Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar - प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 5 मुख्य मजकूराकडे जा

प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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सुधारक और उनकी नियति

यह जिल्दबद्ध लेख टाईप किए हुए 87 पृष्ठ का है। अम्बट्ठ सुत्त पाण्डुलिपि के पृष्ठ संख्या 69 से आरम्भ होता है और पृष्ठ 70 के पश्चात के पृष्ठों को 'ए' से 'जैड' तक संख्याबद्ध किया हुआ है। लोहिक्क सुत्त पृष्ठ 71 से आरम्भ हुआ है - सम्पादक

I. आर्य समाज II. बुद्ध और सुधार III.

     सर टी. माधव राव ने अपने समय के हिंदू समाज के बारे में कहा था : जितना अधिक कोई जीवित रहता है, देखता है और सोचता है, उतनी अधिक गहराई से वह महसूस करता है कि हिंदू समाज को छोड़कर पृथ्वी पर अन्य कोई समाज नहीं है, जो राजनैतिक बुराइयों से कम और स्वयं पर थोपी गई या स्वयं स्वीकार की गई या स्वयं पैदा की गई बुराइयों से अधिक ग्रस्त है और इसलिए इन बुराइयों को दूर किया जा सकता है।

     ये विचार बिल्कुल सही रूप से और बिना अतिशयोक्ति के हिंदू समाज में सुधार की आवश्यकता बताते हैं।

    प्रथम समाज सुधारक और उनमें सबसे महानतम गौतम बुद्ध थे। समाज सुधार का इतिहास ही बुद्ध से शुरू होता है और कोई भी इतिहास उनकी उपलब्धियां बताए बिना अधूरा रहेगा।

reformers and their destiny - Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar    सिद्धार्थ का जन्म शाक्य वंश में उत्तर भारत में नेपाल की सीमा के पास कपिलवस्तु नगर में ईसा पूर्व 563 में हुआ था। उनका कुलनाम गौतम था। वह एक राजकुमार थे। उनकी शिक्षा एक राजकुमार के रूप में हुई थी। उनका विवाह हुआ और उनके एक पुत्र भी था। आर्यों के समाज में बुराइयों और दुःखों से पीड़ित लोगों को देखकर उन्होंने सच्चाई और मुक्ति की खोज के लिए उनतीस वर्ष की उम्र में सांसारिक जीवन त्याग दिया था। उन्होंने चिंतन-मनन किया तथा दो जाने-माने शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण की। लेकिन उनकी शिक्षा से संतुष्ट न होने पर वे शिक्षकों को छोड़कर श्रमण बन गए। इसे भी व्यर्थ समझकर उन्होंने छोड़ दिया। गहराई से सोचने पर उन्हें बोध हुआ । इस अंतर्ज्ञान के आधार पर उन्होंने अपना धम्म (धर्म) प्रतिपादित किया। यह उन्होंने पैंतीस वर्ष की अवस्था में किया। जीवन के अस्सी वर्षों में से बचे हुए समय में उन्होंने अपने धम्म को फैलाया और बौद्ध मठों की नींव रखी तथा भिक्षुओं का संघ बनाकर उसे चलाया । लगभग ईसा पूर्व 483 में अपने प्रतिबद्ध अनुयायिओं के बीच कुसीनारा में उनकी मृत्यु हो गई।

    बोध होने के बाद बुद्ध ने अपना सारा जीवन अपने धम्म चक्र के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। आध्यात्मिक जीवन की ज्ञान ज्योति प्रज्ज्वलित रखने के लिए एकांत में समाधि लगाने-ठीक उसी प्रकार जैसे ईसामसीह एकांत में घंटों प्रार्थना करते थे- बौद्ध भिक्षुओं की बड़ी संख्या को जीवंत उपदेश देने, उनमें से ज्यादा विकसित अनुयायियों को आंतरिक विकास की सूक्ष्म बातें बताने, संघ के कार्य के लिए निर्देश देने, अनुशासन तोड़ने वालों को फटकारने, विश्वासपात्रों के गुणों की पुष्टि करने, शिष्टमंडल का स्वागत करने, विद्वान विरोधियों से बहस करने, दुखी को सांत्वना देने, राजा और किसान से, ब्राह्मण और अछूत से, अमीर और गरीब से मिलने के कार्यों में उनका समय बंटा हुआ था। वे इजारेदार और पापियों पर भी कृपालु थे और कई वैश्याओं ने समझ आने, अन्तर्मन को समझने और दया मिलने से गलत मार्ग त्याग दिया और बुद्ध की शरण में आ गई। इस प्रकार के जीवन के लिए कई प्रकार के नैतिक गुणों तथा सामाजिक प्रतिमानों और अन्य चीजों के अलावा वैभवशाली व्यवहार, कुशलता के साथ प्रजातांत्रिक भावनाओं की आवश्यकता होती है जोकि बहुधा दुर्लभ होती है। वार्तालाप पढ़कर कोई यह नहीं भूल सकता कि गौतम का जन्म और पालन-पोषण एक अभिजात के रूप में हुआ था। वह न केवल ब्राह्मणों और पंडितों से बातचीत करते थे, बल्कि राजकुमारों, मंत्रियों और राजाओं से आसानी व समान रूप से बात करते थे। ‘वह एक अच्छे अतिथि हैं और जिनमें परिहास भाव भी है तथा प्रत्येक द्वार उनके स्वागत को उद्यत होता है।' उन्हें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ऐसे चित्रित किया है :

    “पूज्य गौतम दोनों ओर से कुलीन, विशुद्ध वंश के आकर्षक दिखने में मनोहर, विश्वास जगाने वाले, रंग-रूप में सुंदर, गौर वर्ण, देखने में प्रभावशाली, अर्हत के सद्गुणों से सदाचारी, अच्छाई और सद्गुण से भरपूर, मधुर और विनम्र स्वर, शांत और स्थिर हैं। वह सबका स्वागत करते हैं, मैत्रीपूर्ण और शांतिकारक हैं, घमंडी नहीं हैं, सब उनसे मिल सकते हैं, और वे बातचीत में रूढ़िवादी नहीं हैं। "

    लेकिन उस समय के भारतवासियों को जिस चीज ने आकर्षित किया और जो चीज युगों से आकर्षित करती आई है, उसे उक्त ब्राह्मण ने निम्न शब्दों में व्यक्त किया :

    “गौतम अपने महान वंशजों को त्यागकर, धन और स्वर्ण, जमीन के दबे हुए और जमीन के ऊपर के खजाने को त्यागकर संन्यासी बने और उन्होंने धार्मिक जीवन अपनाया। वास्तव में जब वे युवक थे, सिर पर एक भी सफेद बाल नहीं था, सुंदर व्यक्ति थे, तब उन्होंने घरबार छोड़कर संन्यासी जीवन में प्रवेश किया । "

    “उनके ऐसे जीवन से न केवल प्रीतिकर आचरण, सहानुभूति और दयालुता की आशा की जाती है, बल्कि दृढ़ता और साहस भी आवश्यक है। जब भी समय के अनुसार आवश्यक हुआ, उन्होंने उन लोगों से शांतिपूर्वक संबंध-विच्छेद कर लिया, जो संघ का अहित करते थे। उन्होंने शारीरिक कष्ट धैर्य से सहा, लेकिन फिर भी आंतरिक सुख में कमी नहीं हुई । साहस की आवश्यकता थी जो उनमें पाया गया, उदाहरण के लिए, देवदत्त के द्वारा उनकी हत्या के कई प्रयासों और हत्या की धमकियों के बावजूद, वे शांतचित्त बने रहे। कौशल राज्य के प्रसिद्ध डाकू का राज्य के गांवों में आतंक था। उस डाकू से बुद्ध अकेले और बिना अस्त्र के मिलने गए तथा उसका हृदय परिवर्तन किया और इस प्रकार लोक-कंटक से बदलकर उसे संघ का शांतिप्रिय सदस्य बना लिया। कष्ट, खतरे और अनादर उनकी आध्यात्मिक शांति को भंग नहीं कर पाए। जब उन्हें गाली दी गई, तो उन्होंने जवाब में गाली नहीं दी। जिनको सांत्वना व सहयोग की आवश्यकता थी, उनके लिए उनकी तरफ से कोमल सहृदयता की कमी नहीं थी । "

    वह सबको प्रिय थे। बार-बार उनका वर्णन किया जाता है या वह स्वयं वर्णन करते है कि उन्होंने लोगों की भलाई के लिए, लोगों की खुशी के लिए, लोगों के लाभ के लिए, भगवान और इंसान की अच्छाई और खुशी और समग्र विश्व से सहानुभूति के लिए जन्म लिया है।

    उन्होंने आर्यों के समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। यद्यपि उनका नाम भारत के बाहर फैला है, उनकी शिक्षा का प्रभाव अभी तक यहां बना हुआ है।

    उनका धर्म बड़ी तेजी से फैला। जल्दी ही यह सारे भारत का धर्म बन गया। लेकिन यह भारत तक ही सीमित नहीं रहा । यह तत्कालीन विश्व के कोने-कोने तक पहुंच गया। हर नस्ल के लोगों ने इसे स्वीकार किया। यहां तक कि एक समय अफगान लोग भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। यह एशिया तक ही सीमित नहीं रहा। इस बात के भी प्रमाण मिलते है कि बौद्ध धर्म ब्रिटेन तक फैला हुआ था। ¹

    बौद्ध धर्म के इतनी तेजी से फैलने के क्या कारण थे ?

    इस बारे में प्रोफेसर होपकिन्स का कथन उद्धृत करने योग्य है। उन्होंने कहा है  :

    " प्रारंभ से बौद्ध धर्म के तेजी से प्रसार का कारण उसकी शिक्षा तथा उसकी नींव डालने वाले के प्रभावोत्पादकता और प्रश्रय में निहित है। बुद्ध ने लोगों को मोहित कर दिया, उनकी शिक्षा ने उत्साह जगाया, अभिजात के रूप में उनकी जो स्थिति थी, उसने उन्हें अभिजात वर्ग में सम्मानित बनाया, उनमें विद्यमान चुंबकीय आकर्षण ने उन्हें लोगों का भक्ति- भाजन बनाया।


1. बुद्धिज्म इन प्री-क्रिश्चियन ब्रिटेन, डॉ. डोनाल्ड ए मेकेन्जी, ब्लेकी एंड सन, लंदन, 1928


इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ से इस शिक्षक और हृदय जीतने वाले का तेजस्वी और आकर्षक व्यक्तित्व उभरता है। कोई भी व्यक्ति उनकी तरह भगवान न होते हुए भी भगवान जैसा ही रहा। देवता होने का झूठा दावा नहीं किया, भविष्य के सुख से निस्पृह, अनासक्त, वैराग्य, विचारों में युगांतरकारी लेकिन संसार की मूर्खता की प्यार से उपेक्षा करते हुए, उच्च लेकिन बहुत पसंद किए जाते थे, विश्व-बंधुत्व भाव से संपन्न वह लोगों में साधारण और शांत रूप से घूमते थे, मधुर से मधुरतम वाणी, सभी के आदर्श, सभी से मित्र भाव। उनका स्वर सम्मोहक और पटु था, उनकी आवाज श्रोता को उनका कायल बना देती थी, उनका दर्शन प्रेरणादायक था। परंपरा से ऐसा लगता है। कि वे उनमें से एक होंगे, जिनका व्यक्तित्व ही आदमी को न केवल नेता, बल्कि साथियों के हृदय में भगवान बना देने के लिए काफी था। जब ऐसा कोई बोलता है, तो वह श्रोता को वश में कर लेता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या कहते हैं, क्योंकि वह गति को प्रभावित करते हैं और जो भी उनको सुनता है, वह नत मस्तक हो जाता है। इस व्यक्तित्व के अलावा, दूसरों के मन में यह भावना आती है कि जो भी शिक्षा वह देता है, वह सामान्य नहीं है, बल्कि लोगों की मुक्ति की एक आशा की किरण है, पहली बार उनके शब्दों में सच्चाई पाते हैं जिससे गुलाम एक स्वतंत्र आदमी बन जाता है, वर्गों में भाईचारा पैदा होता है। तब ये देखना मुश्किल नहीं है कि बिजली जैसा स्फूर्ति कहां से उपजती और कैसे एक हृदय से दूसरे हृदय में प्रवाहित होती है। ऐसे आदमी थे बुद्ध, ऐसी उनकी शिक्षाएं थीं, और ऐसी ही अपरिहार्य तीव्रता से बौद्ध धर्म फैला और इस नए मत ने लोगों की नैतिक चेतना पर गहरा प्रभाव डाला । "

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