मुख्य मजकूराकडे जा

अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar

Page 18 of 20
26 मे 2023
Book
5,7,1,2,3,,,

     अस्पृश्यों का आंदोलन क्यों सफल नहीं हुआ है? क्या उनके कोई समर्थक नहीं हैं ? यदि हैं, तो वे अस्पृश्यों की सहायता और उनसे सहयोग क्यों नहीं करते? यह बड़ा ही संगत सवाल है और इस सवाल को ठीक-ठाक समझना भी आवश्यक है। इस सवाल का जवाब देने के पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हिंदू समाज का गठन क्या है और उसमें कौन-कौन से वर्ग शामिल हैं ?

isolation problem - dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    हिंदू समाज का ढांचा जटिल है और जिस किसी का जीवन इसके ताने-बाने से जुड़ा नहीं है, उसके लिए इसकी बनावट को समझ पाना कठिन है। हो सकता है कि इसे एक रेखाचित्र की सहायता से समझने में कुछ आसानी हो। इसलिए यहां नीचे मैं एक रेखाचित्र दे रहा हूं। मेरा विचार है कि इससे हिंदुओं के सामाजिक ढांचे को समझने में सुविधा होगी:

Social Structure of Hindus


     इस रेखाचित्र से पता चलता है कि हालांकि हिंदुओं की अनगिनत जातियां हैं। पर उन्हें चार वर्गों में समेटा जा सकता है। इन चार वर्गों में से प्रथम वर्ग शासक वर्ग है और द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ वर्ग शासित लोगों के वर्ग हैं।

     अब हम इस बात पर विचार करें कि इन वर्गों में से कौन से अस्पृश्यों के सहज मित्र हो सकते हैं।

     हिंदू समाज के विशेषाधिकार वाले लोग प्रथम वर्ग में आते हैं। उन्होंने ही हिंदू समाज-व्यवस्था की रचना की। केवल उन्हीं को इस व्यवस्था से लाभ होता है। और इस वर्ग के लोगों का लक्ष्य इस व्यवस्था की रक्षा करना है। दो मित्र और दो संगी-साथी सामुदायिक हित या वैचारिक सामीप्य के कारण एक-दूसरे से असहमत नहीं हो सकते।

     जयराम-पेशा और आदिम जातियों की क्या स्थिति हैं? उनके पास हिंदू समाज-व्यवस्था को उलट देने का सबसे अधिक सशक्त कारण है।

     शूद्रों की क्या स्थिति है ?

     द्वितीय वर्ग यानी शूद्रों के लिए हिंदू समाज - व्यवस्था के नियम उतने ही घृणास्पद हैं, जितने कि चतुर्थ वर्ग यानी अस्पृश्यों के लिए। हिंदू समाज में, जिसकी व्यवस्था उसके नियम-निर्माता मनु ने की है, शूद्रों की स्थिति बड़ी विचित्र है। विषय को सरलता से समझा जा सके, इसके लिए अलग-अलग शीर्षकों के अधीन शूद्रों की स्थिति संबंधी नियम नीचे दिए जा रहे हैं:

     ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों के गृह स्वामियों से मनु कहता है:

     4.61. "वह ऐसे देश में निवास न करें, जहां शूद्र शासक होते हों" ।

     शूद्र को सम्मानीय व्यक्ति नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि मनु ने यह व्यवस्था दी है:

     11.24.–“कोई भी ब्राह्मण यज्ञ करने यानी धार्मिक प्रयोजनों के लिए कभी भी शूद्र से धन नहीं मांगेगा "।

     शूद्र के साथ सभी विवाह संबंध पूर्णतया वर्जित थे । अन्य तीन वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) में से किसी भी वर्ग की स्त्री के साथ विवाह वर्जित था। कोई भी शूद्र उच्च जातियों की किसी स्त्री के साथ किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं रख सकता था, और यदि कोई शूद्र उसके साथ जार कर्म करता है, तो मनु के विचार में वह ऐसा अपराध करता है, जिसके लिए मृत्यु-दंड है।

     8.374. - जिस किसी शूद्र ने किसी उच्च वर्ग की रक्षित या अरक्षित स्त्री के साथ संभोग किया है, उसे निम्नलिखित रीति से दंड दिया जाए, यदि वह अरक्षित थी तब उसका लिंग कटवा दिया जाए, यदि वह रक्षित थी तब उसे प्राण-दंड दिया जाए और उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाए।

     8.20.- कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है, अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निवर्चन कर सकता है, अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कार्य नहीं कर सकता (चाहे वह कितना ही विद्वान क्यों न हो ) ।

     8.21.- जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है उसी की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय का विचार कर सकता है, यह राज्य उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त होता है जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे को धंस जाती है।

     8.272.- अगर कोई शूद्र उद्दतापूर्वक ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का साहस करता है, तब राजा उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवाए। विद्या और ज्ञान के अर्जन के बारे में मनु का आदेश है:

     3. 156. - जो कोई शूद्र शिष्यों को शिक्षा देता है और जिसका गुरु कोई शूद्र है, वह श्राद्ध में निमंत्रित होने के अयोग्य हो जाता है।

     4.99. - उसे शूद्रों की उपस्थिति में वेदों का कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए।

     वेदाध्ययन करने पर शूद्र को कितना कठोर दंड दिया जाए, इस बारे में मनु के उत्तराधिकारी भी उसे मात कर गए। जैसे कि कात्यायन का कहना है कि शूद्र कहीं से भी वेद को सुन ले या वह वेद के एक शब्द के भी उच्चारण करने का साहस कर दे, तब राजा को चाहिए कि वह उसकी जीभ को चिरवा दे और उसके कानों में पिघला सीसा डलवा दे।

     संपत्ति के बारे में शूद्र के लिए मनु की व्यवस्था है:

     10.129.- किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए, चाहे वह इसके लिए कितना ही समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है, उसे उसका मद हो जाता है, और वह अपने उद्धत या उपेक्षापूर्ण व्यवहार से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचाता है।

     8.417. - यदि किसी ब्राह्मण का जीवन संकटग्रस्त हो, तो वह निस्संकोच के धन को अधिग्रहीत कर ले।

     शूद्र का केवल एक ही व्यवसाय है। इस संबंध में भी मनु का एक अकाट्य नियम है। मनु कहता है:

     1.91.- ब्रह्मा ने शुद्र के लिए एक ही कर्तव्य निर्धारित किया है कि वह विनम्रतापूर्वक इन तीन जातियों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करे |

     10.21.- यदि कोई शूद्र ( ब्राह्मणों की सेवा के द्वारा) अपना जीवन-निर्वाह करने में असमर्थ है और जीवन निर्वाह का साधन चाहता है, तब वह किसी धनी वैश्य की भी सेवा कर अपना जीवन - निर्वाह करे ।

     10.122.- लेकिन शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करे चाहे स्वर्ग के लिए हो या चाहे दोनों उद्देश्यों के लिए ( अर्थात् इस जीवन और इससे अगले जन्म के लिए) हो क्योंकि वह जो ब्राह्मण का सेवक कहा जाता है, अपने सभी उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है।

     10.123.- ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करता है, उसका इसे कुछ भी फल नहीं मिलता।

     शूद्र द्वारा सेवा को मनु एक करार मानता है। यदि कोई शूद्र सेवा से इंकार करता है तो सेवा करने के लिए मजबूर किए जाने की भी व्यवस्था है। यह व्यवस्था इस प्रकार है:

     8.413. - ब्राह्मण शूद्र को चाहे तो खरीद कर या खरीदे बिना भी सेवा कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों की सृष्टि ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए की है।

     10.124. - उनको चाहिए कि वे उसकी योग्यता, उसके परिश्रम और यह ध्यान में रखकर कि उसे कितने अश्रितों का पालन-पोषण करना है, अपने परिवार ( की संपत्ति में से) उसके लिए उचित अंश जीवन निर्वाह के लिए नियम करें।

     10.125.- उसके लिए बचा हुआ भोजन और पुराने खाट-बर्तन आदि दिए जाएं।

     मनु की अपेक्षा है कि अन्य सवर्णों के प्रति शूद्र को वाणी और व्यवहार से विनीत होना चाहिए।

     8.270. - जो शूद्र व्यक्ति द्विज को दारुण वचन कह उसकी अवमानना करता है, उसकी जीभ कटवा देनी चाहिए क्योंकि वह नीच कुलोद्भव है।

     8.271. - यदि वह द्विज का नाम और उसकी जाति का उल्लेख अपमान के तौर पर करता है तब उसके मुख में दस अंगुल लंबी दहकती हुई लोहे की कील डाल दी जाए।

     मनु केवल इतने से ही संतुष्ट नहीं है। वह चाहता है कि शूद्र जाति के लोगों के नामों तथा उपनामों से भी शूद्र की दासता व्यक्त हो। मनु कहता है:

     2. 31. - ब्राह्मण के नाम का पहला भाग ऐसा हो जो शुभ हो, क्षत्रिय का शक्ति से संबंधित, वैश्य का संपत्ति से और शूद्र का पहला नाम ऐसा हो जो तिरस्कारणीय भाव का सूचक हो ।

     2.32. - ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा (शब्द) हो जिसमें सुख का भाव निहित हो, क्षत्रिय का ऐसा हो जिसमें रक्षा का भाव और वैश्य का ऐसा हो जिसमें समृद्धि का भाव तथा शूद्र का ऐसा हो जो सेवा कार्य का भाव सूचित करे ।

     जहिर है कि ये तीनों वर्ग (द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ) एक-दूसरे के समर्थक है। वे हिंदू समाज-व्यवस्था को मिटाने के लिए एकजुट हो सकते हैं। पर वे एकजुट नहीं हुए। ऐसा नहीं है कि उन्हें एकजुट करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है। ब्राह्मण जो हिंदू सामाजिक व्यवस्था के निर्माता है और जो इस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभान्वित होने के कारण इसके प्रबलतम समर्थक हैं, उनके प्रभुत्व को नष्ट करने के लिए 1919 - 1935 के बीच सक्रिय गैर-ब्राह्मण पार्टी इनको एक राजनैतिक मंच पर संगठित करने की दिशा में एक प्रयास थी ।

     यह प्रयास इन तीनों वर्गों को संगठित करने का एकमात्र प्रयास नहीं था । एक और प्रयास मजदूर - नेता, खासकर कम्युनिस्ट नेता कर रहे हैं। उनका नारा है कि जाति चाहे जो भी हो, श्रमिक वर्ग के हित एक जैसे हैं। उनमें वर्ग - चेतना और वर्ग एकता लाई ही जानी चाहिए। यदि वे एक बार एकजुट हो जाए तो अपनी संख्या की भयंकर शक्ति के बल पर अर्थ-व्यवस्था को भंग कर सकते हैं, और यदि एक बार अर्थ-व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, तो निश्चय ही हिंदू

     समाज-व्यवस्था चूर-चूर हो जाएगी। लेकिन नतीजा क्या निकला? नतीजा यह है कि लोग संगठित नहीं हुए । 'शूद्र जरायम- पेशा और आदिम जातियां ब्राह्मणों से भी अधिक अस्पृश्यों का विरोध करती हैं। सच तो यह है कि हिंदू समाज-व्यवस्था पर अस्पृश्यों के आक्रमण का सामना करने के लिए शूद्र वस्तुतः ब्राह्मणों के लिए पुलिस की भूमिका अदा करते हैं। यह एक अजीब-सी बात है। लेकिन यह एक हकीकत है। अगर अस्पृश्य इस स्थापित व्यवस्था के नियमों और विनियमों को तोड़ने की कोई कोशिश करते हैं तो उन पर जो अत्याचार किए जाते हैं और जिनका वर्णन पिछले अध्यायों में किया गया है, वे सबके सब शूद्रों के द्वारा किए जाते हैं।

     संगठित न होने के कारणों को खोजना कठिन नहीं है। इसके कारण क्रमिक असमानता की व्यवस्था में मिल सकते हैं, जिसके अनुसार ब्राह्मण सबका सिरमौर बना हुआ है और 'शूद्र' ब्राह्मण के नीचे लेकिन अस्पृश्य से ऊंचे पर हैं। यदि हिंदू समाज-व्यवस्था का आधार सिर्फ असमानता होती तो वह कब की उखाड़कर फेंक दी गई होती। लेकिन वह तो क्रमिक असमानता पर टिकी है। जब शूद्र ब्राह्मण को गिराना चाहता है, तब उस समय वह इस बात के लिए तैयार नहीं होता है कि अस्पृश्य ऊपर उठकर उसकी बराबरी पर आ जाएं। शूद्र ब्राह्मणों द्वारा किए गए घोर अपमान की कड़वी घूंट पीना तो पसंद करता है, पर वह समाज - व्यवस्था को एक समान स्तर पर लाने में अस्पृश्यों का साथ नहीं देता। नतीजा यह है कि अस्पृश्यों के संघर्ष में कोई उनका साथ नहीं देता। अस्पृश्य एकदम अलग-थलग हैं। वे न केवल अलग-थलग हैं, बल्कि उन्हें उन वर्गों का विरोध सहना पड़ रहा है, जिन्हें उनका समर्थन होना चाहिए था। अस्पृश्यता को मिटाने में यह अलग-थलग की स्थिति एक और बड़ी बाधा है।