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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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V


     तीसरे, बुद्ध ने जातिप्रथा की निंदा की। जातिप्रथा उस समय वर्तमान रूप में विद्यमान नहीं थी। अंतर्जातीय भोजन और अंतर्जातीय विवाह पर निषेध नहीं था। तब व्यवहार में लचीलापन था। आज की तरह कठोरता नहीं थी। किंतु असमानता का सिद्धांत जो कि जातिप्रथा का आधार है, उस समय सुस्थापित हो गया था और इसी सिद्धांत के विरुद्ध बुद्ध ने एक निश्चयात्मक और कठोर संघर्ष छेड़ा। अन्य वर्गों पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों के मिथ्याभिमान के वह कितने कट्टर विरोधी थे और उनके विरोध के आधार कितने विश्वासोत्पादक थे, उसका परिचय उनके बहुत से संवादों से प्राप्त होता है। इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण अम्बट्ठ सुत्त के रूप में जाना जाता है।

sudharak aur Unki Niyati - Siddhartha Gautama buddha - Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

अम्बठ्ठ सुत्त

( एक युवा ब्राह्मण की अशिष्टता और एक वृद्ध की निष्ठा )


     1. मैंने इस प्रकार सुना है। एक बार जब महाभाग कौशल देश की यात्रा के दौरान लगभग पांच सौ बांधवों सहित कौशल के इच्छानंगल नामक ब्राह्मण के गांव में पहुंचे, और वह वहां के इच्छानंगल अरण्य में ठहरे।

     उस समय पोष्करसाति नामक ब्राह्मण उक्कट्ठा में निवास करता था। वह स्थल चहल-पहल, हरियाली और वन्य भूमि तथा धान्य से परिपूर्ण था। कौशल - नरेश प्रसेनजित ने यह क्षेत्र उन्हें उपहार के रूप में प्रदान किया था, जिस पर उन्हें राजा के समान अधिकार प्राप्त था।

     2. अब पोष्करसाति ब्राह्मण ने यह समाचार सुना: 'लोग कहते हैं कि शाक्य वंश के श्रमण गौतम शाक्य परिवार का त्याग करके धम्म (धार्मिक) जीवन अंगीकार करने के लिए बड़ी संख्या में अपने संघ के बांधवों के साथ इच्छानंगल में पहुंच गए हैं और वहां अरण्य में ठहरे हुए हैं। अब जहां तक श्रद्धेय गौतम का संबंध है, उनकी इतनी ख्याति है कि विदेश में भी उनकी ऐसी चर्चा है: महाभाग एक अर्हत, पूर्ण प्रबुद्ध, विवेक और सौजन्य से परिपूर्ण, लौकिक ज्ञान से पुष्ट, मार्गदर्शन के इच्छुक नश्वरों के लिए अनुपम पथप्रदर्शक, देवों और मनुष्यों के लिए उपदेशक, वरदान प्राप्त हैं। वह स्वयं देवताओं, ब्राह्मणों और असम प्रदेश की पहाड़ियों पर मर भाषा बोलने वाले लोगों के ऊपर के लोक और उसके नीचे संन्यासियों तथा ब्राह्मणों, राजाओं और प्रजाजन वाले लोक सहित संपूर्ण सृष्टि को इस प्रकार जानने के बाद, वह अपने ज्ञान की जानकारी दूसरों को कराते हैं। सत्य, जो अपने मूल में सुंदर है, प्रगति में सुंदर है, संपूर्णता में सुंदर है, उसी की उद्घोषणा वह भावना और शब्द में करते हैं, वह उच्चतर जीवन की पूर्णता और पवित्रता का भरपूर ज्ञान कराते हैं।'

    और उस प्रकार के अर्हत के दर्शनार्थ जाना अच्छा है।

    3. और उस समय अम्बट्ठ नामक युवा ब्राह्मण पोष्करसाति ब्राह्मण का एक शिष्य था। वह जाप करता था ( पवित्र शब्दों का), उसे रहस्यवादी पद्य कंठस्थ थे, वह तीनों वेदों का ज्ञाता था, उनके अनुक्रम, उनकी क्रियापद्धति, ध्वनिशास्त्र और भाष्य (चतुर्थ) रूप में) तथा पंचमशास्त्र के रूप में दंतकथाओं का अच्छा ज्ञान था। वह मुहावरों और व्याकरण में निष्णात था, वह लोकायत, कूट तार्किकता और एक महापुरुष के शरीर पर विद्यमान लक्षणों से संबंधित शस्त्र से सुपरिचित था, त्रिसूत्री वैदिक ज्ञान पद्धति में उसे इतना पारंगत माना जाता था कि उसका गुरु भी उसके संबंध में यह कहता था, 'जो कुछ मैं जानता हूं वह तुम जानते हो, और जो तुम जानते हो वह मैं जानता हूं।'

    4. और पोष्करसाति ने अम्बट्ठ को यह समाचार सुनाया और कहा: 'प्रिय अम्बट्ठ श्रमण गौतम के पास जाओ और यह पता लगाओ कि विदेश में उनकी ख्याति का जो डंका बज रहा है, वह वास्तविकता के अनुरूप है या नहीं, श्रमण गौतम वैसे ही हैं, जैसा कि उनके विषय में कहा जाता है, अथवा नहीं?"

5. ‘लेकिन, श्रीमन्, मैं कैसे जान पाऊंगा कि वह वैसे ही हैं, या नहीं?'

     ‘अम्बट्ठ, हमारे रहस्यवादी पद्यों में एक महापुरुष के बत्तीस शारीरिक लक्षण बताए गए हैं। अगर वे लक्षण किसी मनुष्य में हों, तो दो में से एक वह अवश्य बनेगा, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं बनेगा। अगर वह गृहस्थ है, तो वह एकछत्र सम्राट, एक धर्मपरायण राजा बनेगा, चार महासागरों के तटों तक उसका शासन होगा, वह एक विजेता होगा और अपनी प्रजा का संरक्षक तथा सात विधियों का स्वामी होगा और ये सात विधियां हैं: चक्र, हाथी, घोड़ा, रत्न, स्त्री, कोषाध्यक्ष और मंत्री और उसके एक हजार से अधिक वीर और शक्तिशाली पुत्र होते हैं, जो शत्रु की सेनाओं के छक्के छुड़ा देते हैं। और वह समुद्र - पर्यन्त इस विशाल पृथ्वी पर तलवार के बल के बिना धर्मपरायणता के साथ शासन करता हुआ पूर्णप्रभुता से युक्त निवास करता है। लेकिन अगर वह गृहस्थ का त्याग करके गृहविहीन स्थिति में प्रवेश करता है, तो वह बुद्ध बन जाएगा, जो विश्व की आंखों से परदा हटा देता है। अम्बट्ठ, अब तुमने मुझसे रहस्यमय शब्द प्राप्त किए हैं।'

    6. ‘बहुत अच्छा, श्रीमन्’, अम्बट्ठ ने उत्तर में कहा, और अपने स्थान से उठकर पोष्करसाति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए युवा ब्राह्मणों के दल के साथ वह अश्वचालित रथ पर इच्छानंगलकला के अरण्य की ओर चल पड़ा। और वह रथ वहां तक गया, जहां तक वाहनों के लिए मार्ग उपयुक्त था। उसके बाद वह रथ से उतरकर पैदल ही उपवन में गया।

     7. उस समय बहुत से बांधव खुली हवा में इधर-उधर टहल रहे थे। अम्बट्ठ उनके समीप गया और कहा, 'इस समय श्रद्धेय गौतम कहां ठहरे हुए हैं? हम यहां उनसे मिलने आए हैं।'

     8. तब बांधवों ने सोचा: यह युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ विशिष्ट परिवार का है और विख्यात ब्राह्मण पोष्करसाति का शिष्य है। महाभाग ऐसे व्यक्ति के साथ वार्तालाप करने में कठिनाई महसूस नहीं करेंगे और उन्होंने अम्बट्ठ से कहा, 'गौतम वहां ठहरे हुए हैं, जहां द्वार बंद हैं, चुपचाप ऊपर जाओ और धीरे से ड्योढ़ी में प्रवेश करो और खांसकर दस्तक दो । महाभाग तुम्हारे लिए द्वार खोल देंगे।'

     9. तब अम्बट्ठ ने ऐसा ही किया और महाभाग ने द्वार खोल दिया, अम्बट्ठ भीतर चला गया और अन्य युवा ब्राह्मण भी अंदर चले गए और उन्होंने महाभाग से नम्रता तथा शालीनता से पूर्ण शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया तथा अपना स्थान ग्रहण किया। लेकिन अम्बट्ठ टहलता रहा और उसने अचानक बड़ी बेचैनी से खड़े-खड़े बैठे हुए महाभाग से कुछ विनीत स्वर में कहा।

     10. और महाभाग ने उससे कहा: 'अम्बट्ठ, क्या वृद्ध गुरुओं और अपने गुरुओं के वयोवृद्ध गुरुजनों से बात करने का तुम्हारा यही व्यवहार है, जैसे कि तुम अब इधर-उधर टहलते हुए अथवा खड़े-खड़े मुझसे बात कर रहे हो, जब कि मैं बैठा हुआ हूं।'

     11. 'अवश्य नहीं, गौतम। अगर ब्राह्मण स्वयं चल रहा हो तो उससे चलते हुए बोलना, अगर ब्राह्मण खड़ा है तो खड़े-खड़े, अगर उसने आसन ग्रहण कर लिया है तो बैठकर, अथवा अगर ब्राह्मण सहारे से लेटा है तो सहारा लेकर उससे बोलना उचित है। लेकिन मुडित सिर वालों, छद्मवेशी साधुओं, काले भृत्यों और हमारे कुल की सेवा में रत अधम जातियों के साथ मैं उसी प्रकार बोलूंगा जैसा कि अब मैं आपसे बोल रहा हूं।

     'लेकिन, अम्बट्ठ, जब तुम यहां आए हो, तो तुम्हें किसी चीज की जरूरत रही होगी। अच्छा तो यही है कि तुम यहां अपने आने के उद्देश्य पर विचार करो । यह युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ अशिष्ट है, यद्यपि वह अपनी संस्कृति पर गर्व करता है। क्या ऐसा व्यवहार प्रशिक्षण के अभाव के सिवाय किसी अन्य कारण से हो सकता है?"

     12. तब अम्बट्ठ अशिष्ट कहे जाने पर महाभाग से अप्रसन्न और नाराज हो गया और यह विचार करते हुए कि महाभाग उससे कुपित हैं, उसने व्यंग्य और उपहास करते हुए अवज्ञापूर्ण ढंग से महाभाग से कहा: 'गौतम, आपका यह शाक्य कुल असुसंस्कृत है, आपका शाक्य वंश अशिष्ट, चिड़चिड़ा और उग्र है। भृत्य केवल भृत्य हैं, वे न तो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, न उन्हें महत्व देते हैं, न उन्हें उपहार देते हैं, और न उनका सम्मान करते हैं। गौतम, ऐसा व्यवहार न तो उपयुक्त है, न ही भद्रोचित है।'

     इस प्रकार युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने पहली बार शाक्यों पर भृत्य होने का लांछन लगाया।

     13. लेकिन, अम्बट्ठ, शाक्यों ने तुम्हारे प्रति कौन-सा दुर्व्यवहार किया है?

     'एक बार, गौतम, मुझे पोष्करसाति के किसी कार्य से कपिलवस्तु जाना पड़ा और मैं शाक्यों के सभा भवन में चला गया। उस समय बहुत से वृद्ध और युवा शाक्य मंडप में भव्य आसनों पर बैठे हुए आनंद मना रहे थे और साथ-साथ परिहास कर रहे थे, अपनी अंगुलियों से एक-दूसरे को धकिया रहे थे और सच पूछो तो मेरे विचार में उनके परिहास का विषय स्वयं में था, और किसी ने बैठने तक को नहीं कहा। और, गौतम, न तो यह उपयुक्त है, और न ही भद्रोचित है, क्योंकि शाक्य भृत्य केवल भृत्य हैं, जो न तो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, न उन्हें महत्व देते हैं, न उन्हें उपहार देते हैं, और न उनका सम्मान करते हैं।

     इस प्रकार युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने दूसरी बार शाक्यों पर भृत्य होने का लांछन लगाया।

     14. 'इतनी छोटी-सी बात पर बुरा मान गए अम्बट्ठ। नन्हीं सी हठी चिड़िया अपने घोंसले में जो चाहे, बोल सकती है। और शाक्य तो कपिलवस्तु में अपने ही घर में थे। इतनी छोटी-सी बात पर बुरा मान जाना तुम्हें शोभा नहीं देता । '

     15. ‘गौतम, ये चार श्रेणियां हैं- कुलीन जन, ब्राह्मण, व्यापारी और श्रमिक जन । और इन चारों में से तीन, अर्थात कुलीन जन, व्यापारी और श्रमिक जन, वास्तव में ब्राह्मणों के सेवक हैं। इसलिए गौतम न तो यह उपयुक्त है, और न भद्रोचित ही है कि शाक्य जो भृत्य और केवल भृत्य हैं, वे न तो ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, न उन्हें महत्व देते हैं, न उन्हें उपहार देते हैं, और न उनका सम्मान ही करते हैं। '
·
     इस प्रकार युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने तीसरी बार शाक्यों पर भृत्य होने का लांछन लगाया।

     16. तब महाभाग ने इस प्रकार सोचा यह अम्बट्ठ शाक्यों पर भृत्य कुलीन होने का आरोप लगाकर उन्हें नीचा दिखाने पर तुला हुआ है। मैं उससे उसकी अपनी वंश परंपरा के बारे में भी पूछ सकता हूं।' और उन्होंने उससे कहा :

     अम्बट्ठ, तुम्हारा संबंध किस परिवार से है? हां, अगर कोई पितृ और मातृ पक्ष की ओर से तुम्हारे पुराने नाम और तुम्हारी वंश परंपरा का अध्ययन करे, तो यह पता चलेगा कि किसी समय में शाक्य तुम्हारे स्वामी होते थे और तुम उनकी किसी एक दासी की संतान हो। लेकिन शाक्य मूलत: स्वयं को ओक्काक राजाओं के वंशधर बताते हैं।

     अम्बट्ठ, बहुत समय पहले राजा ओक्काक ने अपनी चहेती रानी के पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा से अपने बड़े बच्चों- ओक्कमुख, करान्दा, हत्थीनिका और सिनीपुरा को देश से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार निष्कासित होने के बाद उन्होंने हिमालय की ढलान पर, झील के किनारे आश्रय लिया, जहां एक विशाल कोल (शाल) का वृक्ष विद्यमान था । और इस आशंका से कि कहीं उनके वंश की पवित्रता को आंच न आए, उन्होंने अपनी बहनों से अंतर्विवाह कर लिया।

     अब राजा ओक्काक ने अपने दरबार में मंत्रियों से पूछा, 'श्रीमन्, अब बच्चे कहां हैं?'

     'राजन, हिमालय की ढलान पर, झील के किनारे एक स्थान है, जहां एक विशाल कोल (शाल) का वृक्ष विद्यमान है। वहीं वे रहते हैं। और कहीं उनके वंश की पवित्रता पर आंच न आ जाए, इसलिए उन्होंने अपनी ही बहनों (शाक्य वंशीय) से विवाह कर लिया है।

     तब राजा ओक्काक ने प्रशंसा से अभिभूत होकर कहा : 'वे युवक कोल (शाक्य) के हृदय हैं, वे अपने वंश (परम शाक्य ) को कायम रखे हुए हैं। अम्बट्ठ यही कारण है कि उन्हें शाक्यों के नाम से जाना जाता है। ओक्काक की दिशा नाम की एक दासी थी। उसने एक काले बच्चे को जन्म दिया। और ज्यों ही वह उत्पन्न हुआ, उस नन्हें से काले बच्चे ने कहा, 'मां, मुझे धोओ। मां मुझे नहलाओ, मां, मुझे इस कलुष से मुक्त करो। तभी मैं आपके काम आ सकूंगा।' अम्बट्ठ, अब जिस प्रकार लोग असुरों को असुर कहते हैं, उसी प्रकार उस समय लोग काले (कान्हे) को असुर कहते थे और उन्होंने कहा : 'यह पैदा होते ही बोल पड़ा। यह जो काला (कान्हा) बच्चा पैदा हुआ है, यह एक असुर पैदा हुआ है।' और अम्बट्ठ कान्हायनों का मूल यही है। वह कान्हायनों का पूर्वज था। और मातृ पक्ष की ओर से तुम्हारे पुराने नाम और तुम्हारी वंश परंपरा का अध्ययन करें, तो यह पता चलेगा कि किसी समय शाक्य तुम्हारे स्वामी होते थे और तुम उनकी किसी एक दासी की संतान हो ।

     17. और जब वह इस प्रकार बोल चुके तो युवा ब्राह्मणों ने महाभाग से कहा: 'श्रद्धेय गौतम, अम्बट्ठ पर दासी कुल से उत्पन्न होने का कलंक लगाकर उसे और नीचा न दिखाएं। वह अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ है और अच्छे परिवार का है। वह पवित्र देव स्तुतियों से सुपरिचित एक योग्य पाठक और विद्वान पुरुष है और वह इन मामलों में श्रद्धेय गौतम को उत्तर देने में समर्थ है। '

     18. तब महाभाग ने उनसे कहा: 'बिल्कुल ऐसा ही होगा। अगर तुम अन्यथा समझते हो, तो हमारी इस वार्ता को आगे बढ़ाने का काम तुम्हारा होगा। लेकिन जब तुम इस प्रकार सोचते हो, तो स्वयं अम्बट्ठ को बोलने दिया जाए । '

     19. 'हम ऐसा नहीं सोचते और हम मौन ही रहेंगे। अम्बट्ठ इन मामलों में श्रद्धेय गौतम को उत्तर देने में समर्थ है। '

     20. तब महाभाग ने अम्बट्ठ ब्राह्मण से कहा: 'तब आगे यह प्रश्न उठता है, अम्बट्ठ, जो बहुत ही सुसंगत है, और अनिच्छापूर्वक ही सही, तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर अवश्य देना होगा। अगर तुम स्पष्ट उत्तर नहीं दोगे, अथवा दूसरे प्रसंग पर चले जाओगे, अथवा मौन रहोगे, अथवा विचलित हो जाओगे तो तुम्हारा सिर इसी स्थल पर खंड-खंड हो जाएगा। जब वयोवृद्ध और अनुभवी ब्राह्मण तुम्हारे गुरुजन अथवा उनके गुरुजन इस बारे में आपस में बात कर रहे थे कि कान्हायनों की मूल उत्पत्ति कहां से हुई और उनका वह पूर्वज कौन था जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं, तुमने इस बारे में क्या सुना है?'

     और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो अम्बट्ठ मौन रहा और महाभाग ने फिर से वही प्रश्न पूछा। और फिर भी अम्बट्ठ मौन रहा। तब महाभाग ने उससे कहा : 'अम्बट्ठ, बेहतर यही होगा कि तुम अब इसका उत्तर दे दो। यह तुम्हारे चुप रहने का समय नहीं है। क्योंकि कोई भी यदि तथागत ( जिसने सत्य पर विजय प्राप्त कर ली हो ) द्वारा तीसरी बार पूछे जाने पर भी एक सुसंगत प्रश्न का उत्तर नहीं देता, तो उसका सिर वहीं टुकड़ों में खंडित हो जाता है । '

     21. और उस समय वज्र को धारण करने वाला प्रेत, अग्नि से दहकते हुए, चौंधियाने वाले और प्रकाशमय शक्तिशाली लोह पिंड के साथ अम्बट्ठ के ऊपर आसमान में, इस इरादे से खड़ा हो गया कि अगर उसने उत्तर नहीं दिया, तो उसका सिर वहीं टुकड़ों में खंडित कर दिया जाएगा। और महाभाग ने वज्र धारण किए हुए प्रेत को देखा, और अम्बट्ठ ब्राह्मण को भी वह दिखाई दिया और इस स्थिति से अवगत होने पर आतंकित, स्तंभित और व्यग्र अम्बट्ठ महाभाग से सुरक्षा, संरक्षण और सहायता की याचना करता हुआ भयभीत होकर उनके पार्श्व में सिमट कर बैठ गया और बोला, 'महाभाग, आपने क्या कहा था? एक बार फिर कहिए ।'

     'तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? जब वयोवृद्ध और अनुभवी ब्राह्मण, तुम्हारे गुरुजन अथवा उनके गुरुजन इस संबंध में आपस में बात कर रहे थे कि कान्हायनों की मूल उत्पति कहां से हुई और उनका वह पूर्वज कौन था जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं, तुमने इस बारे में क्या सुना है?'

     'ठीक ऐसा ही, गौतम, मैंने सुना है जैसा कि श्रद्धेय गौतम ने कहा है। कान्हायनों की मूल उत्पत्ति वही है, और वही उनका पूर्वज है, जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं । '

     22. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो युवा ब्राह्मणों में क्षोभ, अशांति और हलचल मच गई और उन्होंने कहा: 'उनका कहना है कि अम्बट्ठ ब्राह्मण जन्म से नीच है, वे कहते हैं कि उसके परिवार की पृष्ठभूमि अच्छी नहीं है। वे कहते हैं कि वह दासी कुल में उत्पन्न हुआ है और शाक्य उसके स्वामी थे। हम यह नहीं मानते कि श्रमण गौतम जिनके शब्दों में सत्यता है, वह विश्वासयोग्य व्यक्ति नहीं है । '

     23. और महाभाग ने सोचा: 'ये ब्राह्मण एक दासी की संतान के रूप में अम्बट्ठ का बहुत अपमान कर रहे हैं। मुझे उनके अपमान से इसे मुक्त करना चाहिए। और उन्होंने कहा :

     'अम्बट्ठ ब्राह्मण को उसके वंश के आधार पर इतनी निर्दयता से अपमानित मत कीजिए। वह कान्हा एक शक्तिशाली सिद्ध पुरुष बन गया था। वह दक्षिण में गया। वहां उसने रहस्यवादी पद्य सीखे और राजा ओक्काक के पास वापस आकर उसने विवाह में उसकी बेटी मद्दरूपी का हाथ मांगा। उत्तर में राजा ने उससे कहा: 'यह व्यक्ति वास्तव में कौन है जो मेरी दासी का पुत्र होने पर भी विवाह के लिए मेरी पुत्री का हाथ मांग रहा है। और क्षुब्ध तथा अप्रसन्न होकर उसने अपने धनुष में बाण चढ़ा दिया। लेकिन न तो वह तीर चला सका, और न वह प्रत्यंचा से पुनः उसे हटा ही सका। तब मंत्री तथा दरबारी सिद्ध पुरुष कान्हा के पास गए और कहा 'श्रीमान् राजा की रक्षा कीजिए, राजा की रक्षा कीजिए। '

     'राजा को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। किंतु उसने अगर बाण नीचे की ओर छोड़ा तो उसके राज्य - पर्यन्त धरती सूख जाएगी। '

     'श्रीमन्, राजा की रक्षा कीजिए और देश की भी। '

     'राजा को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी, न उसकी भूमि को। किंतु उसने अगर ऊपर को बाण छोड़ा, तो देवता सात वर्षों तक उसके राज्य पर्यन्त वर्षा नहीं करेंगे।'

     'श्रीमन्, राजा की रक्षा कीजिए और देश की भी और देवता को वृष्टि करने दीजिए। '

     'राजा को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी और न भूमि को ही, और देवता वृष्टि करेंगे। लेकिन राजा अपने सबसे बड़े पुत्र पर बाण चलाए । राजकुमार को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी, उसका बाल भी बांका नहीं होगा। '

     तब हे ब्राह्मणों, मंत्रियों ने ओक्काक को यह बताया और कहा: 'राजन, अपने सबसे बड़े पुत्र पर बाण छोड़ें, उसे कोई हानि अथवा भय नहीं होगा।' और राजा ने ऐसा ही किया, और कोई क्षय नहीं हुआ। किंतु राजा ने जो पाठ पढ़ा था, उससे आतंकित होकर उसने उस पुरुष को पत्नी के रूप में अपनी पुत्री मद्दरूपी दे दी। हे ब्राह्मणों, आपको दासी कुल के मामले में अम्बट्ठ का इतना और अपमान नहीं करना चाहिए। वह कान्हा शक्तिशाली सिद्ध पुरुष था ।

     24. तब महाभाग ने अम्बट्ठ को कहा: 'अम्बट्ठ इस बारे में तुम क्या सोचते हो? अगर एक युवा क्षत्रिय का संबंध किसी ब्राह्मण कन्या से हो जाता है और उनके सहवास से एक पुत्र का जन्म होता है। क्या ऐसा पुत्र ब्राह्मणों से आसन और जल (आदर के प्रतीक के रूप में) प्राप्त कर सकेगा ? "

     'हां, गौतम, वह करेगा।'

     'लेकिन क्या ब्राह्मण उसे पितरों के निमित्त आयोजित भोज, अथवा दूध में उबाले गए खाद्य, अथवा देवताओं को दी जाने वाली भेंट, अथवा उपहार के रूप में भेजे जाने वाले भोजन में सम्मिलित होने की अनुमति देंगे?"

     'हां, गौतम, वे अनुमति देंगे। '

     'लेकिन ब्राह्मण उसे अपने पद्य सिखाएंगे अथवा नहीं?"

     'हां, गौतम, वे सिखाएंगे। '

     'किंतु उनकी स्त्रियों से उसे अलग रखा जाएगा अथवा नहीं। '

     'उसे अलग नहीं रखा जाएगा।'

     'किंतु क्या क्षत्रिय उसे एक क्षत्रिय के रूप में संस्कारित होने की अनुमति देंगे?”

     'निश्चित रूप से नहीं, गौतम । '

     'क्योंकि मातृ पक्ष की ओर से उसका वंश शुद्ध नहीं है । '

     25. ‘अब तुम इस बारे में क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? अगर एक युवा ब्राह्मण का संबंध किसी क्षत्रिय कन्या से हो जाता है और उनके सहवास से एक पुत्र का जन्म होता है' क्या ऐसा पुत्र ब्राह्मणों से आसन और जल (आदर के प्रतीक के रूप में) प्राप्त कर सकेगा?'

     'हां, गौतम, वह करेगा।'

     'किंतु क्या ब्राह्मण उसे पितरों के निमित्त आयोजित भोज, अथवा दूध में उबाले गए खाद्य, अथवा देवताओं को दी जाने वाली भेंट, अथवा उपहार के रूप में भेजे जाने वाले भोजन में सम्मिलित होने की अनुमति देंगे?"

     'हां, गौतम, अनुमति देंगे। '

     'किंतु ब्राह्मण उसे अपने पद्य सिखाएंगे अथवा नहीं?'

     'हां, गौतम, वे सिखाएंगे।'

     'किंतु क्या क्षत्रिय उसे एक क्षत्रिय के रूप में संस्कारित होने की अनुमति देंगे?"

     'निश्चित रूप से नहीं, गौतम । '

     'उसकी अनुमति क्यों नहीं?"

     'क्योंकि पितृ पक्ष की ओर से उसका वंश शुद्ध नहीं है । '

     26. ‘तब तो, अम्बट्ठ, चाहे स्त्रियों की स्त्रियों से और पुरुषों की पुरुषों से तुलना करें, क्षत्रिय श्रेष्ठ हैं और ब्राह्मण हेय हैं। और, अम्बट्ठ, इस बारे में तुम क्या सोचते हो ? अगर ब्राह्मण किसी अपराध के कारण किसी ब्राह्मण को न्याय के लाभ से वंचित कर दे, उसका मुंडन करके उसके सिर पर राख मलकर उसे भूमि और बस्ती से निष्कासित कर दे, क्या उस ब्राह्मण को ब्राह्मणों के मध्य आसन अथवा जल प्रदान किया जाएगा ?'

     'कदापि नहीं, गौतम । '

     'अथवा ब्राह्मण उसे पितरों के निमित्त आयोजित भोज, अथवा दूध में उबाले गए खाद्य, अथवा देवताओं को दी जाने वाली भेंट, अथवा उपहार के रूप में भेजे जाने वाले भोजन में सम्मिलित होने की अनुमति देंगे ?"

     'कदापि नहीं, गौतम ।'

     'अथवा ब्राह्मण उसे अपने पद्य सिखाएंगे या नहीं। '

     'कदापि नहीं, गौतम । '

     ' और उसे उनकी स्त्रियों से अलग रखा जाएगा या नहीं?'

     'उसे अलग रखा जाएगा।'

     27. 'किंतु इस बारे में तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यदि क्षत्रिय उसी प्रकार किसी क्षत्रिय को न्याय के लाभ से वंचित करके भूमि अथवा बस्ती से निष्कासित कर देते हैं, तो क्या ब्राह्मणों के मध्य उसे आसन और जल प्रदान किया जाएगा?'

     'हां, उसे प्रदान किया जाएगा, गौतम । '

     'और क्या उसे पितरों के निमित्त आयोजित भोज, अथवा दूध में उबाले गए खाद्य, अथवा देवताओं को दी जाने वाली भेंट अथवा उपहार के रूप में भेजे जाने वाले भोजन में सम्मिलित होने की अनुमति दी जाएगी?'

     'हां, गौतम, अनुमति दी जाएगी। '

     ' और क्या ब्राह्मण उसे अपने पद्य सिखाएंगे।'

     'वे सिखाएंगे, गौतम । '

     ' और उसे उनकी स्त्रियों से अलग रखा जाएगा अथवा नहीं?'

     'उसे अलग नहीं रखा जाएगा, गौतम । '

     'लेकिन, अम्बट्ठ, मुंडित सिर, राख की टोकरी से सने, भूमि तथा आबादी वाले क्षेत्रों से निष्कासित क्षत्रिय का घोर पतन हो जाता है, लेकिन घोर पतन के गर्त में गिर जाने के बावजूद यह धारणा सही है कि क्षत्रिय श्रेष्ठ हैं और ब्राह्मण हेय हैं।'

     28. ‘तथापि एक ब्रह्म देवता सुनामकुमार ने यह श्लोक कहा है' :

     वंश-परंपरा के प्रति आस्थावान इस जन-समूह में क्षत्रिय सर्वोत्तम है, किंतु जो विवेक और सत्यता में परिपूर्ण है, वह देवों और मनुष्यों में सर्वोत्तम है।

     'अब, अम्बट्ठ यह श्लोक ब्रह्म सुनामकुमार द्वारा सही तौर से गाया और कहा गया था, जो अर्थपूर्ण है, रिक्त नहीं है। मैं भी इसका अनुमोदन करता हूं।'

     'मैं भी', अम्बट्ठ कहता है।

     'वंश परंपरा के प्रति आस्थावान इस जन समूह में क्षत्रिय सर्वोत्तम है। लेकिन जो विवेक और न्यायनिष्ठा में परिपूर्ण है, वह देवों और मनुष्यों में सर्वोत्तम है। '


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( पाठ के लिए प्रथम भाग यहां समाप्त होता है)