अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
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हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव
जिन परिस्थितियों में हिंदुओं ने अस्पृश्यों के विरुद्ध हिंसा तक का सहारा लिया है, वे परिस्थितियां सभी को समान स्वतंत्रता की चाहत की रही हैं। अगर अस्पृश्य अपना जुलूस निकालना चाहते हैं, तब उन्हें हिंदुओं के द्वारा जुलूस निकालने पर कोई एतराज नहीं होता। अगर अस्पृश्य सोने और चांदी के जेवर पहनना चाहते हैं, तब हिंदुओं को भी वैसा ही अधिकार रहे, इस पर वे कोई एतराज नहीं करते। अगर अस्पृश्य अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहते हैं, तब वे हिंदुओं के बच्चों को शिक्षा की पूरी आजादी होने का विरोध नहीं करते। अगर अस्पृश्य कुएं से पानी भरना चाहते हैं, तब हिंदुओं के द्वारा पानी भरने के अपने अधिकार का उपयोग किए जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। इन सबका कोई अंत नहीं। यहां इन्हें गिनाने की जरूरत नहीं है। सीधी-सी बात है। वह यह है कि अस्पृश्य जो स्वतंत्रता चाहते हैं, वह सिर्फ अपने लिए नहीं है, और वह हिंदुओं के समान स्वतंत्रता के अधिकार से भिन्न नहीं है। तब हिंदू ऐसी इच्छाओं को जो किसी को हानि नहीं पहुंचाती और जो पूर्णत: न्यायसंगत हैं, अमल में न आने देने के लिए हिंसा पर क्यों उतर आते हैं? हिंदू अपने अन्याय को न्यायसंगत क्यों मानते हैं, कौन यह इंकार कर सकता है कि अस्पृश्यों के साथ हिंदुओं के व्यवहार में जो कुछ अपकर्म होता है, उसे सामाजिक अपराध के अतिरिक्त और कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती। यह केवल अन्याय नहीं है, यह केवल तिरस्कार नहीं है। यह मनुष्य की मनुष्य के प्रति घोर अमानवीयता है। अगर किसी डाक्टर के द्वारा मरीज का इसलिए इलाज न करना कि मरीज अस्पृश्य है, अगर हिंदुओं के एक गिरोह द्वारा अस्पृश्यों के घरों को जला डालना, अगर अस्पृश्यों के कुओं में मैला डलवा देना अमानवीय कार्य नहीं है, तब मैं सोचता हूं कि यह और क्या है? प्रश्न यह है कि हिंदुओं में विवक क्यों नहीं है ?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है। अन्य देशों में वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृष्टि के आधार पर बने । गुलामों और खेतिहर गुलामों की धर्म में कोई व्यवस्था नहीं थी। इसकी अपेक्षा अस्पृश्यता मुख्यत: धर्म पर आधारित है, हालांकि इससे हिंदुओं को आर्थिक लाभ होता है। जब कभी आर्थिक या सामाजिक हित की बात होती है, तब कुछ भी पवित्र या अपवित्र नहीं होता। ये हित समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। गुलाम - प्रथा और खेतिहर गुलाम - प्रथा क्यों कर मिट गई और अस्पृश्यता क्यों कर नहीं मिटी, इसका यही स्पष्ट कारण है। दो अन्य प्रश्नों का भी यही उत्तर है। अगर हिंदू अस्पृश्यता का पालन करता है, तो यह इसलिए कि उसका धर्म उसे ऐसा करने का आदेश देता है। अगर उसकी इस स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले अस्पृश्यों का वह नृशंसतापूर्वक और अन्यायपूर्वक दमन करता है, तब उसका कारण उसका अपना धर्म है, जो उसे केवल इस बात की ही शिक्षा नहीं देता कि यह स्थापित व्यवस्था दैवी विधान है और इसलिए पावन है, बल्कि उस पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी आरोपित करता है कि उसे इस स्थापित व्यवस्था का हर संभव उपाय से कायम रखना है। अगर वह मानवता की पुकार को नहीं सुनता, तब उसका कारण यह है कि उसका अस्पृश्यों को मानव समझने के लिए उसे बाध्य नहीं करता। अगर अस्पृश्यों को मारने-पीटने उनके घरों को लूटने तथा जलाने और उन पर अत्याचार करते समय उसे अपने विवके का कुछ भी ध्यान नहीं रहता, तब उसका कारण यह है कि उसका धर्म उसे इस बात की शिक्षा देता है कि इस सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए किया गया कोई भी कर्म पाप कर्म नहीं है।

अधिकांश हिंदू कह सकते हैं कि ऐसा कहना तो उनके धर्म की हंसी उड़ाना है । इस आरोप का उत्तर देने का सबसे अच्छा उपाय हिंदू समाज के निर्माता मनु के कथन, जो उसके ग्रंथ 'मनुस्मृति' के अध्यायों व श्लोकों में दिए गए हैं, उद्धत करना है। मैंने जो कुछ कहा है, उसका अगर कोई खंडन करता है तो उसे अस्पृश्यता के विषय में मनु की निम्नलिखित व्यवस्थाओं को पढ़ना चाहिए:
1. इस पृथ्वी पर जो भी जातियां उस समुदाय से अलग रखी गई हैं जो मुख, बाहु, जंघा और ( ब्राह्मण के ) पैरों से जन्मी हैं, वे दस्यु कहलाती हैं, जो चाहे म्लेच्छों (बर्बर जातियों) की भाषा बोलती हों या आर्यों की - (मनु 10.45.)
2. ये जातियां प्रसिद्ध वृक्षों और श्मशान भूमि के निकट या पर्वतों पर और झाड़ियों के पास निवास करें, (कुछ चिह्नों से ) जानी जाएं और अपने विशिष्ट व्यवसाय से जीविकोपार्जन करें - (वही, 10.50 )
3. लेकिन चांडालों और श्वपचों के घर गांव के बाहर होंगे और उन्हें अपपात्र बनाया जाना चाहिए और उनकी संपत्ति कुत्ते और गधे होंगे - वही, ( 10. 51.)
4. मृतक के वस्त्र इनके वस्त्र होंगे, वे टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करेंगे, उनके गहने काले लोहे के होंगे और वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते रहेंगे - (वही, 10.52. )
5. धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति इन लोगों के साथ व्यवहार न रखे और उनके व्यवहार उनके अपने ही समुदाय में होंगे और विवाह समान व्यक्तियों के साथ ही होंगे- (वही, 10.53.)
6. उनका भोजन (आर्य दाता के अतिरिक्त) अन्य के द्वारा टूट-फूटे बर्तन में दिया गया होगा, रात्रि के समय वे गांवों और नगरों के आस-पास नहीं जाएंगे (वही, 10.54. )
7. दिन में वे, राजा के द्वारा चिह्नों से अंकित हो जिससे वे अलग-अलग पहचाने जा सकें, अपने-अपने काम के लिए जाएंगे और उन व्यक्तियों के शवों को ले जाएंगे जिनके कोई सगे-संबंधी नहीं हैं, यही शास्त्र सम्मत मर्यादा है- (वही, 10.55. )
8. वे राजा का आश होने पर अपराधियों का वध कानून में विहित विधि के अनुसार हमेशा करेंगे और वे अपने लिए (ऐसे) अपराधियों के वस्त्र, शैया और आभूषण प्राप्त करेंगे - (वही, 10.56.)
9. जो भी व्यक्ति निम्नतम जातियों की किसी स्त्री के साथ संबंध रखता है, उसका वध कर दिया जाएगा - (विष्णु 5.43.)
10. अगर कोई व्यक्ति जिसको (चांडाल या किसी अन्य निम्न जाति का होने के कारण ) स्पर्श नहीं किया जाना चाहिए, जान-बूझकर अपने स्पर्श से ऐसे व्यक्ति को अपवित्र करता है, जो द्विज जाति का होने के कारण (केवल द्विज व्यक्ति द्वारा ही ) छुआ जा सकता है, तो उसका वध कर दिया जाएगा - (विष्णु, 5.10 )
क्या कोई व्यक्ति मनु की इन व्यवस्थाओं को पढ़कर यह इंकार कर सकता है कि हिंदुओं में अस्पृश्यता की भावना को चिरस्थाई बनाने और अस्पृश्यों के प्रति उनके मन में न्यायरहितता और विवेकशून्यता उत्पन्न करने के लिए धर्म एकमात्र कारण नहीं है? निश्चय ही, अगर इन दस व्यवस्थाओं के साथ अपकर्मों को जोड़ दिया जाए, जिनका ब्यौरा इस पुस्तक के आरंभिक अध्यायों में दिया जा चुका है, तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि अस्पृश्यों के साथ हिंदू जो बर्ताब करते हैं, वह ऐसा कर मनु की व्यवस्थाओं का ही पालन करते हैं। अगर हिंदू किसी अस्पृश्य का स्पर्श नहीं करता है और अगर वह किसी अस्पृश्य द्वारा स्पर्श कर लिया जाने पर इसे उसका अपराध मानता है, तब वह ऐसा उपर्युक्त पांचवी और दसवीं व्यवस्था के कारण करता है। अगर हिंदू अस्पृश्यों के पृथक रहने पर जोर देता है, तब वह ऐसा तीसरी व्यवस्था के कारण करता है। अगर हिंदू अस्पृश्य को साफ कपड़े और सोने के जेवर नहीं पहनने देता, तब वह आठवीं व्यवस्था का ही तो पालन करता है। अगर हिंदू किसी अस्पृश्य द्वारा संपत्ति और धन अर्जित किया जाना सहन नहीं कर सकता, तब वह तीसरी व्यवस्था का पलन करता है।
वस्तुतः इस बारे में और अधिक तूल देने की कोई आवाश्यकता नहीं। यह निर्विवाद है कि अस्पृश्यों के दुर्भाग्य का मुख्य कारण हिंदू धर्म और उसकी शिक्षाएं हैं। जहां तक गुलाम-प्रथा का संबंध गैर-ईसाई धर्म व ईसाई धर्म से और अस्पृश्यता का संबंध हिंदू धर्म से है, इन दोनों के बीच तुलना करने से यह पता चल जाएगा कि इन दोनों धर्मों का मानव संस्थाओं पर कितना भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ा है। अगर पहले धर्म से मानव समाज का उत्थान हुआ है, तो हिंदू धर्म के कारण मानव समाज का कितना अधिक पतन हुआ है। जो लोग अक्सर गुलाम-प्रथा के साथ अस्पृश्यता की तुलना करते हैं, वे यह नहीं सोचते कि वे विरोधी स्थितियों की परस्पर तुलना कर रहे हैं। कानून के अनुसार गुलाम स्वतंत्र व्यक्ति नहीं था, तो भी सामाजिक दृष्टि से उसे वह सारी स्वतंत्रता प्राप्त थी, जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक थी। इसकी अपेक्षा एक अस्पृश्य व्यक्ति कानून के अनुसार स्वतंत्र व्यक्ति तो है, फिर भी सामाजिक तौर पर उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कोई भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।
यह निश्चय ही एक ऐसी विरोधपूर्ण स्थिति है, जो साफ नजर आती है। इस विरोधपूर्ण स्थिति का क्या कारण है? इसका एक ही कारण है, और वह यह है कि वहां धर्म गुलामों के पक्ष में था, जब कि यहां यह अस्पृश्यों के विपक्ष में है। रोम के कानून में यह घोषित किया गया कि गुलाम की कोई व्यक्तित्व सत्ता नहीं है। लेकिन रोम के धर्म ने इस सिद्धांत को कभी भी स्वीकार नहीं किया और उस सिद्धांत को किसी भी हालत में सामाजिक क्षेत्र में लागू करना स्वीकार नहीं किया। उसने गुलाम को मित्र होने योग्य समझकर उसके साथ मानवोचित व्यवहार किया। हिंदू कानून में यह घोषित किया गया कि अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व नहीं है। गैर-ईसाई धर्म के विपरीत, हिंदू धर्म ने इस सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसे सामाजिक क्षेत्र में लागू भी कर दिया। चूंकि हिंदू कानून ने अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व स्वीकार नहीं किया, इसलिए हिंदू धर्म ने उसे मानव नहीं माना कि वह मित्रता के योग्य हो सकता।
इसका कोई प्रश्न ही नहीं होता कि कानूनी तौर पर निचला दर्जा दिए जाने पर रोम के धर्म ने गुलाम की सामाजिक अवनति से रक्षा नहीं की। उसने इस अवनति से उसकी रक्षा तीन भिन्न-भिन्न रीतियों से की। रोम के धर्म ने उसकी रक्षा जिन तीन रीतियों से की, उनमें एक तो यह थी कि रोम के धर्म ने अपने यहां गुलाम को पवित्रतम पद पर प्रतिष्ठित होने के लिए अपने सभी दरवाजे खुले रखे। जैसा कि कहा गया है:
रोम का धर्म कभी भी गुलामों के विरुद्ध नहीं रहा। उसने अपने पूजास्थलों के द्वार उनके लिए कभी भी बंद नहीं किए। उसने उन्हें अपने उत्सवों में भाग लेने से कभी नहीं रोका। यदि कुछ अनुष्ठानों में सम्मिलित होने पर गुलामों पर प्रतिबंध था, तो वैसा ही प्रतिबंध मुक्त गुलामों (पुरुष और स्त्रियों) पर भी था - पुरुषों पर बोना दिया, वेस्ता और केरस अनुष्ठान में सम्मिलित होने पर प्रतिबंध था, तो एरा मैक्सिमा में हरक्यूलिस नामक अनुष्ठान स्त्रियों के लिए वर्जित था। जब रोम के निवासी अपने प्राचीन देवताओं से अपने लिए आशीर्वाद मांगा करते थे, तब वे अपने गुलामों को भी अनौपचारिक रूप से अपने परिवार के अंग के रूप में सम्मिलित कर लेते थे और वे अपने को उस परिवार के देवी- देवताओं के संरक्षण में आया समझते थे। आगस्टन ने यह आदेश दिया कि मुक्त की हुई गुलाम स्त्रियों को बेस्ता में पादरिन बनने योग्य समझा जाना चाहिए। कानून इस बात पर बल देता था कि गुलाम की कब्र को पवित्र स्थल माना जाए और रोम की धार्मिक कथाओं में उसकी आत्मा के लिए अलग से किसी विशेष स्वर्ग या नरक का प्रावधान नहीं किया गया। जुनेरल यह स्वीकार करता है कि गुलाम का शरीर और उसकी आत्मा उन्हीं तत्वों से बनी है, जिनसे उसके मालिक का शरीर और आत्मा बनी है।
रोम के धर्म ने गुलामों की जिस दूसरी रीति से सहायता की वह यह कि उसने गुलामों को नगर प्रमुख (सिटी प्रीफेक्ट) के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करने के योग्य समझा, जिसका काम गुलामों पर उनके मालिकों के द्वारा किए जाने वाले अत्याचार के मामलों की सुनवाई करना हो गया । वह धर्मनिरपेक्ष उपाय था । एक और बढ़िया उपचार रोम के धर्म ने यह किया कि गुलाम पूजा गृह में जाकर यह निवेदन कर सकता था कि उसे किसी अधिक दयालु मालिक के हाथ बेच दिया जाए।
रोम के धर्म ने जिस तीसरी रीति से गुलामों की रक्षा की वह यह थी कि उसने रोम के कानून को उसके मानव होने के औचित्य को नष्ट करने नहीं दिया । उसने उसे मानव समाज और मानव मैत्री के अयोग्य नहीं घोषित किया। रोम के गुलामों के लिए यह एक बड़ी नजात थी । कल्पना कीजिए कि यदि रोम का समा गुलामों के हाथ से सब्जी दूध और मक्खन न खरीदता, उनके हाथ का छुआ पानी या शराब न पीता कल्पना कीजिए कि यदि रोम का समाज गुलामों से छूतछात बरतता, उन्हें अपने घरों में न घुसने देता वाहनों में उन्हें साथ न बैठाता आदि तो क्या उनके मालिकों के लिए यह संभव होता कि वे उन्हें अर्ध जंगली स्थिति से ऊपर उठाकर सभ्य बना लेते। स्पष्टतः कदापि नहीं । कारण यही था कि गुलाम को अस्पृश्य बनाकर नहीं रखा गया, इसलिए मालिक ने प्रशिक्षित करके उसे ऊंचा उठाया। हम फिर उसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, अर्थात् गुलाम को इसलिए बचाया जा सका क्योंकि समाज द्वारा उसके व्यक्तित्व को मान्यता दी गई और अस्पृश्य की बरबादी का कारण यही था कि हिंदू समाज ने उसके व्यक्तित्व को मान्यता नहीं दी। उसे गंदा और गलीज माना, जिसके कारण वह बराबर में बिठाए जाने या व्यवहार रखे जाने योग्य नहीं रहा ।
कोई सामाजिक या धार्मिक खाई नहीं थी, जो गुलाम को शेष समाज से अलग रखती। बाहर से देखने-सुनने में वह मुक्त गुलाम (फ्रीमैन ) से भिन्न नहीं था । रंग या कपड़ों से उसकी स्थिति का पता नहीं चलता था, वह मुक्त गुलाम की तरह सभी खेल-तमाशों को देख सकता था, वह नगर के जन-जीवन में भाग ले सकता था और राज्य की नौकरियों में नियुक्त हो सकता था, वह व्यापार और वाणिज्य में भाग ले सकता था, जैसे कि अन्य मुक्त गुलाम भाग लेते थे। अक्सर देखा गया कि व्यक्ति के लिए बाहर - बाहर दिखने वाली प्रातिभासिक समानता का महत्व उन अधिकारों से अधिक होता है, जो उसे कानून के तहत प्राप्त होते हैं। गुलाम और मुक्त गुलाम के बीच सामाजिक सीमा अक्सर मिट जाती होगी। गुलाम और मुक्त गुलाम तथा मुक्त गुलाम और गुलाम के बीच विवाह संबंध आम बात थी । गुलाम होने की स्थिति उस व्यक्ति के लिए कलंक नहीं रह गई, जो गुलाम होता था । वह स्पृश्य था और आदरणीय भी। यह सब गुलामों के प्रति रोम के धर्म के दृष्टिकोण के कारण हुआ।
गुलाम - प्रथा के संबंध में ईसाई धर्म के रवैये के विषय में विस्तार से लिखने के लिए यहां स्थान नहीं है। परंतु वह गैर-ईसाई धर्म से भिन्न था। बहुत से लोगों को इस बात का पता नहीं है कि अमरीका में गुलाम - प्रथा के दिनों में ईसाई पादरी किसी गुलाम को ईसाई धर्म में दीक्षित करने के लिए तैयार नहीं होते थे, क्योंकि उनका विचार था कि यदि गुलामों को दीक्षित किया गया और वे गुलाम ही बन रहे, तो इससे ईसाई धर्म का स्तर गिर जाएगा। उनका विचार था कि कोई ईसाई दूसरे ईसाई को गुलाम बनाकर नहीं रख सकता । उसे दूसरे ईसाई को बराबरी का दर्जा देना पड़ जाएगा।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कानून और धर्म, दो ऐसे तत्व हैं जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। कभी-कभी तो उनका चोली-दामन का साथ होता है और कभी-कभी वे एक-दूसरे की खामियों को सुधारने का काम भी करते हैं। इन दोनों तत्वों में कानून का संबंध व्यक्ति से है, जब कि धर्म निवैयक्तिक होता है। कानून क्योंकि व्यक्ति पर आधारित है, इसलिए वह अन्याय और असमानता का कारण हो सकता है। परंतु धर्म के साथ यह बात नहीं है, इसलिए वह निष्पक्ष रह सकता है। यदि धर्म निष्पक्ष होगा, तो वह कानूनी असमानता को दूर करने की क्षमता रखता है। रोम में गुलामों के संबंध में ऐसा ही हुआ । इसी कारण धर्म के विषय में यह कहा जाता है कि वह मनुष्य को उदात्त बनाने के लिए है, न कि उसें अवनत करने के लिए। हिंदू धर्म एक अपवाद है । इसने अस्पृश्यों को अध: प्राणी बना दिया। इसने हिंदू को अमानुषिक बना दिया । इस अधः प्राणी की स्थापित व्यवस्था से और न अमानुषिकता से ही त्राण पाने का कोई उपाय दीखता है।