अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
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हिंदू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास
हिंदू समाज-सुधारकों में कुछ उदारवादी भी हैं। इस वर्ग का कहना है कि अस्पृश्यता हिंदुओं की जातिप्रथा से भिन्न है। इस सिद्धांत के आधार पर वे कहते हैं कि जातिप्रथा नष्ट किए बिना भी अस्पृश्यता दूर हो सकती है। धर्मनिष्ठ हिंदू अस्पृश्यता दूर करने का उतना ही विरोधी है, जितना कि वह जातिप्रथा को दूर करने के विरुद्ध है। वह दो चरणों में समाज-सुधार का उतना ही विरोधी है, जितना कि वह एक चरण में समाज के सुधार का विरोधी है। परंतु राजनीति के खिलाड़ी हिंदुओं को यह विचार बहुत पसंद है। साफ तौर पर इसके दो कारण हैं। पहली बात तो यह है कि इस प्रकार उसे संसार को यह दिखाने का अवसर मिलता है कि वह लोकतंत्र का सबसे बड़ा समर्थक है। दूसरी बात यह है कि अगर वह जातिप्रथा का विरोध नहीं करता है, तब सवर्ण हिंदुओं द्वारा कांग्रेस को छोड़ने का कोई भय नहीं रह जाता।
जो लोग जातिप्रथा को दूर किए बिना अस्पृश्यता निवारण की बात करते हैं, वे अपने तर्क की पुष्टि में 'मनुस्मृति' के दसवें अध्याय के चौथे श्लोक को उद्धत करते हैं। इस श्लोक में मनु केवल चार वर्ण बताता है। कोई पंचम वर्ण है ही नहीं। इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया जाता है कि अस्पृश्य लोग शूद्रो की ही श्रेणी में हैं और जब शूद्रों को न छूने का कोई विधान नहीं है, तब अस्पृश्यों को छूने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह व्याख्या राजनैतिक हिंदुओं को चाहे जितनी अच्छी लगे, लेकिन मनु के अभिप्राय से यह भी व्याख्या मेल नहीं खाती। इस श्लोक की व्याख्या अन्य प्रकार की भी हो सकती है और इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि मनु चातुर्वर्ण्य का विस्तार नहीं चाहता था और इन समुदायों को मिलाकर पंचम वर्ण की व्यवस्था के पक्ष में नहीं था, जो चारों वर्णों से बाहर थे। यह कहकर कि पंचम वर्ण नहीं है, वह यह बताना चाहता है कि जो चातुर्वर्ण्य से बाहर हैं, उन्हें वह पांचवा वर्ण बनाकर हिंदू समाज में शामिल नहीं करना चाहता था। इस बात को उसने स्पष्ट रूप से कहा है, जब वह वर्ण - बाह्य 1, लोगों का जिक्र करता है, जिसका अर्थ है वे लोग, जो वर्ण-व्यवस्था से बाहर हैं। यदि मनु सभी लोगों को चार वर्णों में रखना चाहता, तो वर्ण - बाह्य कहने की जरूरत ही क्या थी? वर्ण - बाह्य में भी वह दो श्रेणियां रखना चाहता था। उसने इन्हें हीन 2 और अन्त्येवासी 3 कहा है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि उक्त श्लोक का जैसा भाष्य प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है, उससे कट्टरपंथी हिंदुओं को भ्रम में नहीं डाला जा सकता कि अस्पृश्यता 'मनुस्मृति' से मेल नहीं खाती और इसका उन्मूलन हिंदू विधान के प्रतिकूल नहीं है ।

मनु के श्लोक की उक्त व्याख्या पर आश्रित तर्क सामान्य और अशिक्षित हिंदू की समझ से परे है। वह तो केवल दो बातें जानता है। एक तो यह कि सामाजिक व्यवहार में तीन प्रकार के बंधन हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। वे हैं- (1) जातियों के बीच आपस में खान-पान निषिद्ध, (2) जाति के बाहर बेटी व्यवहार वर्जित, और (3) कुछ जातियों के लोगों के छू जाने पर भी परहेज । पहले दो प्रतिबंधों से जाति बनती है और तीसरे प्रतिबंध से अस्पृश्यता का जन्म होता है । सवर्ण हिंदू को प्रतिबंधों की संख्या से कोई गुरेज नहीं। वह प्रतिबंध के आचरण पर विशेष ध्यान रखता है। जब उससे इन प्रतिबंधों का अनुपालन नहीं करने के लिए कहा जाता है, तब वह पलट कर पूछ बैठता है, क्यों? वह कहता है, 'जब मैं पहले दो प्रतिबंधों को मानता हूं तो तीसरे का अनुपालन करने में क्या हर्ज है।' मनौवैज्ञानिक रूप में जातिप्रथा और अस्पृश्यता आपस में गुंथी हुई हैं और एक ही सिद्धांत पर आधारित हैं। यदि कोई सवर्ण हिंदू छूतछात बरतता है, तो इसका अर्थ है कि वह जाति में यकीन रखता है।
यदि इस दृष्टि से विचार किया जाए, तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि जातिप्रथा को समाप्त किए बिना अस्पृश्यता के विनाश की आशा करना बालू की भीत बनाना है । यह विचार कि जातिप्रथा और अस्पृश्यता, दोनों अलग-अलग हैं, एक दिवा स्वप्न है। दोनों एक ही हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। अस्पृश्यता, जातिप्रथा का ही परिणाम है। दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों का चोली-दामन का साथ है।
1. मनुस्मृति, 10.28
2. वही, 10.31.
3. वही, 10.39.
एक अन्य कारण भी है, जिससे किसी भी कानूनी या बौद्धिक तरीके से अस्पृश्यता को मिटाया नहीं जा सकता। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि हिंदू समाज-व्यवस्था सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता के सिद्धांत पर आधारित है। यदि यह कहा जाए कि कुछ लोग ही इस सिद्धांत की इस विशिष्टता को समझते हैं, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि कोई समाज सामाजिक असमानता पर आधारित है तो वह उस समाज से बिल्कुल भिन्न है, जो सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता पर आधारित है। पहले प्रकार का समाज एक ढुलमुल व्यवस्था है, जो आत्म-सुरक्षा में सक्षम नहीं है, जब कि दूसरे प्रकार का समाज अपने अस्तित्व को बनाए रखने में पूर्णतः सक्षम है। जो सामाजिक व्यवस्था असमानता पर आधारित होती है, उसमें निचले वर्ण के लोग इस व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए एक-दूसरे के साथ एकजुट हो सकते हैं। उस व्यवस्था को बनाए रखने में किसी की भी रुचि नहीं होती। उस सामाजिक व्यवस्था पर सामूहिक प्रहार की संभावना नहीं होती, सीढ़ी दर सीढ़ी असमानता पर आधारित होती है, क्योंकि सभी पक्षों का दुख-द -दर्द समान नहीं होता है। यह तो तभी हो सकता है जब केवल ऊंचे और नीचे का भेदभव हो। इस सीढ़ीनुमा व्यवस्था में शीर्ष पर ब्राह्मण हैं । सर्वोच्च से नीचे उच्चतर क्षत्रिय हैं। उच्चतर से नीचे उच्च वैश्य हैं। उच्च से नीचे निम्न अर्थात् शूद्र है और निम्न से नीचे अर्थात् जो निम्नतर हैं, वे अस्पृश्य हैं। उच्चतम से सभी को गिला है और सभी उसका पतन चाहेंगे। पर नीचे वाले एकजुट नहीं हो सकते। उच्चतर वर्ग उच्चतम वर्ग से पिंड छुड़ाना चाहता है, परंतु वह उच्च निम्न और निम्नतर वर्ग के कंधे से कंधा नहीं मिला सकता कि कहीं वे उसके बराबर न हो जाएं। उच्च वर्ग को गिरा देना चाहता है जो उसके ऊपर है, परन्तु वह निम्न और निम्नतर से नहीं मिलेगा कि कहीं वे उसके बराबर का दर्जा न पा जाएं। निम्न वर्ग उच्चतम, उच्चतर और उच्च वर्ग से छुटकारा पाना चाहेगा, परंतु निम्नतर से उसकी पटरी नहीं बैठेगी कि कहीं निम्नतर निम्न का दर्जा न पा ले। सीढ़ीनुमा समाज में सिवा इसके कि जो सामाजिक पिरामिड में सबसे नीचे है, कोई भी पूरी तरह विशेषाधिकारों से वंचित नहीं है। दूसरों को श्रेणीगत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। यहां तक कि निम्न को भी निम्नतर की तुलना में विशेषाधिकार प्राप्त हैं। चूंकि हर वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त हैं, अतः हर वर्ग उस व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है ।
अस्पृश्यता अस्पृश्यों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वह हिंदुओं के लिए एक वरदान है। इससे उन्हें एक ऐसा वर्ग मिलता है, जिसकी अपेक्षा वह अपने को श्रेष्ठ समझ सकते हैं। हिंदू ऐसा समाज नहीं चाहते, जिसमें कोई भी 'कुछ' न हो। वे ऐसा समाज भी नहीं चाहते जिसमें हर कोई ‘कोई' कुछ भी बन सके। वे तो ऐसा समाज चाहते हैं, जिसमें वे ही कुछ हों और बाकी लोग कुछ भी न हों। अस्पृश्य 'कुछ भी नहीं हैं लोगों का वर्ग है। इससे हिंदू ‘कुछ' हो जाते हैं। अस्पृश्यता हिंदुओं के सहज गर्व को बनाए रखती है और उन्हें ऐसा अनुभव करने का अवसर प्रदान करती है कि वे अपने को बड़ा अनुभव करने के साथ बड़े दिखें भी। यह एक अन्य कारण है, जिससे हिंदू उन लोगों के प्रति अस्पृश्यता को नहीं त्यागना चाहते हैं, जो बहुतांश तो हैं, लेकिन वे छोटे लोग है।
अस्पृश्यता तभी दूर हो सकेगी, जब संपूर्ण हिंदू सामाजिक व्यवस्था, विशेष रूप से जातिप्रथा विलीन हो जाए। क्या यह संभव है ? प्रत्येक संस्था का कोई कोई आधार होता है। ये आधार तीन प्रकार के होते हैं, जो किसी संस्था को जीवन प्रदान किए रहते हैं। ये आधार हैं-कानूनी, सामाजिक और धार्मिक संस्था का स्थायित्व उसके अपने आधार की शक्ति पर निर्भर करता है। जातिप्रथा के आधार की प्रकृति कैसी है? दुर्भाग्य से जातिप्रथा का आधार धार्मिक है। जातिप्रथा, वर्ग-व्यवस्था का नया संस्करण है, जिसे वेदों से आधार मिलता है। वेद हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ हैं और अकाट्य हैं। मैं इसे दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए कहता हूं कि जिस किसी का आधार धर्म होता है, वह इस कारण ही पवित्र और सनातन बन जाता है। हिंदुओं के लिए जातिप्रथा पवित्र है और सनातन है । यदि जातिप्रथा विलीन नहीं हो सकती, तब यह आशा किस प्रकार की जाए कि अस्पृश्यता विलीन हो जाएगी ?