भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
भाग V
दूसरी राजधानी की आवश्यकता
अध्याय 11
उत्तर तथा दक्षिण के बीच तनाव दूर करने का उपाय
क्या भारत दूसरी राजधानी बनाने में समर्थ है? यह कह देने से कि भारत की इस समय एक राजधानी है, समस्या से पिंड नहीं छुडाया जा सकता। यदि भारत की राजधानी ऐसे स्थान पर स्थित नहीं हैं, जो सभी के लिए संतोषजनक हो, तो अब समय आ गया है कि इस प्रश्न पर विचार किया जाए ।
अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद से अब तक भारत की एक ही राजधानी रही है और वह दिल्ली है। अंग्रेजों के आगमन के पहले भारत की हमेशा दो राजधानियां रही हैं। मुगलों के शासनकाल में भारत की दिल्ली में एक राजधानी थी और कश्मीर में श्रीनगर दूसरी । जब अंग्रेज आए, तब उनकी भी दो राजधानियां थी, एक कलकत्ता और दूसरी शिमला। जब वे कलकत्ता छोड़कर दिल्ली आ गए, तब भी उन्होंने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए रखा। जो दो राजधानियां मुगलों और अंग्रेजों ने कायम रखीं, उनका कारण जलवायु संबंधी परिस्थितियां थीं। चाहे अंग्रेज हों या मुगल, किसी के लिए भी लगातार बारह महीनों तक दिल्ली या कलकत्ता में रहना संभव नहीं था। दिल्ली की गर्मी मुगलों के लिए असहय थी, इसीलिए उन्होंने गर्मी के महीनों के लिए श्रीनगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाया, इसी प्रकार कलकत्ता की गर्मी अंग्रेज सहन नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने भी एक दूसरी राजधानी स्थापित की। मौसम की इन परिस्थितियों में अब तीन और परिस्थितियां जोड़ी जानी चाहिए। मुगलों या अंग्रेजों के राज्य में जनता की सरकार नहीं थी। लेकिन अब हमारे यहां जनता का राज्य है और उसी जनता की सुविधा एक महत्वपूर्ण कारण है। दिल्ली दक्षिण के लोगों के लिए बहुत असुविधाजनक है। इनके लिए यहां की ठंड और यहां तक की दूरी दोनों कष्टकर हैं। गर्मी के महीनों में तो उत्तर भारत के लोगों को भी बड़ा कष्ट होता है। वे तो इसलिए कोई शिकायत नहीं करते कि वे अपने निवास स्थानों के और सत्ता स्थल के निकट हैं। इस कारण दक्षिण भारतीयों की भावनाएं हैं और तीसरा है प्रतिरक्षा । दक्षिण भारतीयों का विचार है कि उनके देश की राजधानी उनसे बहुत दूर स्थित है और उन पर उत्तर भारत के लोगों का शासन है । तीसरा कारण जाहिर है और ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह यह है कि दिल्ली एक सहज भेद्य स्थान है। इसकी पड़ोसी देशों से दूरी बमबारी के लिए बहुत थोड़ी है। यद्यपि भारत अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहने के लिए प्रयत्नशील है, फिर भी यह मान लेना उचित नहीं है कि भारत को कल युद्ध का सामना नहीं करना पड़ेगा, और यदि युद्ध छिड़ गया तो भारत सरकार को दिल्ली छोड़कर अन्यत्र अपनी सुविधा की राजधानी बनानी पड़ेगी। वह कौन सी जगह है, जहां भारत सरकार जाएगी? हमारी समझ में तो एक ही स्थान आता है और वह है, कलकत्ता । लेकिन कलकत्ता में भी तिब्बत से बमबारी का खतरा हो सकता है। हालांकि भारत और चीन में आज भी मैत्री संबंध है, लेकिन यह मैत्री कब तक चलेगी कोई भी निश्चय के साथ नहीं कह सकता। भारत और चीन में कभी भी टकराव पैदा हो सकता है। और ऐसी स्थिति में कलकत्ता को राजधानी बनाना बेकार है। दूसरा शहर जिस पर केंद्र सरकार के शरण स्थल के रूप में विचार किया जा सकता है, बंबई है। लेकिन बंबई एक बंदरगाह है और भारतीय नौसेना, केंद्र सरकार के बंबई आ जाने पर उसकी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता। क्या किसी चौथी जगह के बारे में भी सोचा जा सकता है? मेरी दृष्टि में ऐसी जगह हैदराबाद हो सकती है। हैदराबाद, सिकंदराबाद और बोलारम को मुख्य आयुक्त के प्रांत के रूप में गठित करके उसे भारत की दूसरी राजधानी बनाया जा सकता है। हैदराबाद भारत की राजधानी की सभी आवश्यकताएं पूरी करता है। उसकी सभी राज्यों से समान दूरी है। जो भी निम्नांकित सारणी पर दृष्टिपात करेगा, यह महसूस करेगा:
| दिल्ली से मील | हैदराबाद से मील | |
| बंबई | 798 | 440 |
| कलकत्ता | 868 | 715 |
| मद्रास | 1,198 | 330 |
| कर्नूल | 957 | 275 |
| त्रिवेंद्रम | 1,521 | 660 |
| पटियाला | 124 | 990 |
| चंडीगढ़ | 180 | 1,045 |
| लखनऊ | 275 | 770 |

प्रतिरक्षा की दृष्टि से यह व्यवस्था केंद्र सरकार को सुरक्षा प्रदान करेगी। उसकी भारत की सभी नगरों से समान दूरी है। इससे दक्षिण भारत के लोगों को भी यह संतोष होगा कि उनकी सरकार कभी उनके यहां भी रहती है। सरकार सर्दी के मौसम में और कुछ अन्य महीनों के दौरान हैदराबाद में रह सकती है। हैदराबाद में वे सभी सुविधाएं हैं, जो दिल्ली में उपलब्ध हैं, और यह दिल्ली से कहीं बेहतर शहर भी है। इसमें वह सारा वैभव विद्यमान है, जो दिल्ली में है। यहां इमारतें सस्ती हैं और सुन्दर भी, बल्कि दिल्ली से कहीं अच्छी हैं। वे सब बिकाऊ भी हैं। अगर कोई कमी है तो यह कि इसमें संसद भवन नहीं है, जो भारत सरकार बड़ी आसानी से बनवा सकती है। यह ऐसा स्थान है, जहां संसद साल भर बैठकर काम कर सकती हैं, जो उसके लिए दिल्ली में करना संभव नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता कि हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने में क्या आपत्ति हो सकती है। अच्छा हो यदि यह काम इसी समय हो जाए, जब हम राज्यों का पुनर्गठन कर रहे हैं।
हैदराबाद, सिकंदराबाद और बोलारम को मिलाकर भारत की दूसरी राजधानी बना दिया जाए। सौभाग्य की बात है कि ऐसा बड़ी आसानी से किया जा सकता है और इससे समस्त दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और आंध्र, सभी को संतोष होगा।
उत्तर और दक्षिण के बीच तनाव की स्थिति दूर करने का यह एक और उपाय है।