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अस्पृश्यता - उसका स्रोत - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

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23 मे 2023
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गुलाम - प्रथा और अस्पृश्यता

I

     अस्पृश्यता पर लज्जित होने के बजाए, हिंदू उसे हमेशा उचित ठहराने की कोशिश करते हैं। इसके समर्थन में उनका यह कहना है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में गुलाम था कभी नहीं रही, और यह कि अस्पृश्यता किसी भी दशा में उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि गुलाम- प्रथा है। ऐसा ही तर्क स्व. लाला लाजपतराय जैसे महान व्यक्ति ने 'अनहैपी इंडिया' नामक अपनी पुस्तक में दिया है । इस कथन का खंडन करने के लिए समय का अपव्यय करने की आवश्यकता नहीं थी, अगर बाकी दुनिया को, जिसने गुलाम - प्रथा से बुरी कोई प्रथा देखी ही नहीं, यह विश्वास नहीं होता कि अस्पृश्यता गुलाम - प्रथा से बुरी हो ही नहीं सकती।

     इस तर्क का उत्तर तो यही है कि यह कहना सरासर झूठ बोलना है कि हिंदुओं में गुलाम-प्रथा कभी थी ही नहीं। यह तो हिंदुओं की एक अति प्राचीन प्रथा है। इसे हिंदुओं के विधि-निर्माता मनु ने मान्यता प्रदान की और उनके बाद उनका अनुसरण करने वाले अन्य स्मृतिकारों ने इसे व्यापक बनाया और व्यवस्थित रूप दिया। हिंदुओं में गुलाम-प्रथा केवल एक प्राचीन प्रथा के रूप में नहीं थी जो केवल धुंधले अतीत में प्रचलित रही हो, बल्कि यह तो एक ऐसी संस्था थी जो भारत के इतिहास में 1843 तक प्रचलित रही और अगर अंग्रेजी सरकार इसे उस वर्ष कानून बनाकर समापत न कर देती तो शायद यह आज भी प्रचलित होती ।

     अस्पृश्यता और गुलाम-प्रथा में कौन-सी प्रथा अच्छी या बुरी है, इसे आधार मानकर उठाए जाने वाले तर्क का उत्तर देने के लिए सबसे अच्छा उपाय इन दोनों के बीच अर्थात् अस्पृश्यता का गुलाम प्रथा के साथ, जैसी कि यह प्राचीन रोम और आधुनिक अमरीका में थी तुलना करना और उनके अंतर को स्पष्ट करना है।

Slavery and Untouchability - Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

     रोम साम्राज्य में व्यवहार में गुलामों की क्या स्थिति थी? जहां तक मेरी जानकारी है, इसका सबसे अच्छा विवरण श्री बैरो की 'स्लेवरी इन रोमन एम्पायर' नामक पुस्तक में मिलता है। श्री बैरो लिखते हैं: 

     " अब तक जो चित्रण किया गया, वह घरों की गुलाम प्रथा का घृणित पक्ष है। इसका एक दूसरा पक्ष भी है। साहित्य में घरों को सामान्य रूप में चित्रित किया गया है। निश्चय ही यह अपवाद स्वरूप है। निस्संदेह गुलाम भारी संख्या में होते थे, और ये प्रायः रोम में पाए जाते हैं। इटली और अन्य प्रांतों में दिखाने के लिए इनकी आवश्यकता घरों में कम थी। इनके गुलाम भारी संख्या में खेतों में काम करने और इससे जुड़े उत्पादकता कार्यों के लिए लगाए जाते थे। वहां इन गुलामों के बीच आपसी संबंध ठेकेदार और मजदूरों के बीच जैसा होता था, उनमें से एक उनका मुखिया होता था, बाकी उसके अधीन काम करते थे। प्लिनी का अपने गुलामों के प्रति दयापूर्ण व्यवहार प्रसिद्ध है। वह अपने गुलामों के प्रति यह व्यवहार धार्मिक भावना से प्रेरित होकर या इस इच्छा से नहीं करता था कि आगे आने वाली पीढ़ी की दृष्टि में वह अच्छा समझा जाएगा और यह पीढ़ी उसके उन पत्रों को पढ़ेगी जिसमें उसने अपने गुलामों की मुसीबतों और मृत्यु का वर्णन किया है। प्रत्येक घर ( या प्लिनी) उसके गुलामों के लिए मानो एक गणराज्य था। प्लिनी का अपने गुलामों के साथ व्यवहार सामान्य या कभी - कभी के व्यवहार की तुलना में इतना अच्छा मान लिया जाता है कि उसे कोई ठोस साक्ष्य नहीं माना जाता है । इस दृष्टिकोण के लिए कोई कारण समझ में नहीं आता।

     अमीर लोग कुछ तो दिखावे के लिए और कुछ सचमुच साहित्यिक रुचि के कारण अपने-अपने घरों में ऐसे गुलाम रखा करते थे, जो साहित्य और कला में दक्ष होते थे। क्लाविससेस सेबीनस के बारे में सैनेडा का कहना है कि उसने अपने ग्यारह गुलामों को होमर, हैसीओउड और नौ अन्य गीतकारों की रचनाएं कंठस्थ करा दी थीं। जब उसके एक मित्र ने इस पर यह टिप्पणी की कि इससे सस्ती तो किताबों की अलमारियां होंगी, तब यह उत्तर दिया गया कि नहीं, जो घर का मालिक जानता है, घर के सभी लोग भी वही जानें। इन अतिशयोक्तियों के अलावा, सच्चाई तो यह है कि छपाई आदि की सुविधा नहीं होने के कारण पढ़े-लिखे गुलाम आवश्यक समझे जाते होंगे । व्यस्त वकील, काव्यप्रेमी कवि, दार्शनिक और

  (1. 'स्लेवरी इन रोमन एम्पाय' पृ. 47-49  )   

साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्तियों को नकलनवीसों, रीडरों और लिपिकों की आवश्यकता होती थी। ऐसे लोग स्वाभाविक रूप से भाषा वैज्ञानिक भी होते थे। एक पुस्तक विक्रेता का दावा है कि वह लैटिन और ग्रीक साहित्य का विद्वान है। आशुलिपिकों की भरमार थी । निजी और सार्वजनिक पुस्तकालयों में लायब्रेरियन होते थे। शासन में आशुलिपि की सहायता लेना साधारण बात थी और गुलाम नाजिरों को नियमित नौकरियां मिलती थीं। एक विशेष शोध-प्रबंध में स्नेटोनियस ने बहुत से मुक्त गुलाम शास्त्रकारों और वैश्याकरणिकों का उल्लेख किया है। आस्टस के पोते का अध्यापक वैरीअस फलाकस था, और उसकी मृत्यु हो जाने पर उसकी मूर्ति हो जाने पर उसकी मूर्ति लगाकर उसका सार्वजनिक रूप से सम्मान किया गया। स्क्रीबोनियस एफ्रोडीसियस एक गुलाम था । वह ओरबीलियस का शिष्य था, जो बाद में स्क्रीबेनिया द्वारा आजाद कर दिया गया था। हाईजीनियस पैलेटाइन पुस्तकालय का लायब्रेरियन था। इस कार्यालय में उसके पश्चात उसी के द्वारा आजाद किए गए जूलियस मोडेसटस नामक गुलाम को नियुक्त किया गया। हमें एक गुलाम दार्शनिक का भी पता चलता है, जिसके अनेक मुक्त किए गए गुलाम इतिहासकार होते थे। इस दार्शनिक को अपने मालिक, गुलामों के दोस्तों, और मुक्त हुए गुलाम वास्तुकारों के साथ बहस के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। शिलालेखों में मुक्त किए ऐसे गुलामों का बार-बार उल्लेख मिलता है, जो डाक्टर होते थे। इनमें से कुछ विशेषज्ञ भी थे। जैसा कि एक या दो उदाहरणों से पता चलता है, इनका प्रशिक्षण बड़े-बड़े घरानों में गुलाम के रूप में हुआ। ये कुछ दिन पश्चात प्रख्यात हो गए और मोटी फीस लेने के लिए बदनाम हो गए ।

     समाज के कुछ वर्गों द्वारा नर्तकों, गायकों, संगीतकारों, खेलकूद प्रशिक्षकों आदि की मांग हुई। गुलामों में इस कोटि के लोग भी हुए। इनमें से कुछ को शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित भी किया गया और उन्होंने ख्याति अर्जित की।

     आगस्टस के समय में वाणिज्य और उद्योगों का विस्तार हुआ। इससे पहले भी गुलामों को ( कला और शिल्प) के कार्यों में लगाया जाता था। परंतु व्यापार में अचानक वृद्धि हो गई, अन्यथा उन्हें अधिक संख्या में रखना व्यर्थ होता । रोम निवासी और भी खुलकर विभिन्न व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों में लग गए। चूंकि व्यापारिक गतिविधियां और अधिक बड़े पैमाने पर होने लगीं और दलालों का महत्व और अधिक बढ़ गया, तो भी ये दलाल वही होते थे जो गुलाम थे। यह इस कारण था कि गुलामों की शर्तें लचीली होती थीं। यह इसलिए भी लचीली होती थीं कि जिससे किसी भी गुलाम को यह लालच दिया जा सके कि धन और स्वतंत्रता की आशा से कार्य करे और उनमें इतनी बंदिश भी रहे कि जिससे गुलाम द्वारा अपने मालिक को अपने दुर्व्यवहार के कारण हुए नुकसान की भरपाई करने की गारंटी भी रहे। व्यापार में किसी गुलाम और उसके मालिक अथवा अन्य व्यक्ति के बीच व्यावसायिक शर्तें आम बात थी और इस प्रकार किया गया कार्य निस्संदेह बहुत लाभकारी था। ... गुलामों को भूमि किराए पर देने की प्रथा का ऊपर जिक्र किया जा चुका है ... और यह प्रणाली उद्योगों में कई रूपों में प्रचलित थी। मालिक किसी भी गुलाम को अपने बैंक या जहाज के उपयोग की इजाजत दे सकता था, लेकिन शर्त यह होती थी कि वह उसे इसके बदले में निश्चित राशि या कमीशन देगा । '

(1. 'स्लेवरी इन रोमन एम्पाय' पृ. 63)  

     ये गुलाम जो कुछ कमाते, वह कानून की दृष्टि में उनकी संपत्ति बन गई और जिसे वे विभिन्न प्रयोजनों पर खर्च कर सकते थे। निस्संदेह अधिकांश मामलों में यह धनराशि या तो भोजन पर खर्च होती य आमोद-प्रमोद पर खर्च होती । यह संपत्ति कोई थोड़ी बचत नहीं होती थी जिसे वह कभी-कभी कमाते और मौज-मस्ती के लिए उड़ा देते हो । जो गुलाम अपने मालिक के कारोबार को इस लायक बना देते कि उससे लाभ होने लगे और उन्हें खुद भी लाभ हो, वे यह भी कोशिश करते कि उन्होंने जो कुछ खर्च कर दिया है उसकी भरपाई भी हो जाए । वह अपनी इस अतिरिक्त आय को अपने मालिक के कारोबार में या उससे भिन्न किसी दूसरे कारोबार में फिर से लगा देते। वह अपने मालिक के साथ व्यापारिक संबंध रखते और मालिक उन्हें बराबर का हिस्सेदार मान लेते या वे किसी के साथ करार करते। वह अपनी संपत्ति अथवा अपने कारोबार के इंतजाम के लिए मुख्तार भी रख लेते और इस प्रकार उनकी संपत्ति केवल भूमि, भवन, दुकानें ही नहीं होती थीं, बल्कि अधिकार - पत्र और दावे भी होते थे।
उनमें से बहुत दुकानदार रोटी, मांस, नमक, मछली,

     व्यापार में लगे गुलामों के अनगिनत कारोबार होते, होते जो खाने की तरह - तरह की सामग्री बेचते जैसे शराब, सब्जियां, फल, शहद, दही, बत्तखें और ताजा मछलियां आदि । कुछ गुलाम कपड़े, चप्पलें, जूते, गाउन और मेंटल आदि बेचते थे। रोम में सर्कस मामीमस या पोर्टिस ट्रिगमिस या इसक्विलाइन मार्केट या दि ग्रेट मार्ट (कैओलिन पहाड़ी पर स्थित)

(1. 'स्लेवरी इन रोमन एम्पाय' पृ. 101-102)

या सुबर्रा नामक स्थानों पर इनकी दुकानें थीं। 1

     पोम्पेई में सैसीलियस जुकुंडस के घर पर जो रसीदें मिलीं, उनसे यह स्पष्ट पता चलता है कि ये गुलाम कितनी अधिक संख्या में अपने-अपने मालिकों के यहां मुख्तार और एजेंटों के रूप में काम किया करते थे । 2

     यह बात कोई आश्चर्यजनक नहीं लगती कि राज्य के अधीन भी गुलाम हुआ करते थे। आखिरकार युद्ध करना तो राज्य का ही कार्य था और इससे जो बंदी बनाए जाते, वह राज्य की ही तो संपत्ति होती थी। आश्चर्यजनक तो यह है कि राज्य में इन गुलामों से बड़े-बड़े काम लिए जाते और यह कि इन्हें समाज में विशेष पद प्राप्त थे।

     किसी साम्राज्य के लिए 'राज्य का गुलाम' शब्द का अर्थ यह होने लगा कि वह गुलाम राज्य में शासन के विभिन्न पदों में से किसी पद पर नियुक्त है, उसका एक निश्चित कर्त्तव्य है तथा समाज में प्रायः उसकी एक प्रतिष्ठा है। राज्य के गुलाम, नगर के गुलाम और सीजर के गुलाम से क्रमशः ऐसे कर्मचारियों का बोध होने लगा, जैसे कि आजकल सिविल सेवाओं के उच्च और समस्त अवर पद या नगर निगम में कार्यरत कार्मिक होते हैं । ( कोषागार के ) अधीनस्थ अनेक लिपिक और वित्तीय अधिकारी काम करते थे। इनमें सभी मुक्त गुलाम होते थे। ये लोग जो व्यवसाय करते, उसका क्षेत्र व्यापक होता... जैसे टकसाल.... यहां इसका प्रधान कोई सामंत होता, जो सारी टकसाल का अधिकारी होता था ... इसके अधीन एक मुक्त गुलाम होता और उसके अधीन अनेक मुक्त गुलाम और गुलाम होते थे। लेकिन कुछ विशेष संकट के समय एक या दो अवसरों को छोड़कर इन गुलामों कोक कार्य से बिल्कुल अलग रखा जाता था । उन्हें सेना में शामिल होकर युद्ध करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि ये इस सम्माननीय कार्य के योग्य नहीं समझे थे। हो सकता है कि इसके अन्य कारण भी हों, अधिक संख्या में गुलामों का शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का विधिवत प्रशिक्षण खतरनाक प्रयोग हो सकता था। अगर इन्हें सेना में रखा भी लिया जाता, तो इन्हें युद्ध करने बहुत कम भेजा जाता और इन्हें नियमित रूप से सेना के हरावल में रखा जाता था, जहां ये भारी संख्या में सेवक के रूप में काम करते और इनसे रसद पहुंचाने की ढुलाई करने का काम लिया जाता था । नावों के बेड़ों में गुलाम काफी संख्या में होते थे । 3


(1. 'स्लेवरी इन रोमन एम्पाय' पू. 105
2. वही, पृ. 106
3. वही, पृ. 130-47 )