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अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar

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26 मे 2023
Book
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भाग III

समस्या की जड़ें

8

विदेश के तदनुरूप उदाहरण

[ I रोम में गुलाम-प्रथा, II. इंग्लैंड में अर्ध - गुलाम, III. यहूदी और हीनता, तथा IV. नीग्रो और गुलाम - प्रथा ]

     सामाजिक असमानता केवल हिंदू समाज में ही नहीं है । यह अन्य देशों में भी रही और समाज के उच्च और निम्न, मुक्त और अमुक्त, पूजनीय और निंदनीय वर्गों में बंटने का कारण यही रही है। अन्य प्राचीन और आधुनिक देशों में अमुक्त और निंदनीय वर्गों की स्थिति और उनकी हैसियत के साथ भारत के अस्पृश्यों की स्थिति और उनकी हैसियत की तुलना करने पर बहुत सी बातों का पता चलेगा। इनके अंतर और समानताओं को भली-भांति समझने के लिए इन एक जैसे उदाहरणों के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त कर लेना, उनकी तुलना करने से पहले अत्यंत आवश्यक है। विश्व के सभी भागों में इन सभी वर्गों की स्थिति का सर्वेक्षण प्रस्तुत करना संभव नहीं । न यह आवश्यक है। केवल कुछ थोड़े से उदाहरण व्याख्या के रूप में लिए जा सकते हैं।

    हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच परस्पर संबंध का अध्ययन करते समय हमारे मन में तीन प्रश्न एकदम उभर कर सामने आते हैं। अस्पृश्यता क्यों कर समाप्त नहीं हुई? अस्पृश्यों पर अन्याय को हिंदू वैध और न्यायपूर्ण क्यों मानते हैं? अस्पृश्यों के साथ अपने व्यवहार में हिंदू अपने विवके के संकेत का अनुभव क्या नहीं करते ?

I

    अस्पृश्यों जैसे निम्न और निर्दलीय वर्ग कभी अन्य समाजों में भी रहे हैं। उदाहरणार्थ, ये कभी प्राचीन रोम में होते थे। प्राचीन रोम में पांच प्रकार के निवासी थे- 1. पैट्रीशियन (कुलीन), 2. प्लेबियन ( अकुलीन), 3. क्लायंट ( पराधीन), 4. गुलाम और 5. फ्रीमेन ( मुक्त गुलाम ) ।

   पैट्रीशियन लोग शासक वर्ग के होते थे । वे प्रत्येक अर्थ में नागरिक होते थे, शेष सभी हैसियत में नीचे होते थे। प्लेब और क्लायंट वर्ग- युद्ध में नष्ट हो गए। नए लोगों में से जिन लोगों ने पैट्रीशियन के प्रतिष्ठित परिवारों के प्रमुखों की शरण में रहने की याचना की व उनकी अधीनता स्वीकार कर ली, वे क्लायंट कहलाए। जिन लोगों ने इस प्रकार के व्यक्तिगत संरक्षरण के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और सीधे राज्य का संरक्षण स्वीकार किया, वे शाही गुदस्तादार बन गए। इन लोगों को प्लेबियन कहा जाने लगा। प्लेबियनों को चल और अचल, दोनों प्रकार की संपत्ति रखने का अधिकार था। वे अपनी संपत्ति को रोम के कानून के अधीन हस्तांतरित कर सकते थे और इसके लिए न्यायाधि करणों की सहायता प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उन्हें नगर के प्रशासन में कोई प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं था। वह अर्ध-नागरिक होते थे। उन्हें नगर के धार्मिक कार्यकलापों में भाग लेने की अनुमति नहीं थी । पैट्रीशियन और प्लेबियन के बीच विवाह-संबंध होने का तो प्रश्न ही नहीं था । क्लायंट को सहायता और सुरक्षा के लिए अपने पैट्रीशियन संरक्षक पर निर्भर रहना पड़ता था । क्लायंट और उसके बाल-बच्चों के जीवन निर्वाह के लिए सभी आवश्यकताओं की पूर्ति उसके पैट्रीशियन संरक्षक को करनी पड़ती थी। यह संबंध पीढ़ी दर पीढ़ी का होता था, जो पिता के बाद उसके पुत्र से होता था । क्लायंट को न केवल अपने भरण-पोषण के लिए अपने पैट्रीशियन संरक्षक पर निर्भर रहना होता था, बल्कि उसे अपनी कानूनी सुरक्षा के लिए भी उसी पर निर्भर रहना पड़ता था । चूंकि वह नागरिक नहीं होता था, इसलिए उसे कानूनी कार्रवाई करने का अधि कार प्राप्त नहीं था, और उसके कष्ट निवारण के लिए उसके पैट्रीशियन संरक्षण को उसकी सहायता करनी पड़ती थी और उसके मुकदमेबाजी में फंस जाने पर उसके बदले न्यायाधिकरण के सामने उपस्थित होना पड़ता था ।

asprushyata aur arajakta dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    जहां तक गुलामों का प्रश्न है, उनकी संख्या लाखों में थी। हर अमीर जमींदार के पास सैकड़ों या हजारों की संख्या में गुलाम होते थे। जिस किसी के पास थोड़े-बहुत गुलाम न हों, वह निर्धन कहलाता था । गुलाम निजी संपत्ति होते थे। वे कानून की दृष्टि से मनुष्य नहीं थे और इसलिए उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। कुछेक स्वामी ही उन पर दयालु होते थे। आमतौर से उनके साथ अत्यंत निर्दयतापूर्ण व्यवहार होता था । सेनेका का कथन है- यदि भोज के समय कोई दास खांस देता या छींक देता या उसके हाथ से चाबी गिर जाती और उसकी आवाज सुनाई पड़ जाती है, तो हमें बहुत गुस्सा आ जाता था। ...हम अक्सर उसकी खूब पिटाई करते थे। उसके हाथ-पैर या दांत तोड़ देते थे। एक अमीर रोमवासी अपने गुलाम को उसकी लापरवाही पर मछलियों के पोखर में धकेल देता था, जिससे लेम्प्रे मछलियां उसे नोच-नोचकर खा लें। जो गुलाम अपने स्वामी को अप्रसन्न कर देता था तो उसे सजा के तौर पर तहखाने में बंद कर दिया जाता था। सारा दिन उन्हें भारी-भारी जंजीरों में बंधे बंधे काम करना पड़ता था। कई गुलामों को गर्म सलाखों से दाग दिया गया था। रोम के एक लेखक ने एक मिल का वर्णन जहां इन दासों को काम करना पड़ता था, इन शब्दों में किया है:

    हे भगवना! ये ठठरियां भी क्या कोई इंसान है ? इनकी चमड़ी कोड़ों की मार से उधड़ी पड़ी है। शरीर चिथड़ों में लिपटा हुआ है, सारा शरीर मुड़ गया है, सिर मुंडा हुआ है, पैरा में सांकले पड़ी हुई है, आग की गर्मी से शरीर टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, पलकें आग की लपटों से झुलसी हुई हैं और पूरे शरीर पर भूसी लिपटी हुई है।

   किसी समय में अंग्रेजों के समाज में भी सेवक वर्ग हुआ करता था। यह जानने के लिए कि नारमनों की विजय के समय अंग्रेजों के समाज की क्या दशा थी । हमें 'डूम्सडे ' पुस्तक के पृष्ठ उलटने होंगे। इस पुस्तक में इंग्लैंड की भूमि व्यवस्था और विभिन्न प्रकार के किसानों का सामाजिक सर्वेक्षण किया गया है, जैसी कि विजेता विलियम ने 1806 में अपनी विजय के तुरंत बाद यहां स्थापित की थी। इस पुस्तक में उस समय की आबादी के निम्नलिखित वर्ग बताए गए हैं:


Social Survey of the Land System of England and the Different Types of Peasants


     कुल 3,37,000 की जनसंख्या में 2,84,000 लोग या तो अमुक्त थे या फिर गुलाम थे।

    वह कुछ ऐसा सेवक वर्ग था, जो नस्ल या धर्म पर आधारित नहीं था । लेकिन इतिहास में धर्म और नस्ल के आधार पर बने सेवक वर्ग के कई उदाहरण मिलते हैं। इनमें यहूदी मुख्य थे। ईसाइयों के इस विश्वास के आधार पर कि ईसा की मृत्यु यहूदियों के कारण हुई, यहूदियों को सताया जाता रहा है। मध्य-काल में यूरोप के सभी शहरों में यहूदियों को सीमित क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर किया जाता था, और यहूदियों के ये निवास - क्षेत्र ' घेट्टों' कहलाते थे। 1050 में आस्ट्रेलिया में कोएंजा में हुई ईसाइयों की एक महासभा में अधिनियमित किया गया कि कोई भी ईसाई किसी मकान में यहूदी और मूर ( हब्शी) लोगों के साथ नहीं रहेगा और न उनके साथ भोजन करेगा, और जो कोई इस नियम को तोड़ेगा, वह सात दिन तक प्रायश्चित करेगा । यदि कोई व्यक्ति उच्च पदाधि कारी होकर ऐसा करने से इंकार कर दे तो उसका एक साल तक सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाए। यदि कोई साधारण व्यक्ति यह अपराध करे तो उसे एक सौ कोड़े लगाए जाएं। 1388 में फैलेनशिया में हुई महासभा में एक नियम बनाया गया कि ‘ईसाई उन घरों में न रहें, जो यहूदियों के लिए निर्धारित हैं, और जो वहां रह रहे हों, वे प्रमुख चर्च के द्वारा इस आदेश के जारी होने के दो महीने के भीतर वहां से हट जाएं' और यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें पादरियों द्वारा प्रताड़ित किया जाए। मध्य - काल में यहूदी इकट्ठे होकर एक जगह स्नान करते थे। स्नान करने के लिए और कोई दूसरा उपाय भी नहीं था । इसका कारण यह था कि ईसाई जिन नदियों में नहाते थे वहां राज्य की ओर से यहूदियों का नहाना वर्जित था। चौहदवीं शताब्दी में औगर्स के यहूदियों को बहुत कठोर शर्तों पर नगर में फिर से रहने की इजाजत दी गई थी। इन शर्तों में एक शर्त यह थी कि वे माईन नदी में स्नान नहीं कर सकते। राज्य द्वारा यहूदियों पर कुछ कर भी लगाए गए। ये कर तीन प्रकार के थे 'व्यक्ति कर', व्यक्तिगत लेन-देन और विशेषाधिकारों पर विशेष प्रकार का जुर्माना और शुल्क किस उम्र में यहूदी स्त्री या पुरुष 'व्यक्ति कर' का भुगतान शुरू कर देगा, उसमें बहुत अंतर था, किंतु यह उम्र बहुत कम होती थी। 1273 में इंग्लैंड की तरह स्पेन में भी दस साल की उम्र के यहूदियों को यह कर देना पड़ता था। शांति-काल में यहूदियों के घरों में सिपाहियों को जबरदस्ती रख उनसे धन वसूलना तो आम बात थी। मध्य-काल में जगह-जगह यहूदियों से इस प्रकार धन वसूल करने के असंख्य उदाहरण मिलते हैं। 1215 में पोप इनोसेंट तृतीय ने एक फरमान जारी किया ईसाइयों से अलग अपनी पहचान के लिए यहूदी बाहर अपने कपड़ों के ऊपर एक बिल्ला लगाया करेंगे। लेटरनन परिषद ने स्पष्ट रूप से इस बात पर बल दिया कि यहूदी बिल्ला लगाएंगे, किंतु उसका विवरण नहीं बताया गया । उसने यह बात स्थानीय गवर्नरों और सरकारों पर छोड़ दी कि वे निश्चित करें कि उस अपमानजनक बिल्ले की छाप, रंग और आकार क्या होगा। प्रत्येक गवर्नर और सरकार ने अपनी मर्जी से बिल्लों का रंग और आकार निश्चित कर दिया। उन बिल्लों के रंग और आकार इतने बदले कि वे निरर्थक हो गए और यहूदियों ने ये बिल्ले लगाने छोड़ दिए। चूंकि बिल्ले अक्सर छिप जाया करते थे, इसलिए 1525 में पोप क्लीमेंट सप्तम ने यह व्यवस्था कर दी कि यहूदी अब पीला हैट या बोनेट पहना करेंगे।

   अस्पृश्यों की मौजूदा स्थिति के दौरान किसी जमाने में इंग्लैंड के कैथोलिक ईसाइयों की स्थिति की याद आने लगती है। कैथोलिक ईसाइयों पर अनेक प्रकार की पाबंदियां थीं और उन्हें अनेक कष्ठ भुगतने पड़ते थे। इनकी सूची निम्नलिखित है:

    1. मौजूदा कानून के अनुसार कैथोलिक ईसाइयों के विवाह या ऐसे सभी विवाह गैर-कानूनी हैं, जो कैथोलिक पादरियों के द्वारा संपन्न कराए जाते हैं । इसके फलस्वरूप उस पक्ष को जिसका त्याग किया जाता है, चाहे उसका कारण कुछ भी क्यों न हो, स्थानीय चर्च से या अपने देश के राज्य की सरकार से कुछ भी हरजाना नहीं मिलेगा। यह विधान भी है कि इस अपराध के लिए उस पादरी को देश निकाला दे दिया जाए या उसे जेल में डाल दिया जाए या उसे निर्जन स्थान में भेज दिया जाए।

    2. मौजूदा कानून के अनुसार चूंकि कैथोलिक पादरियों के भरण-पोषण या कैथोलिक पूजा-पद्धति पर दिया गया खर्च अंधविश्वास के प्रयोजनों पर किया गया खर्च समझा जाता है, इसलिए यह धनराशि जब्त की जा सकती है, अगर कोई व्यक्ति उसे हड़प लेता है, तब वह धनराशि कानून के तहत उससे वसूल नहीं की जा सकती । इस प्रकार की घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है।

    3. महामहिम की थल और जल सेना में काम करने वाले कैथोलिक अपने धर्म की रीति के अनुसार रविवार और अन्य त्यौहारों पर पूजा के लिए गिरजाघरों में नहीं जा सकते थे और उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध इन्हीं दिनों प्रोटेस्टेंट गिरजाघरों में जाने के लिए मजबूर किया जाता था । यह ऐसा दोष था, जिसके कारण बहादुर और वफादार सैनिकों में असंतोष व्याप्त था और यह असंतोष तब व्यक्त होता था, जब हर व्यक्ति से संगठित हो शत्रु का सामना करने के लिए यह अपेक्षा की जाती थी कि ऐसे क्षणों में यूनाइटेड किंगडिम एकजुट रहेगा ।

    4. चार्ल्स द्वितीय के 13वें आदेश के द्वारा जिसे प्राय: कारपोरेशन एक्ट कहा जाता है, सभी कैथोलिक ईसाइयों को नगरों और कारपोरेशन के प्रशासन कार्य से वंचित कर दिया गया था।

    5. चार्ल्स द्वितीय के 25वें आदेश के द्वारा जिसे प्रायः टेस्ट एक्ट कहा जाता है, सभी कैथोलिक ईसाइयों को सिविल और सेना की नौकरियों से वंचित कर दिया जाता था।

    6. विलियम तृतीय के 7वें व 8वें आदेश के द्वारा लगभग 27वीं शताब्दी रोम के कैथोलिक ईसाइयों को चुनाव में मत डालने से वंचित किया जा सकता है।

    7. चार्ल्स द्वितीय के 30वें आदेश, खंड 2 के द्वारा लगभग पहली शताब्दी में रोम के कैथोलिक पियरों को संसद में पैतृक आधार पर मिलने वाली सदस्यता से वंचित कर दिया गया था।

    8. इसी कानून के द्वारा रोम के कैथालिकों को हाउस आफ कामन्स में सदस्यता से वंचित कर दिया गया था।

   9. रोम के कैथोलिक ईसाइयों को अनेक कानूनों के द्वारा चर्च के अधि कारियों को अपनी संपत्ति का अधिकार हस्तांतरित करने से वंचित कर दिया गया था, जो कानून के तहत यहूदियों तक को मिला हुआ था।

    10. यद्यपि महामहिम की जल सेना और थल सेना में अधिकांश लोग कैथोलिक थे, तब भी किसी भी व्यवस्था में उन्हें धार्मिक सुविधाएं आदि नहीं दी गई थीं, लेकिन यदि वे उन धार्मिक रीतियों का पालन करने से अस्वीकार कर देते जो राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त गिरजाघरों द्वारा निश्चित की गई थी, तब उन्हें भारी दंड और यातना दी जा सकती थी। सेना के नियम के खंड 1 में यह व्यवस्था थी कि यदि कोई सैनिक डिवाइन सर्विस और सर्मन के समय अनुपस्थित रहता है, तब पहली बार के अपराध स्वरूप उसके वेतन में से एक शिलिंग जब्त कर लिया जाएगा। अगर वह दूसरी बार या बार-बार अपराध करता है, तब हर बार एक शिलिंग जब्त करने के अतिरिक्त उसे जेल की सजा भी भुगतनी पड़ेगी। इस कानून की धारा 2 और 5 के तहत यह भी विधान किया गया कि अगर वह अपने से ज्येष्ठ अधिकारी को किसी विधि सम्मत आदेश की अवमानना करता है (और निश्चय ही अगर वह डिवाइन सर्विस और सर्मन के समय उपस्थित रहने के बारे में अपने ज्येष्ठ अधिकारी के आदेश की अवमानना करता है) तब उसे मृत्यु-दंड या और कोई दंड, जैसा भी जनरल कोर्ट मार्शल द्वारा दिया जाए भुगतना पड़ेगा।

    11. महामहिम के अन्य प्रयोजनों की भांति रोम के कैथोलिक ईसाइयों को राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त धर्म का समर्थन करना पड़ेगा। इस प्रकार उन्हें दो धर्मों की विधियों का पालन करना पड़ेगा। निश्चय ही वे इस संबंध में कोई उज्र नहीं करते थे, लेकिन वे यह अनुभव करते थे कि उनकी यह शिकायत उचित ही है कि उनके धर्म को वैसी मान्यता प्राप्त नहीं है, जैसी कि प्रोटेस्टेंट धर्मावलंबियों को प्राप्त है।

    12. अस्पतालों व फैक्टरियों में और अन्य सार्वजनिक स्थानो पर जब कैथोलिक पादरी रोटी और कुछ पेय बांटने आते हैं, तब गरीब कैथोलिक बच्चों को घुसने नहीं दिया जाता और रोम के गरीब कैथोलिक ईसाइयों के बच्चों को उनके माता-पिता के सामने कभी - कभी प्रोटेस्टेंट स्कूलों में जबरदस्ती डाल दिया जाता है। कैथोलिक ईसाइयों की तरह अस्पृश्यों को भी बहिष्कृत किए जाने की यंत्रणा भुगतनी पड़ती है ।