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भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

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15 मे 2023
Book
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अध्याय 10

बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक

     यथार्थवादिता ही राजनीति का मूल है। इसमें शास्त्रीयता का तत्व नगण्य है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी राजनीतिक योजना पर निर्णय लेने से पूर्व हमारे लिए यह आवश्यक है कि बुनियाद - खाके पर विचार किया जाए।

     कोई भी मुझसे यह पूछ सकता है कि "बुनियाद-खाका" से मेरा क्या अभिप्राय है। मैं समझता हूं कि बुनियाद-खाके का अर्थ, किसी समुदाय की सामाजिक संरचना से है, जिस पर राजनीतिक योजना लागू की जाने वाली है।

     यह बताने के लिए किसी तर्क की आवश्यकता नहीं है कि राजनीतिक संरचना सामाजिक संरचना पर ही टिकी होती है। सच तो यह है कि सामाजिक ढांचे का राजनीतिक ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ता है वही उसकी कार्य प्रणाली में संशोधन कर सकता है। वही उसे रद्द भी कर सकता है, बल्कि चाहे तो उसका खाका भी उड़ा सकता है।

     भारत के संदर्भ में सामाजिक ढांचा जाति-व्यवस्था पर खड़ा है, जो हिन्दू सभ्यता और संस्कृति की विशिष्ट परिणति है।

     जाति-व्यवस्था इतनी जानी-मानी है कि इसके स्वरूप को समझाने में किसी को समय नहीं लगता। कोई भी सीधे यह बता सकता है कि भाषावार राज्यों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ।

     फिर भी जाति व्यवस्था के कुछ विशिष्ट लक्षण है, जिनका उल्लेख किया जा सकता  है :

     (1) जातियों का विभाजन इस प्रकार किया गया है कि किसी भी क्षेत्र विशेष में एक जाति प्रधान है, जबकि दूसरी जो छोटी जातियां है, प्रधान जाति की वंशवर्ती हैं, क्योंकि वे अपेक्षया छोटी जातियां हैं प्रधान जाति पर उनकी आर्थिक निर्भरता है, क्योंकि गांव की अधिकांश भूमि उसी प्रधान जाति की संपत्ति है।

     (2) जाति-व्यवस्था का प्रमुख लक्षण केवल असमानता ही नहीं है, बल्कि उस पर श्रेणीगत असमानता की व्यवस्था की भी छाया है। सभी जातियां बराबर की नहीं हैं। उनमें भी ऊंच-नीचे का भेद है। इनमें घृणा का आरोही मान है और तिरस्कार का अवरोही ।

     (3) किसी भी जाति में अनन्यता और गर्व का भाव उसी प्रकार होता है, जैसे राष्ट्र में। इसलिए जिस प्रकार छोटे और बड़े राष्ट्रों को एक समूह कहा जाता है, वैसे ही जाति समूह कहना भी अनुचित नहीं है।

     मुझे खेद है कि मैं इन बातों को तथ्यों और अंकों के द्वारा स्पष्ट नहीं कर सकता। जनगणना ही इन मुद्दों पर सूचना का एकमात्र साधन है और उससे मुझे कोई सहायता नहीं मिल सकी है। पिछली जनगणना में जातियों की सारणियां नहीं दी गई थीं, जो कि प्रारंभ ही से भारतीय गणना का मुख्य लक्षण रहा है। भारत सरकार के गृह मंत्री, जो इस भूल के लिए उत्तरदायी हैं, का यह मत है कि यदि कोई शब्द, शब्दकोश में न मिले तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि जिस तथ्य का वह शब्द निर्देश करता है, उसका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे लेखक की क्षुद्र बुद्धि पर मुझे तरस आता है।

     जाति-व्यवस्था का जो प्रभाव राजनीति पर पड़ा है, वह सर्वथा स्पष्ट है। इसका दिलचस्प हिस्सा यह देखना है कि इसका चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ा है जो प्रतिनिधि सरकार की बुनियाद है, जिस पर एकल सदस्य निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था खड़ी होती है। इसके जो प्रभाव होते हैं, उनका सार नीचे दिया जा रहा है :

     (1) मतदान हमेशा सांप्रदायिकता के आधार पर होता है। मतदान अपने समुदाय के प्रत्याशी को मत देता है, श्रेष्ठ प्रत्याशी को नहीं।

     (2) बहुसंख्यक समुदाय मात्र सांप्रदायिक बहुमत से सीट जीत जाता है।

     (3) अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को मत देने के लिए बाध्य किया जाता है।

     (4) अल्पसंख्यक समुदाय के इतने मत नहीं होते कि उनका उम्मीदवार बहुसंख्यक समुदाय द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के विरुद्ध सीट जीत ले ।

     (5) उच्चतर (प्रधान) समुदायों का मतदाता श्रेणीबद्ध असमानता की सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित होने के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के किसी उम्मीदवार को अपना वोट देने की उदारता कभी नहीं जुटा सकता। बल्कि इसके विपरीत अल्संख्यक समुदाय का मतदाता, जिसका सामाजिक स्तर निम्न है अपना मत बहुसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को देकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है। यह एक और कारण है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय का उम्मीदवार चुनाव हार जाता है।

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

     यह देखा गया है कि कांग्रेस हमेशा विजयी होती हैं। यह कोई नहीं पूछता कि कांग्रेस ही क्यों जीतती है ? इसका एक ही उत्तर है कि कांग्रेस बहुत लोकप्रिय है। लेकिन कांग्रेस लोकप्रिय क्यों है? इसका सही उत्तर यह है कि कांग्रेस हमेशा ऐसे उम्मीदवार खड़े करती है जो उन जातियों के हैं, जिनका निर्वाचन क्षेत्र में बहुमत है। जाति और कांग्रेस का चोली- दामन के साथ है। कांग्रेस की जीत का एकमात्र कारण यह है कि वह जाति व्यवस्था का अनुचित लाभ उठाती है।

     जाति व्यवस्था के ये अशुभ परिणाम भाषायी राज्यों की रचना के फलस्वरूप निश्चय ही और भी गहरे हो जाएंगे। अल्पसंख्यक समुदायों को कुचल दिया जाएगा। यदि कुचला गया तो उन पर अत्याचार होगा और इनका उत्पीड़न किया जाएगा। उनके साथ भेदभाव बरता जाएगा और उनके साथ कानून की दृष्टि में न समानता का व्यवहार किया जाएगा, न सार्वजनिक जीवन में उन्हें बराबरी के अवसर प्रदान किए जाएंगे।

     लार्ड एक्टन ने राष्ट्रों के इतिहास और उनकी विचारधाराओं में होते आए परिवर्तनों का अच्छा वर्णन किया है :

     प्राचीन यूरोपीय व्यवस्था में राष्ट्रों के अधिकारों को न तो सरकारें मान्यता देती थीं और न ही जनता उनकी बलपूर्वक मांग करती थी। राष्ट्रों का नहीं, बल्कि शासक परिवारों का हित शासन के नियंत्रण का आधार था और प्रशासन चलाते समय जनता की इच्छाओं का कोई ख्याल नहीं रखा जाता था। जहां हर प्रकार की स्वतंत्रता को दबाया जाता है, वहां राष्ट्रीय स्वाधीनता की मांगों की उपेक्षा किया जाना भी आवश्यक होता है और फेनेलन के कथनानुसार इस युग में राजकुमारी राजतंत्र तो अपने दहेज के साथ ले जाती थीं ।

     राष्ट्र पहले तो बहुत निर्जीव से थे, लेकिन जब उनमें चेतना आई तो :

     वे पहले तो अपने वैध शासकों की रक्षा के लिए उनके विजेताओं के विरुद्ध उठ खड़े हुए। उन्होंने अपहर्ताओं का शासन स्वीकार नहीं किया। आगे चलकर ऐसा समय आया, जब उन्होंने इसलिए बगावत का झंडा उठाया कि उनके शासकों ने उनके साथ अन्याय किया था। इस प्रकार के विद्रोहों के भड़कने का कारण कुछ ऐसी शिकायतें थीं, जो निश्चित रूप से सिद्ध हो चुकी थीं उसके बाद फ्रांस की क्रांति हुई, जिससे सब कुछ बदल गया। उसी ने जनता को यह सीख दी कि वे अपनी इच्छाओं आवश्यकताओं को अपने उस अधिकार का सर्वोच्च मापदंड मानें, जिनके अनसुार वे जो कुछ करना चाहें, कर सकते हैं। उसने जनता की प्रभुसत्ता के विचार का उद्घोष किया, जिसे न अतीत नियंत्रित कर सका था और न ही तत्कालीन राज्य ।

     जाति भी राष्ट्र ही होती है, किन्तु एक जाति का दूसरी जाति पर शासन उसी प्रकार स्वीकार्य नहीं हो सकता, जिस प्रकार एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर। लेकिन मान लीजिए कि इस मुद्दे को इतना लंबा न खींचा जाए, बल्कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों तक ही सीमित कर दिया जाए, फिर भी यह प्रश्न तो शेष रह ही जाता है: बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों पर शासन करने का क्या अधिकार है?

     इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जो कुछ भी बहुसंख्यक करते हैं, वह सही होता है। फिर अल्पसंख्यकों को क्या शिकायत हैं?

     जो लोग बहुमत के शासन पर निर्भर रहते हैं, यह तथ्य भूल जाते हैं कि बहुमत भी दो प्रकार का होता हैं (1) सांप्रदायिक बहुमत, और (2) राजनीतिक बहुमत ।

     राजनीतिक बहुमत अपनी वर्ग रचना में परिवर्तित होता रहा है। राजनीतिक बहुमत बढ़ता रहता है। सांप्रदायिक बहुमत पैदा होता है। राजनीतिक बहुमत में प्रवेश खुला रहता है। सांप्रदायिक बहुमत का द्वार बंद रहता है। राजनीतिक बहुमत की राजनीति को बनाने - बिगाड़ने की सभी को स्वतंत्रता होती है। सांप्रदायिक बहुमत की राजनीति उसके अपने सदस्यों द्वारा बनाई जाती है, जो उसी में जन्में हैं।

     भला किसी सांप्रदायिक बहुमत द्वारा उस अधिकार-पत्र को कैसे हथियाने दिया जाए, जो राजनीतिक बहुमत को शासन चलाने के लिए दिया गया था? इस प्रकार के अधिकार- पत्रों का सांप्रदायिक बहुमत को दिया जाना आनुवंशिक सरकार की स्थापना करने और उस बहुमत की निरंकुशता के लिए मार्ग प्रशस्त करने के समान है। सांप्रदायिक बहुमत की यह निरंकुशता महज एक कल्पना नहीं है, यह अनेक अल्पसंख्यकों का अनुभव रहा है, चूंकि महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों के लिए यह अनुभव हाल ही का है, इसलिए उसका विवेचन अनावश्यक है।

     आखिर इसका इलाज क्या है? इसमें संदेह नहीं कि इस सांप्रदायिक तानाशही को रोकने के लिए कुछ रक्षोपाय आवश्यक हैं। प्रश्न यह उठता है कि वे रक्षोपाय क्या हो सकते हैं? पहला रक्षोपाय तो यह है कि बहुत बड़ा राज्य न बनाया जाए। बहुत बड़े राज्य का उसमें रहने वाले अल्पसंख्यकों पर क्या असर पड़ता है, इसे बहुत से लोग समझ नहीं पाते। जितना बड़ा राज्य होगा, अल्पसंख्यकों का बहुसंख्यकों से अनुपात उतना ही छोटा होगा। एक उदाहरण लें यदि महाविदर्भ पृथक रहता तो हिन्दुओं का मुसलमानों से अनुपात 4:1 होता और संयुक्त महाराष्ट्र में अनुपात 14:1 होता। यही स्थिति अछूतों की होती। समेकित बहुसंख्यकों का एक छोटा सा पत्थर यदि अल्पसंख्यकों की छाती पर रख दिया जाए तो सह्य होगा। लेकिन विशाल पर्वत का बोझ वे नहीं झेल सकेंगे। वह तो अल्पसंख्यकों को कुचल कर रख देगा । इसलिए छोटे राज्यों का निर्माण अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान कर सकता है।


     दूसरा रक्षोपाय यह है कि विधानसभा में उनके प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया जाए। संविधान में जो पुराने किस्म के उपायों का प्रावधान था, वे दो थे (1) आरक्षित स्थानों की एक विशेष संख्या, और (2) पृथक निर्वाचक मंडल । इन दोनों रक्षोपायों का नए संविधान में परित्याग कर दिया गया है। मेमनों के शरीर से ऊन उतार ली गई है। वे ठिठुर रहे हैं। उन पर कुछ ऊन चढ़ानी जरूरी है।

     पृथक निर्वाचक मंडल अथवा स्थानों का आरक्षण नहीं किया जाना चाहिए। केवल बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र (दो या तीन के) पर्याप्त हैं, जिनमें एकल सदस्य निर्वाचन क्षेत्र प्रणाली के बजाए, जो वर्तमान संविधान में सम्मिलित हैं, संचित मतदान की व्यवस्था हो । इससे भाषायी राज्यों के बारे में अल्पसंख्यकों के जो भय हैं, वे दूर हो जाएंगे।