अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
कर्तव्य - विशेषाधिकार - छूट - अपात्रता
I
1. जो ब्राह्मण ब्रह्म से मिलन के साधनों पर एकाग्र हैं और अपने कर्तव्यों के पालन में दृढ़ हैं, आजीवन निम्नलिखित छह कर्तव्यों का पालन करेंगे जिनका (वर्णन) उनके उचित क्रम के अनुसार किया गया है- ( मनु, 10.74)
2. प्रत्येक ब्राह्मण के लिए ये छह कर्म ( निर्धारित हैं), अध्यापन, अध्ययन, स्वयं के लिए यज्ञ करना, अन्यों के लिए यज्ञ करना, दान देना और दान लेना- (वही, 10.75.)
3. लेकिन उसके लिए (निर्धारित ) छह कर्मों में से तीन कर्म उसकी जीविका के साधन हैं अर्थात् अन्यों के लिए यज्ञ करना, अध्यापन और पवित्र व्यक्तियों से दान ग्रहण करना - ( वही, 10.76 . )
4. ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय के लिए तीन कर्म, जो ब्राह्मण के लिए अनिवार्य हैं अर्थात् अध्यापन, अन्यों के लिए यज्ञ करना और उसके निमित्त दान ग्रहण करना, वर्जित हैं- (वही, 10.77.)
5. इसी प्रकार ये तीनों कर्म वैश्य के लिए वर्जित हैं, यह शाश्वत नियम हैं, क्योंकि मनु ने जो समस्त जीवों के स्वामी (प्रजापति) हैं ये कर्म उक्त दोनों ( जातियों के व्यक्तियों के लिए) निर्धारित नहीं किए हैं- (वही, 10.78 )
6. मारने के लिए और फेंक कर मारने के लिए शस्त्रास्त्र धारण करना क्षत्रियों के लिए, व्यापार करना, पशु ( पालन) करना और कृषि वैश्यों के लिए जीविकार्थ निर्धारित कर्म हैं, लेकिन उनके कर्तव्य हैं, दान देना, वेदाध्ययन और यज्ञ करना - (वही, 10.79)
7. सभी व्यवसायों में से ब्राह्मणों के लिए वेद का अध्यापन, क्षत्रिय के लिए रोगों की सुरक्षा करना और वैश्य के लिए व्यापार करना सबसे अधिक उत्तम कर्म हैं- (वही, 10.80.)

8. ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है। क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करेगा, उसका उसे कोई फल नहीं मिलेगा- (वही, 10.123)
9. लेकिन यदि ब्राह्मण अपने इन विशिष्ट कर्मों से जिनका अभी उल्लेख किया गया है, अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तब क्षत्रियों के लिए लागू नियम से जीवन-निर्वाह कर सकता है, क्योंकि वह पद के अनुसार उसके बाद आता है- ( मनु, 10.81.)
10. यदि यह पूछा जाए कि अगर वह इन दोनों कर्मों में से कसी भी एक कर्म से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तब क्या किया जाए तो उत्तर है कि वह वैश्य की जीवन-पद्धति अपना ले, स्वयं खेती करे और पशु-पालन करे - (वही, 10.82)
11. जैविका के लिए संकट - ग्रस्त होने पर क्षत्रिय इन साधनों से जीविका निर्वाह करे जो वैश्य के लिए वर्जित नहीं हैं - (वही, 10.95.)
12. अपने कार्यों से जीवन-निर्वाह न कर सकने वाला वैश्य शूद्र की जीवन-पद्धति द्वारा अपना जीवन निर्वाह करे और यह विचार करे कि ये कार्य तो ( उसके लए) निषिद्ध हैं और जब वह समर्थ हो जाए तब उसे उस कार्य से निवृत्त हो जाना चाहिए - (वही, 10.98.)
13. लेकिन जब शूद्र को द्विजों से सेवा कार्य न मिल सके और जब उसकी पत्नी, पुत्रों आदि के भूख से मर जाने की स्थिति आ जाए, तब उसे काठ कर्म द्वारा जीविका का निर्वाह करना चाहिए - (वही, 10.99.)
III
14. क्षत्रिय उद्दंड होकर कभी भी वह जीवन-पद्धति न अपनाए जो ( उससे ) श्रेष्ठ (अर्थात् ब्राह्मणों के लिए) निर्धारित है- (वही, 10.95.)
15. राजा को वैश्य को व्यापार करने, ब्याज पर धन देने, कृषि करने, पशु उधार देने और शूद्र को द्विज जातियों की सेवा करने का आदेश देना चाहिए- (वही, 8.410 )
16. राजा सावधानीपूर्वक वैश्यों और शूद्रों को अपना-अपना कर्तव्य ( जो उनके लिए निर्धारित हैं) करने के लिए बाध्य करे, अगर ये दोनों जातियां अपने-अपने कर्म से विरत होती हैं, तब वे इस समस्त संसार को अस्त-व्यस्त कर डालेंगी - (वही, 8.418;
)
IV
1. कोई भी राजा अंधे व्यक्ति को मूर्ख को, (अपंग को ) जो लाठी के सहारे के बिना उठ बैठ या चल न सकता हो, उस व्यक्ति को जिसने सत्तर वर्ष की आयु पूरी कर ली हो और जो श्रोत्रियों को आर्थिक सहायता देता है, कोई कर देने के लिए बाध्य नहीं करेगा - ( मनु, 8.394.)
2. कोई भी राजा ( अभाव से) कितना ही ग्रस्त क्यों न हो, फिर भी श्रोत्रियों पर कर न लगाए और उसके राज्य में निवास करने वाला कोई भी श्रोत्रियों भूख से न मरे (वही, 7.133.)
3. राजा अपने राज्य में रहने वाले साधारण जनों से जो फुटकर वस्तुओं की खरीद बिक्री से जीवन-निर्वाह करते हैं, कुछ धन वार्षिक देने को कहे जिसे कर कहा जाता है- (वही, 7.137.)
4. वह (राजा) यांत्रिकों और कारीगरों के साथ-साथ शूद्रों से भी जो शारीरिक श्रम कर जीवन-यापन करते हैं (अपने लिए) महीने में एक दिन काम करवाए - (वही, 8.138.)
5. ब्राह्मण के लिए मृत्यु - दंड के स्थान पर उसका सिर मुंडा देना निश्चित किया गया है, लेकिन अन्य जातियों के लोगों के लिए मृत्यु - दंड निश्चित किया गया है- (वही, 8.379.)
6. (राजा) किसी भी ब्राह्मण का वध न कराए चाहे उस ब्राह्मण ने सभी अपराध क्यों न किए हों, वह ऐसे ( अपराधी को) अपने राज्य से निष्कासित कर दे और उसे (अपनी समस्त संपत्ति और अपना (शरीर) सकुशल ले जाने दे - (वही, 8.380)
7. इस पृथ्वी पर ब्राह्मण के बध से बढ़कर कोई दूसरा बड़ा पाप नहीं समझा जाता है, इसलिए राजा को अपने मन में किसी ब्राह्मण का वध करने का विचार नहीं लाना चाहिए (वही, 8.381.)
8. जब किसी विद्वान ब्राह्मण को प्राचीन काल में भूमि में गड़ी कोई निधि मिल जाए तब वह उसे सारी की सारी ग्रहण कर ले क्योंकि वह प्रत्येक वस्तु का स्वामी है- (वही, 8.37.)
9. जब राजा को भूमि में गड़ी कोई पुरानी निधि मिल जाए तब वह उसका आधा भाग ब्राह्मणों को दे दे और शेष आधा भाग अपने राजकोष में जमा कर दे - (वही, 8.38.)