प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
1. 'लेकिन, गौतम, उस पद्य में व्यक्त सत्यता क्या है ? और विवेक क्या है? "
'विवेक और सत्यता की सर्वोच्च पूर्णता में, अम्बट्ठ, जन्म अथवा वंश परंपरा, अथवा इस प्रकार के अभिमान का प्रश्न ही नहीं उठता, जिसके आधार पर यह कहा जाता है - आपको उतना ही योग्य माना जाता है, जितना मुझे, अथवा आपको उतना योग्य नहीं माना जाता, जितना मुझे। जब कभी विवाह की बात चलती है, अथवा विवाह में देने की बात होती है, तो इस प्रकार की बातों का उल्लेख किया जाता है। अम्बट्ठ जो भी जन्म अथवा वंश परंपरा, अथवा सामाजिक स्थिति के अभिमान, अथवा विवाह द्वारा संबंध की दासता से ग्रस्त हैं, वे सर्वोत्तम विवेक और सत्यता से दूर हैं। इस प्रकार की दासता से मुक्त होने पर ही मनुष्य विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता अपने लिए प्राप्त कर सकता है।'
2. 'लेकिन, गौतम, वह आचरण और वह विवेक क्या है?"
( यहां शील के अधीन इसका उल्लेख है )
बुद्ध के आविर्भाव, उनके उपदेश, श्रोता के मतांतरण और उनके द्वारा संसार के परित्याग के संबंध में परिचयात्मक अनुच्छेद ( श्रमणफल के पाठ्य का 40.42, पृष्ठ 62, 63) उसके पश्चात आते हैं :

1. उपरोक्त शील, पृष्ठ 4-12 (8.27) में केवल आंशिक भिन्नता है। प्रत्येक खंड के अंत में दुहराए गए परिच्छेद में यह आता है : 'यह उसमें नैतिकता के रूप में जानी जाती है।'
उसके पश्चात करुणा के अधीन
2. विश्वास के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 63 के पृष्ठ 691 इसके बाद अंश इस प्रकार है : 'यह उसमें आचरण के रूप में माना जाता है। '
3. इंद्रियों का द्वार सुरक्षित है, के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 64 के पृष्ठ 701
4. सावधान और आत्मलीन के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 65 के पृष्ठ 701
5. संतोष के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 66 के पृष्ठ 711
6. एकाकीपन के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 67 के पृष्ठ 71।
7. 'पांच बाधाएं' के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 68-74 के पृष्ठ 71-721
8. चार गहन ध्यान के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 73-76 के पृष्ठ 75-821 प्रत्येक के अंत में अंश 'पिछले से उच्चतम और अच्छे को यहां वास्तव में सन्यासी के जीवन के उच्चतर फल के रूप में न पढ़कर उच्चतर आचरण के रूप में पढ़ा जाना चाहिए ।
विवेक (विग्ग) के अधीन
9. ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अंतर्दृष्टि (नानादासनम्) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 83-84 के पृष्ठ 76। इसके बाद अंश है : 'यह उसमें विवेक के रूप में जाना जाता है। और वह अंतिम से उच्चतर और अधिक मधुर है। '
10. बौद्धिक छवि के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 85-86 के पृष्ठ 771
11. रहस्यमय देन (इद्धी) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 87-88 के पृष्ठ 771
12. दिव्य कर्ण (दिब्बासोता) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 89-90 के पृष्ठ 791
13. दूसरों के हृदय का ज्ञान ( कटो - परियानानम) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 91-92 के पृष्ठ 791
14. पिछले जन्म का स्मरण (पुब्बे निवास- अनुस्साती - नामा) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 93-94 के पृष्ठ 811
15. दिव्य चक्षु (दिब्बा चक्खु) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 95-96 के पृष्ठ 821
16. भयंकर बाढ़ का नाश (आसावानम खयनानम) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 97-98 के पृष्ठ 831
'अम्बट्ठ, इस प्रकार के मनुष्य को विवेक में, आचरण में और विवेक तथा आचरण, दोनों में परिपूर्ण कहा जाता है। और विवेक तथा आचरण में कोई अन्य पूर्णता इससे अधिक उच्चतर और मधुर नहीं है।
3. ‘अब, अम्बट्ठ, विवेक और सौजन्य की इस सर्वोच्च पूर्णता में चार क्षरण हैं और ये चार क्या हैं? अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, अपने कंधे पर बहंगी ( ईंधन, पानी का घड़ा, सुइयां और भिक्षुक साधु का शेष साज-सामान ले जाने के लिए) उठाए हुए गहन वन में प्रवेश करता है, और स्वयं यह शपथ लेता है : एतद् पश्चात मैं उनमें से एक बन जाऊँगा, जो केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह करते हैं तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो।
और पुन:, अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह न कर पाने की स्थिति में, अपने साथ कुदाली और टोकरी लेकर गहन वन में प्रवेश करता है, और स्वयं यह शपथ लेता है: 'एतद् पश्चात् मैं उनमें से एक बन जाऊंगा, जो केवल कंद और फलों के मूलों पर निर्वाह करते हैं', तो निश्चित ही, वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्य को प्राप्त कर लिया हो ।
'और पुन:, अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह न कर पाने की स्थिति में, किसी गांव अथवा नगर की सीमाओं के समीप स्वयं अग्नि- मंदिर का निर्माण करता है और अग्नि देव की उपासना करते हुए वहां निवास करता है, तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो ।
'और पुनः अम्बट्ठ, यदि कोई सन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह न कर पाने, और अग्नि देव की उपासना न कर पाने की स्थिति में, किसी चौराहे पर जहां चार उच्च मार्ग मिलते हैं, स्वयं चार द्वारों वाले एक भिक्षागृह का निर्माण करता है, और वहां रहते हुए स्वयं को यह कहता है, 'चाहे संन्यासी हो अथवा ब्राह्मण, जो कोई भी इन चार दिशाओं में से किसी भी दिशा से यहां से गुजरेगा, मैं अपनी योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार उसका स्वागत करूंगा', तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो ।'
'अम्बट्ठ, सत्यता और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता में ये चार क्षरण हैं। '
4. 'अब, अम्बट्ठ, तुम क्या सोचते हो? क्या एक ही गुरू के अधीन शिष्यों की एक कक्षा के रूप में तुम्हें विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता के संबंध में अनुदेश प्राप्त हो चुके हैं। '
'ऐसा नहीं है, गौतम । मेरा ज्ञान इतना कम है कि मैं उसका दावा भी नहीं कर सकता। विवेक और आचरण की पूर्णता कितनी महान है। मैं किसी भी प्रकार के प्रशिक्षण से दूर रहा हूं।'
'तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की यह सर्वोच्च पूर्णता पूर्णरूपेण प्राप्त नहीं की है, तो क्या तुमने अपने कंधों पर बोझ उठाने और एक ऐसे मनुष्य की तरह गहन वन में प्रवेश करने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जो स्वेच्छा से यह शपथ ले सके कि वह केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह करेगा?' 'वह भी नहीं, गौतम । '
'तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की यह सर्वोच्च पूर्णता पूर्णरूपेण प्राप्त नहीं की है, और तुम स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर भी निर्वाह नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें किसी गांव अथवा नगर की सीमाओं पर स्वयं एक अग्नि-मंदिर का निर्माण करना, और एक ऐसे मनुष्य की तरह वहां रहना सिखाया गया है, जो स्वेच्छा से अग्नि देव की सेवा करेगा। '
'वह भी नहीं, गौतम । '
'तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त नहीं की है, और तुम स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह नहीं कर सकते, और तुम अग्नि देव की सेवा भी नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें स्वयं एक ऐसे स्थान पर चार द्वारों वाले भिक्षागृह का निर्माण करना सिखाया गया है, जहां चार उच्चतम मार्ग एक-दूसरे से मिलते हों, और जहां तुम एक ऐसे मनुष्य की तरह निवास कर सको, जो स्वेच्छा से यह शपथ लेगा कि चार दिशाओं में से किसी भी दिशा से जो कोई भी वहां से गुजरेगा, तो तुम अपनी योग्यता और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसका स्वागत करोगे । '
'वह भी नहीं, गौतम । '
5. इसलिए, अम्बट्ठ, शिष्य के रूप में सर्वोच्च विवेक और आचरण के मामले में ही नहीं, अपितु उन चार क्षरणों में से किसी एक के संबंध में भी, जिसके कारण विवेक और आचरण की पूर्ण प्राप्ति बाधित हो जाती है, तुम्हारे उचित प्रशिक्षण में कमी रह गई है, और तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने भी तुम्हें यह कहावत बताई है : 'ये मुडित सिर वाले छद्मवेशी साधु, काले भृत्य, हमारे बांधवों के चरणों की धूल कौन हैं, जो तीनों वेदों के ज्ञान में पारंगत ब्राह्मणों से वार्ता करने का दावा करते हैं।' जब कि वह स्वयं अपेक्षाकृत न्यून कर्तव्यों में से किसी एक का भी पालन नहीं कर सके हैं। (जिनके कारण मनुष्य ऊंचे कर्तव्यों की अपेक्षा करते हैं)। देखो, अम्बट्ठ, तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय किया है।
6. ‘और, अम्बट्ठ, ब्राह्मण पोष्करसाति कौशल - नरेश प्रसेनजित के अनुदान का उपभोग करता है। लेकिन नरेश उसे अपनी उपस्थिति में आने की अनुमति नहीं देता है। जब वह उससे परामर्श करता है, तो वह उससे केवल आवरण के पीछे से बोलता है। यह कैसी बात है, अम्बट्ठ, कि प्रसेनजित, जिससे वह इस प्रकार का शुद्ध और विधि-सम्मत निर्वाह-व्यय स्वीकार करता है, वह उसे अपनी उपस्थिति में आने की अनुमति नहीं देता। देखो, अम्बट्ठ, तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय किया है?
7. 'अब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ ? मान लो राजा अपने हाथी की गर्दन पर या अपने घोड़े की पीठ पर बैठा है, अथवा अपने रथ के पायदान पर खड़ा है और वह अपने प्रमुखों अथवा राजकुमारों से राज्य के बारे में चर्चा करता है, और मान लो, जैसे ही वह अपने स्थान को छोड़कर एक तरफ चला जाता है, एक श्रमिक (शूद्र) अथवा श्रमिक का दास वहां आता है और वहां खड़े होकर उस विषय पर चर्चा करते हुए कहता है, 'राजा प्रसेनजित ने ऐसा ऐसा कहा । ' यद्यपि उसने राजा की तरह ही कहा हो और राजा की तरह ही चर्चा की हो, तथापि क्या उससे वह राजा बन जाएगा, अथवा उसका कोई अधिकारी ही बन जाएगा? '
'कदापि नहीं, गौतम । '
8. 'लेकिन ठीक इसी तरह, अम्बट्ठ ब्राह्मणों के उन पुराने कवियों (ऋषियों), रचनाकारों, पद्य - गायकों के प्राचीन रूप में विद्यमान शब्दों को उन्हीं की धुन में अथवा संगीतबद्ध रूप में आज के ब्राह्मण पुनः गाते हैं, उनका पूर्वाभ्यास करते हैं और उन्हीं की तरह उनका पाठ करते हैं, जैसे अत्थका, वामका, वामदेव, यमदग्नि, अंगीरस, भारद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र, कश्यप और भृगु । तुम कह सकते हो, 'एक शिष्य के रूप में मुझे उनके पद्य कंठस्थ हैं,' क्या उस आधार पर तुम ऋषि की पदस्थिति प्राप्त कर सकते हो ? इस प्रकार की स्थिति का कोई अस्तित्व नहीं है।
9. 'अब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? तुमने इस बारे में क्या सुना है, जब बूढ़े और अनुभवी तथा वयोवृद्ध ब्राह्मण, तुम्हारे गुरु और उनके गुरु वार्तालाप कर रहे थे, क्या वे पुराने ऋषि जिनके पद्यों को तुम गाते और दुहराते रहते हो, सुसज्जित होकर इत्र का प्रयोग करके, अपने बालों और अपनी दाढ़ी संवार कर पुष्पहारों तथा रत्नों सहित, सफेद वस्त्र पहने हुए, पांचों ऐन्द्रिय सुखों का पूर्ण आनंद लेते हुए, आत्म-प्रदर्शन करते फिरते थे, जैसा कि अब तुम और तुम्हारे गुरु भी करते फिरते हैं। '
" वैसा नहीं, गौतम । '
'और क्या वे उत्तम पके हुए चावलों पर अपना निर्वाह करते थे, जिससे खराब दाने निकाल दिए गए हों, और जिसे विभिन्न प्रकार के मसालों और कढ़ी से जायकेदार बनाया गया हो, जैसा कि तुम और तुम्हारे गुरु अब करते हैं? '
'वैसा नहीं, गौतम ।'
'अथवा क्या झालरयुक्त और चुन्नटदार घाघरा पहने हुए स्त्रियां उनकी सेवा में तत्पर रहती थीं, जैसे कि अब तुम्हारी और तुम्हारे गुरु की सेवा में रहती हैं?
‘अथवा क्या वे वेणीयुक्त और चुन्नटदार पूंछों वाली घोड़ियों द्वारा खींचे गए रथों को लंबे सोटे से हांकते फिरते थे, जैसा कि अब तुम और तुम्हारे गुरु करते हैं?" 'वैसा नहीं, गौतम । '
'अथवा क्या उन्होंने लंबी तलवारों से सज्जित पुरुषों द्वारा स्वयं को ऐसी किलेबंदी वाले नगरों में अभिरक्षित कराया है, जिनके चारों ओर खाइयां खुदी हुई हैं और जिनके द्वारों के सामने कैंची द्वार लगाए गए थे, जैसाकि तुम और तुम्हारे गुरु करते हैं । '
'वैसा नहीं है, गौतम।'
10. ‘तब, अम्बट्ठ, न तो तुम और न तुम्हारे गुरु ऋषि हैं और न तुम ऐसी स्थितियों में रहते हो, जिनमें ऋषि रहते थे। किंतु, अम्बट्ठ, चाहे कोई भी कारण हो, जिसकी वजह से तुम मेरे बारे में आशंका और भ्रांति में पड़े हो, तुम मुझसे पूछ सकते हो। मैं स्पष्टीकरण द्वारा उसे स्पष्ट कर दूंगा।'
11. तब महाभाग अपने कक्ष से निकले और उन्होंने इधर से उधर विचरना आरंभ कर दिया। अम्बट्ठ ने भी वही किया और इस प्रकार महाभाग का अनुसरण करते हुए उसने महापुरुष में पाए जाने वाले बत्तीस लक्षण महाभाग के शरीर में हैं या नहीं, परखना चाहा। और उसे दो लक्षणों को छोड़कर सभी लक्षण दिखाई दिए। दो लक्षणों, प्रछन्न अंग और जिह्वा का विस्तार के बारे में उसे शंका तथा भ्रम हुआ, और वह संतुष्ट और निश्चित नहीं हो पाया।
12. और महाभाग को ज्ञात था कि उसे इस प्रकार की शंका है और उन्होंने अपनी अद्भुत देन द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था की कि ब्राह्मण अम्बट्ठ ने देखा कि महाभाग का वह अंग जिसे वस्त्रों से आच्छादित होना चाहिए था किस प्रकार एक खोल में समावृत्त था। और महाभाग ने अपनी जिह्वा को इस प्रकार घुमाव दिया कि उससे उन्होंने दोनों कानों को स्पर्श किया और सहलाया, और अपने दोनों नासिका रंध्रों को स्पर्श किया और सहलाया, और उन्होंने अपने मस्तक के समग्र भाग को अपनी जिह्वा से आवेष्ठित कर लिया।
युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने सोचा - श्रमण गौतम महापुरुष के केवल कुछ लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं । और उसने महाभाग से कहा : 'अब, गौतम, हमारा जाना हितकर रहेगा। हम व्यस्त हैं और हमें बहुत से कार्य करने हैं।'
'अम्बट्ठ, जो तुम्हें उपयुक्त लगे, वही करो । '
और अम्बट्ठ घोड़ियों द्वारा खींचे जाने वाले अपने रथ पर चढ़ा और वहां से विदा हो गया।
13. उस समय ब्राह्मण पोष्करसाति ब्राह्मणों के बड़े समूह के साथ उक्कट्ठा से चला गया था, और अपने ही विहारोद्यान में बैठा हुआ वहां अम्बट्ठ की प्रतीक्षा कर रहा था। और अम्बट्ठ विहार में आया । और जब वह अपने रथ में वहां तक आया जहां तक रथों के लिए मार्ग सुगम था, वह रथ से उतर गया और पैदल ही वहां पहुंचा जहां पोष्करसाति थे, और उनका अभिवादन करके उसने सम्मानपूर्वक ढंग से एक ओर अपना आसन ग्रहण किया और उसके इस तरह आसीन हो जाने पर पोष्करसाति ने उससे कहा ।
14. 'अच्छा, अम्बट्ठ, क्या तुमने महाभाग को देखा?"
'हां, श्रीमन्, हमने उन्हें देखा । '
'अच्छा, क्या श्रद्धेय गौतम वैसे ही हैं, जैसे उनकी ख्याति है, और जैसा कि मैंने तुम्हें बताया था, उससे अन्यथा तो नहीं हैं। वह ऐसे ही हैं अथवा नहीं?'
'वह वैसे ही हैं, श्रीमन्, जैसी कि उनकी ख्याति घोषित करती है, उससे अन्यथा नहीं हैं। वह वैसे ही हैं, उससे भिन्न नहीं हैं। और वह महापुरुष के कुछ लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं।'
'और क्या, अम्बट्ठ, श्रमण गौतम से तुम्हारी कोई बात हुई?"
'हां, श्रीमन्, हुई।'
'और वार्ता कैसी रही?"
तब अम्बट्ठ ने ब्राह्मण पोष्करसाति को उस पूरी बातचीत से अवगत कराया, जो कि महाभाग के साथ हुई थी।
15. जब वह इस प्रकार बोल चुका, तो पोष्करसाति ने उससे कहा : 'ओह, तुम कैसे ज्ञानाभिमानी हो । कितने मंदबुद्धि हो। ओह, तुम हमारे तीनों वेदों की विशेष जानकारी रखते हो। उनका कहना है कि जो मनुष्य इस प्रकार कार्य करता है, मृत्यु के पश्चात शरीर के क्षय हो जाने पर कष्ट और पीड़ा की निराशाजनक स्थिति में पुनर्जन्म लेता है। अपने अशिष्ट शब्दों में तुमने जिन प्रश्नों पर बल दिया, उनका क्या परिणाम? क्या वही नहीं है, जिसका कि श्रद्धेय गौतम ने प्रकटीकरण किया है? कितने ज्ञानाभिमानी, कितने मंदबुद्धि और हमारे तीनों वेदों के ज्ञान में निष्णात।' और क्रोधित तथा अप्रसन्न होकर उसने अम्बट्ठ को पैर मारकर धकेल दिया और उसने तत्काल महाभाग से मिलना चाहा ।
16. लेकिन वहां मौजूद ब्राह्मणों ने पोष्करसाति से इस प्रकार कहा: 'श्रीमन्, आज श्रमण गौतम से मिलने के लिए बहुत देर हो चुकी है। सम्माननीय पोष्करसाति कल यह कार्य कर सकते हैं।'
पोष्करसाति ने अपने ही घर में पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का मीठा भोजन तैयार करवाया और मशालों की तेज रोशनी में उसे वाहनों में रखवाया और उक्कट्ठा को चल पड़े। और वह स्वयं इच्छानंगल वनखंड की ओर अपना रथ हांकते हुए उस स्थान तक गया जहां तक वाहनों के लिए मार्ग सुगम था, और उसके बाद पैदल ही महाभाग के पास गया और जब उसने नम्रता तथा शालीनतापूर्वक महाभाग से अभिवादन और सम्मान का आदान-प्रदान कर लिया, तो उसने एक तरफ आसन ग्रहण कर लिया और महाभाग से बोला :
17. ‘गौतम, क्या हमारा युवा शिष्य ब्राह्मण अम्बट्ठ यहां होकर गया है?"
'हां, ब्राह्मण, वह यहां आया था। '
'और, गौतम, क्या आपने उससे बात की थी?'
'हां, ब्राह्मण, मैंने की थी।'
'और आपने उससे किस विषय पर बात की थी?'
18. तब महाभाग ने जो भी बात हुई थी, उसके बारे में ब्राह्मण पोष्करसाति को बताया, और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो पोष्करसाति ने महाभाग से कहा : गौतम वह युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ अज्ञानी और मूर्ख है। गौतम, उसे क्षमा कर दीजिए। '
19. और ब्राह्मण पोष्करसाति ने महाभाग के शरीर को ध्यानपूर्वक देखा और उस पर महापुरुष के बत्तीस लक्षणों को परखा। उसे दो लक्षणों को छोड़कर सभी लक्षण स्पष्ट दिखाई दिए। खोल में, प्रच्छन्न अंग और सुदीर्घ जिह्वा, इन दो लक्षणों के बारे में वह अब तक शंका और अनिर्णय की स्थिति में था। लेकिन महाभाग ने पोष्करसाति को वे लक्षण दिखा दिए, जैसे कि अम्बट्ठ को भी दिखाए थे, और पोष्करसाति ने देखा कि महाभाग महापुरुष के कुछ ही लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं, और उसने महाभाग से कहा : 'क्या श्रद्धेय गौतम, संघ के सदस्यों सहित कल का भोजन मेरे साथ करने की कृपा करेंगे?' और महाभाग ने मौन रहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
20. तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने यह देखते हुए कि महाभाग ने ( कल के लिए) प्रार्थना स्वीकार कर ली है, समय की घोषणा की : 'समय हो गया है, गौतम, भोजन तैयार है।' और तब महाभाग ने जो प्रातः ही तैयार हो चुके थे, अपना चीवर पहना और अपना पात्र लेकर बांधवों के साथ पोष्करसाति के घर पर पहुंचे और अपने लिए तैयार किए गए आसन पर बैठ गए। और तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने अपने हाथों से पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का स्वादिष्ट भोजन महाभाग को और उनके संघ के युवा ब्राह्मण सदस्यों को तब तक परोसा, जब तक कि वे तृप्त नहीं हो गए और उन्होंने और भोजन ग्रहण करने से इंकार नहीं कर दिया, और जब महाभाग भोजन कर चुके, तो उन्होंने अपना पात्र धोया और हस्त प्रक्षालन किया। पोष्करसाति ने नीचे आसन ग्रहण किया और उनके पार्श्व में बैठ गया ।
21. और तब इस प्रकार बैठे हुए उससे महाभाग ने उपयुक्त क्रमानुसार बात की, अर्थात उन्होंने उसे उदारता, सद्आचरण, स्वर्ग और भय के बारे में, मिथ्याभिमान और लोभ की विकृति और त्याग के लाभों के विषय में बताया। और जब महाभाग ने देखा कि ब्राह्मण पोष्करसाति प्रकटतः नरम, पूर्वाग्रह से मुक्त, उन्नत और हृदय से आस्थावान बन चुका है, तब उन्होंने उस सिद्धांत की घोषणा की, जिस पर केवल बुद्ध ही विजय पा सके हैं, अर्थात दुःख का सिद्धांत, उसका मूल उसकी समाप्ति और इस लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग। और जिस प्रकार एक स्वच्छ वस्त्र, जिसके सभी दाग धो दिए गए हैं, तुरंत रंग ग्रहण कर लेता है, ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण पोष्करसाति को वहां बैठे सत्य को निरखने के लिए शुद्ध और स्वच्छ दृष्टि प्राप्त हो गई, और उसे ज्ञात हुआ, 'जिस किसी का भी प्रारंभ होता है, उसके साथ ही उसकी समाप्ति की आवश्यकता भी निहित है।'
22. और तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने, जिसने अब सत्य का दर्शन कर लिया था, उस पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे समझ लिया था, उसका गहन चिंतन कर लिया था, जो शंका से परे हो गया था, भ्रांति से मुक्ति पा ली थी और पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया था, और जो स्वामी के उपदेश के अपने ज्ञान के लिए किसी अन्य पर आश्रित नहीं था महाभाग को संबोधित किया और कहा :
'परम श्रेष्ठ, हे गौतम, आपके मुख से निकले ये शब्द परम श्रेष्ठ हैं। ठीक ऐसे ही, जैसे कोई मनुष्य किसी फेंकी हुई चीज को फिर से स्थापित करे, अथवा उसे प्रकट करे जो कुछ छिपाया गया हो, अथवा भटके हुए को सही मार्ग दिखाए, अथवा अंधेरे में प्रकाश ले आए जिससे आंखों वाले बाह्य रूपों को देख सकें, ठीक उसी प्रकार, स्वामी, श्रद्धेय गौतम ने मुझे विभिन्न रूपों में सत्य का ज्ञान कराया है। और मैं हे गौतम, अपने पुत्रों, अपनी पत्नी, अपने संगी-साथियों सहित सत्य और संघ के लिए अपने पथप्रदर्शक के रूप में श्रद्धेय गौतम की शरण में आता हूं। श्रद्धेय गौतम, मुझे एक ऐसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें, जिसने आज से जीवन पर्यन्त उन्हें अपना पथप्रदर्शक बना लिया है। और जिस प्रकार श्रद्धेय गौतम उक्कट्ठा में अन्य लोगों के परिवारों और अपने शिष्यों के पास जाते हैं, वह मेरे परिवार में भी आएं। और वहां जो कोई भी हों, ब्राह्मण अथवा उनकी पत्नियां, वे श्रद्धेय गौतम के प्रति सम्मान व्यक्त करेंगे, अथवा उनकी उपस्थिति में खड़े होंगे, अथवा उन्हें आसन और जल भेंट करेंगे, अथवा उनकी उपस्थिति से प्रसन्न होंगे, उन्हें दीर्घकाल तक सुख और आनंद की प्राप्ति होगी । '
'जो तुम कहते हो, ब्राह्मण, वह ठीक है।'
( यहां अम्बट्ठ सुत्त समाप्त होता है )