अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
जो भी व्यक्ति अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति से दुखी होता है तो वह यह कहकर शुरू करता है, 'हमें अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहिए।' लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो यह कहता हो कि 'हमें हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अस्पृश्यों का होना है, मानो अस्पृश्यता उनके भ्रष्ट होने के कारण है और अपनी हालत के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं। हम अपना जो भी लक्ष्य बनाएं, वह अस्पृश्यों के लिए हो। हिंदू के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएं, आचार-विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं कोई खोट नहीं है। वे पापी तो हैं ही नहीं ।
असलियत क्या है? यह तर्क कि हिंदुओं में कोई दोष नहीं है और अस्पृश्य जो कष्ट झेलते हैं, उसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं, ठीक वैसा ही है, जैसा कि यहूदियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने पर अपने बचाव में ईसाई देते हैं। श्री लुइस गोल्डिंग ने इन यहूदियों की तरफ से ईसाइयों को करारा जवाब दिया है। यहूदियों की समस्या के मूल का विवेचन करते हुए लुई गोल्डिंग का कहना है:
"मैं जिस अर्थ में यहूदियों की समस्या को असलियत में ईसाई समस्या समझता हूं, उसको स्पष्ट करने के लिए एक बहुत ही सीधी-सी मिसाल देता हूं। मेरे ध्यान में मिश्रित जाति का एक आयरिश शिकारी कुत्ता आ रहा है। इसे मैं बहुत दिनों से देखता हूं। यह मेरे दोस्त जॉन स्मिथ का कुत्ता है, नाम है पैी । वह इसे बेहद प्यार करते हैं पैडी को स्कॉच शिकारी कुत्ते नापसंद हैं। इस जाति का कोई भी कुत्ता उसके आस - पास बीस गज दूर से भी नहीं निकल सकता और कोई दिख भी जाता है, तो वह भूक भूककर आसमान सिर पर उठा लेता है। उसकी यह बात जॉन स्मिथ को बेहद बुरी लगती है और वह उसे चुप करने का हर संभव प्रयत्न भी करते हैं क्योंकि पैडी जिन कुत्तों से नफरत करता है, वे बेचारे चुपचाप रहते हैं और कभी भी पहले नहीं भूंकते । मेरा दोस्त, हालांकि पैडी को बहुत प्यार करता है, तो भी वह यह सोचता है, और जैसा कि मैं भी सोचता हूं कि पैडी की यह आदत बहुत कुछ उसके किसी जाति - विशेष होने पर उसके स्वभाव के कारण है। हमसे किसी ने यह नहीं कहा कि यहां जो समस्या है, वह स्कॉच शिकारी कुत्ते की समस्या है और जब पैडी अपने पास के किसी कुत्ते पर झपटता है जो बेचारा टट्टी-पैशाब वगैरह के लिए जमीन सूंघ - सांघ रहा होता है, तब उस कुत्ते को क्या इसलिए मारना पीटना चाहिए कि वह वहां अपने अस्तित्व के कारण पैडी को हमला करने के लिए उसका देता है । "
यहां यदि हम पैडी की स्थिति में हिंदू को और स्कॉच शिकारी कुत्ते की स्थिति में अस्पृश्यों को रखकर विचार करें तो हम देखेंगे कि लुइस गोल्डिंग का तर्क हिंदुओं के संबंध में भी उतना ही लागू होगा, जिनता ईसाइयों पर होता है । अगर गोल्डिंग की बात मानी जाए तो यहूदियों की समस्या वास्तव में ईसाइयों की समस्या है, तब अस्पृश्यों की समस्या भी मूलतः हिंदुओं की समस्या है।

क्या हिंदुओं को इसका अहसास है? क्या वे मानते हैं कि अस्पृश्य उनके लिए समस्या हैं? क्या उन्हें इसकी चिंता है? क्या वे इस पर विचार करते हैं? सचाई जानने के लिए कई बातें देखनी होंगी। एक कसौटी तो यही है कि इस विषय पर कितना साहित्य रचा गया है। मानक कसौटी के रूप में हम अमरीका में नीग्रो लोगों के बारे में रचे गए साहित्य को लें। हमें जानकर आश्चर्य होता है कि अमरीका में नीग्रो लोगों के संबंध में ढेर सारी सामग्री छपी है। कहा जाता है कि नीग्रो समस्या के संबंध में ग्रंथों की सूची तैयारी की जाए, तो कई लाखों पुस्तकों की सूची बन जाएगी। वास्तव में इस विषय पर असंख्य पुस्तकें लिखी गई हैं। यही इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि श्वेत लोगों के लिए यह कितनी बड़ी समस्या है। इस समस्या ने अमरीका में वहां के सभी वर्ग के लोगों को कई पीढ़ियों तक प्रेरित रखा जिनमें धार्मिक, आदर्शवादी, राजनैतिक चिंतक, राजनेता, दानी, समाज विज्ञानी, राजनीतिज्ञों, व्यापारियों के साथ - साथ साधारण नागरिक भी आते हैं।
भारत में अस्पृश्यों पर कितना साहित्य छपा है ? पांच-छह पैमफ्लैटों से ज्यादा नहीं।
छूसरी कसौटी सामाजिक व्यवहार है। मैं समाचार-पत्रों में छपी दो घटनाएं उद्धृत करना चाहता हूं। पहली घटना 'प्रताप' के 5 मार्च, 1926 के अंक में छपी है । यह इस प्रकार है:
"तेईस फरवरी को दिन में करीब ग्यारह बजे लखनऊ के बेगमगंज में लगभग बारह-तेरह लोग मिट्टी खोद रहे थे। तभी एक मिट्टी का ढूह गिर पड़ा ओर वे सभी मिट्टी में दब गए। मिट्टी हटाए जाने पर एक लड़के और छह औरतों को निकाल लिया गया। उनमें से केवल एक औरत जिंदा बची, जो मीरपुर की रहने वाली थी। उसे गहरी चोटें आई थी। और उसकी हालत नाजुक थी। बेगमगंज के निवासियों ने चारपाई देने से इंकार कर दिया, जिस पर उस औरत को लिटाया जाता। अंत में एक मुसलमान ने चारपाई दी। लेकिन कोई हिंदू इस बात के लिए तैयार नहीं था कि उस घायल औरत को चारपाई पर उठाकर उसके घर पहुंचा दें अंत में एक जमादार को बुलाया गया, जो उसे उसके घर पहुंचा कर आया । "
अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं की हृदयहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण निम्नलिखित घटना से प्रकट होता है, जिसके बारे में 'संग्राम' के 10 जुलाई, 1946 के अंक में प्रकाशित संवाददाता की एक रिपोर्ट में बताया गया है। संवाददाता लिखता है:
"आठ जुलाई 1946 को गोवा के म्हाप्से गांव में स्थित अजिल नाम अनाथ आश्रम में एक औरत मर गई । यह आश्रम ईसाई चलाते हैं। यह पता चला कि वह औरत हिंदू थी। उसका कोई सगा - संबंधी नहीं था। जब यह पाया गया कि उसका क्रियाकर्म करने वाला कोई नहीं है तो गांव के हिंदुओं ने मिलकर कफन और अर्थी के लिए चंदा इकट्ठा किया। वे उसके शव के अनाथ आश्रम से बाहर ले आए। उसी समय कुछ अस्पृश्य भी वहां पहुंच गए, जो मृतक और को जानते थे। उन्होंने उसकी पहचान कर ली। जैसे ही हिंदुओं को पता चला कि मरने वाली औरत अस्पृश्य थी तो वे इधर-उधर खिसक गए । अस्पृश्यों ने हिंदुओं से कहा कि उन्होंने मृतक औरत के नाम पर जो चंदा इकट्ठा किया है, वह उन्हें दे दें। हिंदू मुकर गए और उन्होंने कहा कि वह चंदा तो उस औरत को हिंदू जानकर इकट्ठा किया गया था। वह हिंदू नहीं, बल्कि एक अस्पृश्य थी, तो उसके क्रियाकर्म पर यह पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। अस्पृश्यों ने उसके अंतिम संस्कार का खुद ही इंतजाम किया। अस्पृश्यों को अपने प्रति हिंदुओं के प्रेम और सद्भाव का अच्छा सबूत मिला ।
" निम्नलिखित समाचार 2 अक्तूबर, 1925 के 'मिलाप' से लिया गया है। पत्र का संवाददाता लिखता है:
'रुद्रप्रयाग से समाचार मिला है कि सितम्बर के पहले सप्ताह की एक शाम को एक हरिजन रुद्रप्रयाग की धर्मशाला में आया। जब उसे पता चला कि वहां रोजाना रात को एक बाघ आता है तो उसने धर्मशाला के प्रबंधक से कहा कि बाघ से बचने के लिए वह उसे रात भर के लिए धर्मशाला के किसी कोने में पड़ा रहने दे। पर उस जालिम प्रबंधक ने एक न सुनी और ध र्मशाला का फाटक बंद कर दिया। अभागा हरिजन धर्मशाला के बाहर कोने में पड़ा रहा। रात भर उसे बाघ का डर सताता रहा। जब रात ढल रही थी तो बाघ आया और हरिजन पर टूट पड़ा। वह आदमी काफी तगड़ा था। मौ को सामने देख वह निडर हो गया। उसने बाघ को गर्दन से पकड़ लिया और चिल्लाया, मैंने बाघ को पकड़ रखा है। आओ और इसका काम तमाम कर दो ।" पर ऊंची जाति के प्रबंधक ने न तो फाटक ही खोला, और न ही किसी अन्य तरीके से उसकी मदद की। इधर हरिजन की पकड़ ढीली पड़ गई और बाघ जान बचाकर भाग गया। फिलहाल वह व्यक्ति श्रीनगर (गढ़वाल) के अस्पताल में घायल अवस्था में पड़ा है, जहां उसने अपने को खुद दाखिल करवाया। उसकी हालत नाजुक बताई जाती है।
इन उदाहरणों में व्यक्त हृदयहीनता से पता चलता है कि हिंदू को अस्पृश्यों के साथ व्यवहार करते समय उचित-अनुचित का कोई ध्यान नहीं रहता और वह उनकी बिल्कुल भी परवाह नहीं करता ।
तीसरी कसौटी अस्पृश्यों की सेवा और उनके प्रति त्याग-भावना है। यहां भी हम नीग्रो लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए अमरीकियों के प्रयासों को मानक मानकर चलते हैं। इस संबंध में कुछ आंकड़े नीचे दिए जा रहे हैं।
कृपया इस बात पर विचार कीजिए कि नीग्रो लोगों के कल्याणार्थ श्वेत लोगों ने कितना दान 1 दिया-
1. यह तालिका 'नीग्रो इयर बुक' 1931-32 में पृ. 202 दी गई सूची के आधार पर तैयार की गई है।
| वसीयतकर्ता | राशि ( डालरों में) |
वसीयतकर्ता | राशि ( डालरों में) |
| केन | 50,000 | मैसन | 1,00,000 |
| हार्टन | 5,000 | नाउनबर्ट | 40,000 |
| ट्रागटन | 160,600 | हैरीसन | 2,30,000 |
| ऑटिंगर | 500 | मंगर | 75,000 |
| गम्ब्राइन | 35,000 | कोरलिस | 45,000 |
| जरप्की | 1,000 | रोजनबैनिन | 1,000 |
| स्ट्रोक | 500 | बर्टन | 1,000 |
| किडिर | 5,000 | कॉनरॉय | 1,00,000 |
| क्लोडिन | 10,000 | केंट | 10,000 |
| वुड | 500 | ड्यूक | 1,40,000 |
| हार्कनेस | 12,50,000 | मर्कोलिएट | 5,000 |
| बीटी | 2,90,000 | मैसी | 25,000 |
| मारक्वेंट | 5,000 | निकोलस | 20,000 |
| न्यूटन | 5,000 | गैरटसन | 1,50,000 |
| हमिंगटन | 25,000 | हैचर | 20,000 |
| फैल्प | 2,80,000 | राइट | 10,000 |
| बटलर | 30,000 |
यह आंकड़े 1930 से पहले के हैं। इसमें शेष राशि शामिल नहीं है। नीग्रो लोगों में शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यमान शिक्षा कोषों पर भी विचार कीजिए:
1. यह तालिका 'नीग्रो इयर बुक' 1931-32 में पृ. 213-18 पर दी गई सूची के आधार पर तैयार की गई है।
(1) दि एवरी फंड,
(2) दि विलास बीक्वेस्ट,
(3) दि अफ्रीकन फंड,
(4) दि बकिंघम फंड,
(5) दि जार्ज वाशिंगटन एजुकेशनल फंड,
(6) दि माइनर फंड,
(7) दि स्टीवर्ड मिशनरी फांउडेशन,
(8) दि डेनियल हैंड फंड,
(9) दि जॉन स्लैटर फंड, और
(10) दि फैल्प - स्टोक्स फंड |
इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कोष भी हैं, जैसे कि कैरनेगी कोरपोरेशन ज्यूलियस रोजनावाल्ड फंड और दि रौक फैलर फांउडेशन, जो नीग्रो लोगों की सहायता करते हैं। ये कोष कितना धन वितरित करते हैं, यह मालूम नहीं है। परंतु यह लाखों से ऊपर होगा।
नीग्रो लोगों की शिक्षा के लिए धार्मिक संस्थानों द्वारा किए जाने वाले खर्च को भी देखें। यहां कुछ आंकड़े 1 दिए जा रहे हैं।
| वार्षिक खर्च (डालरों में) |
नीग्रो शिक्षा के लिए स्थाई कोष |
स्कूलों की इमारत आदि कामूल्य ( डालरों में) |
||
| 1. |
अमरीकन बैपतिस्त होम |
116,247 | 1,597,700 | 3,594,251 |
| 2. | अमरीकन चर्च इंस्टीट्यूट फार नीग्रोज (एपिसकोपल) |
185,100 | 450,000 | 3,000,000 |
| 3. | अमरीकन मिशनरी एसोसिएशन | 368,057 | 3,228,421 | 3,2000,000 |
| 4. | चर्च आफ क्राइस्ट (डिसीपिल्स) यूनाइटेड क्रिश्चियन मिशनरी सोसायटी |
91,072 | --- | 5000,000 |
| 5. | लूथरेन इवैंजलिकल साइनोडिकल कांफ्रेंस आफ नॉर्थ अमरीका बोर्ड कलर्ड मिशन |
74.900 | --- | 175,000 |
| 6. | मैथोडिस्ट एपिसकोपल चर्च बोर्ड ऑफ एजुकेशन इंस्टीट्यूशन फार नीग्रोज |
259,264 | 1,962,729 | 500,000 |
| 7. | मैथोडिस्ट एपिसकोपल चर्च वीमेंस होम मिशनरी सोसायटी |
104,975 | --- | 360,000 |
| 8. | प्रेसबाइटेरियन चर्च इन दि यू. एस. ए डिविजन आफ मिशन फार कलर्ड पीपुल |
405,327 | 1,994,032 | 3,560,000 |
| 9. | यूनाइटेड प्रेसबाइटेरियन चर्च बोर्ड आफ मिशन फार फ्रामैन |
98,000 | 645,000 | 1,000,000 |
1. यह तालिका 'नीग्रो इयर बुक' 1931-32 में पृ. 213 पर दी गई सूची के आधार पर तैयार की गई
है।
ऐसा अनुमान है कि 1865 से लेकर 1930 तक धार्मिक और खैराती संस्थाओं द्वारा नीग्रो लोगों के उत्थान पर कुल 135,000,000 डालर खर्च किए गए। इस धनराशि में से 85,000,000 डालर श्वेत लोगों द्वारा दिए गए हैं।
अस्पृश्यों के उत्थान के लिए हिंदुओं ने क्या सेवाएं और क्या त्याग किया है। हरिजन सेवक संघ' ही केवल एक ऐसा संगठन है, जिस पर हिंदू गर्व कर सकते हैं। इसकी कुल पूंजी दस लाख रुपये से अधिक नहीं है। फुटकर और बेकार के कार्यों पर इसका खर्च प्रतिवर्ष कुछ हजार रुपये से ज्यादा नहीं है। यह कोई कल्याण कोष नहीं है। असल में यह एक राजनैतिक कोष है। इस कोष का प्रयोजन मुख्य रूप से अस्पृश्यों को अपने वोट हिंदुओं के लिए डालने के लिए राजी करना है।
1. विस्तृत जानकारी के लिए मेरी पुस्तक 'वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव उन टू दि अनटचेबल्स' देखें।
यह अंतर क्यों है? अमरीका में लोग अपने यहां नीग्रो लोगों के उत्थान के लिए सेवा और त्याग कर इतना सब कुछ क्यों करते हैं और अस्पृश्यों के उत्थान के लिए हिंदू लोग कुछ भी क्यों नहीं करते हैं? इसका एक ही उत्तर है कि अमरीकियों में सामाजिक विवेक है, जब कि हिंदुओं में इसका सर्वथा अभाव है। ऐसी बात नहीं कि हिंदुओं में उचित-अनुचित, भला-बुरा या नैतिकता - अनैतिकता का कोई विचार नहीं हैं हिंदुओं में दोष यह है कि अन्य के संबंध में उनका जो नैतिक विवके है, वह सीमित वर्ग, अर्थात् अपनी जाति के लोगों तक ही सीमित है। जैसा कि श्री एच. जे. पैटन कहते हैं' :
कोई व्यक्ति नैतिक दृष्टि से अच्छा हुए बिना भी किसी विशिष्ट समाज में एक अच्छा व्यक्ति हो सकता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में कानून सम्मत अपनी एक पृथक जीवन-चर्या बना लेता है और तदनुसार आचरण करता है, उसमें भी नैतिक गुणों की छाया या उसका आभास मिल सकता है, और उसके जीवन में कोई ऐसा गुण हो सकता है, जिसे हम नैतिक गुण समझने की गलती कर जाएं। ऐसा व्यक्ति किसी भी समाज का हो सकता है, चाहे वह चोरों या डाकुओं का कोई गिरोह ही क्यों न हो। हालांकि चोरों या डाकुओं में भी कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जिसे वे आदर देते हैं। लेकिन वह चोर या डाकू इस कारण आदरणीय व्यक्ति तो नहीं हो सकता। नैतिक दृष्टि से कोई व्यक्ति अच्छा तभी कहा जाएगा, जब वह किसी सीमित समाज में ही अच्छा व्यक्ति नहीं कहा जाए, बल्कि उसे उस समाज के बाहर भी लोग अच्छा कहें। समाज कई समाजों का हो सकता है, जिसके उद्देश्य में सभी समाजों उद्देश्य अंतर्निहित होते हैं। ऐसे समाज से परे कोई समाज नहीं होता है, जिससे कर्तव्यों में कोई अंतर्विरोध उत्पन्न होने की कोई गुंजाइश रहे ।
अस्पृश्य लोग हिंदुओं के समाज के नहीं हैं और हिंदू भी यह नहीं समझते हैं। कि वे और अस्पृश्य, दोनों एक ही समाज के लोग हैं। यही कारण है कि हिंदुओं नैतिक दृष्टि से अस्पृश्यों के प्रति कोई चिंता या ममत्व नहीं होता ।
चूंकि हिंदुओं में इस प्रकार के विवेक का अभाव होता है, इसलिए उनके हृदय में हठधर्मिता और अन्याय के विरुद्ध, जिनसे अस्पृश्य लोग पीड़ित हैं, न्यायोचित रोष उत्पन्न नहीं होता। वे इस हठधर्मिता और अन्याय को गलत नहीं समझते और कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं। हिंदुओं में विवेक का अभाव अस्पृश्यता के निवारण के रास्ते में एक बड़ी बाधा है।
1. 'दि गुड विल' एच. जे. पैटर्न पृ. 281