मुख्य मजकूराकडे जा

अस्पृश्यता - उसका स्रोत - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

Page 6 of 6
23 मे 2023
Book
5,7,1,3,2,,

5

मनुष्यों में रहने के अयोग्य

    अस्पृश्य, जैसा कि पिछले अध्यायों में बताया गया है, हिंदू समाज से बाहर हैं। लेकिन अभी यह सवाल बाकी है कि उन्हें हिंदुओं से कितनी दूरी पर रखा गया है? अगर हिंदू उन्हें हिंदू के रूप में नहीं मानते, तब वे मानव मानकर उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिल जाता, तब तक हम अस्पृश्यों के जीवन के बारे में कोई सही तस्वीर नहीं बना सकते। इसका उत्तर है, बशर्ते कि कोई इसे जानना चाहे । कठिनाई केवल यह है कि उस उत्तर को किस प्रकार पेश किया जाए। इसे पेश करने के दो तरीके हैं। या तो यह कि यह उत्तर बयान के रूप में दिया जाए या यह कि कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जाएं। मैं उदाहरण का तरीका अपनाऊंगा। मैं पाठकों को ढेर सारे उदाहरण देकर यह नहीं चाहूंगा कि उनका मन ऊब जाए। मैं कुछेक उदाहरण दूंगा, जिनसे स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। पहला उदाहरण मद्रास राज्य से है।

    सन् 1909 में श्री वेंकट सुब्बा रेड्डी और उसके साथियों ने मजिस्ट्रेट द्वारा कुछ लोगों की इस शिकायत पर कि उन्होंने उनको बाधा पहुंचाई, भारतीय दंड संहिता की धारा 339 के अधीन सजा दिए जाने के विरुद्ध मद्रास हाईकोर्ट में अपील की । इस मुकदमे में वादी और प्रतिवादी, दोनों ही हिंदू थे । मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय' में इस मुकदमे का पूरा ब्यौरा तो मिलता ही है, लेकिन इससे स्पृश्यों की तुलना में अस्पृश्यों की स्थिति बड़े ही सटीक ढंग से स्पष्ट होती है। यह निर्णय उद्धत करने योग्य है। यह इस प्रकार है :-

(1. क्रिमिनल लॉ जर्नल (11) में पृ 263 पर उल्लिखित ।)

    'अपीलकर्ताओं ( वेंकट सुब्बा रेड्डी तथा अन्य) को इसलिए सजा दी गई है कि उन्होंने कुछ पेरियाओं को एक मंदिर के पास सार्वजनिक मार्ग में इस उद्देश्य से खड़ा किया, जिससे वादी उस मंदिर से एक जुलूस उस सड़क से होकर निकाल न सके। यह पता चला कि वादी ने इस आशंका से जूलूस नहीं निकाला कि अगर वह पेरियाओं के पास से होकर गुजरा तो वह अपवित्र हो जाएगा और यह अभियुक्त ने दुर्भाग्यपूर्वक पेरियाओं को सड़क पर खड़ा किया, जिसका एकमात्र प्रयोजन वादी को वहां जाने से रोकना था, जहां उसे जाने का अधिकार था ।

Untouchability and Its Source – Dr Bhimrao Ambedkar

    हम यह नहीं समझते कि अभियुक्त ने अनुचित अवरोध करने का कोई अपराध किया, हमारे विचार से यह कार्रवाई कोई ऐसी कार्रवाई नहीं थी, जिसे धारा 339 के अंतर्गत बाधा माना जाए। पेरिया लोग कोई बाधक नहीं थे। दरअसल वादी को उनके पास से जुलूस ले जाने से रोकने की कोई बात नहीं थी और उन्हें यह अधिकार था कि वे जहां रहना चाहते थे, रहें । और यह नहीं कहा गया कि उनकी उपस्थिति का प्रयोजन शारीरिक क्षति पहुंचाने का या किसी ऐसे भय को उत्पन्न करना था कि उनकी उपस्थिति से अपवित्र होने के अतिरिक्त कुछ और भी हो सकता था ।

    शिकायतकर्ता जहां जाना चाहता था, उसको वहां जाने से रोकने का कारण पेरियाओं की उपस्थिति नहीं थी, बल्कि उसका कारण उसकी खुद की अनिच्छा थी, जिसके कारण वह पेरियाओं के पास नहीं गया। जैसा कि श्री कुप्पुस्वामी अय्यर ने कहा है कि यह उसके द्वारा स्वयं किया गया चुनाव था, जिसके कारण वह मंदिर से बाहर नहीं गया। यह उसने अपनी सहमति से किया कि वह वहीं रहा और दंड संहिता के अर्थ की सीमा में क्षति पहुंचाने का कोई भय नहीं था, जिसके कारण उनकी सहमति मुक्त सहमति न होती । यदि स्थिति इससे भिन्न होती, तब यह समझा जाता कि किसी भी पेरिया के खिलाफ गलत खड़े होने के बारे में शिकायतकर्ता द्वारा की गई यह शिकायत उचित थी कि जब उससे उस स्थान से कुछ दूर हट जाने के लिए कहा गया, जहां वह अपने किसी काम से बिना किसी कानून का उल्लंघन किए विद्यमान था, तो उसने वहां से हटने से यह जानते हुए मना कर दिया कि जब तक वह वहां रहेगा, तब तक शिकायतकर्ता अपवित्र हो जाने के डर के कारण उसके पास से नहीं जाएगा।

(1. मद्रास में पेरिया अस्पृश्य जाति होती है।)


    यह स्पष्ट है कि इस मामले में कोई अनुचित बाधा नहीं पहुंचाई गई और हम समझते हैं कि अभियुक्त ने जो वहां पेरिया लोगों को खड़ा किया, उसमें कोई अंतर नहीं पड़ता । '

    इसलिए हम सजा को रदद करते हैं और यदि कोई जुर्माना अदा कर दिया गया है, तो वह लौटा दिया जाए।

    यह एक ज्वलंत उदाहरण है। मुकदमे में दो पक्ष थे । वेंकट सुब्बा रेड्डी एक पक्ष का नेता था। दोनों पक्ष सवर्ण हिंदू थे। उनके बीच जुलूस ले जाने के अधि कार के बारे में विवाद था। वेंकट सुब्बा रेड्डी अपने विरोधियों को जलूस निकालने से रोकना चाहता था। इसके लिए उसे कोई अच्छा तरीका मालूम नहीं था। तभी उसके दिमाग में यह तरकीब सूझी कि कारगर तरीका यही हो सकता है कि कुछ अस्पृश्यों को सड़क पर खड़ा कर दिया जाए और उनसे वहां से हटने के लिए कहा जाए । यह चाल काम कर गई और उसके विरोधी अपवित्र हो जाने के भय के कारण अपना जुलूस नहीं निकाल सके। यह बात दूसरी है कि मद्रास हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि पेरियाओं को सड़क पर खड़ा करना कानून की दृष्टि में बाधा नहीं कहलाता। लेकिन सच्चाई तो यही है कि सड़क पर पेरियाओं की उपस्थिति हिंदुओं को दूर रखने के लिए काफी है। इसका अर्थ यह हुआ कि हिंदुओं के मन में अस्पृश्यों के प्रति अटूट घृणा भरी हुई है।

    दूसरा उदाहरण भी उतना ही ज्वलंत है। यह काठियावाड़ में स्कूल के एक अस्पृश्य मास्टर से संबंधित है। यह श्री गांधी द्वारा प्रकाशित 'यंग इंडिया' नामक पत्र के 12 दिसम्बर, 1929 के अंक में पत्र के रूप में छपा था। इस पत्र में उसने यह बताया है कि उसे अपनी पत्नी का एक हिंदू डाक्टर से इलाज कराने में कौन-कौन सी कठिनाइयां आईं और किस प्रकार उसकी पत्नी और उसका बच्चा दोनों ही इलाज ने किए जाने पर मर गए । पत्र में बताया गया है।

    " मेरी पत्नी ने इस महीने की पांच तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया। सात तारीख को वह बीमार पड़ गई और उसे दस्त लग गए। वह कमजोर होती गई। उसके सीने पर सूजन आ गई। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी और उसकी पसलियों में बहुत दर्द होने लगा। मैं डाक्टर को बुलाने गया, लेकिन उसने कहा कि वह हरिजन के घर नहीं जाएगा। वह बच्चे की जांच करने के लिए भी तैयार नहीं हुआ। तब मैं नगर सेठ के पास गया

( 1. जिस मजिस्ट्रेट ने इस मामले की सुनवाई को उसने पेरियाओं की उपस्थिति को बाधा के रूप में पाया और इसलिए उसने अभियुक्त को दोषी करार दिया। )

और गरसिया दरबार में गया, और उनसे गुजारिश की कि वे इस मामले में मेरी मदद करें। नगर सेठ ने बतौर डाक्टर की फीस दो रुपये की जमानत दी। डाक्टर इस शर्त पर आया कि वह उन्हें हरिजन की बस्ती के बाहर देखेगा। मैं अपनी पत्नी और उसके हाल के हुए बच्चे को बस्ती के बाहर ले गया। तब डाक्टर ने अपना थर्मामीटर एक मुसलमान को दिया, उसने मुझे दिया और मैंने उसे अपनी पत्नी को लगाया और बाद में इसी प्रक्रिया के द्वारा थर्मामीटर डाक्टर को लौटा दिया गया। तब कोई रात के आठ बजे होंगे। डाक्टर ने लालटेन की रोशनी में थर्मामीटर देखा और कहा कि मरीज को निमोनिया हो गया है। इसके बाद डॉक्टर चला गया और उसने दवाई भेज दी। मैं बाजार से अलसी का तेल खरीद लाया और उसे अपनी पत्नी के सीने पर मला। इसके बाद डाक्टर दुबारा आने के लिए तैयार न हुआ, हालांकि मैंने उसे उसकी फीस के दो रुपये दे दिए थे। यह बीमारी खतरनाक है। भगवान ही हमारा भला करेगा।

    मेरे जीवन की ज्योति बुझ गई। आज दोपहर दो बजे मेरी पत्नी का देहांत हो गया।

    इस पत्र में स्कूल के अस्पृश्य मास्टर का नाम नहीं दिया गया। इसी प्रकार डाक्टर का नाम भी नहीं बताया गया है। ऐसा स्कूल के अस्पृश्य मास्टर के अनुरोध पर किया गया, क्योंकि उसे बाद में अपने सताए जाने की आशंका थी। इसमें जो बातें बताई गई हैं, वह सच हैं।

    इसकी व्याख्या करने की कोई जरूरत नहीं है। काफी पढ़े-लिखे होने पर भी एक डाक्टर ने ऐसी महिला के थर्मामीटर लगाना और उसका इलाज करना अस्वीकार कर दिया, जिसकी हालत काफी नाजुक थी। चूंकि उसने उसका इजाल करने स मना कर दिया इसलिए वह महिला मर गई। उस डाक्टर को इस बात का तनिक भी ख्याल नहीं हुआ कि वह उस आचरण संहिता का उल्लंघन कर रहा है, जो उसके व्यवसाय के लिए अनिवार्य होती है। हिंदू एक अस्पृश्य को छूने के बजाय अमानवीय होना अधिक पसंद करता है।

    तीसरा उदाहरण 23 अगस्त 1932 के 'प्रकाश' से लिया गया है:

    " तहसील जफरवाल के गांव जगवाल में 6 अगस्त को एक बछड़ा कुएं में गिर पड़ा। उस समय राम महाशय नाम का एक डोम' पास में ही खड़ा

(1. संयुक्त प्रात और बिहार में डोम अस्पृश्य जाति होती है।)


हुआ था। वह तुरंत कुएं में कूद पड़ा और उसने बछड़े को अपनी गोद में उठा लिया। तीन-चार आदमी उसकी सहायता के लिए आ गए और बछड़े को बचा लिया गया। लेकिन गांव के हिंदुओं ने आसमान सिर पर उठा लिया कि इस आदमी ने हमारा कुआं ही गंदा कर दिया और बेचारे को डांटने - फटकारने लगे। सौभाग्य से वहां एक बैरिस्टर आ गया। उसने उन लोगों को खूब डांटा-फटकारा, साधूराम से झगड़ रहे थे और उन्हें शांत किया। इस प्रकार एक आदमी की जान बच गई, वरना पता नहीं क्या होता । "

    यहां क्या महत्वपूर्ण है - एक अस्पृश्य द्वारा बछड़े की रक्षा करना और उसके कारण कुएं का गंदा हो जाना, हिंदुओं के विचार से बेहतर होता यदि उस बछड़े को मरने दिया जाता और कुएं को गंदा होने से बचाना।

   एक ऐसा ही मामला 19 दिसम्बर 1936 के 'बंबई समाचार' में छपा है:

    " कालीकट के एक गांव कलाडी में एक युवती का बच्चा कुएं में गिर पड़ा। वह जोर-जोर चिल्लाने लगी, लेकिन किसी की हिम्मत कुएं में कूदने की न हुई। वहां से एक अजनबी गुजर रहा था। वह बच्चे की रक्षा के लिए तुरंत कुएं में कूद पड़ा। जब उससे लोगों ने उसके बारे में पूछा कि वह कौन है, तो उसने जवाब दिया कि वह अस्पृश्य है । वहां लोगों ने उसके प्रति आभार प्रकट करने के बजाय उस पर गालियों की बौछार करनी शुरू कर दी और उसे मारा-पीटा कि उसने कुआं गंदा कर दिया।"

    हिंदुओं के लिए अस्पृश्य कितना गंदा और साथ में रहने के अयोग्य समझा जाता है। यह जुलाई 1937 के लखनऊ से प्रकाशित ' आदि हिंदू' नामक पत्र में प्रकाशित इस घटना से प्रकट होता है :

    " मद्रास होल्म्स कंपनी का एक कर्मचारी हाल ही में मर गया, , जो अपने आपको ऊंची जाति का कहता था। जब उसकी चिता को अग्नि दी गई, तो उसके परिवार वालों और वहां खड़े लोगों ने उसकी चिता पर चावल फेकें । दुर्भाग्य से उसके दोस्तों में से एक अस्पृश्य भी था, जो मद्रास का आदि-द्रविड़ था। उसने भी दूसरे लोगों की तरह चिता पर चावल फेंके। इस पर सवर्ण हिंदुओं ने उसे भला-बुरा कहा कि उसने चिता को अपवित्र कर दिया। इस बात पर काफी गरमा-गरमी हुई और बात यहां तक पहुंच गई कि दो आदमियों के पेट में चाकू घोंप दिया गया। एक आदमी तो अस्पताल जाते-जाते मर गया और दूसरे की हालत नाजुक बताई जाती है । "

    एक घटना है, जो इससे भी बढ़कर है । बंबई में 6 मार्च, 1938 को दादर के पास कासरवाड़ी (वूलेन मिल्स के पीछे) में इंदूलाल याज्ञनिक की अध्यक्षता में भंगियों की एक सभा हुई। इस सभा में एक भंगी युवक ने आपबीती इस प्रकार सुनाई:

    "मैंने 1933 में वर्नाक्यूलर परीक्षा पास की। मैंने चौथी कक्षा तक अंग्रेजी पढ़ी थी। मैंने बंबई नगर पालिका की स्कूल कमेटी को एक अध्यापक के रूप में नियुक्त के लिए आवेदन पत्र दिया। परंतु वहां कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए मुझे सफलता नहीं मिली। फिर मैंने अहमदाबाद के पिछड़ी जाति अधिकारी को आवेदन-पत्र दिया कि मुझे पटवारी की नौकरी दी जाए, और मैं सफल हो गया। 19 फरवरी, 1936 को मुझे खेड़ा जिले के वरसाड तालुका में मामलातदार के यहां पटवारी नियुक्त किया गया।

    हालांकि हमारा परिवार गुजरात का है, लेकिन मैं इससे पहले कभी गुजरात नहीं गया था। गुजरात जाने का मेरा यह पहला मौका था। मुझे यह नहीं मालूम था कि सरकारी दफ्तरों में भी छुआछूत होती है। इसके अलावा, मैंने अपने आवेदन-पत्र में भी यह लिख दिया था कि मैं एक हरिजन हूं, इसलिए मुझे उम्मीद थी कि मेरे वहां पहुंचने से पहले ही लोगों को यह पता चला जाएगा कि मैं कौन हूं। जब मैं मामलातदार के दफ्तर में पहुंचा और पटवारी का कार्यभार संभालने के लिए उपस्थित हुआ, तो वहां के क्लर्क का रवैया देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।

    कारकून ने मुंह बिचका कर पूछा, 'तुम कौन हो?' मैंने उत्तर दिया, 'श्रीमान, मैं एक हरिजन हूं।' उसने कहा, दूर हटो। वहां दूर खड़े होकर बात करो। मेरे पास आकर खड़े होने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। गनीमत है कि यह दफ्तर है। दफ्तर के बाहर होता तो मैं तुझे छह ठोकर मारता । यहां नौकरी पर आने की हिम्मत कैसे हुई। इसके बाद उसने मुझसे कहा कि मैं अपनी प्रमाण-पत्र और पटवारी के लिए नियुक्ति पत्र जमीन पर डाल दूं। उसने उन्हें वहां से उठाया। जब मैं वरसाड में मामलातदार के दफ्तर में काम करता था, तो मुझे पानी पीने के लिए बहुत कष्ट उठाना पड़ता था । दफ्तर के बरांडे में पानी के घड़े रखे होते थे । पानी पिलाने वाला एक नौकर भी था। उसका काम दफ्तर के क्लर्कों को जब वे आते, पानी पिलाना था। जब पानी पिलाने वाला नहीं होता था तो वे उन घड़ों से खुद पानी ले लेते थे। मेरे लिए ऐसा करना असंभव था। मैं घड़ों को छू भी नहीं सकता था, क्योंकि मेरे छू लेने से पानी गंदा हो जाता। इसलिए मेरा पानी पीना दूसरों की कृपा पर निर्भर करता था । मेरे लिए वहां एक जंग खाया कनस्तर रख दिया गया था। कोई उसे छूता ही नहीं था और उसे मेरे सिवाय कोई साफ भी नहीं करता था। मेरे लिए इसी कनस्तर में पानी डाल दिया जाता था। लेकिन वह पानी भी मैं तभी पी सकता था, जब पानी पिलाने वाला वहां मौजूद हो। उस आदमी की इच्छा मुझे पानी देने की न होती थी। जब वह यह देखता कि मैं पानी पीने के लिए आ रहा हूं, तो वह जान-बूझकर इधर-उधर हो जाया करता था। नतीजा यह होता था कि मैं प्यासा ही रह जाता था। अक्सर मुझे प्यासा रहना पड़ता था ।

    मकान के मामले में भी मेरे सामने ऐसी ही मुश्किलें आईं। मैं वरसाड में अजनबी था। कोई सवर्ण हिंदू मुझे रहने के लिए किराए पर मकान क्यों देता ? वहां के अस्पृश्य भी मुझे इसलिए मकान देने के लिए तैयार न हुए कि वहां के हिंदू लोग कहीं उनसे नाराज न हो जाएं। हिंदू नहीं चाहते थे कि मैं वहां एक क्लर्क के रूप में कार्य करूं, जो मेरे लिए ऊंची नौकरी थी। इससे भी ज्यादा मुश्किलें खाना खाने के बारे में सामने आईं। मैं कहीं से भोजन प्राप्त नहीं कर सकता था। मैं सुबह - शाम भाजा खरीदकर खाता था, और वह भी मैं गांव के बाहर अकले में खाता। लौटकर फिर मामलातदार के दफ्तर की सीढ़ियों पर सो जाता था। मैंने चार दिन ऐसे ही बिताए । जब मुझसे बर्दाश्त न हुआ, तब मैं जन्तराल में रहने के लिए चला गया, जो मेरा पुश्तैनी गांव था । यह वरसाड से करीब छह मील दूर है। मुझे रोजाना ग्यारह मील आना-जाना पड़ता था। मैंने डेढ़ महीने इसी प्रकार गुजारे ।

    इसके बाद मामलातदार ने मुझे पटवारीगिरि सीखने के लिए एक पटवारी के पास भेज दिया। उस पटवारी के अधीन तीन गांव, जनतराल, खापुर और सैर थे। वह जंतराल में रहता था। मैं जन्तराल में उसी पटवारी के साथ दो महीने रहा। उसने मुझे इस बीच में कुछ नहीं सिखाया। मैं उसके दफ्तर के अंदर एक बार भी नहीं जा सका। गांव का मुख्यिा खासतौर से मुझसे चिढ़ता था। एक बार उसने मुझसे कहा, तुम लोग, तुम्हारा बाप तुम्हारा भाई पटवारी के दफ्तर में झाडू लगाते थे और तुम दफ्तर में हमारे बराबर बैठना चाहते हो? होश में आओ, और यह नौकरी छोड़ दो ? "

    एक दिन पटवारी ने मुझे सैजपुर बुलाया और गांव की जनसंख्या की तालिका बनाने को कहा। मैं जन्तराल से सैजपुर गया। मैंने देखा कि मुखिया और पटवारी कोई काम कर रहे थे। मैं गया, दफ्तर के दरवाजे के पास खड़ा रहा। मैंने उनको नमस्ते की, पर किसी ने मेरी तरफ देखा तक नहीं । मैं पंद्रह मिनट तक बाहर खड़ा रहा। मैं अपनी जिंदगी से तंग हो चुका था। इस प्रकार उपेक्षित और अपमानित होने पर मुझे भी गुस्सा आ गया। वहां एक कुर्सी पड़ी थी। मैं उस पर बैठ गया । मुझे कुर्सी पर बैठा देखकर मुखिया और पटवारी मुझसे कुछ कहे बिना चुपचाप वहां से चले गए। कुछ ही देर में वहां लोग आने शुरू हो गए और देखते ही देखते मेरे चारों ओर भीड़ जमा हो गई। इस भीड़ का मुखिया गांव की लायब्रेरी का कर्मचारी था। मेरी समझ में नहीं आया कि क्यों कर एक पढ़ा-लिखा आदमी इस भीड़ का अगुआ बना हुआ है। फिर मुझे पता चला कि यह कुर्सी उसी की थी। उसने मुझे गंदी-गंदी गालिया बकनी शुरू कर दीं। फिर उसने रावनिया ( गांव के चौकीदार) से कहा कि इस भंगी के कुत्ते को इस कुर्सी पर किसने बैठने दिया। चौकीदार ने मुझे उठा दिया और मुझसे कुर्सी छीन ली। मैं जमीन पर बैठ गया। तब भीड़ दफ्तर के भीतर घुस आई और मुझे घेर लिया। लोग गुस्से से लाल हो रहे थे। कुछ मुझे गालियां दे रहे थे और कुछ ने धमकी दी कि धारिया (तेजधार का तलवार जैसा हथियार) से मेरी बोटी-बोटी काट दी जएगी। मैंने उनसे माफी मांगी और दया करने को कहा। भीड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कैसे जान बचाऊं। मेरे दिमाग में आया कि इस बारे में मैं मामलातदार को बताऊं कि किस तरह यह मुसीबत मेरे गले आ पड़ी है, और अगर इस भीड़ द्वारा मेरी हत्या कर दी जाए, तो मेरे शव का क्या किया जाए। मैंने सोचा कि अगर भीड़ को किसी तरह यह पता चल जाए कि मैं सचमुच मामलातदार से शिकायत कर रहा हूं, तो शायद लोग मुझे छोड़ दें। मैंने चौकीदार से कागज लाने को कहा, जो उसने ला दिया। इसके बाद मैंने बड़े-बड़े अक्षरों में यह चिट्ठी लिखी, जिसे हर कोई पढ़ सकता था ।

 

'सेवा में,
ममलातदार,
वरसाड तालुका |
महोदय,

    कृपया कालीदास शिवराम परमार का विनम्र अभिवादन स्वीकार करें। मैं आपको विनम्रता के साथ सूचित करता हूं कि आज मौत साक्षात मेरे सामने आकर खड़ी हो गई है। यदि मैंने माता-पिता का कहना माना होता, तो आज यह नौबत नहीं आती। कृप्या मेरे माता-पिता को मेरी मौत का समाचार दें।'

    जो कुछ मैंने लिखा था, उसे लायब्रेरियन ने पढ़ लिया। उन्होंने मुझे चिट्ठी को फाड़ डालने के लिए कहा। मैंने वह चिट्ठी फाड़ दी। उन्होंने जी भर कर मुझे गालियां सुनाईं और कहा, 'तुम चाहते हो कि हम तुम्हे पटवारीजी कहें, तुम एक भंगी हो, और दफ्तर में घुसकर कुर्सी पर बैठना चाहते हो।' मैंने दया की याचना की और वायदा किया कि ऐसा फिर कभी नहीं होगा । मैंने नौकरी छोड़ देने का भी वायदा किया। जब शाम को सात बजे भीड़ वहां से चली गई, तब तक मैं वहां रहा । तब तक पटवारी और मुखिया नहीं आए थे । उसके बाद मैंने पंद्रह दिन की छुट्टी ली और लौटकर अपने माता-पिता के पास बंबई आ गया ।"

    अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं के सामाजिक दृष्टिकोण का एक और उदाहरण है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। यह दृष्टिकोण निम्नलिखित उदाहरणों से और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

    आठ सितंबर 1943 के 'अलफजल' से :

    " नासिक से पहली सितम्बर को यह खबर मिली कि गांव के हिंदुओं ने एक अछूत परिवार पर धावा बोल दिया है। एक बुढ़िया के हाथ-पांव बांध दिए, उसे लकड़ियों के ढेर पर डाल दिया और उसमें आग लगा दी। यह सब-कुछ इसलिए हुआ कि वे सोचते थे कि गांव में हैजा इसी की वजह से फैला है। " उनतीस अगस्त 1946 के टाइम्स आफ इंडिया' से :

    " खेड़ा जिले के एक गांव में सवर्ण हिंदुओं ने हरिजनों के मकानों पर हमला कर दिया। उनको संदेह था कि ये लोग जादू-टोना करते हैं, जिससे जानवर मर जाते हैं।

    कहा जाता है कि दो सौ ग्रामीण लाठियां लेकर हरिजनों के मकानों में घुस आए, एक बुढ़िया को पेड़ से बांध दिया और उसके पैर जला दिए । उन्होंने एक और औरत की जबरदस्त पिटाई की।

    हरिजन डरकर गांव से भाग गए। जिला हरिजन सेवक संघ के मंत्री छोटा भाई पटेल को जब इस घटना का पता चला, तो वह हरिजनों को गांव वापस आए हैं और उन्होंने हरिजनों की सुरक्षा के लिए अधिकारियों को एक पत्र भेजा है। "

    एक और गांव से भी ऐसी ही घटना का समाचार मिला है। कहा जाता है कि यहां भी हरिजनों की जबरदस्त पिटाई की गई है।

     बात यही खत्म नहीं हो जाती। हिंसा की ऐसी ही एक और घटना हुई, जिसमें कहा गया है कि हिंदुओं ने मिलकर अस्पृश्यों पर हमला किया। यह खबर 22 सितम्बर, 1946 के 'भारत ज्योति' नाम समाचार पत्र में छपी। इसका विवरण इस प्रकार है :

    "वरसाड तालुका के हरिजन सेवक संघ के मंत्री को एक रिपोर्ट प्राप्त हुई है, जिसमें कहा गया है कि खेड़ा जिले के वरसाड तालुका के एक गांव में ग्रामीणों की भीड़ द्वारा किए गए हमले के कारण पांच हरिजन गंभीर रूप से घायल हो गए। उनमें एक महिला भी थी। उन पर यह हमला धारियों और लाठियों से किया गया। यह हमला लगभग सात बैलों के मर जाने के कारण किया गया। गांव वालों को यह संदेह था कि हरिजन टोना-टोटका किया करते हैं।

    घायलों को अस्पताल भेज दिया गया है। पुलिस मौके पर पहुंच गई है और कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। कहा जाता है कि गांव वाले हरिजनों को धमका रहे हैं कि यदि वे इस बारे में अधिकारियों से किसी तरह की शिकायत करेंगे, तो उन्हें जिंदा जला दिया जाएगा।

    खेड़ा के गांवों में ऐसी घटनाएं प्रायः होती रहती हैं और जिलाधीश ने सभी पुलिस अधिकारियों और अन्य अधिकारियों को हिदायतें दी हैं कि हरिजनों का उत्पीड़न करने वालों को कड़ी सजा दी जाएगी।"

     इन उदाहरणों से जो बात सामने आती है, वह साफ और सीधी है। कुछ और कहने की जरूरत नहीं। अस्पृश्य के पास आना भी आम हिंदू के लिए गवारा नहीं । उससे छूत लग जाती है। वह इंसान नहीं है। उसे दूर रखना चाहिए ।

Book Pages

Page 6 of 6