अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
II
[ निम्नलिखित निबंध की मूल अंग्रेजी पाठ की (प्रति श्री एस. एस. रेगे से प्राप्त हुई थी। चूंकि यह 'नीग्रो और गुलाम-प्रथा' (इस अध्याय की योजना के विषयों में से एक विषय) के बारे में है जिस पर उक्त विवेचन में कोई चर्चा नहीं हुई है, अत: इसे यहां सम्मिलित किया गया है- संपादक ]
ऐसा लगता है कि विधाता ने अफ्रीका महाद्वीप के साथ स्थाई रूप से संधि कर उसके भाग्य में लिख दिया है कि वह एशिया और यूरोप के स्वतंत्र और सभ्य निवासियों के लिए गुलामों की एकमात्र जन्मस्थली रहेगा। अमरीका में यूरोपियनों द्वारा गुलाम के रूप में नीग्रो लोगों का आयात शुरू करने के पूर्व निवासियों द्वारा एशिया में नीग्रो लोगों का आयात किया जाता था। हालांकि स्थिति यही थी। लेकिन अमरीका में और अंग्रेजों की नई बस्तियों में नीग्रो लोगों को किस तरह गुलाम बनाकर रखा जाता था, इसका बड़ा ही कारुणिक इतिहास है, जिसे सुनकर लोग एशिया में गुलाम के रूप में नीग्रो लोगों के आयात की कथा को भूल जाते हैं, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि अमरीका में नीग्रो लोगों का यूरोप के निवासी किस प्रकार आयात करते थे, यह सब एक बहुत ही वीभत्स कार्य होता था। यह आयात 16वीं शताब्दी के पहले दशक में शुरू हुआ और 19वीं शताब्दी के मध्य तक चला।
कोलंबस जब पहली बार 1492 में बहामा द्वीप पर पहुंचा, तब उसके बाद आधी शताब्दी में स्पेनवासियों ने मेक्सिको से पेरु होते हुए युरुगुए तक के विशाल भू-भाग को जीत लिया था और उन्होंने अंशतः इस पर कब्जा भी कर लिया था । इसमें बड़े-बड़े वेस्ट इंडियन द्वीप भी शामिल थे। पुर्तगालियों ने ब्राजील में 1531 में अपनी बस्तियां बसानी शुरू की थीं। पुर्तगालियों और स्पेनवासियों ने यहां आते ही अपने-अपने अधीन के क्षेत्रों की प्राकृतिक संपदा का दोहन करना शुरू कर दिया, मुख्य भू-भाग में स्थित सोने और चांदी की खानों का पता लगाना और उन्हें खोदना शुरू कर दिया और द्वीपों की उपजाऊ भूमि पर तंबाकू, नील और गन्ने की खेती शुरू की। लेकिन उनको तुरंत अपेक्षित संख्या में श्रमिकों की पूर्ति की समस्या का सामना करना पड़ गया। उन्हें पर्याप्त संख्या में श्रमिक चाहिए थे। वहां पर श्वेत श्रमिकों की मजदूरी ज्यादा थी और यूरोपवासी वहां की उष्णकटिबंधीय तेज धूप बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। अतः वहां यूरोपवासियों को स्वयं काम करने में कष्ट होता था। वहां पर गैर-यूरोपीय श्रमिक के रूप में वहां के स्थानीय लोग ही उपलब्ध थे। इस भू-भाग को जीतने के दौरान पुर्तगालियों और स्पेनवासियों ने अधिकांश इंडियन (स्थानीय) लोगों का संहार किया था। इन आक्रमणों से डरकर बहुत से इंडियन लोग भागकर पहाड़ों और जंगलों में जाकर छिप गए थे। जो भी उपलब्ध हुए, उन्हें गुलाम बना दिया गया और खानों में खुदाई के काम पर लगा दिया गया। पुर्तगालियों और स्पेनवासियों के कोड़ों की मार खाकर और उनसे खानों और खेतों में जिस निर्दयता से अनथक काम लिया जाता था, उससे वहां के स्थानीय निवासी बीमार पड़ जाते और मर जाते थे ।
दक्षिणी अमरीका के आरंभिक स्पेन के विजेता कनक्टिवजटेडर के नाम से जाने जाते थे। ये नक्टिवजटेडर निकालेस दि ओवेडो के नेतृत्व में, जो कोलंबस के तुरंत बाद यहां आया था, अपने साथ बात्रोलोमे दि लस कसास नामक एक नवयुवक पादरी को ले आए। यह पादरी अपने पवित्र आचरण के लिए विख्यात था। लस कसास पर कोर्ट आफ स्पेन में यह आरोप लगाया गया कि वह इन इंडियन (स्थानीय) लोगों के साथ इस आशा से स्नेहपूर्ण व्यवहार करता था कि वह इनको पवित्र ईसाई धर्म में दीक्षित कर लेगा । लस कसास मेक्सिकों का प्रथम बिशप था। लस कसास ने अपने उस कर्तव्य का पालन करते हुए जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया था, हाईती में कनक्विजटेडरों द्वारा वहां के इंडियन निवासियों पर किए जाने वाले निर्दयतापूर्ण व्यवहार को अपनी आंखों से देखा था और जीवन- पर्यन्त हाईती के बचे-खुचे बेचारे इंडियनों की, जिन्हें कैरीबियन कहा जाता था, उनके मालिकों के हाथों नष्ट होने से रक्षा की। कैरीबियन लोग विनम्र सीधे-सादे और मिलनसार नस्ल के थे। जब कोलंबस ने उनका पता लगाया था तब उनकी संख्या 1,000,000 से कम नहीं थी। ये विभिन्न राज्यों में बंटे हुए थे। इन राज्यों में इनके प्रमुख, जिन्हें कैशीक कहा जाता था, शांतिपूर्वक राज्य करते थे । कोलंबस के बाद स्पेन के जो साहसी लोग यहां आए, उनके सुनियोजित अत्याचारों के कारण इनकी संख्या मुश्किल से 60,000 रह गई । यह कहा जाता है कि सभी गांवों के लोगों ने अन्य लोगों को भी आमंत्रित कर आत्महत्या कर ली, क्योंकि उनके द्वारा किए जा रहे नरसंहार और क्रूर अत्याचार का और कोई निदान नहीं था । लस कसास ने आत्मदाह की अनेक घटनाओं को स्वयं देखा था । लस कसास ने इन घटनाओं को लेकर क्षोभ व्यक्त किया। लेकिन उसका विरोध करना व्यर्थ था और उसके उस विरोध का निष्फल होना निश्चित था । जंगलों की सफाई, जमीन की जुताई और खानों की खुदाई तो होनी ही थी । इसके बिना ईश्वर प्रदत्त राज्य मनुष्य के लिए स्वर्ग नहीं बन सकता था । लस कसास ने इसे अनुभव कर लिया थ। लेकिन उसे इस बात की बड़ी चिंता थी कि अगर यह सब कार्य होते हैं, तब यहां के इंडियनों को कितने कष्टों को भोगना पड़ेगा। उसकी दया की भावना ने उसे नीग्रो लोगों के निःशुल्क आयात की स्वीकृति देने के लिए किंग आफ स्पेन को प्रार्थना-पत्र भेजने के लिए प्रेरित किया। स्पेन की सरकार ने 1511 में राजाज्ञा की कि भारी संख्या में नीग्रो लोगों को इस नई दुनिया में ले जाया जाए। इसके अनुसार माल की तरह नीग्रो लोगों से लदे जहाज इस नई दुनिया को मनुष्य का स्वर्ग बनाने के लिए यहां आए। कुछ वर्षों तक यहां के इंडियनों और नीग्रो लोगों दोनों ने साथ - साथ मिलकर कनक्विजटेडरों के अधीन काम किया। इंडियनों की तुलना में नीग्रो लोगों की काठी मजबूत सिद्ध हुई। एक कनक्विजटेडर का कथन है कि जब उसने चार बिगोटाइनों के लिए जो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर के बीच इस्थमस (जलसंधि) से होकर जाते थे, लकड़ी के लट्ठे भरने का काम किया तब उसने सैकड़ों इंडियनों और तीस नीने लोगों को इस काम पर लगाया था। अंत में उसे पता लगा कि इस काम में पांच सौ इंडियनों की मृत्यु हो गई और तीस के तीस नीग्रो वैसे के वैसे ही बच गए। ये नीग्रो लोग मरने से बच ही नहीं गए, बल्कि इतने हृष्ट-पुष्ट हो गए कि लोगों की तो यह आम धारणा - सी बन गई कि जब तक नीग्रो को फांसी नहीं दे दी जाती, तब तक वह नहीं मर सकता, क्योंकि अभी तक इनमें से कोई भी कमजोर होकर मरता नहीं सुना गया है।

नीग्रो लोगों ने अपने व्यवहार और आचरण से यह प्रमाणित कर दिया कि इंडियन लोगों की अपेक्षा वे अधिक उपयोगी साधन हैं। इस कारण इंडियन लोगों को तो छोड़ दिया जाता था और श्रमपूर्ण कार्य के लिए नीग्रो लोगों को प्राथमिकता दी जाती थी। ऐसा इसलिए होता था कि विधाता ने इंडियनों को कम और नीग्रो को अधिक मजबूत बनाया है। इसका परिणाम यह हुआ कि इंडियन लोग तो गुलाम होने से बच गए, लेकिन नीग्रो लोगों के भाग्य में वह वस्तु आ गई जो कनक्विजटेडर उन पर लागू करना चाहते थे एक ऐसा भाग्य जिसे अपनाने के लिए पवित्र और दयालू हृदय वाले पादरी लस कसास ने उन्हें आमंत्रित किया था और जिसके योग्य होने के बारे में नीग्रो लोगों ने अपने सामर्थ्य को स्वयं सिद्ध कर दिया था।
जब लोगों को यह पता चल गया कि 'चार इंडियनों की अपेक्षा एक नीग्रो ज्यादा काम करता है' तब नीग्रो लोगों का व्यापार करने के लिए तुरंत एक नियमित मंडी खुल गई। पुर्तगालियों ने अफ्रीका के पश्चिमी तट पर जो मंडी स्थापित की, उससे एकदम मुनाफा होने लग गया और यह स्वाभाविक था, क्योंकि नई दुनिया की अपार संपत्ति का उपयोग नीग्रो लोगों के श्रम के बिना असंभव था। लोग इस नए व्यापार में इस तरह तल्लीन हो गए कि पूर्व की ओर जाने के लिए नए रास्ते की खोज का काम जो शुरू ही हुआ था, वह छोड़ दिया गया।
व्यापार के इस नए क्षेत्र में भाग लेने के लिए यूरोप के विभिन्न देशों में कड़ा मुकाबला था। नई दुनिया से संपत्ति का जो प्रवाह हो रहा था, उस पर स्पेन और पुर्तगाल के एकाधिकार के बारे में पोप की ओर से एक आदेश जारी हुआ। अंग्रेजों और डचों को यह आशंका हो गई कि अमरीका के संसाधनों पर इस प्रकार एकाधि कार के हो जाने से सारे यूरोप को खतरा पैदा हो जाएगा और वह इसे न होने देने के बारे में दृढ़ थे।
अंग्रेजों ने अपने राष्ट्र के लाभ के लिए इस व्यापार को अपने हाथ में लेने के लिए ठोस रूप से पहल की। इस संबंध में पहला सौदा 1553 में हुआ, जब अफ्रीका के तट से चौबीस नीग्रो लाए गए और उन्हें चुपचाप अंग्रेजों के हाथ बेच दिया गया था। इनमें सबसे ज्यादा साहसी और जो इतिहास में सबसे बड़े निर्दयी आदमचोर के रूप में कुख्यात हुआ, जॉन हाकिन्स नाम का अंग्रेज था । एजिलाबेथ प्रथम से राजाज्ञा प्राप्त कर 'जीसस' नामक एक बड़ा जहाज लेकर वह अफ्रीका से नीग्रो लोगों को लाने के लिए समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा। उसने इन नीग्रो लोगों को वहां से लाकर स्पेन की बस्तियों में बेच डाला। इसके बाद स्पेन के एकाधिकार को समाप्त करने का दृढ़ निश्चय कर सर फ्रांसिस ड्रेक ने हाकिन्स का अनुसरण किया। इन साहसपूर्ण यात्राओं में एक-दूसरे के जहाजों से माल की चोरी की घटनाओं को लेकर अंतर्राष्ट्रीय विवाद उठ खड़े हुए, जिनकी चरम परिणति स्पेन के युद्धपोतों के बेड़े के विरुद्ध संघर्ष हुआ और उसे नष्ट कर डाला गया ।
ध्यान देने की बात यह है कि इन झगड़ों में प्रत्येक राष्ट्र निर्लज्जतापूर्वक इस बात का दावा करता था कि उसके राष्ट्रिकों द्वारा नीग्रो लोगों का दूसरे के जहाजों पर से उड़ाकर अपने जहाजों में भर लेने का काम व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं था, बल्कि सार्वजनिक हित में था, जिसे उनकी सरकार से समर्थन प्राप्त था ।
ऐसा लगता है कि गुलाम बनाने के उद्देश्य से नीग्रो लोगों को लाने के लिए 'जीसस' नामक जहाज के उपयोग में निहित विडंबना पर्याप्त नहीं थी, इसलिए एक और घटना हुई जो उससे कम विडंबनापूर्ण नहीं थी। यह घटना थी 'मेफ्लावर' नामक जहाज द्वारा प्लाईमाउथ रॉक पर पिलग्रिम फादर्स (अंग्रेज प्यूरिटन मतावलंबी पादरी लोगों का दल) के आगमन के साथ-साथ बारनेकल और अन्य समुद्री क्षतिकारक जीवाश्मों से क्षतिग्रस्त ब्रिंग पोत (दो मस्तूल वाला जहाज) पर बीस नीग्रो लोगों का वर्जीनिया में जेम्सटाउन में आगमन । यह जहाज जेम्स नदी तक गया और इसमें ये नीग्रो अमरीका में वर्जीनिया की प्रथम सफल बस्ती के सभ्य साहसिकों के उपयोग के लिए लाए गए थे। इस प्रकार अमरीका में नीग्रो लोगों और पिलग्रिम फादर्स को लाया गया, जो वहां एक ही समय में आए। पिलग्रिम फादर्स का उद्देश्य उनकी स्वतंत्रता की सुरक्षा करना और नीग्रो का उद्देश्य अपनी स्वतंत्रता को गंवाना था । जहां तक संख्या का संबंध है, अमरीका की इन नई बस्तियों की जनसंख्या में नीग्रो लोगों की कुछ समय तक प्रमुखता रही। वास्तविक अर्थ में अमरीका और उसके द्वीपों को मुख्यतः अफ्रीका से आए लोगों और नीग्रो लोगों ने बसाया। 1800 से पहले तक अमरीका में जितने नीग्रो लोगों को लाया गया, उनकी संख्या वहां पर सभी यूरोपियनों की कुल संख्या से बीस गुनी से भी अधिक थी। यह अपरिहार्य था। यूरोप की जनसंख्या कम थी। यह लंबी-लंबी लड़ाइयों के कारण और भी घट गई थी, और यह अपनी पिछड़ी हुई संस्कृति से उभर रहा था। यहां जो नीग्रो आयात किए गए उनकी हैसयित बहुत समय तक अनिश्चित रही । डच लोग जिन बीस नीग्रो लोगों को लाए थे और जो जेम्सटाउन में उतरे थे, उन्हें बस्ती में तुरंत गुलाम की संज्ञा नहीं दी गई। उन्हें उसी आधार पर स्वीकार किया गया, जैसे कि वे ठेके पर रखे गए नौकर हों। यह पता चला है कि वर्जीनिया नामक बस्ती के 1624 और 1625 के मस्टर रोलों में तेईस नीग्रो लोगों के नाम दर्ज थे, जिनमें से सभी नीग्रो उसी श्रेणी के श्वेत लोगों की तरह 'सेवक' के रूप में दर्ज थे। यह भी लिखा मिलता है कि बीस नीग्रो लोगों के आगमन के चौंतीस वर्ष बाद इनमें से एक एंथनी जॉनसन नामक नीग्रो ने न्यायालय से अपने समर्थन की पुष्टि के संबंध में यह आदेश प्राप्त किया कि जॉन कैस्टर नामक एक दूसरे नीग्रो की सेवाओं पर उसका स्थाई अधिकार है। गुलामी की परिभाषा पचास वर्ष तक निश्चित नहीं हुई और जिन उपायों से यह निश्चित हुई, वे बहुत धीरे-धीरे किए गए।
शुरू-शुरू में सेवा के संबंध में एक कानून होता था जो सभी सेवकों पर चाहे वे नीग्रो हों या श्वेत, लागू होता था । ज्यों-ज्यों समय बीतता गया त्यों-त्यों नीग्रो सेवकों और श्वेत सेवकों के साथ व्यवहार में अंतर किया जाने लगा। यह भेद इन बाहरी और विधर्मी लोगों के भय के कारण किया जाने लगा जो परंपरा और रीति-रिवाजों में रचते - पचते जा रहे थे। इस भय के कारण धीरे-धीरे अफ्रीकावासियों की हैसियत में संशोधन हुआ और जो नीग्रो सेवक कहे जाते थे, उन्हें नीग्रो गुलाम कहा जाने लगा। बाद में ज्यों-ज्यों स्थिति बदलती गई, त्यों-त्यों सेवकों से संबंधित कानून और रीति-रिवाजों में संशोधन होते रहे, और अमरीका की इन विदेशी बस्तियों में नीग्रो लोगों को गुलाम के रूप में रखने की प्रथा का विकास होता गया । सेवक से गुलाम के रूप में यह अंतरण दो चरणों में पूरा हुआ। इस अंतरण का पहला चरण वह है, जब नीग्रो लोगों को आजन्म सेवक के रूप में रखने की प्रथा को मान्यता दी गई। जैसा कि कहा जाता है, गुलाम होने का लक्षण यह नहीं है कि किसी की राजनैतिक या नागरिक स्वतंत्रता छिन जाती है, बल्कि इस क्षति का स्थाई और अंतिम होना है जो चाहे स्वैच्छिक हो या अनैच्छिक हुई हो। यह अन्य प्रकार के दासत्व, जैसे मध्य - कालीन गुदस्तादार ( वैसेलेज ) और अर्ध- ? - गुलाम (विलियनेज) तथा आधुनिक खेतिहर गुलाम (सर्फडम) और द्रव्य के बजाय मात्रानुसार तकनीकी सेवक (सर्वीट्यूड) से भिन्न होता है जो स्थान या काल के आधार पर सीमित होता है। खेती करने वाले मालिक अपने श्वेत सेवकों की सेवा अवधि बढ़ाने के प्रयत्न में तो सफल नहीं हो सके, लेकिन इन 'अश्वेत लोगों के मामले में वे सफल हो गए। उनके प्रयत्नों को सार्वजनिक आधार पर समर्थन मिला क्योंकि इन 'अश्वेत ' लोगों के बारे में यह धारणा हो गई थी कि अगर इन्हें नियंत्रण में नहीं रखा गया तो ये खतरनाक हो जाएंगे।
नीग्रो सेवकों को नीग्रो गुलाम के रूप में बदलने के लिए दूसरा उपाय यह किया गया कि गुलाम नीग्रो मां की अवधि को बढ़ा दिया गया और उसके बच्चों को भी गुलाम बना दिया गया। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि नीग्रो मां को अपने अधीन गुलाम बनाकर रखने से उसके बच्चों पर भी उसके मालिक का नियंत्रण हो जाता था। यह स्पष्ट है कि इन बच्चों के मां-बाप जीवन-भर गुलाम रहने के कारण अपनी संतान के पालन-पोषण के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर सकते थे, और इनका पालन-पोषण भी मालिक पर निर्भर करता था। इस कारण इन बच्चों पर स्वतः मालिक का अधिकार हो जाता था । यह परिवर्तन कानूनी रूप में आने के बहुत पहले रीति-रिवाज के रूप में हो गया था। कानून के रूप में इसे अमरीका के विभिन्न राज्यों में 1662 से 1741 के बीच लागू किया गया।
इस प्रकार नीग्रो गुलाम बन गए जो मूलतः केवल सेवक होते थे। ध्यान देने की बात यह है कि अफ्रीका में, जो नीग्रो लोगों की जननी रहा है, गुलाम-प्रथा वहां की मूल संस्था थी और बहुत पुरानी थी । दासत्व की सबसे अधिक प्रचलित विधियां ये थीं - (1) जन्म से ही गुलाम होने से, (2) कर्ज के बदले गुलाम के रूप में बिकजाने से, (3) युद्ध में पकड़े जाने पर गुलाम बना दिए जाने से, और ( 4 ) आपसी वैर या लोभ से प्रेरित होकर किसी का अपहरण कर उसे गुलाम के रूप में बेच दिए जाने से । नीग्रो वस्तुतः गुलाम- प्रथा से पूरी तरह हिले - मिले हुए थे और उन्हें गुलाम और मालिक होने, दोनों प्रकार का स्वयं अनुभव था। इसलिए जब किसी नीग्रो को जबरदस्ती मालिक से गुलाम बना दिया जाता और वह मालिक नहीं रह जाता था, तब किसी के हृदय में उसके प्रति वैसी ही सहानुभूति नहीं उत्पन्न होती थी। लेकिन अगर इसे अपने किए का उचित दंड भी मान लिया जाए तो भी उस नई दुनिया में जहां उसे लाकर रखा जा रहा है, गुलाम के रूप में उसकी स्थिति उन कष्टों के संदर्भ में जो उसे उसके नए और विदेशी मालिक देते थे, थोड़ा-बहुत क्रोध तो पैदा कर ही सकती थी।
नई दुनिया में जहां नीग्रो लोगों को गुलामी की प्रथा में ढाला जाने लगा, उन्हें कितने और किस प्रकार के कष्ट दिए जाते थे, यूरोप और एशिया के वासियों को उनकी कल्पना करना संभव नहीं। इन कष्टों का वर्णन इन्हें तीन शीर्षकों में बांटकर किया जा सकता - पकड़े जाते समय का कष्ट यात्रा में दिया गया कष्ट और जब उनसे काम कराया जाता है तब दिया जाने वाला कष्ट । पहला कष्ट तो उस प्रक्रिया में होता था, जिस प्रक्रिया द्वारा गुलाम बनाने के लिए नीग्रो लोगों की धर-पकड़ की जाती थी। शुरू-शुरू में तट पर अचानक जहाज के पहुंचने पर उनकी धर-पकड़ की जाती थी। लेकिन बाद में नीग्रो जहाजों की टोह लेना और भागकर जंगलों व झाड़ियों में छिप जाना सीख गए। बाद में ये समुद्री व्यापारी भीतरी इलाके में कभी-कभी आ जाते और वे सामान्यतः स्थानीय व्यापारियों या छोटा-मोटा धंधा करने वालों के साथ धंधा करने लगे। वे यूरोप से सस्ता माल, जैसे कपड़ा, नकली मोती, लोहे से बना सामान, छोटी-बड़ी बंदूकें और कारतूस, शराब आदि लाते और उसके बदले उनसे गुलाम और उनके कबीले के मालिकों को खरीद लिया करते। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलाता कि शक्तिशाली कबीले के सरदारों ने इस प्रकार के माल, खासतौर से बंदूकों या शराब के प्रति कभी अनाकर्षण प्रकट किया जो या ऐसी वस्तुओं के प्रति वे कभी आकृष्ट न हुए हों। यह देखा गया कि छोटे से छोटे अपराध पर भी लोगों को दंड स्वरूप गुलाम बना लिया जाता था, निजी स्वार्थ के लिए कबीलों के बीच परस्पर लड़ाइयां, शांति के समय औरतों और बच्चों का अपहरण अफ्रीकी जीवन का लगभग अभिन्न अंग बन गया और ज्यों-ज्यों भीतरी भू-भाग में व्यापार फेलने लगा, त्यों-त्यों इन घटनाओं का सिलसिला भी बढ़ता गया ।
दूसरा कष्ट इन नीग्रो लोगों को तब भोगना पड़ता, जब वे अमरीका ले जाए जाते थे। इनके व्यापारी इनको खरीदने के बाद एक टोली में तट पर पैदल चलाते । इसमें आदमियों, औरतों व बच्चों का कोई ख्याल नहीं किया जाता था । कभी-कभी इन्हें काफी दूर तक चलना पड़ता। आमतौर पर इनके पैरों में बेड़ियां पड़ी होतीं, जिससे वे बचकर भागने न पाएं। कभी-कभी इनके गले में भी छल्ला (तौक) डाल दिया जाता था। यह छल्ला एक छड़ से एक लंबे पोल से बांध दिया जाता था, जो 'स्लेव स्टिक' कहलाती थी । इन्हें अपने - अपने सिर पर खाने की सामग्री और रास्ते के लिए जरूरी अन्य सामग्री, हाथी दांत या अन्य स्थानीय रूप से उपलब्ध माल भी ढोना पड़ता था, जो उनके खरीददार ने खरीदा होता था । यात्रा यह कठोरताएं कमजोर नीग्रो लोगों को बहुत भारी पड़तीं। जो गुलाम रास्ते में बीमार पड़ जाते, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता या उन्हें अपनी मौत मरने के लिए वैसा ही छोड़ दिया जाता। जिन रास्तों से ये गुलाम अक्सर ले जाए जाते थे, उन रास्तों पर इधर-उधर नर-कंकाल या उसकी हड्डियां पड़ी मिलतीं । तट पर पहुंचने पर इनको गुलामों वाले जहाजों पर भर दिया जाता, जो इनको ले जाने के लिए खासतौर से बनाए गए होते थे। जहाज के अंदर माल रखने वाली जगह को तीन-तीन फुट के अंतर पर आड़े तख्ते रख, बांट दिया जाता था, जिन्हें 'डेक' कहते हैं। इनके बीच सीढ़ी होती थी। इस तरह जो खाने बने होते, उनमें इन गुलामों को दो-दो की संख्या में बेड़ी पहना कर लिटा दिया जाता था। आदमियों और औरतों को अलग-अलग रखा जाता था। जहाज में जितने ज्यादा गुलाम भरे होते, उतना ज्यादा लाभ होता । इसलिए इनको ठूंस-ठूंसकर इस तरह भरा जाता कि ये मुश्किल से करवट ले सकते थे। एक सौ पचास टन वाले जहाज में छह सौ तक गुलाम भरे जाते थे। अफ्रीकी के तट से ब्राजील तक का रास्ता छोटा था, लेकिन यहां से वेस्टइंडीज तक के तथाकथित 'मिडिल पैसेज' को जो इन गुलामों के वितरण का मुख्य केंद्र था, खराब मौसम और तेज हवाओं के कारण तय करने में कई हफ्ते लग जाते। अगर मौसम अच्छा होता, तब गुलामों को ऊपर 'डेक' पर लाया जाता और उन्हें व्यायाम के लिए नाचने को कहा जाता या उन्हें जबरदस्ती नचाया जाता था। ये अक्सर बीमार रहते और जो लोग खाना बंद कर देते, उनको जबरदस्ती खिलाने के और इन जहाजों पर रहते। लेकिन 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वीकार किया गया कि औसतन इन गुलामों में से इनकी संख्या का छठा भाग इस समुद्री यात्रा में ही मर जाता था। जब यह मात्रा खत्म होती तब इन गुलामों की जांच होती और ये बेचे जाने के लिए तैयार किए जाते । तूफान या इनको ठीक तरह न रखने पर इनके जो जख्म हो जाते, उनकी मरह-पट्टी कर दी जाती। लेकिन जहां तक मुमकिन होता, इन जख्मों को छिपा दिया जाता। लेकिन बंदरगाहों पर एजेंट लोगों की अक्सर यही शिकायत रहती कि इन पार्सलों में जो नीग्रो माल आया है, वह 'खराब' 'घटिया' या बुरी तरह से घिसा-पीटा है। आखिर में जहांज पर या खुले बाजार में इन गुलामों को हर एक का नाम बताकर या बोली लगाकर बेचा जाता था। 18वीं शताब्दी में एक हट्टे-कट्टे नीग्रो की कीमत बढ़कर 60 पौंड तक हो गई थी। बीमार और घायल नीग्रो लोगों को कमजोर नीग्रो स्त्रियों और बच्चों के साथ मिलाकर बचे-खुचे माल की तरह सस्ते दामों में बेच दिया जाता था। आखिर में जब ये नीग्रो खेतों तक पहुंचते, तब उन्हें शेष जीवन में लिखे भोग को भोगने के लिए तैयार होने से पहले एक और संकट से गुजरना पड़ता था। काम पर लगाए जाने पर पहले कुछ महीनों की अवधि पक्का होने की अवधि कही जाती थी, इस दौरान नए गुलामों में से औसतन एक तिहाई गुलाम शरीर और मन से नई जलवायु या खाना-पीना या परिश्रम में अपने को अनुकूल नहीं कर पाते और वे मर जाते थे। कुल मिलाकर इस प्रकार मरने वालों की - अर्थात् जब इन गुलामों को पकड़ने के लिए लड़ाइयां लड़ीं जातीं या धावे मारे जाते थे, जब उन्हें समुद्र-तट तक पैदल चलाया जाता था, जब वह 'मिडिल पैसेज' से होकर जाते थे और जब उन्हें पक्का किया जाता था - संख्या के बारे में स्थूल रूप से यह अनुमान लगाया गया है कि हर - एक अफ्रीकी नीग्रो पर जब उसे पक्का कर दिया जाता था, एक नीग्रो की मृत्यु होती थी।
तीसरे प्रकार का कष्ट तब भोगना पड़ता था, जब पक्के बनाए गए नीग्रो को जीवन की वास्तविक परिस्थिति से जूझना पड़ता था । नीग्रो गुलामों की पद्धति में उसके मालिक को दो प्रकार के अधिकार मिले होते थे, जो निर्विवाद होते थे। ये अधिकार थे - स्वामित्व का अधिकार और दंड देने का अधिकार | स्वामित्व का अधिकार का बड़ा व्यापक अर्थ होता था। इस अधिकार के तहत मालिक को अपने नीग्रो गुलाम का सेवक के रूप में इस्तेमाल करने का ही अधिकार प्राप्त नहीं था, बल्कि वह उसे सेवा करने के लिए किसी दूसरे को बेच भी सकता था, वह पुश्तैनी आधार किसी दूसरे को दे सकता था। वह अपनी मर्जी के अनुसार जो चाहे कर सकता था। अधिकार की इस अवधारणा का आशय उस गुलाम के व्यक्तित्व के अधीन की गई संपत्ति के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित करना था । संपत्ति के रूप में गुलाम की अवधारणा के कारण वह मालिकों द्वारा अपने कर्ज चुकाने की स्थिति में देय या अधिकृत किए जाने योग्य हो गया। अगर इस प्रकार गुलाम मुक्त भी हो जाए, तो भी वह अपनी मुक्ति के पहले अपने मालिक के द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने के लिए इस्तेमाल हो सकता था। गुलामों के व्यक्ति के बजाय संपत्ति के रूप में स्वीकार हो जाने पर उनकी कानूनी और नागरिक के रूप में स्थिति और भी सीमित हो गई। वह स्वं कोई संपत्ति न रख सकता था, और न उसका कोई उपयोग ही कर सकता था। यह रोम के कानून के अनुसार नहीं था, जहां गुलामों को अपनी संपत्ति बनाने व रखने का अधिकार था। इसे उसकी निजी संपत्ति (पिक्यूलियन) कहते थे। हालांकि यह सीमित अधिकार था, तो भी यह महत्वपूर्ण अधिकार होता था, क्योंकि यह इस तथ्य को प्रमाणित करता था कि रोम का कानून यह स्वीकार करता था कि संपत्ति होते हुए भी गुलाम का अपना व्यक्तित्व है। चूंकि नीग्रो का गुलाम के रूप में कोई व्यक्तित्व नहीं है, इसलिए वह न तो व्यापार, और न ही अपना विवाह कर सकता था। मालिक द्वारा गुलाम को दंड दिए जाने के अधिकार की व्याख्या नीग्रो के प्रसंग में बड़े क्रूर होकर की जाती थी। 1829 में नार्थ कैरोलीन राज्य के न्यायालय में एक मामले में मुख्य न्यायाधीश ने एक मालिक को जिस पर अपने गुलाम को पीटने का आरोप था, बरी करते हुए यह व्याख्या की:
यह कहना गलत है कि मालिक और गुलाम के बीच के संबंध माता-पिता और उनकी संतान के बीच के संबंध जैसे होते हैं। जब माता - पिता अपने पुत्र को कुछ सिखाते हैं, तब उनका उद्देश्य उसे इस योग्य बनाना होता है कि वह एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में अपना जीवन यापन कर सके, और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे उसे नैतिक और बौद्धिक सीख देते हैं। गुलामों के संबंध में स्थिति भिन्न होती है। गुलाम को नैतिक सीख देने का तो अर्थ ही नहीं है। गुलामों की व्यवस्था का उद्देश्य मालिक को लाभ और उसकी सुरक्षा होता है, उसके गुलामों का इससे भिन्न कोई अस्तित्व नहीं होता, उनमें अपने लिए कुछ करने का कोई सामर्थ्य नहीं होता, वे परिश्रम ही करते हैं, लेकिन उसका फल न तो उनको मिलता है, और न उनकी संतान को ऐसे लोगों को क्या नैतिक सीख दी जा सकती है, जिससे उन्हें यह आश्वस्त किया जा सके कि उन्हें सहज भाव से या केवल अपने सुख के लिए परिश्रम करते रहना है, क्योंकि यह असंभव है और शायद ही कोई मूर्ख इसे अनुभव या स्वीकार करेगा, यह कभी सच नहीं हो सकता? ऐसी सेवाएं उसी से अपेक्षित हो सकती हैं, जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती, जो अपनी इच्छाओं को दूसरों की इच्छाओं की पूर्ति में समर्पित कर देता है। ऐसा अनुपालन तभी संभव है, जब शरीर और मन के ऊपर किसी का पूर्ण अधिकार हो। इसके बिना अपेक्षित फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए मालिक को परम अधिकार होना चाहिए, जिससे गुलाम उसके प्रति पूर्ण समर्पित रहे ।
दंड देने के बारे में मालिक के अधिकार की इस प्रकार की व्याख्या का अमरीका में प्रभाव यह हुआ कि न्यायपूर्ण दंड के फलस्वरूप यदि कोई नीग्रो कभी मर जाता, तो कानून उसे संयोग से हुई घटना मात्र मानता था। दंड देने के इस अधिकार का मालिकों ने कितनी निर्दयतापूर्वक प्रयोग किया वह 1787 में एंटीगिना के एक निवासी द्वारा लिखे गए पत्रों के उद्धरणों को पढ़कर अनुभव किया जा सकता है। लेखक कहाता है:
नीग्रो लोगों को पौ फटते ही उठा दिया जाता है और बीस से साठ तक या उससे भी अधिक संख्या में टोलियां बनाकर उन्हें श्वेत निरीक्षकों की देख-रेख में काम पर लगा दिया जाता है। ये लोग यहां कभी स्कॉटलैंड से आकर ठेके पर मजदूर के रूप में काम करते थे, और अपनी लगन और मेहनत से इन बागानों में अक्सर हाकिम बन जाते थे। इन हाकिमों के नीचे इन नीग्रो लोगों से काम कराने वाले होते । ये लोग अधिकतर अश्वेत होते थे, या गोरी व काली नस्ल के भद्दी शक्ल के वर्णसंकर होते हैं। इनको काम पर होते समय कोड़े दिए जाते हैं, जिनसे वे लोगों को दंडित कर सकें, और उन्हें नीग्रो लोगों को जब कभी उन्हें काम में ढिलाई करते देखें, तब उन्हें इन्हीं कोड़ों से मारने का पूरा अधिकार होता है, उन्हें इस बात का कोई ख्याल नहीं रहता कि यह ढिलाई, सुस्ती या थक जाने के कारण है न ही वे इस बात का ख्याल करते हैं कि नीग्रो की उम्र क्या है, या वह पुरुष है या स्त्री । बारह बजे उन्हें अंदर कर लिया जाता है (अर्थात् काम पर से छुट्टी मिल जाती है) जिससे वे फिर काम करने के लिए हरे-भरे हो सकें, साढ़े बारह बजे घंटी बजती है तब वे बाहर निकल पड़ते हैं और अपने काम पर तब तक लगे रहते हैं, जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता।
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इस द्वीप पर गुलामों को जो दंड दिया जाता है, वह तरह- तरह का और अत्यंत यातनापूर्ण होता है । इनमें एक है 'थंबस्कू' अर्थात् अंगूठों को एक-दूसरे पर रखकर मशीन द्वारा दबाना जिससे मर्मान्तक वेदना होती है। 'लोहे की नेकलेस' एक तरह का बड़ा छल्ला होता है, जिसे 'लॉक' करने के बाद गले में डाल दिया जाता है, अक्सर इसके बाद एक और छल्ला डाल दिया जाता है इसे गले में डाल देने के बाद पहनने वाला अपना सिर इधर-उधर मोड़ नहीं सकता है। इनके 'बूट' भी लोहे के लंबे पाइन सरीखे होते हैं, इनका घेरा पूरे चार इंच का होता है और वे घुटनों तक आते हैं। इन गुलामों को ये बूट अवश्य पहनने पड़ते हैं और इन्हें पहन कर ही काम करना पड़ता है। दोपहर के समय गले में लोहे के छल्ले और पैरों में लोहे के बूट पहने शहर की सड़कों पर अक्सर ये दिखाई पड़ जाते हैं 'स्पर' लोहे के छल्ले होते हैं, जो बूट जैसे ही होते हैं। इनमें तीन से चार इंच तक लंबी नुकीली छड़ें लगा दी जाती हैं और इन्हें आड़ा करके रखा जाता है। शरीर के चारों ओर सांकल पहना कर उसे ताले से जकड़ देना इन दलित प्राणियों को सताने का एक और तरीका है।
इन गुलामों के सभी मालिकों को एक की गलती के कारण एक जैसा समझना भयंकर गलती होगी। मालिकों के प्रति गुलामों का अक्सर दोस्ताना रवैया होता और इसी तरह गुलामों के प्रति मालिकों का रवैया भी कृपापूर्ण होता। जो भी हो, यह व्यवस्था पूर्णतः आर्थिक आधार पर आश्रित थी, जिसके कारण यह समझा जाता था कि मनुष्य का सृजन भी एक साधन के रूप में हुआ है और उसका इस्तेमाल मनुष्यता का ख्याल किए बिना किया जा सकता है।
इस बात को पुष्ट करने के लिए और अधिक उदाहरण देने की अब आवश्यकता नहीं है कि अतीत में भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी निम्न, पराधीन और अधिकार–विहीन वर्ग होते थे। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि पृथक वर्ग के रूप में यह पराधीन और अधिकार- विहीन वर्ग लुप्त हो गए और समाज का अभिन्न अंग बन गए। प्रश्न है, अस्पृश्यता क्यों कर नहीं लुप्त हुई ?
इसके अनेक कारण है। इन पर अगले अध्यायों में चर्चा की जाएगी।