भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
खोए हुए क्षेत्र की पुनर्प्राप्ति
क्या सभी मराठी भाषी लोगों को एक ही राज्य में ठूंस दिया जाए? या उन्हें दो या उससे अधिक राज्यों में बांट दिया जाए।
अगला प्रश्न यह है कि बंबई के पृथक्करण के बाद शेष बचे भाग का क्या किया जाए। शेष भाग के भी दो हिस्से हैं (1) गुराजत और (2) महाराष्ट्र। मेरी चिंता महाराष्ट्र के बारे में है। आयोग ने भाषायी प्रांतों की रचना करते समय मराठी भाषी क्षेत्र गैर-मराठी भाषी क्षेत्रों
को दे दिए हैं। इस प्रकार सम्मिलित न किए गए क्षेत्रों की संख्या इस प्रकार है :
1. बेलगाम ताल्लुक बेलगाम शहर सहित
2. खानपुर ताल्लुक
3. चिकोरी ताल्लुक जिसमें निपानी शामिल हैं।
4. सूप ताल्लुक
5. कारवार ताल्लुक
6. बीदर में निलंग ताल्लुक
7. बीदर में अहमदपुर तहसिल
8. बीदर में उदगीर तहसिल
9. आदिलाबाद में राजगीर तहसिल
10. विदर्भ का कुछ भाग जो पड़ोसी हिन्दी भाषी राज्य को दे दिया ।
जिन महाराष्ट्रियों को महाराष्ट्र से अलग किया गया है, उनकी संख्या 13,89,648 है।
आयोग को बंबई के मिश्रित राज्य को रोके रखने के लिए दो अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरे करने पड़े थे। एक था, बंबई को महाराष्ट्रियों के हाथों न जाने देने का। आयोग ने ऐसा एक मिश्रित राज्य स्थापित करके किया। दूसरा काम उन्होंने यह किया कि महाराष्ट्रियों और गुजरातियों के बीच समानता स्थापित की। बंबई राज्य की भावी विधानसभा में इन दोनों में समानता जो आयोग की योजना का ही एक अंग थी बहुत आवश्यक थी, क्योंकि पुरानी विधानसभा में कर्नाटक के सदस्य, जिन पर गुराजती अपने बहुमत के लिए निर्भर थे, नए कर्नाटक राज्य में उन्हें नहीं मिल पाते। आयोग ने मराठी भाषी लोगों को गैर मराठी-भाषी राज्यों के सुपुर्द करके महाराष्ट्र के पंख काट दिए। इस प्रकार की राजनीतिक बर्बरता का और कोई कारण नहीं जान पड़ता।

आयोग ने महाराष्ट्र के साथ जो यह अन्याय किया, उसका अब प्रतिकर किया जाना चाहिए, और सौभाग्य की बात है कि ऐसा करना संभव भी है। मिश्रित राज्य के प्रस्ताव की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है, न ही महाराष्ट्रियों और गुजरातियों के बीच समानता आवश्यक रही है।
अध्याय 8
समस्या के सिद्धांतों का सारांश
पाठक की सुविधा के लिए मैं नीचे उन सिद्धांतों का सार प्रस्तुत कर रहा हूं, जो भाषायी राज्यों की रचना के मूल में होने चाहिएं। उनका पिछले पृष्ठों में उल्लेख हो चुका है, लेकिन वे बिखरे हुए हैं। यहां मैं उन्हीं सिद्धांतों को दोहराता हूं :
(1) मिश्रित राज्य अपनाने का विचार सर्वथ त्याग दिया जाना चाहिए ।
(2) प्रत्येक राज्य एक भाषी होना चाहिए, अर्थात् एक राज्य, एक भाषा ।
(3) एक राज्य, एक भाषा के फार्मूले को एक भाषा, एक राज्य से गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए।
(4) एक भाषा, एक राज्य के फार्मूले का अर्थ यह है कि सभी लोग जो एक भाषा बोलते हैं, एक ही शासन के अधीन रखे जाएं, चाहे क्षेत्रफल, जनसंख्या और उस भाषा के बोलने वालों की परिस्थितियों में कितनी ही भिन्नता क्यों न हो । बंबई को शामिल करके एक संयुक्त महाराष्ट्र का निर्माण करने के लिए किए गए आंदोलन के मूल में यही विचार निहित है। यह एक बेतुका फार्मूला है, जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इसका परित्याग किया जाना चाहिए। एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को एक से अधिक राज्यों में बांटा जा सकता है, जैसा कि संसार के अन्य भागों में किया जाता है।
(5) एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को कितने राज्यों में बांटा जाए, यह इन बातों पर निर्भर होगा : ( 1 ) कारगर प्रशासन की अपेक्षाएं (2) विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएं (3) विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की भावनाएं, और (4) बहुमत तथा अल्पमत के लोगों का अनुपात ।
(6) ज्यों-ज्यों राज्य का क्षेत्रफल बढ़ता है, अल्पसंख्यकों का बहुसंख्यकों के साथ अनुपात घटता जाता है और अल्पसंख्यकों की स्थिति नाजुक हो जाती है तथा बहुसंख्यकों के लिए अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने के अवसर कई गुना बढ़ जाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि राज्यों का आकार छोटा हो ।
(7) बहुसंख्यकों के अत्याचार को रोकने के लिए अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिया जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए और बहु-सदस्य निर्वाचन क्षेत्र ( दो या तीन ) पर आधारित पद्धति के लिए, जिसमें संचित मतदान की व्यवस्था हो, प्रावधान किए जाने चाहिएं।