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अस्पृश्यता - उसका स्रोत - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

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23 मे 2023
Book
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II

     अब हम अमरीका में नीग्रों लोगों के बारे में उनके उस युग की वास्तविक दशा पर विचार करेंगे, जब कानून की दृष्टि में वे गुलाम माने जाते थे। यहां कुछ ऐसे तथ्य दिए जा रहे हैं, जिनसे उनकी दशा पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है:

     लैफायत ने स्वयं यह देखा कि क्रांति के दौरान श्वेत और अश्वेत नाविकों और सैनिकों ने एकजुट हो आपस में बिना किसी कटुता के संघर्ष किया। उत्तरी कैरोलिना के ग्रानविले काउंटी में जॉन चैविस नाम एक मूल नीग्रो था, जिसकी शिक्षा-दीक्षा प्रिंसटन विश्वविद्यालय में हुई थी। वह श्वेत छात्रों के लिए एक प्रायवेट स्कूल चलाता था। उसे स्थानीय चर्च द्वारा राज्य में श्वेतों की सभाओं में प्रवचन करने का भी अधिकार मिला हुआ था। उसके शिष्यों में से एक शिष्य उत्तरी कैरोलिना का गवर्नर और दूसरा राज्य का एक प्रमुख विग सीनेटर भी हुआ। उसके दो शिष्य उत्तरी कैरोलिना के मुख्य न्यायाधीश के पुत्र थे। राज्य की सबसे बड़ी सैनिक अकादमी के संस्थापक का पिता उसके स्कूल में पढ़ा और उसी के घर में रहा। ... इस प्रकार गुलाम हर प्रकार का कार्य करते थे। नीग्रो गुलामों में जो अधिक प्रतिभाशाली होते थे, उन्हें कारीगर का प्रशिक्षण दिया जाता था, जिससे उनका उपयोग हो सके और उनकी सेवाएं ठेके पर दी जा सकें। गुलाम कारीगरों से बाजार में उपलब्ध दूसरे सामान्य कारीगरों की अपेक्षा दुगुनी आय होती थी । उस्ताद कारीगरों के अपने कर्मचारी होते थे। चूंकि इस पद्धति का विकास होता गया, कुछ उस्ताद कारीगर अपने गुलाम कारीगरों के लिए भाड़े पर गुलामों को रखने लगे। बहुत से गुलाम कारीगर अपनी बचत से जो उन्हें सामान्यतः किए गए काम से अधिक काम करने से होती, उन्हें खरीद लिया करते थे।

Slavery and Untouchability - Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

(1. दि नीग्रो इन अमरीकन सिवीलाइजेशन, चार्ल्स सी जॉनसन)

     काम छोड़कर भाग जाने वाले गुलामों और उनकी बिक्री के बारे में जो विज्ञापन प्रकाशित होते, उनसे इस परिपाटी के विकसित हो जाने की पुष्टि होती है। इन लोगों को गरीब श्वेत मजदूरों के बराबर या उनसे अधिक वेतन मिलता और अपने उस्तादों के प्रभाव से अच्छे से अच्छा काम मिल जाता था। 1838 एथेंस और जार्जिया में चिनाई व लकड़ी का काम करने वालों के ठेकेदारों को एक याचिका दी गई कि वे नीग्रो मजदूरों को तरजीह देना बंद कर दें। 'कानूनी तौर पर ' नैतिक दृष्टि से और नागरिकता की दृष्टि से इस देश और राज्य के असली मालिक श्वेत हैं। उनके स्वामित्व का अधिकार तभी स्थापित हो गया था, जब श्वेत जाति के कोपरनिकस और गैलिलियो ने पृथ्वी को गोलाकार साबित कर दिया था। इसका ज्ञान एक अन्य श्वेत व्यक्ति कोलंबस को भी था, जिसने पश्चिम की ओर चलकर इस भूमि का पता लगाया । इसलिए एक श्वेत व्यक्ति ने ही इस महाद्वीप की खोज की। इस प्रकार आप उसी वर्ग के व्यक्तियों को रोजी-रोटी से वंचित कर रहे हैं, उनके परिवार का पेट काट रहे हैं। आप सौदेबाजी में भी उन्हें काम न देकर नीग्रो लोगों का पक्ष ले रहे हैं। 1858 में अटलांटा में श्वेत मिस्त्रियों और मजदूरों ने उस्तादों के अश्वेत गुलाम कारीगरों के खिलाफ याचिका दी, जो अलग कालोनी में रह रहे थे। उसके अगले वर्ष ही बहुत से श्वेत नागरिकों ने इस बात पर आपत्ति प्रकट की कि नगर परिषद ने उनकी कालोनी में एक नीग्रो दंत चिकित्सक को डाक्टर की इजाजत दे रखी है। 'हमारे और समाज के साथ न्याय करने के लिए उस पर रोक लगाई जाए। हम अटलांटा के नागरिक आप से न्याय की गुहार करते हैं । ' जार्जिया के रिचमंड काउंटी में 1819 में स्वतंत्र नीग्रो वर्ग की जनगणना से पता चला है कि उनमें बढ़ई, नाई, बोटकोर्कर, जीनसाज, चर्खा कातने वाले, मिलराइट, होल्स्टर, जुलाहे, करघा बनाने वाले, आरा मशीन चलाने वाले और स्टीम बोट पायलेट थे। एक नीग्रो मोची ने अपने हाथ से जूते बनाए थे, जो राष्ट्रपति मुनरो ने अपना पद ग्रहण करते समय पहने थे। मोंटीसेलो में थामस जेफर्सन के घर पर जिस खूबसूरती से एक गुलाम ने टाइलें बिछाई थीं, उसे देख हैरियत मार्टीन्यू को दंग रह जाना पड़ा था। आज भी पुराने बाग में यह भवन मौजूद है, जिसमें इन नीग्रो कारीगरों का कमाल देखने को मिलता है। इन लोगों ने ओक वृक्षों के तनों को चीरकर उसे उन्हीं वृक्षों की लकड़ी के कीलों को जोड़-जोड़ कर तैयार किया था । कताई और बुनाई में प्रवीण नीग्रो स्त्रियां मिलों में कार्य करती थीं। बंकिघम ने 1839 में एथेंस और जार्जिया में देखा कि ये नीग्रो श्वेत लड़कियों के साथ कार्य कर रहे थे और उनमें श्वेत लड़कियों के प्रति तिरस्कार या आपत्ति की कोई भावना नहीं थी । दक्षिण के नीग्रो कारीगर चाहे वे गुलाम होते या मुक्त, सभी अपने उत्तरी क्षेत्र के भाइयों से बेहतर थे। फिल्डेल्फिया में 1856 में लोगों की चिढ़ के कारण 1,637 नीग्रो कारीगरों में से दो तिहाई से भी कम अपना धंधा कर पाते थे। उत्तर में आयरिश लोगों को जो 19वीं शताब्दी के शुरू से ही अमरीका में आने शुरू हो गए थे, उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर काम कर लिया जाने लगा, जो गुलामों पर लागू होते थे। उनके पक्ष में कहा गया था कि एक आयरिश कैथोलिक मुश्किल से ही अपनी स्थिति को सुधार पाता है, जब कि इस बारे में नीग्रो लोग सफल हो जाते हैं। जिस समय अश्वेत गुलामों की खरीद-फरोख्त का चलन था तो क्या ओलीवर क्रोमवेल ने उन सभी आयरिश लोगों को बेच नहीं दिया था जो फ्लोरिडा के ड्रोघेदा नरसंहार से बच बार्बेडोस भाग आए थे । न्यूयार्क और पैंसिलवानिया के मुक्त और भगोड़े नीग्रो लोगों का इन लोगों के साथ बराबर टकराव होता रहता था। इस टकराव का सबसे भयंकर रूप उन दंगों में देखने के लिए मिला, जो न्यूयार्क में भड़क उठे थे। इन मूल आयरिश लोगों का मकान बनाते समय बेलदार के रूप में काम पर और छोटे-बड़े कामों पर एकाधिकार था। इसलिए वे नीग्रो लोगों की किसी भी ऐसी कोशिश पर भड़क उठते, जो उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए खतरा लगती ।


III

     यह रोमन गुलामों और अमरीका के नीग्रो गुलामों की यथार्थ स्थिति थी। क्या भारत में अस्पृश्यों की स्थिति में कहीं कोई ऐसी बात है, जिसकी रोमन गुलामों और नीग्रो गुलामों की स्थिति से तुलना की जा सके? अगर हम रोमन और नीग्रो गुलामों की स्थिति के साथ अस्पृश्यों की स्थिति की तुलना करने के लिए समान युग का चयन करें तो यह अनुचित नहीं होगा। लेकिन मैं आज अस्पृश्यों की तुलना गुलामों की उस दशा से करना अनुचित नहीं समझता, जो रोमन साम्राज्य में उनकी थी। यह तुलना ऐसी होगी कि हम बदतर स्थिति की तुलना किसी श्रेष्ठ स्थिति से कर रहे हैं, क्योंकि अस्पृश्यों के संबंध में उनकी आज की स्थिति स्वर्णिम स्थिति समझी जाती है। आज की अस्पृश्यों की वास्तविक स्थिति गुलामों की वास्तविक स्थिति से कितनी भिन्न है? आज कितनी संख्या में अस्पृश्य लायब्रेरियन, स्टेनोग्राफर आदि जैसे व्यवसायों में लगे हुए हैं, जितने कि इन व्यवसायों में रोम में गुलाम नियुक्त थे? आज कितने अस्पृश्य वाकपटु, भाषाविज्ञानी, दार्शनिक, अध्यापक, डाक्टर और कलाकार हैं और बौद्धिक कार्यकलाप करते हैं, जैसा कि रोम में गुलाम किया करते थे। क्या रोम के गुलामों की तरह भारतीय अस्पृश्यों से ये काम कराए जाते हैं, क्या कोई हिंदू ऐसी हिम्मत रखता है कि इन प्रश्नों का उत्तर 'हां' कह कर दे ? अस्पृश्यों के लिए ये सारे रास्ते पूरी तरह बंद हैं, जब कि रोमन गुलामों के लिए ये पूरी तरह खुले हुए थे। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि हिंदू अस्पृश्यता को उचित ठहराने के लिए जो दलील देते हैं, कितनी सारहीन है। दुख तो इस बात का है कि अधिकांश लोग गुलामी को मात्र इसलिए बुरा बताते हैं कि इसमें कानून द्वारा एक व्यक्ति के जीवन का जो अधिकार दूसरे को सौंप दिया जाता है, वह गलत है। वे यह भूल जाते हैं, चाहे गुलाम प्रथा हो या न हो, जुल्म, उत्पीड़न, क्रूरता और प्रताड़ना बनी ही रहती है, जिससे पीड़ा, हताशा और नैराश्य का जन्म होता है। जो लोग गुलामों की उपरोक्त यथार्थ स्थिति पर विचार करेंगे, उन्हें यह मानना पड़ेगा कि गुलाम - प्रथा को उसकी कानूनी अवधारणा पर हल्के फुल्के ढंग या तपाक से बुरा कह देना निरर्थक बात होगी। जो कुछ कानून अनुमति देता है, वह समाज में प्रचलित व्यवस्था का साक्ष्य नहीं है । बहुत से गुलाम यह स्वीकार कर लेंगे कि उनके पास जो कुछ है, वह गुलाम प्रथा के कारण ही है, और बहुतों ने संपदा अर्जित की, चाहे उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार किया हो अथवा नहीं।

     यह अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि गुलाम - प्रथा कोई स्वतंत्र समाज - व्यवस्था नहीं है। किंतु क्या अस्पृश्यता एक स्वतंत्र व्यवस्था है? जो हिंदू अस्पृश्यता का समर्थन करते हैं, निस्संदेह वे कहेंगे कि 'हां, यह स्वतंत्र समाज-व्यवस्था है।' वे यह भूल जाते हैं कि गुलामी और अस्पृश्यता में अनेक प्रकार के अंतर हैं, और इनके कारण ही अस्पृश्यता परतंत्र समाज-व्यवस्था का सबसे अधिक कुत्सित रूप है। गुलामी कभी अनिवार्य नहीं रही, परंतु अस्पृश्यता अनिवार्य व्यवस्था है। कोई व्यक्ति किसी को भी गुलाम के रूप में रख सकता था। यदि वह किसी को गुलाम न रखना चाहे तब उस पर ऐसा न करने की कोई पाबंदी नहीं। परंतु अस्पृश्यता के संबंध में कोई विकल्प नहीं। अगर कोई एक बार अस्पृश्य के घर में जन्म ले ले, तब वह सब तरह से अस्पृश्य हो जाएगा। गुलाम-प्रथा के कानूनों में मुक्ति का विधान है। कोई व्यक्ति यदि एक बार गुलाम हो गया, तो यह आवश्यक नहीं कि वह जीवन-भर गुलाम ही रहेगा। अस्पृश्य होने पर वह उससे बच नहीं सकता। एक बार अस्पृश्य, तो हमेशा के लिए अस्पृश्य । दूसरा अंतर यह है कि अस्पृश्यता गुलामी का एक अप्रत्यक्ष रूप है और इसलिए अत्यंत कुत्सित है। किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से खुले तौर पर और प्रत्यक्ष रीति से वंचित कर देना गुलाम बनाने की बेहतर प्रथा है। इससे एक गुलाम को अपनी गुलामी का अहसास रहता है और यह प्रतीति ही आजादी की लड़ाई का सबसे पहला ओर अमोघ अस्त्र है। परंतु यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अप्रत्यक्ष रीति से छीन ली जाए, तब उसे अपने गुलाम होने का अहसास ही नहीं होगा। अस्पृश्यता गुलाम - प्रथा का एक अप्रत्यक्ष रूप है। किसी अस्पृश्य से कहा जाए कि 'तुम स्वतंत्र हो, तुम एक नागरिक हो, तुमको नागरिकता के सभी अधिकार प्राप्त है और उसे रस्सी से इस तरह बांध दिया जाए कि वह स्वतंत्र होने का अनुभव भी न कर सके, तब यह निर्दयतापूर्वक धोखा देना है। अस्पृश्यों को उनकी गुलामी का अहसास न होने देना उनको गुलाम बनाना है। यह अस्पृश्यता है, तो भी यह गुलामी है । यह यथार्थ है, हालांकि यह अप्रत्यक्ष है। यह अव्यक्त है इसलिए यह स्थाई है। इन दोनों व्यवस्थाओं में से अस्पृश्यता निस्संदेह बुरी है ।

     न तो गुलामी ही स्वतंत्र समाज-व्यवस्था है और न ही अस्पृश्यता । परंतु यदि इन दोनों में अंतर किया जाए, और इस बात में कोई संदेह भी नहीं है कि इन दोनों में अंतर है, तो इस अंतर की कसौटी यह होगी कि क्या गुलामी की स्थिति में शिक्षा, नैतिक आदर्श, सुख, संस्कृति और समृद्धि संभव है, या यह अस्पृश्यता की स्थिति में संभव है। अगर इस कसौटी पर इन दोनों स्थितियों को परखा जाए, तब निस्संदेह यह पता चलेगा कि गुलामी की स्थिति सौ दर्जे अच्छी है। गुलामी में शिक्षा, नैतिक आदर्श, सुख, संस्कृति और समृद्धि की गुंजाइश है। अस्पृश्यता में तो इनमें से किसी की गुंजाइश नहीं। अस्पृश्यता में गुलामी जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था के लाभ की कोई संभावना नहीं। इसमें स्वतंत्र व्यवस्था की सारी हानियां विद्यमान हैं। गुलामी जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था में कुछ लाभ भी हैं, जैसे व्यापार, दस्तकारी या कला का अनुभव, या जैसा कि प्रोफेसर मूरेस ने इसे 'उच्च संस्कृति की दीक्षा का सोपान' कहा था। गुलामी की प्रथा में, विशेषकर जो प्रथा रोमन साम्राज्य में प्रचलित थी, उसमें अस्पृश्यता को समाप्त करने या व्यक्तिगत विकास की बाधाओं की अस्वीकृति का प्रश्न ही नहीं हुआ । इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गुलामी की प्रथा अस्पृश्यता से बेहतर है।

     इस प्रकार यह प्रशिक्षण, संस्कृति से परिचय निस्संदेह गुलामों के लिए एक बहुत बड़ी नियामत थी। इसमें मालिकों को अपने गुलामों के प्रशिक्षण और उन्हें सुसंस्कृत करने पर काफी धन खर्च करना पड़ता था । 'गुलामों के रूप में रखने से पूर्व बहुत कम गुलाम ऐसे मिलते थे, जो शिक्षित या दीक्षित होते थे। इसका उपाय यही था कि उन्हें छोटी अवस्था से ही घरेलू कामों में प्रशिक्षित कर दिया जाए या कारीगरी सिखा दी जाए, जैसा कि साम्राज्य की स्थापना के पूर्व कुछ मात्रा ज्येष्ठ काटो ने किया था। यह प्रशिक्षण उनके मालिकों और उनके यहां मौजूद कार्मिकों द्वारा दिया जाता था। दरअसल अमीर घरों में विशेष प्रशिक्षक होते थे। यह प्रशिक्षण कई प्रकार के क्षेत्रों में दिया जाता था, जैसे उद्योग, व्यापार, कला और साहित्य । '

     ये मालिक अपने गुलामों को अच्छे से अच्छे कामों और संस्कृति में क्यों प्रशिक्षित करते थे, निस्संदेह उनका उद्देश्य इनसे आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता था। कुशल श्रमिक अकुशल श्रमिक की तुलना में अधिक मूल्यवान मद होती थी। उसे बेचने पर उसकी कीमत ज्यादा मिलती और भाड़े पर चढ़ाने पर उसकी मजदूरी भी ज्यादा मिलती थी। इसलिए मालिकों द्वारा गुलामों को शिक्षित करना मानो पूंजी निवेश करना था ।

     गुलाम - प्रथा जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था में गुलामों का भरण-पोषण करना और उन्हें स्वस्थ रखना उनके मालिकों का दायित्व था । गुलाम को अपने भोजन, कपड़ों और अपनी रिहायश के बारे में चिंता से मुक्त रखा जाता था। इस सबकी व्यवस्था करने के लिए मालिक बाध्य होता था । यह उसके मालिक के लिए बोझ नहीं होता था, क्योंकि गुलाम अपने ऊपर होने वाले खर्च से ज्यादा कमा लेता था। लेकिन हर स्वतंत्र व्यक्ति के लिए अपनी रोजी-रोटी और मकान की कोई सुरक्षित व्यवस्था हमेशा संभव नहीं होती है, क्योंकि श्रमिक अपनी-अपनी कीमत जानते हैं। जो काम करने के लिए तैयार है, उस तक को काम नहीं मिलता और श्रमिक के संबंध में ऐसा कोई नियम भी नहीं है, जिसके अधीन उसे उन दिनों तक दाना-पानी मिल सके, जब तक उसे कोई काम नहीं मिल जाता है । यह नियम कि काम नहीं तो रोटी नहीं, गुलामों पर नहीं लागू होता है। उसके लिए रोटी के साथ-साथ काम ढूंढने की जिम्मेदारी मालिक पर होती है। अगर मालिक उसके लिए काम ढूंढने में असफल रहता है, तो इससे गुलाम का अपने लिए रोटी मिलने का अधिकार नहीं छिन जाता है। व्यापार में उतार-चढ़ाव, लाभ और हानि सामान्य परिवर्तन हैं, जिन्हें हर स्वतंत्र श्रमिक को भोगना होता है। लेकिन इनका गुलामों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इनका प्रभाव उसके मालिक पर तो पड़ सकता है, लेकिन गुलाम इन सबसे मुक्त है। उसे अपनी रोटी, शायद वही रोटी मिलती है, चाहे लाभ के दिन हों या घाटा हो रहा हो ।

     गुलाम-प्रथा जैसी परतंत्र समाज - व्यवस्था में गुलाम के स्वास्थ्य और उसके कुशल-क्षेम का ध्यान रखने के लिए उसका मालिक बाध्य है। गुलाम, मालिक की संपत्ति था। लेकिन गुलामों की यही निर्भरता स्वतंत्र व्यक्ति के मुकाबले उनके लिए वरदान बन गई। वे संपत्ति स्वरूप थे, इसलिए मूल्यवान थे। मालिक अपने हित में गुलामों के स्वास्थ्य और उनके कुशल क्षेम का पूरा ध्यान रखते थे। रोम में गुलामों को दलदली इलाकों या मलेरिया - ग्रस्त क्षेत्रों में कभी नहीं भेजा जाता था। ऐसे क्षेत्रों में स्वतंत्र व्यक्ति भेजे जाते थे। काटो ने रोमन किसानों को सलाह दी थी कि वे कभी भी अपने गुलामों को दलदली या मलेरिया-ग्रस्त क्षेत्रों में न भेजें। यह अजीब सा लगता है। परंतु जरा-सा ध्यान देने पर ही पता चल जाएगा कि यह स्वाभाविक भी था। आखिर गुलाम उनकी मूल्यवान संपत्ति होते थे। इसलिए कोई समझदार मालिक जिसे अपने हित का ज्ञान है, अपनी मूल्यवान संपत्ति को मलेरिया से क्यों तबाह होने दे। परंतु जो गुलाम नहीं थे, उनकी किसे परवाह थी क्योंकि वे किसी की संपत्ति थोड़े ही होते थे? इस कारण गुलामों को बड़ी सुविधा प्राप्त थी। उनका इतना ध्यान रखा जाता था, जितना और किसी का नहीं रखा जाता ।

     अस्पृश्यों को परतंत्र समाज-व्यवस्था की उक्त इन तीनों सुविधाओं में से कोई भी सुविधा प्राप्त नहीं है। उच्चतर अध्ययन के क्षेत्र में अस्पृश्य का कोई प्रवेश नहीं है, उसके लिए सभ्य जीवन के कोई रास्ते नहीं खुले हुए हैं। उसका काम सिर्फ सफाई करना है। उसे और कुछ नहीं करना है। अस्पृश्यता का अर्थ उसकी रोजी-रोटी की सुविधा नहीं है। हिंदुओं में से कोई भी अस्पृश्य को रोजी-रोटी, मकान व कपड़ा करने के लिए जिम्मेदार नहीं है। अस्पृश्य का स्वास्थ्य किसी की जिम्मेदारी नहीं। अस्पृश्य की मौत शुभ मानी जाती है। एक हिंदू कहावत है 'अस्पृश्य मरा गंद हटा।

     दूसरी तरफ, अस्पृश्य के लिए स्वतंत्र समाज-व्यवस्था की सभी बलाएं उसकी तकदीर में लिखी हैं। स्वतंत्र समाज-व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसकी यही जिम्मेदारी स्वतंत्र समाज-व्यवस्था का सबसे बड़ा अभिशाप है। कोई इस उत्तरदायित्व को पूरा कर पाता है या नहीं, यह समान अवसर और समान व्यवहार मिलने पर निर्भर करता है। हालांकि अस्पृश्य एक स्वतंत्र व्यक्ति होता है, तो भी उसे समान अवसर नहीं मिलते और न उसके साथ राग-द्वेष से मुक्त व्यवहार ही होता है । इस दृष्टि से अस्पृश्यता गुलाम-प्रथा की तुलना में न केवल बदतर है, बल्कि यह निश्चय ही एक क्रूर कर्म है। गुलामी की प्रथा में गुलाम के लिए रोजी ढूंढने की जिम्मेदारी उसके मालिक की होती है। स्वतंत्र मजदूर व्यवस्था में रोजी प्राप्त करने के लिए मजदूरों को अपने साथियों का मुकाबला करना पड़ता है। इस धक्का-मुक्की में अस्पृश्य के लिए अवसर कहां? संक्षेप में, जिस प्रतियोगिता में सामाजिक कलंक के कारण अस्पृश्य का पक्ष निर्बल हो, तब जिन्हें रोजगार दिया जाएगा, उनकी सूची में उसका आखिरी नंबर होगा और जिन लोगों को निकाला जाना है, उनमें उसका प्रथम स्थान होगा। गुलाम-प्रथा की तुलना में अस्पृश्यता इसलिए क्रूर कर्म है कि इससे अस्पृश्यों पर अपने लिए रोजी कमाने का दायित्व डाल दिया जाता है, जब कि रोजी कमाने के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह खुले नहीं होते ।

     सारांश यह है कि हिंदू, अस्पृश्यों को गुलामों की स्थिति से भिन्न उन स्थितियों में अपना मानते हैं, जिनसे उनके स्वार्थ की पूर्ति होती है और जब उन्हें अपने साथ रखने में उनका स्वार्थ आड़े आ जाता है और वे बोझ लगने लगते हैं, तब वे उनको अपना कहने और अपने बराबर रखने से इंकार कर देते हैं। अस्पृश्य, परतंत्र समाज-व्यवस्था के किसी लाभ के अधिकारी होने का दावा नहीं कर सकते, उन्हें स्वतंत्र समाज-व्यवस्था की सभी मुसीबतों को स्वयं ढोने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है।