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अस्पृश्यता - उसका स्रोत - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

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23 मे 2023
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अस्पृश्यता - उसका स्रोत ( भाग 5 )  - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

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भारत की बहिष्कृत बस्तियां - अस्पृश्यता की केन्द्र- समाज से बाहर

     हिंदू समाज - व्यवस्था में अस्पृश्यों की सामाजिक स्थिति क्या है? उनकी स्थिति की सही जानकारी देना ही इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य है। लेकिन हिंदू समाज-व्यवस्था में अस्पृश्य किस प्रकार रहते हैं या उन्हें किस प्रकार रहने के लिए मजबूर किया जाता है, इसका यथार्थ और प्रत्यक्ष चित्र उनके सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए सबसे अच्छा माध्यम ढूंढ निकालना कोई आसान काम नहीं है। एक उपाय यह है कि हम हिंदू समाज-व्यवस्था का एक माडल बना लें और तब उसमें उनकी उस स्थिति को प्रदर्शित करें, जो उन्हें यहां दी गई है। इसके लिए हिंदुओं के किसी गांव जाना आवश्यक है। हमारे उद्देश्य की पूर्ति के लिए अच्छा उपाय और कोई नहीं है। हिंदुओं का गांव हिंदुओं की समाज-व्यवसथा की मानो प्रयोगशाला है। गांव में हिंदू समाज - व्यवस्था का पूरा-पूरा पालन होता है। जब कभी कोई हिंदू भारतीय गांवों का जिक्र करता है, तो वह उल्लास से भर उठता है। वह उन्हें समाज - व्यवस्था का आदर्श रूप मानता है। उसकी यह पक्की धारणा है कि संसाद में इसकी कोई तुलना नहीं। कहा जाता है कि सामाजिक संगठन के सिद्धांत में भारतीय गांवों का एक विशेष योगदान है, जिसके लिए भारत गर्व कर सकता है।

     हिंदू अपनी इस धारणा के बारे में कि भारतीय गांव सामाजिक संगठन के आदर्श रूप हैं, कितने कट्टर होते हैं, इसका अनुमान भारतीय संविधान सभा के हिंदू सदस्यों के धुंआधार भाषणों से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने अपने इस मत के समर्थन में दिए थे कि भारतीय संविधान में भारतीय गांवों को स्वायत्त प्रशासनिक इकाइयों के संवैधानिक पिरामिड के आदर्श के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, जहां उनकी अपनी-अपनी विधायिका, अपनी कार्यपालिका, अपनी न्यायपालिका होती है। अस्पृश्यों के दृष्टिकोण में इससे बढ़कर कोई दुखद बात नहीं है। भगवान का शुक्र है कि संविधान सभा ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बावजूद हिंदू अपनी इस बात पर हमेशा जोर देते हैं कि भारतीय गांव समाज-व्यवसथा के आदर्श रूप हैं। यह धारणा हिंदुओं की कोई पुश्तैनी धारणा नहीं है, और न इस धारणा की जड़ें उनके अतीत में छिपी हुई हैं। यह उन्होंने चार्ल्स मैटकाफ से ली है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी में एक कर्मचारी था और राजस्व अधिकारी के पद पर काम करता था। उसने अपने राजस्व के दस्तावेजों में भारतीय गांवों का इस प्रकार वर्णन किया' :

Asparishyata Athva Baharat Mein Bahishkrit Bastiyo Ke Prani by Dr B R Ambedkar

     " प्रत्येक गांव छोटे-छोटे गणराज्य हैं, जिनमें अपनी-अपनी आवश्यकता की लगभग हर वस्तु मौजूद है, और वे दूसरों से पूर्णतः स्वतंत्र हैं। ऐसा लगता है कि जब कुछ भी नहीं बचेगा, तब भी वे बने रहेंगे। सल्तनतें एक के बाद एक गिरती जाती हैं, एक के बाद दूसरी क्रांति होती है। हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज बारी-बारी से शासक बनते जाते हैं, लेकिन गांव वैसे के वैसे ही रहते हैं। संकट के दिनों में वे अपनी रक्षा स्वयं कर लेते हैं। जब आक्रामक सेनाएं देश को एक कोने से दूसरे कोने तक रौंदने लगती हैं, गांव के लोग अपने- अपने जानवरों को अपने-अपने बाढ़े के अंदर बंद कर लेते हैं और आक्रामकों को चुपचाप रास्ता दे देते हैं। अगर वे स्वयं लूटमार का निशाना बनते हैं और फौजों के आक्रमण को नहीं झेल पाते हैं, तो वे भागकर दूर के किसी गांव में चले जाते हैं। लेकिन जब फौजें निकल जाती हैं, तब लौट आते हैं और अपना धंधा फिर शुरू कर देते हैं। अगर किसी भू-भाग में बार-बार लूटमार और नर-संहार होता है और गांव फिर से आबाद न हो सकें, तब लोग बिखर जाते हैं। लेकिन ज्यों ही अमन-चैन हो जाता है, ही ये लोग अपने-अपने गांव फिर वापस आ जाते हैं। एक पीढ़ी गुजर जाती है, लेकिन उसके बाद आने वाली पीढ़ी लौट आती है। बेटा, बाप की जगह ले लेता है और अपने बाप-दादा के गांव आ जाता है, उसी जगह घर बनाता है जहां उसके बाप-दादा का घर था, यह पीढ़ी भी वहीं पर फिर बस जाती है जहां उसके पूर्वज गांव में फिर से आबाद होने पर दुबारा इसमें आए थे। इस बार किसी छोटे-मोटे हमले से डरकर नहीं भागेगी, क्योंकि जब ये लोग मुसीबतों का मुकाबला करने के लिए अपने दल गठित कर लेंगे और लूटमार

1. बाडेन पोवेल द्वारा अपनी पुस्तक, लैंड सिस्टम आफ ब्रिटिश इंडिया, खंड 1 से उद्धत

करने वालों का सफलतापूर्वक मुकाबला कर लेंगे। मैं सोचता हूं कि गांव के लोगों का इस प्रकार संगठित होना और अपने लिए एक छोटी-मोटी शासकीय इकाई बनाना सभी प्रकार की उथल-पुथल और उलट-फेर के बावजूद भारत की जनता के संरक्षण में जितना सहायक हुआ, उतना कोई और तत्व नहीं हुआ और इसी के कारण यहां की जनता खुशहाल रही, उसने आजादी का सुख भोगा । "

     हिंदुओं ने भारतीय गांवों के बारे में जब अंग्रेज सरकार के एक अधिकारी का यह वर्णन पढ़ा, तब वे फूलकर कुप्पा हो गए, उन्होंने इसे अपना वास्तविक गुण समझा। भारतीय गांवों के बारे में इस दृष्टिकोण को अपना कर हिंदुओं ने अपनी बुद्धि या ज्ञान के प्रति न्याय नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपनी कमजोरी ही प्रकट कर दी। चूंकि बहुत से विदेशी भारतीय गांवों के बारे में इसी आदर्शपरक दृष्टिकोण को सही मान लेते हैं, इसलिए समाज की असली तस्वीर पेश करना उचित होगा, जैसी कि हर किसी को भारतीय गांवों में मिलती है।

     भारतीय गांव अलग से सामाजिक इकाई नहीं है। उसमें भिन्न-भिन्न जातियां होती हैं। परंतु हमारे प्रयोग के लिए यह कहना पर्याप्त है:

     1. गांव में दो तरह की आबादी होती है (क) स्पृश्य, और (ख) अस्पृश्य । ?

     2. स्पृश्य लोगों की संख्या अधिक और अस्पृश्य लोगों की संख्या थोड़ी होती है।

     3. स्पृश्य लोग गांव में रहते हैं और अस्पृश्य गांव के बाहर अलग-अलग घर बनाकर रहते हैं।

     4. आर्थिक दृष्टि से स्पृश्य लोग सबल और शक्तिशाली होते हैं, जब की  अस्पृश्य लोग गरीब और पराश्रित होते हैं।

     5. स्पृश्य लोग सामाजिक दृष्टि से शासकों की जाति होती है, जब कि अस्पृश्य लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे बंधुआ लोगों की जाति होती है।

     भारत के गांवों में रहने वाले इन स्पृश्य और अस्पृश्य लोगों के बीच आपसी व्यवहार की शर्तें क्या होती हैं? प्रत्येक गांव में स्पृश्य लोगों की एक आचार-संहिता होती है, जिसका अस्पृश्यों को पालन करना होता है । यह संहिता उन कार्यों को निश्चित करती है, जिनको करने या न करने पर अस्पृश्य लोगों का अपराध माना जाता है। इन अपराधों की सूची निम्नलिखित है:

     1. अस्पृश्यों को चाहिए कि वे अपने घर हिंदुओं की बस्तियों से दूर बनाएं। अगर अस्पृश्य अपने घर दूर बनाने के इस नियम को तोड़ते हैं या उसकी अनदेखी करते हैं, तब यह उनका अपराधा माना जाएगा।

     2. अस्पृश्य लोगों के घर गांव के दक्षिण में होने चाहिए, क्योंकि चारों दिशाओं में दक्षिण दिशा ही सबसे अधिक अशुभ होती है। इस नियम का उल्लंघन अपराध समझा जाएगा।

     3. अस्पृश्य को चाहिए कि वह इस बात का ध्यान रखे कि उसके छू जाने या उसकी छाया से भी पाप लगता है। अगर वह इस नियम को तोड़ता है, तब वह अपराध करता है।

     4. अगर कोई अस्पृश्य अपने पास किसी भी प्रकार की कोई संपत्ति, जैसे भूमि या पशु रखता है, तब वह अपराध करता है ।

     5. अगर कोई अस्पृश्य अपने लिए खपरैल' की छत वाला घर बनाता है, तब वह उसका अपराध माना जाता है।

     6. अगर कोई अस्पृश्य स्वच्छ कपड़े, जूते, घड़ी या सोने के जेवर पहनता है, तब वह अपराध करता है।

     7. अगर कोई अस्पृश्य अपने बच्चों के अच्छे नाम रखता है, तब वह अपराध करता है। उनके नाम ऐसे होने चाहिए, जो हीनता / घृणा सूचक हों ।

     8. अगर कोई अस्पृश्य किसी हिंदू के सामने किसी कुर्सी पर बैठता है,  तब वह अपराधा करता है।

     9. अगर कोई अस्पृश्य घोड़े पर चढ़कर या पालकी में बैठकर गांव से गुजरता है, तो वह अपराध करता है ।

     10. अगर कोई अस्पृश्य अपनी बिरादरी वालों का कोई जुलूस गांव से होकर ले जाता है, तब वह अपराध करता है।

     11. अगर कोई अस्पृश्य किसी हिंदू को प्रणाम आदि नहीं करता, तब वह अपराधकरता है।

     12. अगर कोई अस्पृश्य सभ्य लोगों की भाषा बोलता है, तब वह अपराध करता है।


(1. गांवों में खपरैल की छत वाले मकान समृद्धि-सूचक होते थे। अब तो पक्के मकान बनने लगे हैं - संपादक)

     13. अगर कोई अस्पृश्य किसी शुभ दिन गांव में आकर बातचीत करता फिरता है जब हिंदू व्रत कर रहे हों या जब वे अपना व्रत पूरा कर अन्न-जल ग्रहण कर रहे हों, तब वह अपराध करता है, क्योंकि उसके मुख से निकली श्वास से केवल वातावरण दूषित होता है बल्कि हिंदुओं का आहार भी दूषित हो जाता है।

     14. अगर कोई अस्पृश्य स्पृश्य व्यक्तियों के जैसे चिह्न धारण करता है और अपने को स्पृश्य जैसा प्रदर्शित करता घूमता है, तब वह अपराध करता है।

     15. अस्पृश्य को चाहिए कि वह हीन व्यक्त्यिों के स्तर के अनुरूप दिखे और उसे प्रत्यक्ष रूप में हीनता दर्शाने वाले ऐसे नाम आदि धारण करने चाहिएं, जिनसे लोग उसे तदनुरूप पहचान सकें। जो इस प्रकार हैं -

     (क) हीनता - सूचक नाम रखना ।

     (ख) स्वच्छ वस्त्र न पहनना ।

     (ग) बिना खपरैल वाले घर में रहना ।

     (घ) चांदी - सोने के जेवर न पहनना ।

     इनमें से किसी भी नियम का उल्लंघन करना अपराध है।

     इसके बाद हम उन कर्तव्यों को लेते हैं, जो इस संहिता के अनुसार अस्पृश्यों को स्पृश्यों के लिए करने अपेक्षित हैं। इस शीर्षक के अंतर्गत निम्नलिखित कार्यों को रखा जा सकता है :

     1. अस्पृश्य जाति के व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी भी हिंदू के घर की घटना, जैसे- मृत्यु या विवाह की सूचना दूसरे गांवों में रहने वाले उसके सगे-संबंधियों तक पहुंचाए, चाहे वह गांव कितनी ही दूर क्यों न हो।

     2. अस्पृश्यों को चाहिए कि हिंदू के घर में विवाह के अवसर पर ऐसे कार्य, जैसे लकड़ी चीरना या आने-जाने का कार्य करे।

     3. अस्पृश्य को चाहिए कि जब हिंदू की लड़की अपने पिता के घर से पति के गांव जा रही हो तो वह उसके साथ जाए चाहे वह गांव कितनी ही दूर क्यों न हो।

     4. जब सारा गांव बड़े-बड़े त्यौहार, जैसे होली और दशहरे का त्यौहार, की तैयारी कर रहा हो, तब अस्पृश्यों को चाहिए कि वे नौकरों द्वारा किए जाने वाले ऐसे काम करें, जो मुख्य कार्य के पहले किए जाने जरूरी होते हैं।

     5. अस्पृश्यों के चाहिए कि वे कुछ त्यौहारों पर अपनी स्त्रियों को गांव के बाकी लोगों के हवाले कर दें, जिससे वे उनके साथ फूहड़ मजाक आदि कर सकें।

     ये काम बिना मजदूरी लिए किए जाने होते हैं। इन कामों के महत्व को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि ये काम क्यों अस्तित्व में आए। गांव का हर हिंदू अपने आपको अस्पृश्यों से श्रेष्ठ मानता है। वह अपने आपको सबका मालिक मानता है और इसलिए वह अपनी इज्जत को बनाए रखना बहुत जरूरी समझता है। वही अपनी इस इज्जत को तब तक कायम नहीं रख सकता, जब तक उसके इशारे पर नाचने वालों की भीड़ उसके आस-पास नहीं रहती । इसके लिए उसे अस्पृश्य ही मिलते हैं, जो उसका हर काम करने के लए तैयार रहते हैं और जिन्हें उसके लिए कुछ भी देना नहीं पड़ता। चूंकि अस्पृश्य असहाय होते हैं, अतः वे इस कारण इन कामों को करने से इंकार नहीं कर सकते और हिंदू भी उनसे जबरदस्ती काम करवाने से नहीं चूकते, क्योंकि वे उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए जरूरी होते हैं।

     अंग्रेज सरकार ने जब दंड संहिता बनाई, तब उसमें इन अपराधों को शामिल नहीं किया गया। लेकिन जहां तक अस्पृश्यों का सवाल है, अपराध अभी भी वास्तविक हैं। इनमें से कोई भी अपराध करने पर अस्पृश्य को अवश्य सजा भुगतनी पड़ती है। ये नियम किस प्रकार लागू किए जाते हैं, यह अध्याय 5 और 6 से स्पष्ट हो जाएगा।

     दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन अपराधों के लिए जो सजा दी जाती है, वह सामूहिक होती है। चाहे अपराध किसी एक अस्पृश्य ने किया हो, लेकिन उसकी सजा पूरी जाति को भुगतनी होती है ।

     अस्पृश्य किस प्रकार रहते हैं? वे अपनी रोजी-रोटी किस प्रकार कमाते हैं, जब तक यह नहीं पता चलता है, तब तक हिंदू समाज में उनकी हैसियत का स्पष्ट पता लगना संभव नहीं ।

     एक कृषि प्रधान देश में जीविका का प्रमुख साधन कृषि हो सकती है, परंतु रोजी-रोटी का यह साधन आमतौर से अस्पृश्यों के लिए उपलब्ध नहीं है। इसके कई कारण हैं। पहली बात तो यह है कि जमीन खरीदना उनके वश की बात नहीं, और दूसरी यह कि यदि अस्पृश्य जमीन खरीदने की स्थिति में है, तो भी वह ऐसा नहीं कर सकता। देश के अधिकांश भागों में हिंदू इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते कि अस्पृश्य जाति का कोई व्यक्ति जमीन खरीदकर स्पृश्य जाति की बराबरी का प्रयत्न करे। किसी अस्पृश्य के ऐसे दुस्साहस का विरोध ही नहीं किया जाता, बल्कि उसको सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। कुछ भागों में तो उनके जमीन खरीदने पर कानूनी प्रतिबंध है। उदाहरणार्थ, पंजाब प्रांत में एक कानून है जिसका नाम हैं, भूमि स्वामित्व अधिनियम। इस कानून में उन जातियों का उल्लेख किया गया है, जो जमीन खरीद सकती हैं और अस्पृश्यों को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश भागों में अस्पृश्य भूमिहीन मजदूर रहने के लिए विवश हैं और मजदूर के रूप में वे वाजिब मजदूरी की मांग नहीं कर सकते। वे हिंदू किसानों के लिए उसी मजदूरी पर काम करने को मजबूर हैं, जो उन्हें मालिक देना चाहे । इस प्रश्न पर हिंदू किसान मजदूरी कम से कम रखने के लिए आपस में एकमत हो जाते हैं, क्योंक यह उनके हित में होता है। दूसरी ओर अस्पृश्यों के पास कोई चारा नहीं रहता। वे या तो उसी मजदूरी पर काम करें अथवा भूखों मरें । न ही उनमें मोत-तौल करने की क्षमता होती है। वे या तो निश्चित की हुई दरों पर काम करें या फिर पिटाई के लिए तैयार रहें।

     अस्पृश्यों को उनकी मजदूरी नकद या अनाज के रूप में दी जाती थी। उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में मजदूरी के रूप में दिए जाने वाले अनाज को 'गोबरहा ' कहा जाता है। इसका अर्थ है, जानवरों के गोबर से निकलने वाला अनाज । मार्च या अप्रैल के महीने में जब फसल पूरी तरह पक जाती है तो उसे काटकर खलिहान में फैला दिया जाता है। उस पर बैलों की दांय चलती है, ताकि उनके चलने से भूसा अनाज से अलग हो जाए । दाय पर चलते बैल बहुत-सा अनाज और लांक खा जाते हैं। जब वे जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं, तो अनाज को पचाना मुश्किल होता है। अगले दिन वही अनाज गोबर के साथ निकल जाता है। गोबर को इकट्ठा कर लिया जाता है और उसमें से अनाज निकाल लिया जाता है। यही अनाज मजदूरी के रूप में अस्पृश्य मजदूरों को दे दिया जाता है, जिसे पीसकर वे रोटी बना लेते हैं।

     जब फसल का समय गुजर जाता है और अस्पृश्यों के पास रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं होता तो वे घास काटते हैं और जंगलों से ईंधन इकट्ठा कर आस-पास के शहरों में बेच आते हैं। परंतु यह भी वन रक्षकों के ऊपर निर्भर करता है। जब उसकी मुट्ठी गरम की जाएगी, तभी वह उन्हें सरकारी जंगलों में घास और लकड़ी काटने देता है। जब वे शहर में आते हैं तो उनका मुकाबला खरीददारों से होता है। ये खरीददार भी हिंदू ही होते हैं, जो हमेशा मजदूरी कम रखने की कोशिश में रहते हैं। चूंकि उनमें अपने माल को रोके रखने की सामर्थ्य नहीं होती, इसलिए उन्हें अपना माल उसी कीमत पर बेचना पड़ जाता है, जो भी उन्हें बताई जाती है। कभी-कभी तो उन्हें अपने गांव से शहरों तक दस-दस मील तक बोझ लेकर जाना पड़ता है।

     ऐसा कोई व्यवसाय नहीं है, जिससे वे अपनी रोजी-रोटी कमा सकें। उनके पास इसके लिए न तो पूंजी होती है, और यदि हो भी तो, कोई भी उनसे सामान नहीं खरीदता ।

     आमदनी के ये सभी साधन स्पष्टतः अनिश्चित और अस्थाई होते हैं। इनमें कोई गारंटी नहीं होती है। देश के कुछ भागों में जिन्हें में जानता हूं, अस्पृश्यों के लिए रोजी-रोटी का केवल एक ही स्थाई साधन है। यह है, गांव के हिंदू किसानों से खाना मांगने का अधिकार । हर गांव का अपना अलग शासन- तंत्र होता है। गांव की व्यवस्था के अनुसार अस्पृश्य पुश्तैनी नौकर-चाकर होते हैं। मजदूरी के अंश के रूप में सारे अस्पृश्यों को मिलाकर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिलता है, जो उन्हें बहुत पहले दिया गया था जो निश्चित होता है, जिसमें कभी बढ़ोतरी नहीं की गई, और जिसे अस्पृश्य भी बगैर खेती किए छोड़ देना बेहतर समझते हैं, क्योंकि उसके भी छोटे-छोटे टुकड़े हो गए होते हैं। इस कारण उन्हें भीख मांगने का अधिकार ही मिलता है।

     यह बात चाहे कितनी ही खेदजनक क्यों न हो, यह अधिकार उनका परंपरागत अधिकार बन गया है और सरकार भी अस्पृश्य का वेतन तय करते समय, चाहे वह सरकारी पद पर ही क्यों न नियुक्त हो, अस्पृश्य को मिलने वाली भीख की कीमत को अपने ध्यान में रखती है।

     भारत में इस समय स्पृश्यों से भीख मांगकर खाना छह करोड़ अस्पृश्यों की जीविका का मुख्य आधार है। अगर कोई किसी गांव में उस समय जाए जब लोग शाम का खाना खा चुके होते हैं, तब वह अस्पृश्यों के झुंड के झुंड रटे-रटाए ढंग से गुहार करते हुए भीख मांगते हुए देख सकता है।

     यह विधिसम्मत भिक्षा-वृत्ति अस्पृश्यों के लिए एक प्रथा बन चुकी है। गांव में स्पृश्यों के परिवार के साथ अस्पृश्यों के परिवारों का वैसा ही संबंध होत है, जैसा मध्यकालीन यूरोप में लार्ड्स आफ मैनर्स और उनके अधीन सर्फ्स और मिलेंस के बीच होता था। स्पृश्य लोगों के परिवारों के साथ जुड़े अस्पृश्य लोगों के परिवार उनके यहां काम करते थे। ये संबंध इतने गहरे हो गए हैं कि जब कोई स्पृश्य हिंदू किसी अस्पृश्य की बात करता है तो वह उसे 'मेरा आदमी' कहता है, जैसे कि वह उसका गुलाम हो। यह संबंध-सूत्र ही स्पृश्य परिवारों के यहां अस्पश्य लोगों द्वारा भीख मांगकर खाना खाने की प्रथा को स्थाई प्रथा बनाने में सहायक हुआ।

     यही हैं हमारे ग्रामीण गणराज्य, जिन पर हिंदुओं को इतना नाज है। इन गणराज्यों में अस्पृश्यों की क्या स्थिति है? वे दुमछल्ला तो क्या, पैर की जूती भी नहीं हैं। उनको दीन-हीन बना दिया गया है उन्हें हर तरह से इतना दीन-हीन बना दिया गया है कि बहुसंख्यक उन पर राज कर सकें। यह विपन्नता किसी एक व्यक्ति या परिवार की नहीं, बल्कि उनके पूरे समुदाय की नियति है। अस्पृश्य हर स्पृश्य से तुच्छ है, चाहे उसकी आयु कुछ भी क्यों न हो, वह कितना भी योग्य क्यों न हो । एक स्पृश्य हिंदू युवक किसी भी वृद्ध अस्पृश्य से उच्च है। पढ़ा-लिखा अस्पृश्य भी उस स्पृश्य से हीन है, जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है।

     स्पृश्य द्वारा दिया गया आदेश कानून है। अस्पृश्यों को इस बात से और कुछ लेना-देना नहीं सिवाय इसके कि वे उसका पालन करें और उसे शिरोधार्य करें।

     स्पृश्यों के विरुद्ध अस्पृश्यों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं। उन्हें न कोई समान अधिकार प्राप्त है और न ही कोई न्याय, जिसके द्वारा उन्हें वह सब कुछ दिया जा सके, जो उन्हें देय है। उन्हें उसके सिवा कुछ भी देय नहीं है, जो स्पृश्य उन्हें देने के लिए सहमत हैं। अपनी ओर से अस्पृश्यों को अपने लिए कुछ भी अधिकार नहीं मांगने चाहिए। उनको स्पृश्यों से उनकी कृपा और अनुकंपा के लिए विनती करनी चाहिए। उन्हें जो कुछ मिले, उसी से संतोष करना चाहिए ।

     यह व्यवस्था हैसियत और व्यवहार, दोनों ही दृष्टियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। एक बार स्पृश्य तो हमेशा के लिए स्पृश्य । एक बार अस्पृश्य तो हमेशा के लिए अस्पृश्य। एक बार ब्राह्मण तो हमेशा के लिए ब्राह्मण । एक बार भंगी तो हमेशा के लिए भंगी । जो लोग उच्च जाति में पैदा होते हैं, वह इस व्यवस्था में हमेशा उच्च रहते हैं, और जो निम्न जाति में पैदा होते हैं, वे हमेशा निम्न रहते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था कर्म, अर्थात् भाग्य के अटल सिद्धांत पर आधारित है, जो एक बार हमेशा के लिए निश्चित होता है और जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। इस व्यवस्था में किसी व्यक्तिगत योग्यता या अयोग्यता का कोई स्थान नहीं है। कोई अस्पृश्य ज्ञान और आचार-विचार में कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, लेकिन ज्ञान और आचार विचार में वह स्पृश्य से नीचे ही समझा जाएगा, जो ज्ञान या आचार-विचार में कितना ही हीन क्यों न हो। कोई स्पृश्य चाहे कितना ही गरीब क्यों न हो, वह उस अस्पृश्य से ऊंचा है, जो चाहे कितना ही अमीर क्यों न हो।

     यही है भारतीय गांवों के भीतरी जीवन की तस्वीर। इस गणतंत्र में लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें समता के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें स्वतंत्रता के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें भ्रातत्व के लिए कोई स्थान नहीं । भारतीय गांव गणतंत्र का ठीक उलटा रूप है। अगर यह गणतंत्र है तो यह स्पृश्यों का गणतंत्र है, स्पृश्यों के द्वारा है और उन्हीं के लिए है। यह गणतंत्र अस्पृश्यों पर स्थापित हिंदुओं का एक विशाल साम्राज्य है। यह हिंदुओं का एक प्रकार का उपनिवेशवाद है, जो अस्पृश्यों का शोषण करने के लिए है। अस्पृश्यों के कोई अधिकार नहीं हैं। उन्हें तो सिर्फ मुंह जोहना है, सेवा करनी है और अपने को अर्पित कर देना है। उन्हें यह कार्य सिर्फ करते रहना या मर जाना है। उनके कोई अधिकार नहीं हैं, क्योंकि वे इस तथाकथित गणतंत्र के बाहर हैं। वे हिंदुओं के समाज से बहिष्कृत हैं। यह एक दुश्चक्र है। लेकिन यह एक यथार्थ है, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

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