अस्पृश्यता और अराजकता - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
asprushyata aur arajakta dr babasaheb ambedkar
1. पुरुष के विषय में कहा जाता है कि वह नाभि के नीचे की अपेक्षा उसके ऊपर अधिक शुद्ध होता है, इसलिए स्वयंभू ने उसका मुख उसके शरीर में सबसे अधिक शुद्ध घोषित किया है- (मनु, 1.92.)
2. चूँकि ब्राह्मण मुख से उत्पन्न हुआ, चूंकि वह सबसे पहले उत्पन्न हुआ और चूंकि उसे वेद प्राप्त हैं, इसलिए वह अधिकार से अपनी इस समस्त सृष्टि का स्वामी है- (वही, 1.93.)
3. चूँकि स्वयंभू ने तपस्या पूर्ण करने के बाद उसे अपने मुख से उत्पन्न किया जिससे पूजार्चना देवताओं और पितृगणों को भेजी जा सके और यह ब्रह्मांड संरक्षित रहे (वही, 1.94.)
4. कौन ऐसा सृजित जीव है जो उससे श्रेष्ठ है जिसके मुख के माध्यम से देवता हव्य और पितृगण कव्य को ग्रहण करते हैं- (वही, 1.95.)
5. समस्त सृष्टि में वे सर्वश्रेष्ठ हैं जो प्राणधारी हैं, प्राणियों में वे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनकी जीविका का साधन बुद्धि है, बुद्धिजीवियों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है और मनुष्यों में (वे सर्वश्रेष्ठ हैं) जो ब्राह्मण हैं- (वही, 1.96.)
6. ब्राह्मण अस्तित्व में आने के बाद इस पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ के रूप में जनम लेता है, वह समस्त सृजित प्राणियों का स्वामी होता है - (वही, 1.99.)
7. पृथ्वी पर जो कुछ भी है वह सब ब्राह्मणों का है। अपनी उत्पत्ति को उत्तम होने के कारण ब्राह्मण निश्चय ही सबका अधिकारी है- (वही, 1.100. )
8. जिस प्रकार शास्त्र विधि से स्थापित अग्नि तथा सामान्य अग्नि- दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में महान है- (वही, 9.317.)

9. यद्यपि ब्राह्मण सभी प्रकार के शुद्ध कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, तथापि वे हर प्रकार के पूजनीय हैं क्योंकि वे महान देवता हैं- (वही, 9.319.)
10. और (पिता) अपने बालक के जन्म के दसवें या बारहवें दिन या शुभ तिथि पर शुभ मुहुर्त में शुभ ग्रहों का योग होने पर बालक का नामकरण संस्कार कराए - ( वही, 2.30.)
11. ब्राह्मण के नाम का पहला भाग ऐसा हो जो (कुछ) मंगलकारी होने का सूचक हो, क्षत्रिय का शक्ति से संबंधित और वैश्य का संपत्ति से संबंधित हो, लेकिन शूद्र का (कुछ ऐसा हो ) जो घृणा योग्य हो - ( मनु, 2.31.)
12. ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा (शब्द) होगा जिसमें सुख का भाव निहित हो, क्षत्रिय के नाम का दूसरा भाग ऐसा (शब्द) होगा जिसमें रक्षा करने का भावि निहित हो और वैश्य का ऐसा (शब्द) होगा जिसमें समृद्धि का भाव निहित हो तथा शूद्र का ऐसा होगा जिससे सेवा करने का भाव व्यक्त हो- (वही, 2.32.)
13. वह (ब्राह्मण) ऐसे देश में निवास न करे जहां के शासक शूद्र हों, न ही (ऐसे देश में निवास करे ) जहां कदाचारी व्यक्तियों का बाहुल्य हो, न ही (ऐसे देश में निवास करे) जहां अपधर्म व्याप्त हो, न ही (ऐसे देश में निवास करे ) जहां निम्नतम जातियां भरी पड़ी हों- (वही, 4. 61. )
14. जब राजा स्वयं ( किसी न्यायिक विवाद के) कारणों के संबंध में निर्णय न कर सके तब उसे चाहिए कि वह इस कार्य के लिए किसी ब्राह्मण को नियुक्त करे जो विभिन्न शास्त्रों का विद्वान हो- ( कात्यायन, 6.3.)
15. जब (उक्त गुणों से युक्त ) कोई ब्राह्मण नहीं मिल सकता हो तब राजा को चाहिए कि वह किसी क्षत्रिय या वैश्य को नियुक्त करे जो धर्म में निष्णात हो और राजा को किसी शूद्र को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने से सतर्क रहना चाहिए - (वही, 6.7.)
16. इनके अतिरिक्त अन्य के द्वारा ( न्यायाधीश के रूप में) जो कुछ किया गया है, वह निश्चित रूप से गलत किया गया समझा जाना चाहिए, चाहे वे (राजा केही) अधिकारी क्यों न हों और चाह संयोग से इस प्रकार किया गया निर्णय धर्म-ग्रंथों के अनुसार ही क्यों न हो- (वही, 68. )
17. ब्राह्मण जो अपनी जाति के नाम के कारण ही भरण-पोषण करता है या जो अपने को केवल ब्राह्मण कहता है ( चाहे उसका वंश अनिश्चित ही क्यों न हो) वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचप कर सकता है, लेकिन यह कार्य कोई शूद्र कभी नहीं कर सकता - ( मनु, 8.20.)
18. जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है और उसी की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय का विचार करता है, वह राज्य उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त होता है, जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे धंस जाती है- (मनु, 8.21.)
19. किसी ब्राह्मण को जो कानून को अच्छी तरह जानता है अपने प्रति किसी के द्वारा किए गए अपराध के विषय में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपनी शक्ति से ही उस व्यक्ति को दंडित कर सकता है, जिसने अपराध किया है- (वही, 9.31.)
20. उसकी अपनी शक्ति राजा की शक्ति से अधिक होती है, इसलिए ब्राह्मण अपनी शक्ति से ही अपने शत्रुओं को दंड दे सकता है - (वही, 11.32.)
21. ब्राह्मण के बारे में यह घोषित है कि वह (विश्व का ) सृजक, दंडदाता, शिक्षक है और इसलिए वह (सभी सृजित प्राणियों का ) उपकारकर्ता है, इसलिए कोई भी व्यक्ति उससे अपभाषण न करे और न उसके विरुद्ध कटूक्ति ही बोले- (वही, 11.35.)