्य मानव पुत्रों में भी ये विशेषताएं रही हैं और वह अपने दृष्टिकोण को अनुयायियों तक पहुंचाने
1. सुत्तनिपात
में अत्यंत आश्चर्यजनक रूप में सफल हुए ¹ । '
बुद्ध विवेक के सिद्धांत को उतनी ही दृढ़ता से मानते थे, जितनी दृढ़ता से वह प्रेम के सिद्धांत को मानते थे। उनकी मान्यता थी कि नैतिक जीवन का प्रारंभ ज्ञान के साथ होता है और उसकी समाप्ति विवेक के साथ होती है। वह 'विश्व की रक्षा के लिए आए और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उनका तरीका अज्ञानता का विनाश, जीवन के सही मूल्यों एवं विवेकपूर्ण जीवन पद्धति के लिए ज्ञान का प्रसार करना था।' बुद्ध ने यह दावा नहीं किया कि लोगों का उद्धार करने के लिए उनके पास शक्ति है। लोगों को स्वयं इसके लिए प्रयत्न करना है और ज्ञान के मार्ग पर चलकर उद्धार हो सकता है। उन्होंने ज्ञान पर इतना जोर दिया कि उनके विचार में ज्ञान के बिना नैतिकता कोई गुण नहीं है।
तीन चीजों के विरुद्ध बुद्ध ने महान अभियान छेड़ा था। उन्होंने वेदों की सत्ता को अस्वीकार किया....
दूसरे, उन्होंने धर्म के रूप में बलि की निंदा की। बलि के प्रति बुद्ध का रवैया एक कहानी के रूप में जातक - माला में भली-भांति वर्णित है। कहानी इस प्रकार है :
1. प्रात- बुद्धिज्म, पृ. 49