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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

लोहिक्क सुत्त

( अध्यापन के शीलाचार की कुछ बातें )

     1. इस प्रकार मैंने सुना है। एक बार भारी संख्या में संघ के सदस्यों के साथ लगभग पांच सौ भिक्षुकों सहित कौशल जनपदों की यात्रा के दौरान परम श्रेष्ठ साल - वाटिका(साल वृक्षों की पंक्ति से घिरे गांव) में पहुंचे। उस समय,   ब्राह्मण लोहिक्क साल-वाटिका में सुस्थापित थे। वह जीवन की हलचल से गुंजित स्थल था, जहां पर्याप्त हरित भूमि थी, वन्य भूमि थी और अनाज था। कौशल - नरेश प्रसेनजित ने उपहार स्वरूप ये क्षेत्र उन्हें इस अधिकार के साथ प्रदान किया था, मानो वह स्वयं राजा हों।

     2. अब, उस समय विचारमग्न ब्राह्मण लोहिक्क निम्नलिखित कुत्सित बात सोच रहा था : 'मान लो, कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति (मस्तिष्क की ) को प्राप्त कर लेता है, तो उसे उसके बारे में किसी को नहीं बताना चाहिए। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले। उसी प्रकार मैं कहता हूं कि यह (दूसरों को बताने की इच्छा) एक तरह की लालसा है। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है ? '

sudharak aur Unki Niyati - Siddhartha Gautama buddha - Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     3. अब, ब्राह्मण लोहिक्क ने समाचार सुना : 'लोग कहते हैं कि शाक्य कुल के श्रमण गौतम जो धार्मिक जीवन अंगीकार करने के लिए शाक्यों से अलग हो गए थे, अब अपने संघ के बहुत से बांधवों सहित कौशल के जिलों की यात्रा करते हुए साल वाटिका में पहुंच गए हैं। अब जहां तक श्रद्धेय गौतम का संबंध है, उनकी इतनी ख्याति है कि विदेश में भी उनकी ऐसी चर्चा है : महाभाग एक अर्हत, पूर्ण प्रबुद्ध, विवेक और सौजन्य से परिपूर्ण, लौकिक ज्ञान से पुष्ट, मार्गदर्शन के इच्छुक नश्वरों के लिए अनुपम पथप्रदर्शक, देवों और मनुष्यों के लिए उपदेशक, वरदान प्राप्त हैं। और वह स्वयं देवताओं, ब्राह्मणों और असम प्रदेश की पहाड़ियों पर मर भाषा बोलने वाले लोगों के ऊपर वाले लोक और उसके नीचे संन्यासियों तथा ब्राह्मणों, राजाओं और प्रजाजन वाले लोक सहित संपूर्ण सृष्टि को पूर्ण रूप से इस तरह जानते और देखते हैं, मानो वह उनके सामने हों, और उस संपूर्ण सृष्टि को जानने के बाद, वह अपने ज्ञान की जानकारी दूसरों को कराते हैं। सत्य जो अपने मूल में सुंदर है, प्रगति में सुंदर है, संपूर्णता में सुंदर है, उसी की उद्घोषणा वह भावना और शब्द में करते हैं, वह उच्चतर जीवन की पूर्णता और पवित्रता का भरपूर ज्ञान कराते हैं। और उस प्रकार के अर्हत के दर्शनार्थ जाना अच्छा है। '

     4. तब लोहिक्क ब्राह्मण ने भेषिक नाई से कहा: 'आओ भेषिक, वहां जाओ जहां श्रमण गौतम टिके हुए हैं, और वहां जाकर मेरे नाम से उनसे पूछना कि क्या वह रोग और अस्वस्थता से मुक्त हैं, और स्वास्थ्य और शक्ति से पूर्ण सुविधाजनक स्थिति में हैं, और इस प्रकार कहना : क्या श्रद्धेय गौतम अपने संघ के बांधवों सहित कल का भोजन लोहिक्क ब्राह्मण से ग्रहण करना स्वीकार करेंगे?'

    5. भेषिक नाई ने लोहिक्क ब्राह्मण के शब्दों का पालन करते हुए कहा, 'बहुत अच्छा, श्रीमन्, और जैसा कहा गया था, उसने वैसा ही किया। और परम श्रेष्ठ ने मौन रहकर उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।

6. और जब भेषिक नाई ने देखा कि परम श्रेष्ठ ने सहमति दे दी है, वह अपने स्थान से उठा, और अपना दायां हाथ परम श्रेष्ठ की ओर करते हुए वहां से चला गया और लोहिक्क ब्राह्मण के पास पहुंच कर उससे इस प्रकार बोला : 'श्रीमन्, आपके आदेशानुसार हमने परम श्रेष्ठ को संबोधित किया और परम श्रेष्ठ ने आने की सहमति दे दी है। '

     7. तब रात्रि के बीत जाने पर लोहिक्क ब्राह्मण ने अपने निवास स्थान पर पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का स्वादिष्ट भोजन तैयार करवाया और भेषिक नाई से कहा : 'भेषिक, वहां जाओ जहां श्रमण गौतम टिके हुए हैं, और वहां पहुंचकर यह कहते हुए समय की घोषणा कर दो : हे गौतम, समय हो गया है, और भोजन तैयार है। '

     भेषिक नाई ने लोहिक्क ब्राह्मण के शब्दों का पालन करते हुए कहा, 'बहुत अच्छा, श्रीमन्, और आदेशानुसार वैसा ही किया। और परम श्रेष्ठ, जो प्रातः ही तैयार हो गए थे, अपना पात्र लेकर संघ के बांधवों सहित साल-वाटिका की ओर चल पड़े।

     8. अब, ज्यों ही वह चले, भेषिक नाई परम श्रेष्ठ के पीछे-पीछे चलता रहा। और उसने परम श्रेष्ठ से कहा :

     'लोहिक्क ब्राह्मण के दिमाग में निम्नलिखित कुत्सित विचार घर कर गया है, 'मान लो कि कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति (मस्तिष्क की) को प्राप्त कर लेता है, तो उसके बारे में किसी को नहीं बताना चाहिए। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले। उसी प्रकार मैं कहता हूं कि यह (दूसरों को बताने की इच्छा) एक तरह की लालसा है।' यह अच्छा होता, श्रीमन्, यदि परम श्रेष्ठ उसके मस्तिष्क को उस कुत्सित विचार से मुक्त कर देते। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है?"

     'वही ठीक रहेगा, भेषिक, वही ठीक होगा।'

     9. और परम श्रेष्ठ लोहिक्क ब्राह्मण के निवास स्थान पर गए और अपने लिए नियत आसन पर बैठ गए। और लोहिक्क ब्राह्मण ने बुद्ध के नेतृत्व में उनके संघ को संतुष्ट किया, अपने ही हाथों से पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का स्वादिष्ट भोजन तब तक परोसा, जब तक कि उन्होंने और ग्रहण करने से इंकार नहीं कर दिया । और जब परम श्रेष्ठ भोजन कर चुके, तो उन्होंने अपना पात्र धोया और हस्त-प्रक्षालन किया। लोहिक्क ब्राह्मण ने नीचे आसन ग्रहण किया और उनके पार्श्व में बैठ गया और उसके इस प्रकार आसीन हो जाने पर परम श्रेष्ठ ने उससे निम्नानुसार कहा :

     'लोहिक्क, जो कुछ कहते हैं, क्या वह सच है कि तुम्हारे दिमाग में निम्नलिखित कुत्सित विचार उत्पन्न हो गया है ( और उन्होंने उपरोक्त कथनानुसार वह विचार प्रकट किया) ।

     'ऐसा ही है, गौतम ।'

     10. 'अब तुम क्या सोचते हो, लोहिक्क ? क्या तुम साल वाटिका में सुस्थापित नहीं हो?'

     'हां, ऐसा है, गौतम।'

     'तब, लोहिक्क, मान लो कोई इस प्रकार कहे : 'साल-वाटिका' में लोहिक्क ब्राह्मण का राज्य है, उसे अकेले ही साल वाटिका के संपूर्ण राजस्व और उत्पाद का उपभोग करने दो, किसी और को कुछ न मिले। ऐसी बात कहने वाला व्यक्ति खतरनाक होगा या नहीं, क्योंकि वह उन लोगों को छेड़ रहा है, जो तुम्हारे अधीन जीवनयापन करते हैं? '

     'हां, गौतम, वह खतरनाक होगा।'

     'और भय उत्पन्न करने वाला क्या वह व्यक्ति उनकी भलाई के लिए सहानुभूति रखता होगा या नहीं?'

     'वह उनकी भलाई के बारे में नहीं सोचेगा, गौतम । '

     'और उनकी भलाई की बात न सोचते हुए क्या उसका हृदय उनके प्रेम की ओर उन्मुख होगा अथवा उनसे शत्रुता रखेगा?'

     'शत्रुता रखेगा, गौतम । '

     'किंतु यदि किसी का हृदय शत्रुता में निमग्न है, तो वह अविश्वसनीय सिद्धांत है, अथवा विश्वसनीय ?"

     'वह अविश्वसनीय सिद्धांत है, गौतम । '

     'अब अगर, लोहिक्क, कोई मनुष्य अविश्वसनीय सिद्धांत का मानने वाला है, तो मैं घोषणा करता हूं कि उसकी नियति यह होगी कि दो भावी जन्मों में एक बार वह या तो पाप मोचन के लिए जन्म लेगा अथवा एक पशु के रूप में उसका पुनर्जन्म होगा । '

     11. 'अब तुम क्या सोचते हो, लोहिक्क? क्या कौशल नरेश प्रसेनजित के अधिकार में काशी और कौशल नहीं हैं?'

     'हां, है, गौतम । '

     'तो, मान लो लोहिक्क, यदि कोई इस प्रकार कहे :

     'कौशल - नरेश प्रसेनजित के अधिकार में काशी और कौशल हैं, उसे काशी और कौशल के संपूर्ण राजस्व और उत्पाद का उपभोग करने दो, अन्य किसी को कुछ न मिले। ऐसी बात कहने वाला व्यक्ति खतरनाक होगा या नहीं, क्योंकि उसने कौशल नरेशन प्रसेनजित के अधीन जीवनयापन करने वाले मनुष्यों को, तुम्हें और अन्य लोगों को छेड़ा है।'

     'हां, गौतम, वह खतरनाक होगा । '

     ' और भय उत्पन्न करने वाला वह व्यक्ति उनकी भलाई के लिए सहानुभूति रखता होगा या नहीं?'

     'वह उनकी भलाई के बारे में नहीं सोचेगा, गौतम ?'

     'और उनकी भलाई की बात न सोचते हुए क्या उसका हृदय उनके प्रेम की ओर उन्मुख होगा अथवा उनसे शत्रुता रखेगा?'

     'शत्रुता रखेगा, गौतम । '

     'किंतु यदि किसी का हृदय शत्रुता में निमग्न है, तो वह अविश्वसनीय सिद्धांत है। अथवा विश्वसनीय ?'

     'वह अविश्वसनीय सिद्धांत है, गौतम । '

     'अब अगर, लोहिक्क, कोई मनुष्य अविश्वसनीय सिद्धांत का मानने वाला है, तो मैं घोषणा करता हूं कि उसकी नियति यह होगी कि दो भावी जन्मों में एक बार वह या तो पाप मोचन के लिए जन्म लेगा अथवा एक पशु के रूप में उसका पुनर्जन्म होगा।

     12. और 14. 'इसलिए, लोहिक्क, तुम स्वीकार करते हो कि वह जो यह कहता है कि साल-वाटिका पर तुम्हारा अधिकार है, इसलिए तुम्हें वहां के संपूर्ण राजस्व और उत्पाद का उपभोग करना चाहिए और अन्य किसी को कुछ नहीं देना चाहिए, और वह जो यह कहता है कि कौशल - नरेश प्रसेनजित का काशी और कौशल पर अधिकार है, इसलिए उन्हें स्वयं वहां के संपूर्ण राजस्व और उत्पाद का उपभोग करना चाहिए और अन्य किसी को कुछ नहीं देना चाहिए, वह तुम्हारे अधीनस्थ रहने वालों के लिए भय उत्पन्न करेगा अथवा नरेश प्रसेनजित के अधीन रहने वाले तुम्हारे और अन्य लोगों के लिए भय उत्पन्न करेगा, और जो इस प्रकार दूसरों के लिए भय उत्पन्न करते हैं, उनमें उनके प्रति सहानुभूति का अभाव होता है और जिस मनुष्य के प्रति सहानुभूति का अभाव है, उसका हृदय शत्रुता में निमग्न हो जाता है, और अपने हृदय को शत्रुता में निमग्न कर लेना अविश्वसनीय सिद्धांत है।

     13. और 15. 'ठीक ऐसे ही, लोहिक्क, जो यह कहता है : 'मान लो कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति ( मस्तिष्क की) को प्राप्त कर लेता है, तो क्या उसे उसके बारे में किसी और को नहीं बताना चाहिए? क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले।' उसी प्रकार मैं कहता हूं कि दूसरों को बताने की यह इच्छा एक तरह की लालसा है। जो इस प्रकार बात करता है, वह उन परिजनों के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करेगा, जिन्होंने उस व्यक्ति द्वारा निर्धारित सिद्धांत और अनुशासन अंगीकार किए हैं, जिन्होंने सत्य पर विजय प्राप्त कर ली है- उदाहरण के तौर पर धर्मान्तरण का फल प्राप्त कर चुके हैं, अथवा एक बार उसमें वापस जाने अथवा कभी वापस न जाने, और यहां तक कि अर्हत के रूप में दीक्षित हो जाने की स्थिति में पहुंच चुके हैं, वह उनके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करेगा, जो ऐसे आचरण को फलित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्वर्ग में परमेश्वर्य की स्थितियों में पुनर्जन्म संभव है। किंतु उनके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करके उनकी भलाई के प्रति उसकी सहानुभूति नहीं होगी, उनकी भलाई के प्रति सहानुभूति के अभाव में उसका हृदय शत्रुता में निमग्न हो जाएगा, जो कि अविश्वसनीय सिद्धांत है। अब, लोहिक्क, अगर कोई मनुष्य अविश्वसनीय सिद्धांत को मानता है, तो मैं घोषणा करता हूं कि उसकी स्थिति यह होगी कि दो भावी जन्मों में एक बार वह या तो पाप मोचन के लिए जन्म लेगा अथवा एक पशु के रूप में उसका जन्म होगा ।

     16. ‘लोहिक्क, विश्व में ये तीन प्रकार के गुरु हैं, जो दोषारोपण के योग्य हैं, और जो भी इस प्रकार के गुरु को दोषी बताएगा, भर्त्सना न्यायोचित होगी, तथ्यों और सत्य के अनुरूप, अनुचित नहीं होगी। यह तीन प्रकार क्या हैं?

     सर्वप्रथम, लोहिक्क, एक इस प्रकार का गुरु होता है, जो श्रमण के उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है, जिसके कारण उसने गृह त्याग किया और गृहविहीन जीवन अंगीकार किया। उस लक्ष्य को स्वयं प्राप्त किए बिना वह अपने श्रोताओं को सिद्धांत (धम्म) का उपदेश देता है और कहता है : 'यह तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है, इससे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी।' तब उसके वे श्रोता न तो उसे सुनते हैं, न उसके शब्दों की ओर ध्यान देते हैं, और न उसके ज्ञान के माध्यम से चित्त को स्थिर कर पाते हैं, वे अपने गुरु की शिक्षा से अलग, अपने ही मार्ग पर चलते हैं। इस प्रकार के गुरु की भर्त्सना की जानी चाहिए, और उसे इन तथ्यों की जानकारी कराते हुए यह भी बताना चाहिए : 'तुम उस पुरुष की तरह हो, जो ऐसी स्त्री से प्रणय निवेदन करेगा, जो कि उसका तिरस्कार करती है, अथवा उसका आलिंगन करेगा जो उससे अपना मुख फेर लेती है।' मैं कहता हूं, तुम्हारा यह लोभ भी उसी प्रकार का है (मनुष्यों के गुरु का ढोंग रचते रहना, जब कि कोई ध्यान नहीं देता, वे तुम्हारा विश्वास ही नहीं करते )। तब किस लिए कोई मनुष्य दूसरे के लिए कुछ करे?

     लोहिक्क, यह विश्व में पहले प्रकार का गुरु है, जो दोषारोपण के योग्य है। और जो कोई भी ऐसे को दोषी बताएगा, उसकी भर्त्सना न्यायोचित होगी, तथ्यों और सत्य के अनुरूप, अनुचित नहीं होगी।

     17. दूसरे स्थान पर, लोहिक्क, एक इस प्रकार का गुरु होता है, जो श्रमण के उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है, जिसके कारण उसने गृह त्याग किया और गृहविहीन जीवन अंगीकार किया। उस लक्ष्य को स्वयं प्राप्त किए बिना वह अपने श्रोताओं को सिद्धांत का उपदेश देता है और कहता है : 'यह तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है, इससे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी।' और उसके शिष्य सुनते हैं, उसके शब्दों पर ध्यान देते हैं, कही हुई बात को समझकर वे चित्त की स्थिरता प्राप्त करते हैं, और गुरु के उपदेश से अलग वे अपने ही मार्ग पर नहीं चलते। इस प्रकार के गुरु की भर्त्सना की जानी चाहिए, और उसे इन तथ्यों की जानकारी कराते हुए यह भी बताना चाहिए : 'तुम उस मनुष्य की तरह हो, जो अपने खेत की तरफ ध्यान न देकर अपने पड़ोसी के खेत की निराई के बारे में सोचेगा।' मैं कहता हूं, तुम्हारा यह लोभ भी उसी प्रकार का है (दूसरों को शिक्षा देते रहना, जब कि तुमने स्वयं को शिक्षित नहीं किया है)। तब एक मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है?

     लोहिक्क, यह विश्व में दूसरे प्रकार का गुरु है, जो दोषारोपण के योग्य है। और जो भी ऐसे गुरु की भर्त्सना करेगा, उसकी भर्त्सना न्यायोचित होगी, तथ्यों और सत्य के अनुरूप, अनुचित नहीं होगी।

     18. और पुन:, लोहिक्क, तीसरे स्थान पर एक इस प्रकार का गुरु होता है, जो स्वयं श्रमण के उस लक्ष्य को प्राप्त कर चुका है, जिसके कारण उसने गृह त्याग किया और गृहविहीन जीवन अंगीकार किया। उस लक्ष्य को स्वयं प्राप्त कर चुकने के बाद वह अपने श्रोताओं को सिद्धांत का उपदेश देता है और कहता है : 'यह तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है, इससे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी।' किंतु उसके वे श्रोता न तो उसकी बात सुनते हैं, न उसके शब्दों पर ध्यान देते हैं, न उसकी बात को समझकर चित्त की स्थिरता प्राप्त करते हैं। गुरु के उपदेश से अलग वे अपने ही मार्ग पर चलते हैं। इस प्रकार के गुरु की भर्त्सना की जानी चाहिए और उसे इन तथ्यों की जानकारी देते हुए यह भी बताना चाहिए: 'तुम उस मनुष्य की तरह हो जो पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा लेता है।' मैं कहता हूं, तुम्हारा लोभ उसी प्रकार का है (शिक्षा देते रहना, जब कि तुमने शिक्षा देने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित नहीं किया है)। तब किसलिए, एक मनुष्य दूसरे के लिए कुछ करे ?

     लोहिक्क, विश्व में यह तीसरे प्रकार का गुरु है, जो दोषारोपण के योग्य है। और जो भी इस प्रकार के गुरु को दोषी बताएगा, उसकी भर्त्सना न्यायोचित होगी, तथ्यों और सत्य के अनुरूप, अनुचित नहीं होगी। और लोहिक्क, ये तीन प्रकार के गुरु हैं, जिनके बारे में मैंने बताया ।

     19. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, लोहिक्क ब्राह्मण परम श्रेष्ठ से इस प्रकार बोले : 'लेकिन, गौतम, क्या विश्व में इस प्रकार का भी कोई गुरु है, जो दोषारोपण के योग्य न हो? '

     ‘हां, लोहिक्क, विश्व में एक ऐसा गुरु है, जो दोषारोपण के योग्य नहीं है।'

     'और, गौतम, वह किस प्रकार का गुरु है ?"

     (इसका उत्तर ऊपर दिए गए व्याख्यात्मक शब्दों के रूप में श्रमण- फल में है । ) यह निम्नानुसार है :

     1. तथागत ( जिसने सत्य पर विजय प्राप्त कर ली हो) का आविर्भाव, उनके उपदेश, श्रोता के धर्मान्तरण और उनके द्वारा गृहविहीन स्थिति का अंगीकार किया जाना ।

     2. शील का सूक्ष्म विवरण, जिसका वह पालन करता है।

     3. हृदय का विश्वास, जो वह अपने व्यवहार द्वारा प्राप्त करते हैं।

     4. 'इंद्रियों का द्वार सुरक्षित है' के संबंध में अनुच्छेद।

     5. 'सावधान और आत्मलीन' के संबंध में अनुच्छेद ।

     6. थोड़े से संतुष्ट, जीवन की सादगी के संबंध में अनुच्छेद ।

     7. उद्धार, असंयमित स्वभाव, आलस्य, चिंता और विमूढ़ता के संबंध में अनुच्छेद।

     8. इस मुक्ति के फलस्वरूप प्राप्त आनंद और शांति जिससे उसका संपूर्ण अस्तित्व परिपूर्ण हो जाता है, के संबंध में अनुच्छेद ।

     9. चार हर्षोन्माद (गाथा) के संबंध में अनुच्छेद ।

     10. ज्ञान से उत्पन्न अंतर्दृष्टि के संबंध में अनुच्छेद ( प्रथम मार्ग का ज्ञान ) ।

     11. चार महान सत्यों, मादक द्रव्यों-लोभ, मोह, भविष्य, अज्ञानता का विनाश - और अर्हत के पद की प्राप्ति के संबंध में अनुच्छेद |

     टेक के साथ, अंतिम अनुच्छेद इस प्रकार है :

     'और गुरु, चाहे कोई भी हो, लोहिक्क, जिसके अधीन शिष्य इतनी उत्कृष्टता प्राप्त करता है, वैसे गुरु पर विश्व में कोई दोषारोपण नहीं कर सकता। और ऐसे गुरु पर जो भी दोषारोपण करेगा, उसकी भर्त्सना न्यायोचित नहीं होगी तथ्यों अथवा सत्य के अनुरुप नहीं होगी, और उसका समुचित आधार नहीं होगा। '

     78. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो लोहिक्क ब्राह्मण ने परम श्रेष्ठ से कहाः 'किसी मनुष्य को कोई उसके सिर के बालों से खींचकर पकड़ ले और उसे उठाकर वापस दृढ़ भूमि पर सुरक्षित रख दे, ठीक वैसे ही पाप विमोचन स्थल पर गिरते हुए मुझे उठाकर श्रद्धेय गौतम ने वापस भूमि पर रख दिया है। परम श्रेष्ठ, हे गौतम, आपके मुख से निकले शब्द परम श्रेष्ठ हैं। ठीक ऐसे ही जैसे कोई मनुष्य किसी फेंकी हुई चीज को फिर से स्थापित करे, अथवा उसे प्रकट करे जो कुछ छिपाया गया हो, अथवा भटके हुए को सही मार्ग दिखाए, अथवा अंधेरे में प्रकाश ले आए जिससे आंखों वाले बाह्य रूपों को देख सकें-ठीक उसी प्रकार श्रद्धेय गौतम ने मुझे विभिन्न रूपों में सत्य का ज्ञान कराया है। और मैं भी सत्य और संघ के लिए अपने पथप्रदर्शक के रूप में श्रद्धेय गौतम की शरण में आता हूं। श्रद्धेय गौतम, मुझे एक ऐसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें, जिसने आज से जीवन पर्यन्त उन्हें अपना पथप्रदर्शक बना लिया है।'