अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
परिशिष्ट 1
I
अस्पृश्यता के कारण हालात बद से बदतर 2
जयपुर से एक संवाददाता ने जून 1953 की घटना का समाचार भेजा, जो निम्नलिखित है:
"जयपुर, 25 जून : इस राज्य में गिनी वर्म नामक बीमारी फैली हुई है, जिसे यहां के लोग नारू अथवा बाल भी कहते हैं। इसके कारण रोगी को महीनों कष्ट उठाना पड़ता है। कभी-कभी तो एक-दो वर्ष भी लग जाते हैं। इसके कारण अनेक रोगियों के तो अंग बेकार हो जाते हैं। "
यह बीमारी पीने के पानी के माध्यम से फैलती है। इसकी रोकथाम के लिए डाक्टर केवल यही सलाह देते हैं, 'पहले पानी को उबालो, छानों और फिर उसे पीओ । '
यह बीमारी बहुधा उस समय फैलती है, जब वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है, जो खेतों में बुवाई का मौसम होता है। इसका नतीजा यह होता है कि जब उसे अपनी कमाई पर लगा होना चाहिए, उस समय वह चारपाई पर पड़ा होता है ।
बांसवाड़ा के निकट कोपरा गांव में पूछताछ करने पर पता चला कि 57 परिवारों में 125 रोगी नारू के शिकार हैं। छह लोगों के एक हरिजन परिवार में पांच लोग नारू बीमारी से पीड़ित हैं। उनके पास खाने के लिए सूखे मांस के मात्र कुछ टुकड़े थे।
1. परिशिष्टों में छपे सभी प्रेस समाचार इस पुस्तक की मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि के अंत में पाए गए हैं। संपादक
2. 27 जून, 1935 के 'स्टेट्समैन' में प्रकाशित
यह बला प्राय: समाज द्वारा ही इन लोगों पर थोपी जाती है। जिस तालाब से हरिजन पानी पीते हैं, वह इतना गंदा है कि वह नारू कीड़ों का जैसे बसेरा बन गया है। जब यह तालाब बांसवाड़ा के कलक्टर को दिखाया गया तो वह स्तब्ध रह गया और उसने तालाब को तुरंत बंद किए जाने का आदेश दिया ।

इसके पास ही एक पक्का कुआं था, जहां जाकर पानी लिया जा सकता था। हिंदुओं से चिरौरी की गई थी कि वे हरिजनों को इस कुएं से पानी लेने दें, लेकिन वे राजी नहीं हुए। कलक्टर ने कहा, 'यदि आपसे कहा जाए तो क्या आप इस तालाब का पानी पी लेंगे?' हिंदुओं ने स्वीकार किया कि वह पानी मनुष्य के पीने के लायक नहीं है, फिर भी उन्होंने हरिजनों को पक्के कुएं को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी।
हालात खराब हैं और सबसे अधिक कष्ट हरिजन भोग रहे हैं। कानून ने अस्पृश्यता को अपराध ठहराया है। लम्बे अर्से से हरिजन सेवक संघ उसे मिटाने के लए जी-तोड़ प्रयास कर रहा है, लेकिन कहा नहीं जा सकता कि देहातों में सवर्ण हिंदुओं के मन-मस्तिष्क में कोई परिवर्तन आया है। इस संबंध में राज्य सरकारें कुछ अधिक नहीं कर पाई हैं।
परिशिष्ट-II
जहां कमीज पहनना अपराध है
दक्षिण भारत में हरिजनों की व्यथा
एक सामाजिक कार्यकर्ता का अनुभव
ले. - स्वामी आनंद तीर्थ, प्रादेशिक अधिकारी,
अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ
'संडे टाइम्स, 9 मार्च, 1952 से
बड़े खेद की बात है कि पांच वर्ष पूर्व नागरिक असुविधा निवारण संबंधी कानून बन जाने पर भी हमारे गांवों में हरिजनों को अब भी विभिन्न नागरिक असुविधाओं को झेलना पड़ रहा है। मदुरै जिले के मैलूर तालुका में हरिजनों की सामाजिक असुविधाओं को दूर करने के लिए पिछड़े नौ महीने से अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ जोरदार कोशिश कर रहा है। चाय की दुकानों, सैलूनों, कुओं, तालाबों, बाबड़ियों आदि में हरिजनों को जिन अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, उन्हें दूर करने की कोशिश की गई। कहीं-कहीं गांवों के मुंसिफ जिनसे इस कानून को लागू करने में सहयोग की आशा की जाती है, बेचारे हरिजनों को अपने प्राथमिक अधिकारों के इस्तेमाल करने के रास्ते में प्रतिक्रियावादी ताकत बन रोड़े बन जाते हैं। नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं, जिनसे पता चलेगा कि हरिजनों के विरुद्ध पूर्वाग्रह ने हमारे समाज में कितनी गहरी जड़ें जमा रखी हैं।
नाथम के पास पाल में एक हरिजन युवक ने नारियल के कुल्हड़ में चाय पीने से मना कर दिया। उसने कहा कि मुझे कांच के गिलास में चाय दी जाए। इस पर एक सवर्ण हिंदू ने उसके लात मारी और उसके सिर पर जूते लगाए। बाद में इस सवर्ण को सब-मजिस्ट्रेट, मैलूर ने सजा दी, पर केवल दस रुपये का जुर्माना किया । मेलावल्वू में जब मैं दो हरिजन लड़कों के साथ चाय की दुकान पर गया तो लोगों के एक समूह ने मुझे पीटने की धमकी दी और लड़कों को खदेड़ दिया। चाय की दुकान वाले ने बिना बात कांच का एक गिलास तोड़ दिया और उन सबने मांग की कि मैं उसकी भरपाई करूं, नही `तो जुर्माने के रूप में मेरी ठुकाई और पिटाई की जाएगी। मैंने भागकर पास के एक प्राथमिक स्कूल में शरण ले ली। भीड़ तभी तितर-बितर हुई, जब पंचायत बोर्ड के प्रधान ने बीच-बचाव किया।
केलावल्वू में हरिजन एक गंदे तालाब से पानी लेते हैं, जिसमें लोग नहाते और अपने जानवरों को भी नहलाते हैं। जब हरिजनों से सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के लिए कहा गया, तब सवर्ण हिंदुओं ने उनसे गाली-गलौच की और उन्हें डराया व धमकाया, ताकि वे सार्वजनिक तालाब से पानी लेने का साहस न कर सकें। केलावल्वू में पुलिस थाना है, पर वहां की पुलिस हरिजनों की असुविधाओं के प्रति आंखें मूंदे हुए हैं। अत्तुकुलम में सवर्ण हिंदू सार्वजनिक कुएं में पाखाना फेंक देते हैं, क्योंकि वे उन हरिजनों को नहीं रोक सके, जिन्होंने हमारे कहने पर वहां से पानी लिया। एत्तिमंगलम में सवर्ण हिंदुओं ने सरकारी नर्सरी में कुछ हरिजनों द्वारा उगाई गई धान की पौध को नष्ट कर दिया। इसका कारण यह था कि हरिजन इस चावड़ी के अंदर आ गए थे, जहां एक सार्वजनिक सभा हो रही थी। बेचारे हरिजनों ने शिकायत की, पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।
तिरुवदूर में जब हमने हरिजनों से कहा कि वे सार्वजनिक तालाब से पानी ले लें तो एक सवर्ण हिंदू युवक ने एक गर्भवती हरिजन महिला से हाथापाई की और उसके घड़े को भी तोड़ दिया। पुलिस ने सवर्ण हिंदू के खिलाफ मुकदमा दायर किया और सब - मजिस्ट्रेट ने उस पर सिर्फ पंद्रह रुपये का जुर्माना किया। उसके बाद से हरिजन उस सार्वजनिक तालाब से बेरोकटोक पानी ले रहे हैं। कोत्तागुडी में गांव के एक नाई ने हरिजन लड़के के बाल काटने से इंकार कर दिया। पुलिस ने उस पर मुकदमा चलाया और उसे सब - मजिस्ट्रेट ने सजा दी। लेकिन उसके बाद सवर्ण हिंदुओं ने हरिजनों को चावड़ी में बुलाया और चेतावनी दी कि अगर इस नाई के पास गए और बाल काटने के लिए कहा तो सबको जुर्माना भरना पड़ेगा।
किदारीपत्ती में हरिजनों को अनुमति नहीं है कि वे आम रास्ते से अपने शव को ले जाएं या गांव की गलियों में साइकिल पर सवार होकर निकलें। मैलूर में सब - मजिस्ट्रेट की अदालत में एक मुकदमा एक हरिजन को साइकिल की सवारी से रोकने के बाबत चल रहा है । नदिकोविलपत्ती में जो मैलूर तालुका कार्यालय से केवल तीन फर्लांग पर है, हरिजन एक गंदे नाले से पीने का पानी ले रहे थे, क्योंकि सार्वजनिक तालाब तक उनकी पहुंच नहीं हो सकती थी । इस संबंध में पुलिस में दो शिकायतें दर्ज कराई गईं और अब सवर्ण हिंदुओं की हिम्मत नहीं वे हरिजनों को रोक सकें। थेक्किथेरू में जब हरिजन उस समय मंथै चावड़ी पर जाकर बैठ गए जब कि चावड़ी में सार्वजनिक सभा हो रही थी, उन पर पत्थर फेंके गए, परिणामस्वरूप उन्हें डर के कारण वह स्थान छोड़ देना पड़ा ।
मैलूर से कोई दो मील दूर नविनिपत्ती में कहा जाता है कि वहां के गांव के मुंसिफ ने पोंगल समारोह दिवस पर हरिजनों के अच्छे कपड़े पहनने पर एतराज किया और दो हरिजन युवकों को अपनी कमीजें और ऊपरी वस्त्र उतारने के लिए कहा। उन युवकों से यह भी कहा गया कि वे कुम्बी दल (साष्टांग प्रणाम) करें और केवल लुंगी पहनकर जाएं।
मदुरै नगर से कोई दस मील दूर मंकुलम में जो अत्याचार किया, वह सबसे अधिक कष्टपूर्ण रहा। वहां ग्राम - मुंसिफ ने शत्रु जैसा व्यवहार किया। दो हरिजन युवक चाय की दुकान पर गए। उन्हें भीतर जाने से रोका गया। इस पर उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट कर दी। इसके लिए उनमें से एक को बड़े-बूढ़ों के इशारे पर एक सवर्ण हिंदू ने खंभे से बांध दिया और बेरहमी से पीटा। दूसरे हरिजन पर ग्राम- मुंसिफ के नौकर ने चाकू से हमला किया। हरिजनों का सामाजिक बहिष्कार किया गया और उन्हें काम नहीं दिया गया । उनका अपराध बस इतना था कि उन्होंने सार्वजनिक तालाब से पानी लिया था। दुकानदारों ने उन्हें खाने-पीने की चीजें देने से इंकार कर दिया और उन्हें दो दिन तक भूखा रखा गया। स्थिति तभी सुधरी, जब मालगुजारी के डिवीजनल अफसर ने बीच-बचाव किया।
हाल ही में दो हरिजनों तथा स्वयं मुझ पर सवर्ण हिंदुओं की एक टोली ने बर्बरतापूर्ण हमला किया। हमें उन्होंने लकड़ी के डंडों से पीटा। हमारा गुनाह बस यह था कि हमने तालाब में स्नान किया और हम चावड़ी के सामने एक कौफी - क्लब में गए थे। मदुरै के सरकारी अस्पताल में भर्ती करके हमारा इलाज किया गया। मेरी दाईं टांग में फ्रैक्चर हो गया। उसके कारण मैं दाईं टांग स े चल भी नहीं सकता था। ग्राम मुंसिफ समेत सोलह लोगों पर पुलिस ने दंगा करने का आरोप लगाया। लेकिन कुछ कांग्रेसजन समझौता कराने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि उनके कुछ रिश्तेदार उसमें फंसे हुए हैं। पता चला है कि ये लोग इस संबंध में सिफारिश लेकर उच्च अधिकारियों तक पहुंचे हैं। कैसी विडंबना है, कहां महात्माजी की यह इच्छा, हरिजनों को अपना सगा भाई समझो। कहां यह स्थिति ! अपना, अपना होता है; पराया, पराया।
जहां तक हरिजनों के प्रति सवर्ण हिंदुओं के रवैये का संबंध है, हमारे हाथ लगती है, गिरी निराशा और हताशा । कहां गया महात्माजी का महान बलिदान ! उन्होंने ही हमारे लिए स्वराज का द्वार खोला। वह चाहते हैं कि इन दलितों तक भी आजादी पहुंचे। राजस्व और पुलिस के अधिकारी हरिजनों की असुविधाओं को दूर करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। महात्माजी के सुपुत्र मणिलाल दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की नागरिक असुविधाओं को दूर कराने के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं। हरिजनों को महात्माजी अपने ही जिगर का टुकड़ा समझते थे। आज उन्हें ही वैसी आजादी देने से हम कतरा रहे हैं। महात्माजी का गुणगान करने वाले सवर्ण हिंदुओं और कांग्रेसजनों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी आत्मा को शांति तो तभी मिलेगी, जब अस्पृश्यता के इस पाप को देश के चप्पे-चप्पे से जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा। सरकार को समझना चाहिए कि हमारे समाज से इस पाप को दूर करने के लिए ठोस प्रयत्न किए जाने जरूरी हैं।