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अस्पृश्यता - उसका स्रोत - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

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23 मे 2023
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अस्पृश्य - उनकी संख्या

    यह जानने से पहले कि अस्पृश्य होने का क्या अर्थ होता है, यह जानना आवश्यक है कि भारत में अस्पृश्यों की संख्या कितनी है ? इसके लिए जनसंख्या रिपोर्ट देखनी होगी।

    भारत में पहली बार आम जनगणना 1881 में हुई थी। 1881 की जनसंख्या रिपोर्ट में भारत की कुल जनगणना करने के लिए यहां की विभिन्न जातियों और प्रजातियों की सूची बनाने और उनका कुल योग करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया था। इस रिपोर्ट में विभिन्न हिंदू जातियों का उच्च या निम्न अथवा स्पृश्य या अस्पृश्य जातियों के रूप में कोई वर्गीकरण नहीं किया गया। दूसरी बार आम जनगणना 1891 में हुई। इस बार जनगणना आयुक्त ने देश की जनसंख्या को जाति, प्रजाति और उच्च या निम्न जाति के रूप में वर्गीकृत करने की कोशिश की। किंतु यह एक प्रयास मात्र था।

    तीसरी बार आम जनगणना 1901 में हुई। इस बार 'जनगणना के लिए एक नया सिद्धांत अर्थात् स्थानीय जनमत द्वारा स्वीकृत सामाजिक वरीयता के आधार पर वर्गीकरण का सिद्धांत अपनाया गया। इस पर उच्च जाति के हिंदुओं ने जाति के अनुसार उल्लेख किए जाने का तीव्र विरोध किया। उन्होंने जाति के बारे में पूछे गए प्रश्न को निकाल देने पर बल दिया।

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    किंतु जनगणना आयुक्त पर इस आपत्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जनगणना आयुक्त की दृष्टि में जाति के आधार पर उल्लेख किया जाना महत्वपूर्ण और आवश्यक था। जनगणना आयुक्त ने यह तर्क दिया कि सामाजिक संस्था के रूप में जाति के गुण-दोष के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए, परंतु यह स्वीकार करना असंभव है कि भारत में जनसंख्या संबंधी समस्या पर कोई भी विचार-विमर्श, जिसमें जाति एक महत्वपूर्ण मुददा न हो, लाभप्रद हो सकता है। भारतीय समाज का ताना-बाना अभी जाति-व्यवस्था पर आधारित है और भारतीय समाज के विभिन्न स्तरों में परिवर्तन का निर्धारण अभी भी जाति के आधार पर होता है। प्रत्येक हिंदू (यहां इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जा रहा है) जाति में जन्म लेता है, उसकी वह जाति ही उसके धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक जीवन का निर्धारण करती है। यह स्थिति मां की गोद से लेकर मृत्यु की गोद तक रहती है। पश्चिमी देशों में समाज के विभिन्न स्तरों का निर्धारण, चाहे वह आर्थिक हो, शैक्षिक हो, या व्यावसायिक हो, जिन प्रधान तत्वों के द्वारा होता है, वे अदलते - बदलते रहते हैं, वे उदार होते हैं, और उनमें जन्म और वंश की कसौटी को बदलने की प्रवृत्ति होती है। भारत में आध्यात्मिक, सामाजिक, सामुदायिक तथा पैतृक व्यवसाय सबसे बड़े तत्व हैं, जो अन्य तत्वों की अपेक्षा प्रधान तत्व होते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों में जहां जनगणना के समय आर्थिक अथवा व्यावसायिक वर्ग के आधार पर आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, वहां भारत में जनगणना के समय धर्म और जाति का ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रव्यापी और सामाजिक संस्था के रूप में जाति के बारे में कुछ भी क्यों न कहा जाए, इसकी उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं होगा और जब तक समाज में किसी व्यक्ति के अधिकार और उसके पद की पहचान जाति के आधार पर की जाती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हर दस साल बाद होने वाली जनगणना से इस अवांछनीय संस्था के स्थायी होते जाने में सहायता मिलती है।

    सन् 1901 की जनगणना के परिणामस्वरूप अस्पृश्यों की कुल जनसंख्या के बारे में कोई सटीक आंकड़े नहीं निकल सके। इसके दो कारण थे। पहला तो यह कि इस जनगणना में कौन अस्पृश्य है और कौन नहीं, इसे निश्चित करने के लिए कोई सटीक कसौटी नहीं अपनाई गई थी। दूसरे यह कि जो जातियां आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई थीं और अस्पृश्य नहीं थीं, उन्हें भी अस्पृश्यों के साथ मिला दिया गया।

    सन् 1911 की जनगणना में कुछ आगे काम हुआ और अस्पृश्यों की गणना बाकी लोगों से अलग करने के लिए दस मानदंड अपनाए गए। इन मानदंडों के अनुसार जनसंख्या अधीक्षकों ने उन जातियों और कबीलों की अलग-अलग गणना की, जो

    1. ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को नहीं मानते,

    2. किसी ब्राह्मण या अन्य मान्यता प्राप्त हिंदू से गुरु - दीक्षा नहीं लेते,

    3. वेदों की सत्ता को नहीं मानते थे।

    4. बड़े-बड़े हिंदू देवी- देवताओं की पूजा नहीं करते,

    5. ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते,

    6. जो किसी ब्राह्मण को पुरोहित बिल्कुल भी नहीं बनाते,

    7. जो साधारण हिंदू मंदिरों के गर्भ गृह में भी प्रवेश नहीं कर सकते,

    8. जिनसे छूत लगती है,

    9. जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं, और

    10. जो गोमांस खाते हैं और गाय की पूजा नहीं करते ।

    हिंदुओं से अस्पृश्यों को अलग मानने पर मुसलमानों द्वारा सरकार को 27 जनवरी, 1910 को प्रस्तुत किए अपने एक ज्ञापन में इस पर बल दिया गया कि उन्हें भारत की राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व हिंदुओं की कुल जनसंख्या के अनुपात में न देकर उन हिंदुओं की जनसंख्या के अनुपात में दिया जाए जो स्पृश्य होते हैं, क्योंकि उनका यह तर्क था कि जो अस्पृश्य हैं, वे हिंदू नहीं हैं।

    इस तरह यह कहा जा सकता है कि 1911 की जनगणना से अस्पृश्यों की संख्या के निर्धारण की शुरुआत हुई। 1921 और 1931 की जनगणना में भी इन हिदायतों के अनुपालन की कोशिश जारी रखी गई।

    साइमन कमीशन जो 1930 में भारत आया था, इन्हीं कोशिशों के परिणामस्वरूप कुछ-कुछ निश्चयपूर्वक यह बता सका कि ब्रिटिश भारत में अस्पृश्यों की जनसंख्या चार करोड़ 4.5 लाख है।

    किंतु 1932 में जब लोथियन समिति पुनर्गठित विधान सभा के लए मताधि कार के प्रश्न पर विचार करने के लिए भारत आई और उसने जांच करनी शुरू की तब हिंदुओं ने अचानक अपने तेवर बदल दिए और भारत में अस्पृश्यों की संख्या के बारे में जो आंकड़े साइमन कमीशन ने दिए थे उनको भारत में अस्पृश्यों की जनसंख्या के बारे में सही आंकड़ों के रूप में मानने से इंकार कर दिया। कुछ प्रांतों में तो हिंदुओं ने यहां तक कहा कि उनके प्रांत में कोई अस्पृश्य है ही नहीं। इसका कारण यह था कि तब तक हिंदुओं को अस्पृश्यों की स्थिति को खुले आम स्वीकार करने के खतरे का अहसास हो चुका था, क्योंकि इसका मतलब यह था कि हिंदुओं को जनसंख्या के आधार पर विध नसभा में जितना प्रतिनिधत्व मिला हुआ था, उसका कुछ अंश उनसे छिनकर अस्पृश्यों को मिल जाएगा।

    सन् 1941 की जनगणना पर विचार करना व्यर्थ है, क्योंकि यह जनगणना युद्ध - काल में की गई और एक प्रकार से यह अनुमानित ही थी ।

    अंतिम जनगणना 1951 में हुई । निम्नलिखित आंकड़े जनगणना आयुक्त द्वारा जारी विवरण से लिए गए हैं। जनगणना आयुक्त ने भारत में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या पांच करोड़ 13 लाख बताई है।

    सन् 1951 की जनगणना में, जिसमें भारत की कुल जनसंख्या 35 करोड़ 67 लाख बताई गई है, एक लाख 35 हजार लोगों की गणना नहीं की जा सकी, जिनसे संबंधित रिकार्ड जालंधर के जनगणना अधिकारी के कार्यालय में आग लग जाने कारण नष्ट हो गया था।

    पैंतीस करोड़ 67 लाख की कुल आबादी में से 29 करोड़ 49 लाख लोग ग्रामीण क्षेत्रों में हैं और छह करोड़ 18 लाख लोग शहरों में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या चार करोड़ 62 लाख है, जब कि शहरों में उनकी जनसंख्या 51 लाख है।

    कुल आबादी में गैर-कृषि कार्यों में लगे दस करोड़ 76 लाख लोगों में से एक करोड़ 32 लाख लोग अनुसूचित जातियों के हैं।

    कुल आबादी में जिन लोगों या उनके आश्रितों के पास पूरी तरह या आंशिक रूप से अपनी-अपनी जमीनें हैं और जो खेती करते हैं, उनकी जनसंख्या 16 करोड़ 74 लाख है। इनमें से एक करोड़ 74 लाख लोग अनुसूचित जातियों के हैं। जिन लोगों के पास बिल्कुल भी या मुख्य रूप से अपनी-अपनी जमीनें नहीं हैं और जो खेती करते हैं, उनकी जनसंख्या पूरे भारत में तीन करोड़ 16 लाख है,  इनमें से 56 लाख लोग अनुसूचित जातियों के हैं।

    खेतिहर मजदूरों और उनके आश्रितों की कुल जनसंख्या पूरे भारत में चार करोड़ 48 लाख है। इनमें से एक करोड़ 48 लाख अनुसूचित जातियों के हैं।

   गैर-कृषि वर्गों के आंकड़े इस प्रकार हैं-

कृषि को छोड़कर अन्य उत्पादन कार्य : कुल तीन करोड़ 77 लाख ।
अनुसूचित जातियों के लोग
53 लाख।
वाणिज्य व्यवसाय : कुल दो करोड़ 13 लाख ।
अनुसूचित जातियों के लोग
9 लाख ।
परिवहन : कुल 56 लाख  अनुसूचित
जातियों के लोग छह लाख ।
अन्य सेवाएं और विविध साधन : : कुल चार करोड़ 30 लाख ।
 अनुसूचित जातियों के लोग
64 लाख ।

    अनुसूचित जाति के लोगों की कुल पांच करोड़ 13 लाख की जनसंख्या में से उत्तरी भारत (उत्तर प्रदेश) में एक करोड़ 14 लाख लोग; पूर्वी भारत ( बिहार, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, असम, मणिपुर, त्रिपुरा) में एक करोड़ 28 लाख लोग; दक्षिणी भारत (मद्रास, मैसूर, ट्रावनकोर - कोचीन और कुर्ग) में एक करोड़ दस लाख लोग; पश्चिमी भारत (बंबई, सौराष्ट्र और कच्छ) में 31 लाख लोग; मध्य भारत (मध्य प्रदेश, मध्य भारत, हैदराबाद, भोपाल और विंध्य प्रदेश) में 76 लाख लोग; और उत्तर-पश्चिमी भारत ( राजस्थान, पंजाब, पटियाला और पूर्वी पंजाब के राज्यों, अजमेर, दिल्ली, बिलासपुर और हिमाचल प्रदेश) में 52 लाख लोग अनुसूचित जाति के हैं ।

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