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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

II

    बुद्ध के अवतरित होने के समय आर्यों के समाज की ऐसी ही स्थिति थी। सुधारक के रूप में आर्यों के समाज को सुधारने के लिए श्रम करने वाले बुद्ध के संबंध में दो संगत प्रश्न हैं। उनके सुधार में मुख्य आधार स्तंभ क्या थे ? अपने सुधार आंदोलन में वह किस हद तक सफल हुए हैं ?

    पहले प्रश्न को लें। बुद्ध ने यह अनुभव किया कि अच्छे और विशुद्ध जीवन का बोध कराने के लिए आदेश की अपेक्षा उदाहरण बेहतर है। एक अच्छा और विशुद्ध जीवन बिताकर उन्होंने सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किया, जिससे कि वह सभी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत कर सके। उन्होंने कितना निष्कलंक जीवनयापन किया, इसका परिचय हमें ब्रह्म जाल सुत्त से प्राप्त हो सकता है। इसे नीचे उद्धृत किया जा रहा है, क्योंकि इसमें हमें केवल यही जानकारी नहीं मिलती कि बुद्ध ने कितना विशुद्ध जीवनयापन किया, अपितु यह हमें इस बारे में भी जानकारी देता है कि आर्यों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कितना अस्वच्छ जीवनयापन करते थे।


ब्रह्म जाल सुत्त

    1. ऐसा मैंने सुना है। एक बार महाभाग लगभग पांच सौ बांधवों के साथ राजगृह और नालंदा के बीच मुख्य पथ से होकर गुजर रहे थे। और भिक्षु सुप्पिया भी अपने युवा शिष्य ब्रह्मदत्त के साथ राजगृह और नालंदा के बीच मुख्य पथ से होकर गुजर रहे थे। भिक्षु सुप्पिया, बुद्ध और उनके सिद्धांत एवं संघ की निंदा करते चले जा रहे थे। लेकिन उनके युवा शिष्य ब्रह्मदत्त बुद्ध की प्रशंसा में सिद्धांत की प्रशंसा में, संघ की प्रशंसा में कई प्रकार से विचार व्यक्त कर रहा था। इस प्रकार परस्पर विरोधी मत रखने वाले गुरु और शिष्य, दोनों महाभाग और उनके साथी बांधवों के पीछे-पीछे चल रहे थे।

reformers and their destiny - Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    2. अब महाभाग अपने साथी बांधवों के साथ रात गुजारने के लिए अम्बलत्तिका विहारोद्यान के राजकीय विश्रामगृह में रुके। भिक्षु सुप्पिया और उनके साथ उनके युवा शिष्य ब्रह्मदत्त भी वहीं ठहरे और विश्रामगृह में भी वे दोनों उसी विषय पर चर्चा करते रहे।

    3. और तड़के बहुत से बांधव जागकर मंडप में एकत्र हुए और आसन ग्रहण करने के पश्चात बातें करने लगे। उनकी वार्ता का रुख इस प्रकार था, 'बंधुओं, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है और विचित्र भी कि महाभाग, अर्हत, महान् बुद्ध जो सब कुछ जानते और देखते हैं, उन्होंने स्पष्ट रूप से यह समझ लिया होगा कि मनुष्यों की प्रवृत्तियां कितनी भिन्न होती हैं। क्योंकि देखने की बात यह है कि जबकि भिक्षु सुप्पिया बुद्ध, सिद्धांत और संघ की निंदा करते हैं, उनका ही युवा शिष्य ब्रह्मदत्त कई प्रकार से उनकी प्रशंसा में बोलता है। इस प्रकार गुरु और शिष्य, दोनों परस्पर विरोधी विचारों को व्यक्त करते हुए महाभाग और उनके बांधवों के पीछे-पीछे चलते हैं।

    4. अब उनकी वार्ता के रुख को समझते हुए महाभाग मंडप में गए और उन्होंने उस आसन पर स्थान ग्रहण किया, जो उनके लिए बिछाया गया था। बैठने के बाद उन्होंने कहा, ‘आप यहां बैठे क्या बातें कर रहे हैं, और आपके बीच बातचीत का क्या विषय है?" और उन्होंने उन्हें सब कुछ बता दिया। और उन्होंने कहा :

    5. 'बधुओ, अगर बाहर के लोग मेरे विरुद्ध अथवा संघ के विरुद्ध अथवा सिद्धांत के विरुद्ध बोलते हैं, तो आपको उस आधार पर न तो विद्वेष रखना चाहिए, न ईर्ष्या से पीड़ित होना चाहिए और न दुर्भावना ग्रस्त होना चाहिए । अगर आप उस आधार पर क्रोध करेंगे अथवा आहत होंगे, तो उससे आपकी अपनी आत्म-विजय में बाधा पहुंचेगी। अगर, दूसरों के हमारे विरुद्ध बोलने पर आप क्रोध करेंगे और दुखी होंगे, तो क्या ऐसी स्थिति में आप यह निर्णय कर सकेंगे कि उनके भाषण में कौन-सी अच्छी या बुरी बात कही गई थी ?'

    'श्रीमान्, यह नहीं होगा।'

    'लेकिन जब बाहर वाले मेरे अथवा सिद्धांत अथवा संघ के विरुद्ध बोलते हैं, तो आपको यह कहकर झूठ का उद्घाटन करना चाहिए और बताना चाहिए कि यह मिथ्या है, क्योंकि इस या उस कारण से यह तथ्य नहीं है, यह ऐसा नहीं है। ऐसी चीज हमारे बीच नहीं होती, न हममें होती है। '

    6. ‘लेकिन बंधुओं, अगर बाहर वाले मेरी, सिद्धांत की ओर संघ की सराहना में बोलते हैं, तो उस आधार पर आपको आनंदित अथवा हर्षित अथवा गर्वित नहीं होना चाहिए । यदि आप ऐसा करेंगे, तो इससे भी आपकी आत्म - विजय में बाधा पहुंचेगी। जब बाहर वाले मेरी अथवा सिद्धांत की अथवा संघ की सराहना करते हैं, तो आपको जो तथ्य है, उसे यह कहकर स्वीकार करना चाहिए: इस अथवा उस कारण से यह तथ्य है। यह ऐसा ही है। ऐसी चीज हमारे बीच पाई जाती है, हममें विद्यमान है।'

    7. एक गैर-धर्मांतरित व्यक्ति तथागत की सराहना करते हुए केवल छोटी-छोटी चीजों, महत्वहीन बातों और मात्र नैतिकता के बारे में बोलेगा। ऐसी छोटी-छोटी चीजें और मात्र नैतिकता के अल्प ब्यौरे क्या हैं, जिनकी वह सराहना करेगा ?

(4) (नैतिकता, भाग 1 )

    8. 'प्राणियों की हत्या को अस्वीकार करते हुए परिव्राजक गौतम जीवन के विनाश से अलग रहते हैं। उन्होंने गदा और तलवार अलग रख दी है, और कठोरता से लज्जित तथा दया से परिपूर्ण, वह सभी जीवनधारियों के प्रति संवेदनशील एवं दयालु रहते हैं। ' तथागत की सराहना में बोलते हुए, गैर-धर्मांतरित व्यक्ति इसी प्रकार बोल सकता है।

    अथवा वह कह सकता है : जो' नहीं दिया गया है, उसको अस्वीकार करते हुए परिव्राजक गौतम उसे ग्रहण करने से अलग रहे जो उनका अपना नहीं है । वह केवल वही लेते हैं जो दिया जाता है, और इस आशा में कि भेंट और आएगी, वह अपना जीवन ईमानदारी तथा हृदय की पवित्रता के साथ व्यतीत करते हैं। '

   अथवा वह कह सकता है, 'अशुचिता का परित्याग करते हुए परिव्राजक गौतम ब्रह्मचारी हैं। यह यौनाचार की अश्लील प्रथा से स्वयं को अलग और कोसों दूर रखते हैं। '

    9. अथवा वह कह सकता है: 'मिथ्याभाषण का परित्याग करते हुए परिव्राजक गौतम अपने-आपको झूठ से अलग रखते हैं। वह सत्य बोलते हैं और सत्य से कभी डिग नहीं। वह निष्ठावान और विश्वास योग्य हैं तथा विश्व को दिया गया अपना वचन भंग नहीं करते।'

    अथवा वह कह सकता है : 'निंदापूर्ण बातों को अस्वीकार करते हुए परिव्राजक गौतम पर-निंदा से दूर रहते हैं। वह जो कुछ यहां सुनते हैं, उसे यहां से लोगों के बीच विवाद उत्पन्न करने के लिए अन्यत्र दोहराते नहीं हैं, अन्यत्र को कुछ सुनते हैं, उसे वहां के लोगों के विरूद्ध विवाद उठाने के लिए नहीं दोहराते हैं। इस तरह वह बंटे हुए लोगों को एकजुट करने के लिए जीवनयापन करते हैं, वह मित्रों को प्रोत्साहन देने वाले, शांति स्थापित करने वाले, शांति प्रेमी, शांति के लिए भावपूर्ण और शांतिवर्धक शब्दों के वक्ता हैं। '

    अथवा वह कह सकता है : 'अविनयपूर्ण वाणी का परित्याग करते हुए, परिव्राजक गौतम कठोर भाषा का प्रयोग नहीं करते। वह ऐसे शब्द बोलते हैं, जो निर्दोष, कर्ण प्रिय, मधुर, हृदय-स्पर्शी, सुसंस्कृत, आनंददायक और लोकप्रिय हो । '

    अथवा वह कह सकता है: निरर्थक बातों का परित्याग करते हुए परिव्राजक गौतम व्यर्थ की बातचीत नहीं करते। विशेष अवसर पर वह धर्म तथा संघ के अनुशासन के विषय पर तथ्यानुसार बोलते हैं, उनके शब्द सार्थक होते हैं। वह सही समय पर ऐसे शब्द बोलते हैं, जो उपयुक्त उदाहरणों से युक्त, सुस्पष्ट और प्रासंगिक किसी के भी हृदय में बस जाने योग्य होते हैं। '

    10. अथवा वह कह सकता है : 'परिव्राजक गौतम बीजों अथवा पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते। '

    'वह दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं, रात्रि को भोजन नहीं करते, दोपहर के बाद भोजन ग्रहण नहीं करते।

    वह नाच, गानों और संगीत से भरपूर खेल-तमाशों और मेलों को देखने नहीं जाते।

    वह पुष्पहार पहनने, इत्र तथा अनुलेपन से स्वयं को सुसज्जित करने से दूर रखते हैं।

    वह विशाल एवं भव्य शय्या के उपयोग का परिवर्जन करते हैं।

    वह चांदी अथवा स्वर्ण ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

    वह बिना पकाए हुए अन्न को ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

    वह कच्चा मांस ग्रहण करने से दूर रहते हैं।

    वह स्त्रियों अथवा लड़कियों को स्वीकारने से दूर रहते हैं।

    वह बंधुआ पुरुषों और बंधुआ स्त्रियों को स्वीकारने से दूर रहते हैं।

    वह भेड़ों अथवा बकरियों को लेने से दूर रहते हैं।

    वह कुक्कुटों और शूकरों को लेने से दूर रहते हैं।

    वह हाथियों, पशुओं, घोड़ों और घोड़ियों को लेने से दूर रहते हैं ।

    वह जुते हुए खेतों अथवा बंजर भूमि को लेने से दूर रहते हैं।

    वह बिचौलिए अथवा संदेशवाहक के रूप में कार्य करने से दूर रहते हैं।

    वह क्रय-विक्रय से दूर रहते हैं।

    वह तुलाओं, कांस्य तथा मापकों के जरिए धोखा देने से दूर रहते हैं ।

    वह उत्कोच, ठगी और धोखाधड़ी के कुटिल तरीके से दूर रहते हैं ।

    वह विकलांग बनाने, हत्या करने, दास बनाने, मुख्य पथों पर लूट, डकैती और हिंसा से दूर रहते हैं। '

    बंधुआ, इसी प्रकार की बातें गैर-धर्मांतरित व्यक्ति तथागत की सराहना करते हुए कह सकता है।

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    कुलशील (आचरण के बारे में छोटा पैरा) यहां पर समाप्त होता है।

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    11. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण ऐसे नवपादपों और बढ़ते हुए पौधों को हानि पहुंचाने के अभ्यस्त हो जाते हैं, जिनका प्रसार जड़ों अथवा कटाई से अथवा ग्रंथियों अथवा कोपलों अथवा बीजों से होता है, परिव्राजक गौतम नवपादपों और बढ़ते हुए पौधों को इस प्रकार की हानि पहुंचाने से दूर रहते हैं । '

    12. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण जिस प्रकार खाद्य, पेय, वस्त्र, साज-सामान, बिस्तरे, इत्र और कढ़ी हुई सामग्री जैसी एकत्रित वस्तुओं के उपयोग के अभ्यस्त हो जाते हैं, परिव्राजक गौतम एकत्रित की गई ऐसी वस्तुओं के उपयोग से दूर रहते हैं।'

    13. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले परिव्राजक और ब्राह्मण ऐसे तमाशों में जाने के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :

    1. नाच - नृत्य (नक्काम),

    2. गीत गायन ( गीतम),

    3. वाद्य संगीत (वादितम),

    4. मेलों में तमाशे (पेखम),

    5. गाथाओं का पाठ (आक्खानम ),

    6. कर संगीत ( पाणिसरम),

    7. चारणों का गान ( वेताल),

    8. टम-टम वाद्य (कुंभाथुनम),

    9. सुंदर दृश्य (शोभा नगरकम् ),

    10. चांडालों द्वारा नटीय करतब ( चांडाल वमसा-धोपनम),

    11. हाथियों, घोड़ों, भैंसों-सांडों, बकरियों, भेड़ों, मुर्गों और बटेरों की लड़ाई,

    12. लठैती, मुक्केबाजी, मल्ल में शक्ति परीक्षण,

    13-16. दिखावटी लड़ाई, हाजिरी लेना, युद्धाभ्यास, समीक्षा |

    परिव्राजक गौतम ऐसे तमाशों में जाने से स्वयं को दूर रखते हैं। '

    14. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक अथवा ब्राह्मण ऐसे खेलों और मनोरंजनों के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :

    (1) आठ या दस चौखानों से बनी बिसात (चौपड़),

    (2) हवा में ऐसी बिसात की कल्पना करते हुए उसी प्रकार के खेलों का खेला जाना,

    (3) जमीन पर खींची गई लकीरों के ऊपर चलते रहना जिससे प्रत्येक अपने अपेक्षित स्थान पर कदम रख सके,

    (4) एक ढेरी में से नाखूनों के बल पर बिना हिलाए मोहरों अथवा मनुष्यों को हटाना, अथवा उन्हें ढेरी में रखना जिससे ढेरी हिल जाती है, वह हार जाता है,

    (5) पांसा फेंकना,

    (6) लंबी छड़ी से छोटी छड़ी पर प्रहार करना,

    (7) लाख अथवा लाल रंग अथवा आटे के पानी में सनी, अंगुलियों वाले हाथ को पानी में डुबोना और गीले हाथ को जमीन अथवा दीवार पर मारना, पुकार कर कहना कि ‘यह क्या होगा?' और दिखाना कि यह शक्ल हाथी, घोड़ों आदि की होनी चाहिए.

    (8) गेंद से खेल खेलना,

    (9) पत्तों की बनी हुई खिलौन की बांसुरी बजाना,

    (10) खिलौने के हलों से हल चलाना,

    (11) कलाबाजियां दिखाना,

    (12) ताड़ के पत्तों की खिलौना चक्की बनाकर खेलना,

    (13) ताड़ के पत्तों का खिलौना माप बनाकर खेलना,

    (14-15) खिलौना गाड़ियों अथवा खिलौना धनुषों से खेलना,

    (16) हवा में अथवा साथी खिलाड़ी की पीठ पर लिखे अक्षरों का पूर्वानुमान लगाना,

    (17) साथी खिलाड़ी के विचारों का पूर्वानुमान लगाना, और

    (18) बहरूपियापन।

    परिव्राजक गौतम इस प्रकार के खेलों और मनोरंजनों से अलग रहते हैं। '

    15. अथवा वह कह सकता है : जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए गए भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण ऊंचे और विशाल पलंगों के उपयोग के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :-

    (1) सचल पीठिकाएं, ऊंची और छह फुट लंबी (असंदी),

    (2) तख्त जिसकी पीठ पर पशु आकृतियां खुदी हों (पल्लं को),

    (3) बकरी के लोमो वाली लंबी चादर (गोनाको),

    (4) रंगीन थेगली से बनाए गए पलंगपोश (कित्तका),

    (5) सफेद कंबल ( पट्टिका).

    (6) ऊनी शैयावरण जिनमें फुलों की कढ़ाई की गई हो ( पटालिका),

    (7) रूई से भरी हुई रजाइयां (तुलिका),

    ( 8 ) तोशक, जिनमें शेर, बाघ आदि की आकृतियों की कढ़ाई की गई हो (विकाटिका),

    (9) दोनों तरफ पशु लोम लगे हुए गलीचे (उद्दालोम ),

    (10) एक तरफ पशु लोक लगे हुए गलीचे (इकांतलोमी),

    (11) रत्नजड़ित शैयावरण ( कथ्थीसम ),

    (12) रेशमी शैयावरण ( कोसीयम ),

    (13) सोलह नर्तकियों के लिए पर्याप्त कालीनें (कट्टाकम),

    (14-16) हाथी, घोड़े और रथ के नमदे,

    (17) हिरन की खालों को सिलकर बनाए गए नमदे ( अगीनापवेनी),

    (18) जंगली हिरन की खालों से निर्मित नमदे,

    (19) कालीन जिनके ऊपर चांदनी हों (सौटारखदाम), और

    (20) पीठिकाएं, जिनमें सिर और पैरों के लिए लाल तकिए हों । '

    परिव्राजक गौतम ऐसी वस्तुओं के उपयोग से दूर रहते हैं।

    16. अथवा वह कह सकता है : 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण सजने-संवरने और सौंदर्य के साधनों का उपयोग करने के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :

    अपने शरीर पर सुगंधित चूर्ण मलना, उससे बाल धोना और स्नान करना, पहलवानों की तरह अंगों को गदाओं से थपथपाना, दर्पणों, आंखों का काजल आदि, पुष्पहारों, कुंकुम, सौंदर्य प्रसाधनों, कंगन, कंठहारों, छड़ियों, औषधियों के लिए सरकंडे के खोलों, कटारों, सायबान कशीदाकारी की हुई चप्पलों, पगड़ियों, पुष्प, किरीटों, याक की पूंछ की चंवरों और लंबी झालरदार पोशाकों का इस्तेमाल करना ।

    परिव्राजक गौतम शरीर को सज्जित करने, सजने-संवरने के साधनों के उपयोग से दूर रहते हैं। '

    17. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण इस तरह के क्षुद्र वार्तालाप के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :

    राजाओं, डाकुओं, राज्य के मंत्रियों के किस्से युद्ध, आतंक और लड़ाइयों के वृतांत, खाद्य और पेय पदार्थों, वस्त्र, बिस्तरों, फूलमालाओं, इत्रों के बारे में बातें करना, संबंध-संपर्कों, साज-सामान, गांवों-नगरों, शहरों और देशों के बारे में बातें करना, स्त्रियों और सूरमाओं की कहानियां सुनाना, गली के नुक्कड़ों अथवा पनघट की गपशप करना, भूतों की कहानियां सुनाना, बेढंगी बातें करना, पृथ्वी अथवा समुद्र के उद्भव के बारे में अथवा अस्तित्व और अनस्तित्व के बारे में अटकलबाजी करना ।

    'परिव्राजक गौतम ऐसे क्षुद्र वार्तालाप से अलग रहते हैं । '

    18. अथवा वह कह सकता है : 'जब कि निष्ठावान व्यक्ति द्वारा दिए गए भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण ऐसी विवादपूर्ण शब्दावली के प्रयोग के अभ्यस्त हो जाते हैं, जैसे :

    तुम इस सिद्धांत और अनुशासन को नहीं जानते, मैं जानता हूं।

    तुम इस सिद्धांत और अनुशासन को कैसे जान पाओगे?

    तुम गलत विचारों में फंस गए हो। मैं ही केवल सही हूं।

    मैं सही बात बोल रहा हूं, तुम नहीं।

    तुम पहले को बाद में रख रहे हो और जो बाद में रखना चाहिए, वह पहले रख रहे हो । तुमने उपाय निकालने में इतनी देर कर दी, इससे सब कुछ गड़बड़ हो गया है। तुम्हारी चुनौती स्वीकार कर ली गई है।

    तुम गलत साबित हुए हो।

    अपने विचारों को स्पष्ट बताओ।

    अगर कर सकते हो, तो अपने आपको मुक्त करो ।

    ‘परिव्राजक गौतम ऐसी विवादपूर्ण शब्दावली से अलग रहते हैं। '

    19. अथवा वह कह सकता है: 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए गए भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण संदेश ले जाने, दौत्य कार्य करने और राजाओं, राज्य के मंत्रियों, क्षत्रियों, ब्राह्मणों अथवा युवा मनुष्यों के बीच यह कहते हुए मध्यस्थता करने के अभ्यस्त हो जाते हैं : वहां जाओ, यहां आओ, यह अपने साथ ले जाओ, वहां से वे ले आओ।

    'परिव्राजक गौतम ऐसे दासोचित कार्यों से अलग रहते हैं। '

    20. अथवा वह कह सकता है : 'जब कि निष्ठावान व्यक्तियों द्वारा दिए गए भोजन पर निर्वाह करने वाले कुछ परिव्राजक और ब्राह्मण जो अपने लाभ की लालसा से प्रवंचक, प्रमादी (देने वालों के लिए पवित्र शब्दों का प्रयोग करने वाले) शगुनिया, ओझा का काम करते हैं।

    'परिव्राजक गौतम इस प्रकार की ठगी और गूढ़ भाषा से दूर रहते हैं । '

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    (मज्झिम शील (आचरण पर लंबा अनुच्छेद) यहां पर समाप्त होता है)

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