अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
परिशिष्ट-II
हरिजनों पर जबरन अत्याचार
(थुम्बापत्ती में दर्दनाक और शर्मनाक अत्याचार)
हमारे गांवों में चावड़ी न्यायालय बंद करो
चावड़ी न्यायालय
हम सभी जानते हैं कि हालांकि तमिलनाडु के गांवों की चावड़ियों में हरिजन प्रवेश नहीं कर सकते, फिर भी इन चावड़ियों में सवर्ण हिंदू उनके भाग्य का फैसला करते हैं और उन पर इतने कठोर अत्याचार किए जाते हैं कि वे सवर्ण हिंदुओं से हमेशा डरे-डरे से रहते हैं हरिजनों की नागरिक असुविधाओं को दूर करने के लिए हम जो आंदोलन छेड़ते हैं, उसमें वे क्यों हिस्सा नहीं लेते, इसका एक कारण यह भी है कि उन्हें गांव के मुखिया (पेरियमबलगर) जो सवर्ण हिंदू होता है, के नेतृत्व में सवर्ण हिंदुओं द्वारा सताए जाने का बराबर डर बना रहता है। अनेक स्थानों पर ग्रामवासियों ने पंचायत सभा का नाम देकर अपने-अपने चावड़ी न्यायालय स्थापित कर रखे हैं। बेचारे हरिजनों को इन चावड़ियों में बुलाया जाता है और उन पर गुलामों की तरह मुकदमा चलाया जाता है। यदि उनमें से कोई पेरियमबलगर के आदेश का विरोध करता है, तो जबरा कानून शुरू हो जाता है। बेरहमी से उनकी ठुकाई व पिटाई की जाती है, ताकि उनके मन में डर बिठाया जा सके और पेरियमबलगर की निरंकुश सत्ता का लोगों में प्रदर्शन किया जा सके। इन चावड़ियों में विभिन्न प्रकार की परिस्थिति और पेरियमबलगर व उसके सभासदों की इच्छा के अनुसार हरिजनों को दंड दिया जाता है- यथा, सरेआम कोड़े लगवाना, भारी जुर्माना करना और जुर्माना न देने पर उनकी संपत्ति जब्त कर लेना, झूठे मामले गढ़ना, रोजगार न देना और मजदूरी रोक कर आर्थिक बहिष्कार करना, सामाजिक समारोहों और धार्मिक उत्सवों में उनकी भागीदारी पर रोक लगाकर सामाजिक बहिष्कार करना, तालाबों और कुओं पर उनके प्रवेश पर रोक लगाकर उन्हें पानी न लेने देना, गांवों की दुकानों में बिक्री पर रोक लगाकर उन्हें खाने-पीने की चीजें न खरीदने देना, आदि-आदि। हरिजनों का उद्धार तभी हो सकता है, जब सरकार उन ग्रामवासियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करे, जो ग्राम पंचायत की आड़ में ये अवैध और अन्यायपूर्ण अदालतें चलाते हैं। पिछड़े तथा अल्पसंख्यक समुदाय पर उपर्युक्त तरीकों से तरह- तरह का जैसा उत्पीड़न गांवों में वहां के लोग कर रहे हैं, उसे कोई भी सभ्य सरकार सहन नहीं कर सकती।
थुम्बापत्ती में अत्याचार
एक अगस्त 1953 को थुम्बापत्ती में हरिजनों के साथ जो व्यवहार किया गया, उसे सुनकर किसका हृदय न पसीज उठेगा। इसका विवरण इस प्रकार है । यह गांव मदुरै से 22 मील दूर स्थित है और यह स्थान तमिलनाडु में हरिजनों के एक प्रमुख नेता, संसद सदस्य श्री पी. कक्कन का जन्म स्थान है। पता चला है कि हरिजन बस्ती के सभी वयस्कों को चावड़ी के सामने खुले मैदान में बुलाया गया। सवर्ण हिंदुओं ने प्रथा के अनुसार पेरियमबलगर और उसकी परिषद के सामने साष्टांग प्रणाम किया। उसके बाद कोई एक दर्जन हरिजन युवकों को मुकदमे के लिए अलग छांट लिया गया। उन पर यह आरोप था कि लोगों को उन पर शक है कि वे गांव में चोरियां करते हैं। जिन युवकों ने थोड़ा-बहुत विरोध किया और सवर्ण हिंदुओं के आगे प्रथानुसार हाथ-पैर नहीं जोड़े, उन्हें दंड देने के लिए अलग से चुन लिया गया। उन्हें डंडों से मारा-पीटा गया और उनसे चोरी स्वीकार करने के लिए कहा गया। अन्य हरिजनों से पूछताछ की गई और कहा जाता है कि उत्पीड़न के डर से उन्होंने सभी चोरियों की जिम्मेदारी अभियुक्तों पर थोप दी। फैसला सुनाया गया कि ये युवक दोषी हैं। इसके बाद विधिवत दंड देने के लिए कुछ को हथकड़ियां भी पहना दी गईं। पता चला है कि उनमें से एक ने फिर भी विरोध प्रकट किया और बच निकलने के लिए बहाना बनाया। चावड़ी न्यायालय का अनादर करने पर गांव वाले नाराज हो गए । पता चला है कि पेरियमबलगर ने चावड़ी की ओर से यह निर्णय किया कि इन हरिजन युवकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए । जबरा कानून की कार्रवाई शुरू हो गई और हरिजन युवकों की बड़ी बेरहमी से पिटाई की गई। जिन लोगों को हरिजनों से कोई शिकायत या विद्वेष था, उन सभी को बिना किसी दंड के भय के हरिजनों से गिन गिनकर बदला लेने की खुली छूट मिल गई। जिस हरिजन युवक ने फिर भी बच निकलने की कोशिश की, उसके पैरों को पकड़ उसे पथरीली जमीन पर खूब घसीटा गया। दूसरों की डंडों से पिटाई की गई। उन्हें पेड़ों से बांध दिया गया और फिर इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उनकी हड्डियों और पसलियां लगभग चूर-चूर हो गईं। कोई आठ घंटे तक उन्हें पैंरों से बांधकर खड़ा रखा गया, ताकि लोग उन्हें जी भर कर देख लें। लगता है कि सभी हरिजनों को यह चेतावनी दे दी गई है कि वे हजिरन कार्यकर्ताओं से सहयोग न करें।

झूठा मामला गढ़ा गया
उसके बाद गांव वालों ने जो कुछ किया, वह और भी शर्मनाक है। आमतौर पर होता यह है कि झूठे मामले हरिजनों के मत्थे मढ़ दिए जाते हैं और तुरंत कार्रवाई करने के लिए पुलिस बुला ली जाती है। जब यह पता चला कि हरिजनों को गंभीर चोटें आई हैं, तो गांव वालों को अहसास हुआ कि वे तो मुसीबत में फंस जाएंगे। पता चला है कि इसलिए संसद सदस्य श्री पी. कक्कन के अस्सी वर्षीय पिता एवं ग्राम प्रधान ( थोट्टी) श्री पूसारी कक्कन से कहा गया कि वह यह झूठी शिकायत कर दें कि पिछली शाम को हरिजन मंदिर से कुछ चीजें गुम हो गईं और ग्राम के मुंसिफ ने पुलिस में रपट दर्ज करा दी कि ये चीजें हरिजन युवकों से बरामद की गई। कहा जाता है कि पूसारी कक्कन और एट्टी कक्कन नामक एक अन्य ग्राम प्रधान ने ये चीजें लाकर ग्राम के मुंसिफ को दीं। सूचना पाते ही पुलिस तुरंत आ गई। उसने चोरी के आरोप में हरिजन युवकों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें अस्तपाल भेज दिया, क्योंकि वे घायल अवस्था में पाए गए। हमारा आशय सरेआम पुलिस की आलोचना करना नहीं है। इतना कहना काफी होगा कि ग्रामवासियों ने हरिजनों पर जो जुल्म किए वे पुलिस की सरकारी दृष्टि से ओझल रहे ।
सच का पता चल ही गया
यह अच्छा हुआ कि वे गांव वालों ने जो कुछ किया, उसके समर्थन में एक सामूहिक याचिका तमिलनाडु हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष वैद्यनाथ अय्यर के पास भेज दी। वह याचिका जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए मेरे पास भेज दी गई। एक छोटी-सी कमेटी बनाई गई । उसमें मैलूर तालुका कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, मैलूर तालुका हरिजन सेवक संघ के सचिव, मैलूर सेवा समाज के सचिव, और मुझे शामिल किया गया। हमने तदनुसार मामले की जांच की। हमने पाया कि गांव वालों ने हरिजन युवकों को बेरहमी से मारा-पीटा और उन्हें कोई आठ घंटे पेड़ों से बांधे रखा। उसके बाद ही पुलिस वहां पहुंची। श्री पूसारी कक्कन और पेरियमबलगर की शिकायत की जांच-पड़ताल श्री वैद्यनाथ अय्यर ने की। उन्होंने श्री अय्यर के सामने स्वीकार किया कि पुलिस के पास दर्ज कराई गई शिकायत झूठी और मनगढ़त थी। पेरियमबलगर ने भी हरिजनों के प्रति किए गए अवैध कार्यों के लिए खेद प्रकट किया। इस बीच पुलिस ने श्री पूसारी कक्कन की शिकायत की जांच-पड़ताल की और मामले के बारे में कहा, 'कुछ पता नहीं चल सका', लेकिन उसने गांव वालों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया। लगता है कि हरिजन युवकों की हड्डियां दरअसल टूटी नहीं थीं। डंडों की मार तथा रस्सियों के बंधन के निशान उनके शरीरों पर कई दिन तक दीखते रहे। उनमें से दो को दो दिन तक अस्पताल में रखा गया और उनकी टांगों का एक्सरे किया गया, ताकि निश्चय किया जा सके कि उनकी हड्डियां टूटी नहीं। उनकी टांगों पर पलस्तर बांधकर भेज दिया गया। एक पखवाड़े तक वे ठीक तरह से चल भी नहीं सकें ।
दो जांच-पड़ताल की गईं
डिप्टी कलक्टर के आदेश पर एक जांच-पड़ताल उप- कल्याण अधिकारी, मदुरै ने की और दूसरी जांच-पड़ताल हाल ही में सरकार के आदेश से राजस्व डिवीजनल अधिकारी, मदुरै ने की। परिणाम अभी तक पता नहीं चला है।
थुम्बापत्ती में नागरिक असमानताएं
1948 में जब सार्वजनिक तालाब से हरिजनों ने पानी लिया, तो थुम्बापत्ती के ग्रामवासियों ने भयंकर विरोध किया। तब तक हरिजन एक गंदे पोखर से पानी ले रहे थे। वहां लोग स्वयं नहाते थे और पशुओं को भी नहलाते थे। कुछ हरिजन युवकों को बुरी तरह मारा-पीटा गया और हरिजनों के घरों को आग लगाने की कोशिश की गई। कहा जाता है कि इस संबंध में अधिकारियों ने ग्राम के मुसिफ तथा अन्य लोगों को चेतावनी दी है। थुम्बापत्ती में चाय की एक दुकान में हरिजन को कांच के गिलास में कौफी नहीं दी गई। इस मामले की सूचना पुलिस को 19 अगस्त, 1953 को दी गई। चाय की दुकान के मालिक को अपराधी माना गया और उस पर सब - मजिस्ट्रेट ने दस रुपये का जुर्माना किया। गांव का नाई कहता है कि वह हरिजनों की सेवा करने के लिए तैयार है। फिर भी हरिजन उसके पास नहीं जाते। संभवतः उसका कारण यह है कि सवर्ण हिंदुओं ने उन्हें गुप्त रूप से चेतावनी दी है। कुछ हरिजन 1 जुलाई, 1953 को नाई के पास गए थे और इस बात पर विश्वास करने के लिए सबूत हैं कि 1 अगस्त, 1953 को हरिजन युवकों के खिलाफ जो कार्रवाई की गई, वह हरिजनों में दहशत फैलाने की एक साजिश थी।
हमारा सामान्य अनुभव
आमतौर पर हमारा यह सामान्य अनुभव रहा है कि जब भी हरिजन अपने प्राथमिक अधिकारों को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तो ग्रामवासी उन्हें चावड़ी पर बुला लेते हैं और किसी न किसी रूप में उनको धमकते व मारते-पीटते हैं। उत्पीड़न की ऐसी घटनाएं मंगलम, कुरुवनकुलम, अडानूर, पाथियेत्तमगुडी और कारुगाकोट्टै में घटीं। पुलिस के उच्च अधिकारियों ने इन स्थानों का दौरा किया। कुछ स्थानों में हरिजनों को चावड़ी पर बुलाया गया और कोट्टागुडी, किरारीपट्टी और पुल्लिपट्टी की भांति चेतावनी दी गई। अधीनस्थ पुलिस अधिकारी आमतौर पर सवर्ण हिंदुओं का समर्थन करते हैं। इस प्रकार सवर्ण हिंदुओं को अपना ब कानून लागू करने की छूट मिल जाती है, ताकि वे हरिजनों को उनके दास होने का बोध करा सकें।
क्या हम इसे सहन कर सकते हैं।
हमारे सामने सवाल यह है कि जब हम जलियांवाला बाग में हुए डायर के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह कर चुके हैं, तो आजकल सरेआम हरिजनों को जिस घोर अपमान और मनमानें अवैध अत्याचार का शिकार बनाया जा रहा है, क्या हम उसे सहन कर सकते हैं? जलियांवाग बाग में तो अत्याचार विदेशी नौकरशाहों ने उन नर-नारियों पर ढाए थे, जो एक सभा के लिए वहां एकत्र हुए थे। यहां उसी प्रकार के जुल्म हमारे ग्रामवासियों ने उन चंद हरिजन चुवकों पर किए, जिन पर चावड़ी में मुकदमा चलाया गया जिसका उद्देश्य यह था कि आम हरिजन के हृदय में आतंक का हौआ बिठा दिया जाए।
सरकार को क्या करना होगा
ग्राम में सरकार ने ग्राम पंचायतों की स्थापना की है। उनमें निर्वाचित सदस्य होते हैं, जिनमें हरिजन भी होते हैं। तो क्या कारण है कि सरकारी मान्यता प्राप्त इन पंचायतों के समानांतर सवर्ण हिंदुओं को उनके चावड़ी न्यायालय करने की छूट दी जाए। ग्रामों में निर्धन पिछड़े वर्ग की जातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के मार्गों में ये चावड़ी न्यायालय गंभीर बाधाएं हैं। ग्रामों में हरिजनों का उद्धार अथवा मुक्ति तभी हो सकती है, जब इन चावड़ी न्यायालयों पर सरकार रोक लगा दे। जब तक चावड़ी न्यायालयों पर यह प्रतिबंध नहीं लगाया जाता कि वे इस प्रकार हरिजनों के बारे में कोई निर्णय नहीं कर सकते, तब तक हरिजनों की नागरिक असुविधाओं को दूर करने के हमारे सभी प्रयास मिट्टी में मिलते रहेंगे। इससे पहले कि छुआछूत मिटाने के लिए तीन लाख रुपये खर्च किए जाएं, सरकार को कुछ जरूरी उपाय करने ही होंगे। उसे चावड़ी में हरिजनों पर हो रहे उत्पीड़न को बंद करना होगा। उसे हरिजनों को इस योग्य बनाना होगा कि वे इंसान के रूप में गर्व से अपना सिर उठा सकें। केरल में सार्वजनिक स्थानों से अब छुआछूत का सफाया हो गया है, क्योंकि देश के उस भाग से अब इन चावड़ी न्यायालयों का लोप हो गया है।
एक अपील
महात्मा गांधी ने ही हमें यह बोध कराया कि हम ग्रामों में निर्धन हरिजनों के साथ भारी अन्याय कर रहे हैं। उनके साथ निम्न जातियों तथा दास जैसा व्यवहार कर रहे हैं। यदि वह न होते तो देश के विभिन्न भागों के हरिजन सवर्ण हिंदुओं के असह्य अत्याचारों से तंग आकर हिंदुओं से अलग हो जाते। आज से 21 वर्ष पूर्व महात्मा गांधी ने पूना में ऐतिहासिक अनशन किया था। उद्देश्य था, हरिजनों के समर्थन में जन-जागरण हो। इसमें संदेह नहीं कि पिछले दशकों में भारी जन-जागरण हुआ है और आज हरिजन आंदोलन के प्रति जन - सहानुभूति है। सरकार वचनबद्ध है कि वह हरिजनों की सभी प्रकार की सामाजिक तथा नागरिक असुविधाओं को दूर करेगी। वह हरिजनों की प्रतिष्ठा बढ़ाने के सभी शांतिपूर्ण तथा वैध प्रयासों को पूर्ण सहयोग प्रदान भी कर रही है। लेकिन हमें स्वीकार करना होगा कि गांवों में आज भी हरिजनों के प्रति काफी विद्वेष और पूर्वाग्रह हैं। हम सभी समाज सेवकों से अपील करते हैं कि वे ग्रामों में सवर्ण हिंदुओं के हृदय में परिवर्तन लाएं, ताकि अब और आगे हरिजनों को एक अलग अस्पृश्य वर्ग के रूप में न माना जाए। हम सभी नेताओं से अपील करते हैं कि वे अस्पृश्यता को मिटाने के लिए जी-जान से जुट जाएं और प्रयास करें कि हरिजनों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग माना जाए।
स्वामी आनंद तीर्थ, एम. ए.
प्रादेशिक अधिकारी
अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ
दक्षिणी रेंज,
प्रधान कार्यालय, मैलूर