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अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar

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26 मे 2023
Book
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प्रशासन का दृष्टिकोण

भारतीय दंड संहिता की धारा 2 के अनुसार:

     प्रत्येक व्यक्ति जो ब्रिटिश भारत की सीमा में इस संहिता के प्रावधानों के प्रतिकूल प्रत्येक कार्य या त्रुटि के लिए दोषी होगा, वह इस संहिता के अधीन, न कि अन्यथा दंड का भागी होगा।

    जिन विधि आयुक्तों ने दंड संहिता का मसौदा तैयार किया था, उन्होंने सेक्रेटरी आफ स्टेट को लिखे अपने पत्र से 'प्रत्येक व्यक्ति' शब्दों पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता पर बल दिया था। वे अपनी टिप्पणी में लिखते हैं:

    महोदय, आप देखेंगे कि हमने इस संहिता के प्रभाव क्षेत्र से किसी भी स्वायत्तशासी प्राचीन रजवाड़ों को जो कंपनी की राज्य-सीमा में रहते हैं, मुक्त रखने का प्रस्ताव नहीं किया है। यह अपवाद होना चाहिए अथवा नहीं, यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर हम तब तक कुछ नहीं कह सकते, जब तक हमें मौजूदा संधियों के बारे में, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में जिस अर्थ में वह समझी गईं, समझौतों के इतिहास की, संबंधित परिवारों की मनोवृत्ति और उनकी शक्ति और उन परिवारों के प्रति वहां की जनता की भावनाओं के बारे में उससे भी अधिक सटीक जानकारी न हो जितनी कि हमें है। अत्यंत आदरपूर्वक हम यही निवेदन करना चाहते हैं कि इस प्रकार जो भी अपवाद होगा, वह एक बुरी बात होगी, इससे और भी बुरी बात यह है कि जनता से यह कहा जाए कि वह कानून से ऊपर होने की स्थिति को उच्च और विशेषाधिकार के रूप में ग्रहण करे, यह विशेषाधिकार जितने अधिक समय तक दिए जाते रहेंगे, उतना ही इन्हें वापस लेना कठिन होता जाएगा, इन्हें वापस लेने का इससे अच्छा अवसर कब आएगा जब सरकार एक नई संहिता लागू करने जा रही है, जो सभी जातियों और धर्मों के लोगों पर लागू होगी, हमें इस बात में संदेह है कि समान न्याय की अपेक्षा कोई अन्य तत्व भी है जिसे अधिक वरीयता दी जानी चाहिए, सिवाय उस जन - आस्था के जिसकी हमने प्रतिज्ञा कर रखी है।

   शायद यह कल्पना की गई होगी कि समान न्याय का सिद्धांत स्थापित व्यवस्था को ध्वस्त कर देगा। पर सच बात तो यह है कि स्थापित व्यवस्था की बाल भी बांका नहीं हुआ और इसके बावजूद वह उसी तरह से कार्यान्वित हो रही है, . जैसे वह पहले होती थी। प्रश्न किया जा सकता है कि समान न्याय का सिद्धांत अपना प्रभाव डालने में विफल क्यों रहा। इसका जवाब सीधा है। न्याय के सिद्धांत की उद्घोषणा करना एक बात है और इसे प्रभावशाली बनाना दूसरी बात है । समान न्याय का सिद्धांत कारगर होता है या नहीं, यह आवश्यक रूप से प्रशासनिक अधि कारियों के स्वभाव और आचरण पर निर्भर करता है, जिन्हें इसका पालन करना है। यदि प्रशासनिक पक्ष स्थापित व्यवस्था के प्रति उसी वर्ग का होने के कारण सहानुभूति रखकर उसका पक्ष लेगा और नई व्यवस्था के प्रति वैर भाव रखेगा, तो नई व्यवस्था कदापि लागू नहीं हो सकती। नई व्यवस्था की सफलता के लिए प्रशासन के तदनुरूप होने की आवश्यकता कार्ल मार्क्स द्वारा 1871 में पेरिस नगर परिषद् के गठन के अवसर पर स्वीकार की गई थी और इस सिद्धांत को लेनिन ने सोवियत साम्यवाद के संविधान में लागू किया था। दुर्भाग्य से अंग्रेज सरकार ने प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में कभी ध्यान नहीं दिया । यथार्थ तो यह है कि उसने उन्हीं लोगों के लिए प्रशासन संभालने के द्वार खोल दिए, जो हिंदुओं की स्थापित व्यवस्था में विश्वास रखते हैं, जहां समानता के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में राज तो अंग्रेजों का रहा और शासन हिंदू चलाते रहे। प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में थोड़े से ही आंकड़े इस तथ्य को उजागर कर देंगे।

obstacles in the way of untouchables - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

   भारत की राजधानी से लेकर गांवों तक पूरे प्रशासन पर हिंदू 'कुंडली मारे बैठा है। हिंदू सर्वशक्तिमान की तरह है, जो प्रशासन की शाख पर बैठा है और कोने-कोने में हाथ फैलाए हुए है। कहीं ऐसा सूराख नहीं, जिसमें से घुसकर कोई पुरानी व्यवस्था का विरोधी गुजर सके। कोई भी विभाग हो राजस्व, पुलिस या न्याय, जहां भी देखिए, हिंदू जमे हुए हैं। यदि स्थापित व्यवस्था अब भी चली आ रही है, तो इसका कारण है कि उसे सरकार के हिंदू अधिकारियों का अटूट समर्थन प्राप्त है। हिंदू अधिकारी अपनी योग्यता के आधार पर ही शासन नहीं कर रहे हैं। वे लोगों पर उनकी जाति - कुजाति को ध्यान में रखकर प्रशासन कर रहे हैं। उनका सिद्धांत सभी के लिए एक जैसा न्याय देना नहीं है । स्थापित व्यवस्था के अनुरूप न्याय उनका आदर्श है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि स्थापित व्यवस्था में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति दृष्टिकोण को वे प्रशासन का आधार मानते हैं। प्रशासन के क्षेत्र में अस्पृश्यों के प्रति सरकार के अधिकारियों का जो दृष्टिकोण है, उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है।

    प्रत्येक अस्पृश्य इस बात का गवाह है कि जब कोई अस्पृश्य किसी सवर्ण हिंदू के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पुलिस अधिकारी के पास जाता है तो उसे संरक्षण के स्थान पर ढेर सारी गालियां सुनने को मिलती हैं। या तो उसे बिना रिपोर्ट लिखे भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी लिखी जाती है कि उसमें स्पृश्य को बच निकलने का कोई न कोई रास्ता अवश्य छोड़ दिया जाता है। यदि वह किसी मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा ले जाता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालूम हो जाती है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षड्यंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत में नहीं उठेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह किसी अस्पृश्य को गवाही देने के लिए ले आएगा तो मजिस्ट्रेट गवाही को स्वीकार ही नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि यह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि स्वतंत्र गवाह है भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान सा तरीका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता । वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि उसको पता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच नहीं की है।

    ऐसे भेदभाव होते हैं, इस बात को अब कांग्रेस ने भी स्वीकार कर लिया है। 7 मार्च, 1938 के 'हिंदू' के अंक में प्रकाशित तमिलनाडु हरिजन सेवक संघ की 30 सितम्बर, 1937 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है:

    "इन अधिकारों के कारण दूर-दराज के गांवों में भी हरिजनों में राजनैतिक जागृति आ गई है, जहां केवल पुलिस का राज चलता है और जहां इन अधि कारों की मांग करना हरिजनों के लिए हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि अधि कारों की मांग करने का अर्थ सवर्णों और उनके बीच मारपीट होता है, इस मारपीट में सवर्णों का हाथ ऊपर रहता है। इस मारपीट का स्वाभाविक परिणाम या तो पुलिस में या मजिस्ट्रेट को शिकायत दर्ज कराना होता है । मजिस्ट्रेट को शिकायत करना हरिजन के लिए आर्थिक दृष्टि से संभव नहीं होता और पुलिस में शिकायत करने का नतीजा और भी खराब होता है । अनेक मामलों में इन शिकायतों की कभी कोई जांच नहीं होती, कई अन्य मामलों में सदा सवर्णों के पक्ष में ही निर्णय दर्ज किया जाता है। पुलिस में हमने जो शिकायतें कीं उनका भी यही परिणाम हुआ। हमें ऐसा लगता है कि पुलिस के निचले कर्मचारियों के दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। या तो वे हरिजनों के अधिकारों से नावाकिफ हैं, जिनकी रक्षा करने की उनसे अपेक्षा होती है या वे सवर्णों के प्रभाव में आ जाते हैं। यह भी हो सकता है कि वे बिल्कुल ही उदासीन रहते हैं । अन्य मामलों में अमीर सवर्ण की तरफदारी भ्रष्टाचारवश की जाती है । "

    इससे स्पष्ट है कि हिंदू अधिकारी अस्पृश्यों के कितने विरोधी और हिंदुओं के कितने तफरदार होते हैं। अगर उनके सामने अपने अधिकार या अपने विवके के इस्तेमाल का सवाल उठता है, तब उनका निर्णय अस्पृश्यों के खिलाफ ही होता है।

    पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष्ट होते हैं। अगर वे सिर्फ भ्रष्ट हों तो स्थिति इतनी खराब न हो, क्योंकि जो अधिकारी भ्रष्ट होता है, वह किसी भी पक्ष के द्वारा खरीदा जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षतापूर्ण होते हैं। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण अस्पृश्यों को सुरक्षा और न्याय नहीं मिल पाता। एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो प्रत्येक हिंदू में जन्मजात होती है। पुलिस और मजिस्ट्रेटों को अपनी प्रेरणाओं, हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभूति नहीं होती। वे उस अभाव पीड़ा, लालसा और इच्छाओं से अनुप्राणित नहीं होते, जो अस्पृश्यों को अद्वेलित किए रहती हैं। फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते हैं, प्रगति करने में उनकी सहायता नहीं करते, उनके हित की उपेक्षा करते हैं और ऐसी हर चीज को काट देते हैं, जिसमें अस्पृश्यों को गर्व और आत्म-सम्मान मिल सके। दूसरी ओर वे हिंदुओं का उनके हर काम में साथ देते हैं, उनके साथ पूरी सहानुभूति रखते हैं, जिससे उनकी शक्ति, क्षमता, मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा बनी रहे। जब कभी इन दोनों में संघर्ष होता है, तब वे अस्पृश्यों के इस विद्रोह को कुचलने में हिंदुओं के एजेंट का काम करते हैं और प्रकट रूप से और निर्लज होकर हिंदुओं के हर घिनौने काम में हर संभव, उचित - अनुचित सहायता भी देते हैं, जिससे अस्पृश्यों को उनकी करनी का फल चखाया जा सके और वे ऊपर उठने न पाएं।

     इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और उत्पीड़न कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। कोई हिंदू यह साफ तौर पर कह सकता है कि वह किसी भी अस्पृश्य को नौकरी पर नहीं लगाएगा, वह उसे कुछ भी नहीं बेचेगा, वह उसे अपने खेतों से बेदखल कर देगा, किसी कानून को तोड़े बिना भी वह उसके जानवर अपने खेतों से होकर नहीं जाने देगा। वह ऐसा कर अपने अधिकार का ही उपयोग कर रहा है। कानून को इस बात की परवाह नहीं कि इस सबके पीछे उसका इरादा क्या है। कानून यह नहीं देखता कि इससे उस अस्पृश्य को कितनी हानि हो रही है। पुलिस अपनी शक्ति और अपने अधिकार का दुरुपयोग कर सकती है। पुलिस अधिकारी इस बात को दर्ज कर, जो कही ही नहीं गई या ऐसी बात को दर्ज कर, जो कही गई बात से बिल्कुल भिन्न है, जान-बूझकर अपने रिकार्ड तोड़-मरोड़ सकता है। वह उस पक्ष को गवाहों के नाम-पते आदि बता सकता है, जिसमें उसका स्वार्थ होता है । वह किसी को गिरफ्तार करने से मना कर सकता है। वह किसी मामले को खत्म कर देने के लिए हजार काम कर सकता है। वह यह सब काम पकड़े जाने के डर के बिना कर सकता है। कानून में बहुत-सी कमियां हैं और वह इन कमियों को अच्छी तरह जानता है । मजिस्ट्रेट ने उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह छूट दे रखी है। वह उसका इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह आजाद है। किसी भी मामले का निर्णय गवाहों पर निर्भर करता है, जो गवाही दे सकते हैं। लेकिन मुकदमे का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि क्या गवाहियां विश्वसनीय हैं या नहीं। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह किस पर विश्वास और किस पर अविश्वास करता है। वह किसी भी पक्ष पर विश्वास करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है और वह जो कुछ करता है, वह उसका अपना विवके होता है, कोई उसके इस विवेक का इस्तेमाल करने में दखल नहीं कर सकता है। ऐसे बहुत से मामले हैं, जिनमें मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ किया है। अस्पृश्यों की गवाहियां चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हों, मजिस्ट्रेट सभी मामलों में एक ही बात कह देता है कि 'मुझे गवाहों पर विश्वास नहीं है' और किसी ने भी उसके इस विवेक के बारे में सवाल नहीं किया है। क्या दंड देना है, यह भी मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है । कुछ ऐसे भी निर्णय होते हैं, जिनके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। अगर उचित न्याय नहीं हुआ है, तो उचित न्याय पाने का एक रास्ता यही अपील होती है । मजिस्ट्रेट द्वारा यह कह दिया जाता है कि इस मामले में दिए गए निर्णय के खिलाफ अपील नहीं हो सकती ।

    अगर हिंदू समाज स्थापित व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है, तो वैसा ही सरकार के हिंदू अधिकारी भी कर रहे हैं। इन दोनों ने मिलकर इस स्थापित व्यवस्था को अभेद्य बना दिया है ।