प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
आर्यों के धर्म में यज्ञ या बलि का समावेश है। यज्ञ देवताओं के देवत्य में प्रवेश और उन्हें काबू में करने का माध्यम भी था। पारंपरिक यज्ञों की संख्या इक्कीस थी, जिन्हें सात-सात के तीन वर्गों में विभक्त किया गया था। पहले वर्ग के यज्ञों में मक्खन, दूध, अनाज आदि की आहुतियां दी जाती थीं। दूसरे वर्ग में सोम की आहुति और तीसरे में जीव की बलि चढ़ाई जाती थी । यज्ञ अल्पावधि अथवा एक वर्ष या उससे अधिक समय तक चलने वाले दीर्घकालिक हो सकते थे। दीर्घकालिक को सत्र कहा जाता था । यज्ञ के पक्ष में तर्क यह है कि इसे करने वाला शाश्वत पुण्य का भागी बनता है। यज्ञ के माध्यम से स्वयं उस मनुष्य का ही नहीं, अपितु उसके पितरों का भी उद्धार हो जाता है। अपनी भेंट द्वारा वह पितरों को सुख तो प्रदान करता ही है, साथ ही उनका वैभव बढ़ाता है और उन्हें स्वर्गलोक में रहने के लिए भेजता है ।¹
यज्ञ का प्रयोजन मात्र स्वर्गीय आनंद के प्राप्ति में सहायक बनना कदापि नहीं था। अधिकतर बड़े यज्ञ पृथ्वी पर उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति के लिए किए जाते थे। भविष्य के किसी लाभ के बिना किसी ने यज्ञ किया हो, इसकी जानकारी नहीं मिलती। ब्राह्मण-प्रधान भारत आभार प्रकट करना नहीं जानता था। सामान्य रूप से किसी व्यक्ति को यह लाभ उस देवता से मुआवजे के रूप में प्राप्त उपहार होता, जिसको आहुति दी जाती। यज्ञ का प्रारंभ इन शब्दों के उच्चारण के साथ होता है: 'वह इस मंत्र पाठ के साथ देवता को आहुति देता है : 'तू मुझे दे और मैं तुझे दूंगा; तू मुझे अर्पित कर और मैं तुझे अर्पित करूंगा।'

यज्ञ का अनुष्ठान विस्मय जागृत करता था। हर शब्द परिणाम - गर्भित होता था, यहां तक कि शब्द का उच्चारण अथवा लहजा भी महत्वपूर्ण होता था । तथापि ऐसे संकेत मिलते हैं कि स्वयं पुरोहित भी यह समझते थे कि अधिकांश अनुष्ठान छलावा मात्र हैं। और उनका उतना महत्व नहीं है, जितना कि बताया गया है।
प्रत्येक यज्ञ का अर्थ होता था, पुरोहित को दक्षिणा देना। जहां तक दक्षिणा का संबंध है, उसके नियम स्पष्ट थे और उनके प्रतिपादक निर्लज्ज थे। पुरोहित मात्र दक्षिणा के लिए यज्ञ कराता था और उसमें मूल्यवान वस्त्र, गाय, घोड़े अथवा स्वर्ण होता था। कब क्या दिया जाना है, इसका बड़ी सावधानी से उल्लेख किया गया था। पुरोहितों ने कर्मकांड का एक ऐसा जाल बिछाया था कि हर अनुष्ठान पर वे दक्षिणा की मांग करते थे। संपूर्ण व्यय का भार, जो बहुत ही विपुल होता था, उस एक व्यक्ति पर पड़ता था, जिसके लाभ के लिए यज्ञ कराया जाता था। संपूर्ण अनुष्ठान कितना व्ययसाध्य होता था, इसे इस बात से देखा जा सकता है कि एक जगह पर यज्ञ के लिए दी जाने वाली दक्षिणा एक हजार गायों के रूप में बताई गई है। इतने बड़े लोभ के लिए वह यह घोषणा करता था कि जो एक हजार गायों का दान करता है, उसे स्वर्ग की सभी वस्तुएं प्राप्त हो
1. यह होपकिन्स की पुस्तक दि रिलीजन ऑफ इंडिया से लिया गया है।
जाती हैं। पुरोहित के पास प्रस्तुत करने के लिए अच्छा पूर्वोदाहरण यह था कि स्वर्ग के देवताओं के बारे में प्रचलित कथाओं में कहा गया है कि वे जब पड़ोसी देवताओं की मदद करते हैं, तो सदैव एक-दूसरे से पुरस्कार की मांग करते हैं। जब देवता पुरस्कार चाहते हैं, तो पुरोहित को भी वैसा करने का अधिकार है।
जीव की बलि चढ़ाये जाने वाला यज्ञ प्रमुख यज्ञ होता था । यह खर्चीला और नृशंस होता था। आर्यों के धर्म में बलि के लिए पांच जीवों का वर्णन है। बलि के लिए जीवों की इस सूची में पहला स्थान मनुष्य का था। नर बलि सबसे महंगी होती थी। इस बलि के नियमों के अनुसार यह आवश्यक था कि वध किया जाने वाला व्यक्ति न तो पुरोहित हो और न ही दास हो। उसे क्षत्रिय अथवा वैश्य होना चाहिए। उस समय के सामान्य मूल्यांकन के अनुसार बलि के लिए खरीदे जाने वाले मनुष्य का मूल्य एक हजार गायें था। खर्चीला और नृशंस होने के अलावा यह अत्यंत वीभत्स होता होगा, क्योंकि बलि चढ़ाने वालों को केवल मनुष्य का वध ही नहीं करना होता था, बल्कि उसे खाना भी पड़ता था । मनुष्य के बाद दूसरा स्थान घोड़े का था। वह भी काफी खर्चीली बलि होती थी, क्योंकि घोड़ा आर्यों के लिए उनकी भारत विजय में एक दुर्लभ और आवश्यक पशु था। सैन्य शासन के इतने सक्षम साधन को बलि की भेंट चढ़ाना आर्यों के लिए रुचिकर नहीं था। यह बलि इसलिए भी वीभत्स होती होगी, क्योंकि अश्व-बलि चढ़ाने के एक अनुष्ठान में वध किए जाने से पूर्व घोड़े की बलि चढ़ाने वाले की पत्नी के साथ मैथुन कराया जाता था ।
आमतौर पर बलि के लिए भेंट किए जाने वाले ऐसे पशु होते थे, जिनका उपयोग लोग अपने कृषि प्रयोजनों के लिए किया करते थे। उनमें अधिकतर गाय और बैल होते थे।
यज्ञ खर्चीले होते थे और उन पर होने वाले व्यय के विचार से यह प्रथा समाप्त हो सकती थी। लेकिन वह समाप्त नहीं हुई। कारण यह है कि यज्ञ के रुकने से ब्राह्मण को होने वाली दक्षिणा की हानि का प्रश्न इससे जुड़ा हुआ है । यदि यज्ञ कराना रुक जाता तो कोई दक्षिणा भी नहीं रह पाती और ब्राह्मण भूखों मर जाता। इसलिए ब्राह्मण ने खर्चीली जीव बलि का विकल्प खोज लिया। नर बलि के लिए ब्राह्मण ने जीवित मनुष्य के स्थान पर घास-फूस अथवा धातु अथवा मिट्टी के बने मनुष्य को प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी। लेकिन उन्होंने इस भय से नर बलि का पूर्णरूप से त्याग नहीं किया कि कहीं यज्ञों का कराना बंद हो गया तो उन्हें अपनी दक्षिणा से हाथ धोना पड़ेगा। जब नर बलि बहुत कम हो गई तो उसके विकल्प के रूप में पशु बलि शुरू हो गई। आम लोगों के लिए पशु बलि भी खर्चीली थी। यहां भी इस आशंका से कि कहीं इस बलि का प्रचलन ही बंद न हो जाए, ब्राह्मण बड़े पशु के स्थान पर छोटे पशु का सुझाव लेकर आगे आया, जैसे कि पहले मनुष्य और घोड़े के स्थान पर पशु बलि की अनुमति दी गई थी। यह सब यज्ञ को जारी रखने के प्रयोजन के लिए किया गया, ताकि ब्राह्मण को दक्षिणा का नुकसान न उठाना पड़े, जोकि उसकी आजीविका थी । ब्राह्मण यज्ञ को जारी रखने के लिए इतने कटिबद्ध थे कि वे भेंट स्वरूप मात्र चावल प्राप्त करके संतुष्ट हो जाते थे।
तथापि इससे यह नहीं माना जाना चाहिए कि प्रस्तुत विकल्प से आर्यों के यज्ञों की भयावहता में कमी आ गई थी। विकल्पों को अपनाने के बावजूद अधिक खर्चीली और नृशंस बलि का स्थान अपेक्षाकृत कम खर्चीली और निर्दोष बलि ने पूर्ण रूप से नहीं लिया। इससे यही निष्कर्ष निकला कि भेंट बलि कराने वाले की क्षमता के अनुसार हो सकती है। अगर यह गरीब हो तो भेंट चावल की हो सकती है। अगर वह संपन्न हो तो भेंट बकरी की हो सकती है। अगर वह अमीर हो तो भेंट मनुष्य, गाय, घोड़े अथवा सांड की हो सकती है। विकल्पों का प्रभाव यह हुआ कि यज्ञ को सभी की सामर्थ्य के भीतर लाया गया, ताकि कुल मिलाकर ब्राह्मण अपेक्षाकृत अधिक लाभ अर्जित कर सके। इसके प्रभाव से पशु बलि नहीं रुक सकी। वास्तव में असंख्य लोगों द्वारा पशु-बलि जारी रखी गई।
यज्ञ में बहुधा नियमित रूप से पशुओं की हत्या होती थी, जिसमें ब्राह्मण बधिकों का काम करते थे। किस सीमा तक इन निर्दोष पशुओं की हत्या होती थी, इसकी कुछ जानकारी बौद्ध साहित्य में निहित यज्ञों के उल्लेख से प्राप्त होती है। सुत्तनिपात में एक ऐसे यज्ञ का वर्णन किया गया है, जिसे कौशल - नरेश प्रसेनजित द्वारा संपन्न किए जाने की व्यवस्था की गई थी। यह बताया जाता है कि यज्ञ में वध के लिए खंभों से पांच सौ बैल, पांच सौ सांड, पांच सौ गाएं, पांच सौ बकरियां और पांच सौ मेंमने बांधे गए थे और यज्ञ करने वाले पुरोहितों के आदेशानुसार राजा के सेवकों को जो कार्य सौंपे गए थे, वे अपने कर्त्तव्यों का पालन आश्रुपूरित नेत्रों से कर रहे थे।
यज्ञ में जहां एक ओर भयंकर हत्या कांड होता था, वहां वह वास्तव में एक प्रकार का उत्सव बन जाता था। भुने हुए मांस के अलावा, मादक पेय भी सुलभ होते थे। ब्राह्मणों के लिए सोम और सुरा, दोनों ही उपलब्ध होती थीं। अन्य लोगों को काफी मात्रा में सुरा सुलभ होती थी। लगभग प्रत्येक यज्ञ के बाद जुआ खेला जाता था और सबसे असाधारण बात यह है कि इसके साथ-साथ खुले में संभोग भी चलता रहता था। यज्ञ अय्याशीपूर्ण बन गए थे और उनमें कोई धर्म शेष नहीं रह गया था।
आर्य धर्म अनुष्ठानों की शृंखला मात्र था। इन अनुष्ठानों के पीछे अच्छे और सदाचारी जीवन के लिए कोई ललक नहीं होती थी। पवित्रता के लिए कोई कामना या पिपासा नहीं थी। उनके धर्म में कोई आध्यात्मिक तत्व नहीं था। ऋग्वेद के देवगीत आर्य धर्म में आध्यात्मिक आधार की अनुपस्थिति का बहुत ही अच्छा प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। देवगीत आर्यों द्वारा अपने देवताओं के लिए की गई प्रार्थनाएं हैं। इन प्रार्थनाओं में वे क्या कामना करते हैं? क्या वे यह प्रार्थना करते हैं कि उन्हें लोभ से दूर रखा जाए? क्या वे बुराई से छुटकारा पाने की प्रार्थना करते हैं? क्या वे अपने पापों के लिए क्षमादान की प्रार्थना करते हैं ? अधिसंख्य देवगीतों में इंद्र की स्तुति की गई है। वे उसकी स्तुति इसलिए करते हैं, क्योंकि उसने आर्यों के शत्रुओं का विनाश किया। वे सभी गुणगान करते हैं, क्योंकि उसने कृष्ण नामक एक असुर की सभी गर्भवती पत्नियों को मार डाला। वे उसकी प्रशंसा करते हैं, क्योंकि उसने असुरों के सैकड़ों गांवों को नष्ट कर दिया। वे उसकी सराहना करते हैं, क्योंकि उसने लाखों दस्युओं को मार डाला। वे इस आशा में इंद्र की प्रार्थना करते हैं, ताकि वह अनार्यों का और भी विनाश कर सके, जिससे वे अनार्यों की खाद्य आपूर्ति के साधन और संपदा प्राप्त कर सकें। ऋग्वेद के देवगीत आध्यात्मिक तथा उन्नायक होने की बजाय, कुत्सित विचारों तथा कुत्सित प्रयोजनों से परिपूर्ण है। आर्य धर्म का सरोकार कभी भी ऐसे जीवन से नहीं रहा, जिसे सदाचारी जीवन कहा जाता है।