भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
बंबई नगर की स्थिति
बंबई नगर का क्षेत्र एक विवादास्पद विषय है और यह विवाद बहुत तीव्र बन चुका है। महाराष्ट्रीय चाहते हैं कि यह नगर महाराष्ट्र का भाग बने। गुजराती चाहते हैं कि यह नगर एक पृथक राज्य हो। इसी विवाद पर सिर- फुटव्वल हुई है, लेकिन इस पर कोई सहमति नहीं हो पाई। इसलिए यह जरूरी है कि मामले की जड़ तक पहुंचा जाए।
गुजराती बंबई को अपना शहर नहीं मानते, लेकिन यह भी नहीं चाहते कि वह उनके हाथों से निकल जाए। चूंकि इस नगर के व्यापार और उद्योग पर उनका नियंत्रण है, इसलिए वे इस पर एक प्रकार का सुविधाधिकार चाहते हैं । मुद्दा है कि यह महाराष्ट्र का अंग बने या इसका पृथक राज्य के रूप में निर्माण किया जाए? इस मुद्दे पर गुजरातियों और महाराष्ट्रियों में तीव्र मतभेद हैं। महाराष्ट्रीय चाहते हैं कि बंबई नए महाराष्ट्र राज्य का ही अंग बने। गुजराती इसका डटकर विरोध करते हैं। उन्होंने दो विकल्प रखे हैं। एक विकल्प तो यह है कि वर्तमान द्विभाषी बंबई राज्य को तोड़कर गुजरात और महाराष्ट्र की दो भाषायी इकाइयां न बनाई जाएं। कांग्रेस कार्यकारिणी समिति का निर्णय यह है कि बंबई नगर को एक पृथक राज्य बना दिया जाए ।
गुजराती खुश हैं, लेकिन जाहिर है महाराष्ट्रीय इससे नाराज हैं। महाराष्ट्रियों का रोष बिल्कुल जायज है। महाराष्ट्रियों के विरुद्ध जो तर्क प्रस्तुत किए गए हैं, उनमें कोई दम नहीं है।
पहला तर्क जो दिया गया गया है, वह यह है कि बंबई शहर की कुल जनसंख्या में मराठी लोगों का बहुमत नहीं है। बंबई की कुल जनसंख्या बहुत भारी है (देखें सांख्यिकीय परिशिष्ट ) | मराठी भाषी लोग 48 प्रतिशत हैं।

जो इस प्रकार का तर्क देते हैं, वे उस तर्क की कमजोरी को महसूस नहीं करते ।
निःसंदेह, बंबई नगर में मराठी भाषी लोग 50 प्रतिशत से कम हैं, लेकिन इसका मूल्यांकन दो कारकों से किया जाना चाहिए। एक तो यह है कि भौगोलिक दृष्टि से कोई यह मानने से इन्कार नहीं करेगा कि बंबई महाराष्ट्र का ही एक भाग है, चाहे महाराष्ट्रीयों का शहर के अंदर अल्पमत ही है। यहां तक कि श्री मोरारजी देसाई ने भी गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति की एक बैठक में भाषण देते हुए कहा था कि बंबई महाराष्ट्र का ही भाग है।
जनसंख्या कारक का मूल्यांकन करते समय जो दूसरा प्रश्न विचारणीय है, वह है शेष भारत से आने वाले लोगों का तांता, जो या तो लाभ कमाने के उद्देश्य से बंबई आते हैं या जीविकोपार्जन के लिए उनमें से कोई भी बंबई को अपना घर नहीं समझता और इसीलिए उनमें से किसी को बंबई नगर का स्थायी निवासी नहीं समझना चाहिए। उनमें से तो कुछ महीनों के लिए ही आते हैं और वापस चले जाते हैं।
बंबई केवल महाराष्ट्रीयों के लिए घर है और किसी के लिए नहीं। इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कि बंबई शहर में बहुसंख्यक कौन लोग हैं, गैर- महाराष्ट्रियों को गिनना न तो तर्कसंगत है और न ही उचित ।
इसके अतिरिक्त यही नहीं देखा गया कि बंबई में गैर- महाराष्ट्रीयों की जो बाढ़ चली आती है, उसका कारण ऐसे स्थानीय कानून का होना है, जिसके अनुसार नागरिकता की बढ़ती को रोका जा सके। यदि बंबई राज्य में ऐसा कानून होता है तो भारत के सभी भागों से बंबई आने वालों का प्रवाह रोका जा सकता था और महाराष्ट्रीयों का बहुमत बरकरार रखा जा सकता था ।
यह भी अनुभव नहीं किया गया कि बंबई में गैर- महाराष्ट्रीयों का प्रवाह इसलिए और भी होता है कि बंबई एक बंदरगाह है और यह बंदरगाह इसके पश्चिमी तट पर है। यूरोप से बंबई का रास्ता यूरोप से कलकत्ता या यूरोप से मद्रास की अपेक्षा कहीं छोटा है। यही कारण है कि भारत के अन्य भागों से गरीब लोग भारी संख्या में अपने घर बार छोड़कर अस्थायी निवास के लिए बंबई आते हैं। बंबई में दूसरे शहरों की तुलना में रोजगार तलाश करना भी आसान है ।
सच तो यह है कि इस मामले पर भिन्न दृष्टिकोण से विचार किया जाना चाहिए। लोग विगत लगभग दो सौ वर्षों से बंबई आते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद इस आवाजाही से महाराष्ट्रीयों की शहर में जनसंख्या 48 प्रतिशत से कम नहीं हुई है। दो सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी इसकी जनसंख्या का स्वरूप मुख्यतः महाराष्ट्रीय ही बना हुआ है। इसका कारण नगर का प्रवासी स्वरूप है (देखें परिशिष्ट 3 ) । गुजराती लोग तो प्रवासी होते ही हैं।
कुछ अन्य तर्क भी ऐसे हैं, जो बंबई को महाराष्ट्र के एक भाग के रूप में बनाए रखने के पक्ष में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
बंबई भारत का एकमात्र मिश्रित नगर नहीं है। कलकत्ता और मद्रास भी मिश्रित नगर हैं यदि कलकत्ता, पश्चिम बंगाल का और मद्रास, मद्रास राज्य का भाग हो सकता है. तो बंबई को महाराष्ट्र का भाग बना देने में क्या आपत्ति है? यही वह प्रश्न है, जो प्रत्येक महाराष्ट्रीय पूछेगा। मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। मेरे मस्तिष्क में एक ही उत्तर आता है, जो यह है कि कांग्रेस की आला कमान का यह विचार है कि महाराष्ट्रीय दूसरों पर शासन करने के योगय नहीं है। यह महाराष्ट्रीयों के चरित्र पर एक लाछंन है और वे उसे हरगिज सहन नहीं करेंगे।
कहा जाता है कि बंबई गैर- महाराष्ट्रीयों की पूंजी के बल पर बना है। हो सकता है ऐसा ही हो। लेकिन क्या मद्रास मद्रासियों की पूंजी के बल पर बनाया गया है? क्या कलकत्ता बंगालियों की पूंजी से बना है? अगर यूरोपीय लोग मद्रास और कलकत्ता में पूंजी निवेश न करते तो ये दोनों गांव ही बने रहते। फिर भला महाराष्ट्रीयों के खिलाफ यह दलील क्यों दी जाती है, जब वे बंबई को अपना बताते हैं। महाराष्ट्रीयों ने बंबई को मजदूर तो दिए ही हैं, जिनके बिना बंबई नगर वह नहीं हो सकता था, जो वह आज है। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि बंबई का अस्तित्व महाराष्ट्र पर ही निर्भर है। उसके विद्युत के संसाधन महाराष्ट्र में हैं। उसकी जलपूर्ति के साधन महाराष्ट्र में हैं। उसके श्रमिकों के साधन महाराष्ट्र में हैं। महाराष्ट्र किसी भी समय बंबई नगर को मोहनजोदाड़ों में परिवर्तित कर सकता है।
गुजराती लोगों को यह डर है कि महाराष्ट्रीय उनके साथ भेदभाव का व्यवहार करेंगे लेकिन हमारे संविधान के अनुसार भेदभाव इसलिए संभव नहीं है क्योंकि संविधान में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यालय के आदेश के रूप में मौलिक अधिकारों और उपचारों की सूची दी गई है, जिनके अधीन किसी भी अन्याय का तत्काल निवारण कराया जा सकता है। भेदभाव-जन्य किसी भी प्रकार के अन्याय के लिए संविधान में उपचार की व्यवस्था है। भला गुजरातियों को डरने की क्या आवश्यकता है?
आइए, अब हम इस पर विचार करें कि गुजरातियों को बंबई के एक पृथक नगर राज्य बन जाने से क्या लाभ पहुंचेगा। बंबई राज्य में उनकी आबादी केवल 10 प्रतिशत है। उन्हें बंबई के नगर राज्य की विधानसभा में कितनी सीटें मिल जाएंगी? 10 प्रतिशत भी नहीं। फिर भला 10 प्रतिशत लोग 90 प्रतिशत के मुकाबिले में अपने मुवक्किलों की रक्षा कैसे कर पाएंगे?
यह स्मरणीय है कि महाराष्ट्रियों और गुजरातियों के बीच जो प्रतिद्वंद्विता की भावनाएं हैं, वे पहले से कहीं अधिक उत्तेजित होती जाएंगी। महाराष्ट्रीय, गुजराती उम्मीदवार को मत नहीं देगा और गुजराती मतदाता किसी महाराष्ट्रीय प्रत्याशी को मत नहीं। अब तक तो गुजराती पैसों से महाराष्ट्र में अपना काम निकाल रहे हैं। लेकिन एक बार आत्म-सम्मान जाग जाए तो पैसा भी कुछ नहीं कर पाएगा। गुजरातियों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि परस्पर सद्भाव से अधिक संरक्षण मिल सकता है, या नगर के शासन में छोटी-छोटी भागीदारी से ?
वैसे तो महाराष्ट्र का पक्ष फौलाद की तरह मजबूत है, लेकिन कुछ बातें दूसरे पक्ष की ऐसी हैं, जिन पर उन्हें ठंडे दिल से गौर करना चाहिए।
वे चाहते हैं कि बंबई महाराष्ट्र ही में रहे। लेकिन उनके लिए विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर वे चाहते क्या हैं? क्या वे चाहते हैं कि बंबई प्रगति करता रहे, या वे चाहते हैं कि वह पतनशील हो जाए? क्या बंबई महाराष्ट्र में रहते हुए फल-फूल सकता है? इसका प्रकरांतर से यह अर्थ है क्या महाराष्ट्र बंबई नगर के वर्द्धमान व्यापार और उद्योग-धंधों के लिए आवश्यक पूंजी जुटा सकता है? कोई भी महाराष्ट्रीय इस प्रश्न का उत्तर 'हां' में नहीं दे सकता। महाराष्ट्रीय वर्षों के बाद इस स्थिति में आ पाएंगे कि पूंजी की आवश्यकता पूरी कर सके। फिलहाल तो ऐसा संभव नहीं जान पड़ता।
दूसरा मुद्दा यह है : यदि नगर की संपन्नता में गिरावट आ जाए चाहे वह पूंजी के पलायन के कारण हो या व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लोप से तो बंबई में रहने वाले महाराष्ट्रियों के जीवन-स्तर पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? महाराष्ट्रियों को यह नहीं भूलना चाहिए चाहे इससे उनके स्वाभिमान को ठेस क्यों न पहुंचती हो कि वे क्लकों और कुलियों के देश में रहते है। किसी पतनशील नगर में उन्हें कौन रोजगार देगा ?
महाराष्ट्रियों को बंबई के प्रश्न पर इसी दृष्टि से विचार करना चाहिए। एक सूक्ति हैं।
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्ध त्यजति पंडितः ।
बंबई नगर को पृथक राज्य का दर्जा दिए जाने के लिए एक और कारण भी है। अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति के लोग जो गांवों में रहते हैं, उन पर बहुसंख्यक समुदाय के लोग अत्याचार करते हैं, उनका उत्पीड़न करते हैं, यहां तक कि वे उनकी हत्या भी कर देते हैं। अल्पसंख्यक समुदायों को शरण चाहिए एक ऐसा सुरक्षित स्थान चाहिए जहां वे बहुसंख्यक समुदाय के अत्याचार से सुरक्षित रह सकें। यदि संयुक्त महाराष्ट्र बन जाए जिसमें बंबई शामिल हो, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए कहां जाएंगे ?
इसी प्रकार का अत्याचार उस समय गांवों में रहने वाले ब्राह्मणों, मारवाड़ियों और गुजरातियों के साथ किया जाता था, जब गोडसे ने गांधी जी की हत्या की थी। सभी ब्राह्मण, मारवाड़ी और गुजराती, जो किसी समय गांवों में रहते थे, वहां से भाग निकले। जो अब शहरों-कस्बों में रहते हैं और सुरक्षित हैं और अपने अनुभवों को भुलाकर संयुक्त महाराष्ट्र की मांग कर रहे हैं।
मैं समझता हूं कि यदि महाराष्ट्रीय फिलहाल कांग्रेस आला कमान का निर्णय मान लें, तो उनके लिए यह हितकर सिद्ध होगा।
महाराष्ट्रियों को बंबई के हाथ से निकल जाने पर कोई डर नहीं होना चाहिए । महाराष्ट्रियों को कोई भी बंबई से वंचित नहीं कर सकता, न ही उन्हें बंबई से बाहर निकाल सकता है।
बंबई की पृथक राज्य के रूप में रचना पर जो असली आपत्ति है, उसका कारण यह है कि 'बंबई' नाम से यह अर्थ नहीं निकलता कि यह महाराष्ट्र का ही एक अंग है। इसी आपत्ति का निराकरण करने के लिए मेरा यह सुझाव है कि बंबई के नए राज्य का नाम बदल कर इसे कोई और नाम दे दिया जाए, जिससे महाराष्ट्र का बोध होता हो ।
मान लीजिए, इस सुझाव के अनुसार यह कहने के बजाए कि बंबई को एक पृथक राज्य बना दिया जाए, यदि यह कहा जाए कि महाराष्ट्र को चार राज्यों में विभक्त कर दिया जाए (1) महाराष्ट्र नगर-राज्य (जो बंबई नगर है), (2) पश्चिमी महाराष्ट्र, (3) मध्य महाराष्ट्र, और (4) पूर्वी महाराष्ट्र तो बंबई की पृथक राज्य के रूप में रचना करने पर क्या आपत्ति हो सकती है?
इसका मतलब भी तो बंबई का पृथक्करण ही होगा। नगर के नाम में इस प्रकार का परिवर्तन किए जाने पर मैं यह जानना चाहूंगा कि ऐसा कौन महाराष्ट्रीय होगा, जिससे इस आधार पर कि इस योजना से बंबई महाराष्ट्र से पृथक हो जाएगा, बंबई की पृथक नगर - राज्य के रूप में रचना पर आपत्ति हो ? यह कह देना कि बंबई को एक पृथक राज्य बना दिया जाए, ऐसा ही है, जैसे यह कहा जाए कि महाराष्ट्र को चार राज्यों में विभक्त कर दिया जाए। यदि महाराष्ट्र को दो या तीन राज्यों में विभक्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है, तो उसके चार भागों में विभक्त कर देने पर क्या आपत्ति हो सकती है? मुझे तो कोई आपत्ति दिखाई नहीं देती भाषा में समानता की दृष्टि से मेरा सुझाव है कि कलकत्ता को बंगाल राज्य नगर और मद्रास को तमिल राज्य नगर के नाम दिए जाएं।
महाराष्ट्रियों और गुजरातियों के बीच तनाव की स्थिति दूर करने के लिए मैंने यह सुझाव दिया है।
महाराष्ट्र नगर-राज्य अधिशेष राज्य होगा। जो लोग संयुक्त महाराष्ट्र की मांग करते हैं जिसमें बंबई शामिल हो, उन्हें इस अधिशेष से महाराष्ट्र के लिए लाभ मिलने की आशा है।
नगर-राज्य का अधिशेष राजस्व इन दो करों से मिल सकता है (1) संपत्ति कर, और (2) विद्युत कर। यदि बंबई पृथक नगर-राज्य बन जाए तो क्या इन दो स्रोतों से प्राप्त राजस्व का विनियोजन महाराष्ट्र अपने लिए कर सकता है ?
बंबई नगर-राज्य संपत्ति कर में से संपत्ति कर की आय ले लेना संभव ही नहीं है। यह स्थानीय कर है, जो स्थान विशेष में स्थित संपत्ति पर लगाया जाता है। इस कर से प्राप्त आय का अधिकारी वही राज्य हो सकता है, जिसमें वह सम्पत्ति स्थिति हो ।
जहां तक विद्युत कर का संबंध है, उसमें स्थिति भिन्न है।
जब गुजरात और महाराष्ट्र अलग हो जाएं और जो हो ही जाएंगे तो गुजरात अपने ही राज्य में उत्पन्न और खर्च होने वाली बिजली से अर्जित राजस्व की मांग करेगा। महाराष्ट्र अपने ही राज्य में उत्पन्न और खर्च होने वाली बिजली से अर्जित राजस्व का दावा करेगा बंबई नगर भी राज्य होने के नाते यही करेगा। क्या बंबई को इस प्रकार राजस्व हथियाने की अनुमति दी जाएगी? क्या यह न्याय संगत होगा? बंबई नगर बिजली पैदा नहीं करता, वह बंबई शहर के बाहर महाराष्ट्र में पैदा की जाती है। इसलिए बंबई नगर - राज्य को यह अधिकार नहीं है कि वह बिजली से अर्जित समस्त राजस्व खुद ले ले । उचित तो यह है कि ऐसी स्थिति में साधनों के पृथक्करण और आय के विभाजन का सिद्धांत लागू किया जाए जो राज्य वित्त के सभी विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं।
इसे ठोस आधार प्रदान करने के लिए केंद्र को चाहिए कि वह विद्युत का करारोपण अपने अधीन ले ले और होने वाली आय को महाराष्ट्र के चार राज्यों में उनकी आवश्यकता के अनुरूप बांट दें -
(1) बंबई, (2) पश्चिमी महाराष्ट्र, (3) मध्य महाराष्ट्र और (4) पूर्वी महाराष्ट्र
इससे बंबई के पृथक्करण के कारण इन तीनों महाराष्ट्रों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव में कमी आ जाएगी।