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भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

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15 मे 2023
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भाग IV

भाषावार राज्यों की समस्याएं

अध्याय 9

व्यवहार्यता

     क्या तीन महाराष्ट्रीय राज्य बने रह सकते हैं? क्या उनका राजस्व उनके व्यय के लिए पर्याप्त हो सकता है? ऐसा प्रश्न उठाया जाना स्वाभाविक है।

    यह बात नहीं कि इस प्रकार के प्रश्न केवल महाराष्ट्र के संबंध में ही किया जा सकता है। यही प्रश्न भारत के अनेक राज्यों के बारे में भी किया जा सकता है।

    मैं कराधान जांच समिति की जिसके अध्यक्ष डॉ. जॉन मथाई, थे, रिपोर्ट के भाग III के "क" और "ख" भाग के राज्यों तथा केंद्रीय सरकार से संबंधित चार विवरण उद्धृत करता हूं (देखें सारणी 4,5,6 और 7 ) । इन विवरणों से निम्नांकित प्रस्ताव सामने आते हैं।

    (1) राज्यों में एक वर्ष विशेष तक कोई घाटा नहीं हुआ था। वे सब जीवनक्षम थे। कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने के बाद से राज्य टिक नहीं पाए ।

    (2) जब से कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई, उत्पादन शुल्क से होने वाली आय घटनी शुरू हो गई। और अब तो समाप्त प्रायः है।

    (3) आयकर और बिक्री कर में भारी वृद्धि हुई है ।

     यही वे कारण हैं, जिनसे पता चलता है कि राज्यों की व्यवहार्यता क्यों समाप्त हो गई हैं।

     उत्पाद शुल्क से होने वाली आय एक मिथ्या सिद्धांत पर बलि कर दी गई, जिसका न कोई अर्थ है और न ही कोई वास्तविकता ।

    जहां तक नशाबंदी की नीति का संबंध है जो कांग्रेस ने अपनाई थी, निम्नलिखित निष्कर्ष बेखटके और बिना किसी चुनौती की आशंका के निकाले जा सकते हैं :

    (1) राजस्व की एक भारी राशि व्यर्थ ही गंवा दी गई।

     (2) जनता ने मद्यपान करना नहीं छोड़ा। अवैध शराब का भारी मात्रा में उत्पादन हो रहा है और वह चोरी छिपे जनता को बेची जा रही है।

     (3) इससे सरकार ने जो धन खोया वह अवैध निर्माता ने पा लिया ।

     (4) मद्यनिषेध ने समाज को भ्रष्ट कर दिया है। पहले तो परिवार में केवल पुरुष सदस्य ही शराब पीते थे क्योंकि वे ही शराब की दुकानों पर जा सकते थे । अब अवैध शराब का निर्माण घर-घर में होने लगा है। जो शराब अब घरों में बनती है उसे पुरुष, स्त्री दोनों पीते हैं।

     (5) मद्यनिषेध के कारण सरकार को राजस्व की हानि तो हुई ही है, इसके अलावा उसे शराबबंदी लागू करने के लिए पुलिस पर भी अधिक खर्च करना पड़ता है, हालांकि पुलिस उसे लागू करने के लिए कुछ नहीं करती।

    इस मद्यनिषेध से क्या फायदा है, जो निषेध नाम मात्र को भी नहीं करता? कांग्रेस ने मद्यनिषेध को सारे भारत में लागू करने की धमकी दी है। ईश्वर कांग्रेस को चिरायु करे। कहावत है कि ईश्वर जिसे नष्ट करना चाहता है, पहले उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। यहीं वह कांग्रेसियों के साथ कर रहा है।

     मेरे लिए इतना ही यह देना पर्याप्त है कि कांग्रेस को एक ही विकल्प चुनना होगा, या तो जीवित रहे, या मद्यनिषेध जारी रखे।

     भूमि राजस्व के बारे में यही कह देना पर्याप्त है कि वह निश्चित रूप से बढ़ाया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस तो वोट खो देने के डर से खेतिहर को छूना ही नहीं चाहती यही कारण है कि वह बिक्री कर और आयकर जारी रखकर ही धनार्जन करना चाहती है, जिनमें दोनों का ही शहरी वर्गों पर भारी दबाव पड़ता है। यह बात सारणी 6 से स्पष्ट हो जाएगी।

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

     इस प्रकार यह बात स्पष्ट जाती है कि जीवन क्षमता की कोई समस्या नहीं है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि कांग्रेस अपनी कराधान नीति पर पुनर्विचार करे ।

    जीवन क्षमता कराधान सहन करने की क्षमता और कर लगाने की इच्छा पर निर्भर है। क्षमता पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, आवश्यकता इच्छाशक्ति की है।

     भारत की समस्त कराधान प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता है। यह संविधान को बदल देने का प्रश्न है। लेकिन मैं इस समय इस पर चर्चा नहीं कर सकता, मैं उसे किसी और अवसर के लिए उठाए रखता हूं।