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भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

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15 मे 2023
Book
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संयुक्त या विभाजन

    मैं कह चुका हूं कि बंबई को एक नया क्षेत्र देकर इसे एक पृथक नगर - राज्य बना दिया जाए। अब यह प्रश्न रह जाता है कि शेष महाराष्ट्र का क्या किया जाए। मैं बता चुका हूं कि शेष महाराष्ट्र को तीन राज्यों में बांटा दिया जाए।

    प्राचील- काल से ही महाराष्ट्र तीन राज्यों में बंटा रहा है। 'महावंश' में अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भारत के विभिन्न भागों में भेजे गए प्रचारकों के संदर्भ में इस तथ्य का उल्लेख है। लेकिन आगे चलकर पाली साहित्य में 'त्रय महाराष्ट्रिका अथवा तीन महाराष्ट्रों का हवाला दिया गया है। इससे पता चलता है कि पुरातन काल से ही तीन महाराष्ट्र चले आते हैं। इसलिए मेरा प्रस्ताव कुछ नया नहीं है। जनसंख्या, क्षेत्र और राजस्व का विभाजन अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में दर्शाया गया है। संलग्न मानचित्र सं. 5 में तीनों खंडों में से प्रत्येक का क्षेत्रफल और सीमाएं बताई गई हैं।

    फिलहाल क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से इन तीन खंडों में कोई बात आपत्तिजनक नहीं प्रतीत होती । आदिकाल से ही इन्हें 'त्रय महाराष्ट्र' की कहा जाता रहा है।

    इस प्रकार के विभाजन से भाषा के सिद्धांत पर कोई आंच नहीं आती। वास्तव में, यदि इन तीनों महाराष्ट्रों की एक ही भाषा हो तो इससे मराठी भाषा के विकास में भी सहायता मिलेगी, बशर्ते कि ऐसा करना उन तीनों के लिए संभव हो।

    जहां तक इसकी व्यवहार्यता का प्रश्न है, उस पर मैं आगे चलकर विचार करूंगा। मेरा इरादा इस पर अलग से एक विशेष अध्याय लिखने का है। उस जमाने में बंबई को कौन जानता था ? वरना वही महाराष्ट्र का चौथा भाग होता ।

    शेष तीन भागों से जिसे मैंने पूर्वी महाराष्ट्र कहा है, पहले ही से पृथक राज्य बन चुका है। आवश्यकता इस बात की है कि इसे अलग ही रहने दिया जाए। इसकी एक सुव्यवस्थित प्रशासन व्यवस्था है, सुव्यवस्थित राजस्व व्यवस्था है और सुव्यवस्थित न्यायिक व्यवस्था है या हिन्दी भाषी लोगों के बंधन से मुक्त हो चुका है।

   अब एक ही समस्या शेष है कि महाराष्ट्र के अधीन आने वाले उस क्षेत्र को जो इस समय बंबई राज्य का भाग है और हैदराबाद राज्य के मराठवाड़ा क्षेत्र को किस प्रकार विभक्त किया जाए।

    इन दोनों का एक ही में विलय करने और उसे तीसरे से जोड़ने के बजाए जिसे मैं पूर्वी महाराष्ट्र कहता हूं, बंबई के महाराष्ट्र वाले भाग और मराठवाड़ा को दो समान राज्यों में क्यों न विभक्त कर दिया जाए? मेरी यही योजना है। मैं बंबई राज्य के महाराष्ट्र वाले भाग के छह जिलों को अंतरित करके उसे मराठवाड़ा का भाग बनाना चाहता हूं (देखें मानचित्र

    5) तीनों महाराष्ट्रों के क्षेत्रफल और जनसंख्या का विभाजन नीचे दर्शाया गया है :

तीनों महाराष्ट्र राज्यों की जनसंख्या, क्षेत्रफल और राजस्व लगभग निम्नानुसार होगा

राज्य का नाम कुल जनसंख्या
( करोड़ों में )
कुल क्षेत्रफल
(वर्ग मीलों में)
कुल
राजस्व
     कुल खर्च
पश्चिमी महाराष्ट्र 1,26,77,316 30,028 26,24,20,441      अज्ञात
मध्य महाराष्ट्र 1,24,09,044 55,482 21,63,80,095      अज्ञात
पूर्वी महाराष्ट्र 80,27,130 39,004 09,41,11,012      अज्ञात
योग 3,31,13,490 1,24,514 57,29,11,548  

     अब मैं अपनी योजना के समर्थन में कारण बताना चाहता हूं। मैं पहले कह चुका हूं कि महाराष्ट्र हमेशा से तीन भागों में बंटा रहा है। यह एक ऐतिहासिक तर्क है। इससे कम से कम यह पता चलता है कि जिसे संयुक्त महाराष्ट्र कहा जाता है, उसकी परंपरा, रहन- सहन और सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति समान नहीं है। जिन लोगों को संयुक्त महाराष्ट्र लेने की जल्दी है, वे शायद इस पर गंभीरता से विचार न करें। लेकिन वर्तमान स्थिति से उभरने वाले कुछ अन्य तर्क भी हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मैं उनमें से कुछ की ओर संकेत करता हूं।

Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka

    मेरा पहला तर्क यह है कि एक अकेली सरकार संयुक्त महाराष्ट्र जैसे विशाल राज्य पर शासन नहीं कर सकती।

    मराठी-भाषी क्षेत्र की कुल जनसंख्या 3,30,83,490 है। कुछ क्षेत्र जिसमें मराठी-भाषी जनता आबाद है 1,74,514 वर्गमील है। यह इतना विशाल क्षेत्र है कि किसी भी एक राज्य के लिए इस पर सफलतापूर्वक शासन करना असंभव है जो महाराष्ट्रीय संयुक्त महाराष्ट्र की बात करते हैं, उन्हें अपने महाराष्ट्र के क्षेत्रफल और जनसंख्या की विशालता का अनुमान ही नहीं है। लेकिन एकमात्र महाराष्ट्रीय राज्य ही क्यों? यह बात मेरी समझ से बाहर है। पृथक महाराष्ट्र राज्य की मांग करना एक बात है, लेकिन एकमात्र महाराष्ट्र राज्य सर्वथा भिन्न बात है। मैं ऐसे पृथक महाराष्ट्र के पक्ष में हूं जो गुजरातियों से भी अलग हो और हिन्दी भाषी लोगों से भी अलग हो। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि स्वतंत्र महाराष्ट्र का एक ही राज्य क्यों बनाया जाए। महाराष्ट्रीयों का उत्तर प्रदेश पर आक्रमण करने का तो कोई इरादा है नहीं और इसलिए उनका कोई संयुक्त मोर्चा हो यह भी जरूरी नहीं ।

    मराठों के दृष्टिकोण से भी इस प्रकार का समेकन क्यों हो? सतारा के मराठे का औरंगाबाद के मराठे से क्या संबंध? नासिक के मराठे से रत्नागिरी के मराठे का क्या लगाव ? सतारावासी मराठा औरंगाबाद के मराठा की समस्याओं से क्या हमदर्दी या लगाव रख सकता है? इसी प्रकार नासिक में रहने वाले मराठों को रत्नागिरी के मराठों की समस्याओं से क्या दिलचस्पी होगी ? समेकन का कोई मतलब नहीं है और उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

    वर्तमान बंबई के मंत्रिमंडल में जितने भी मराठा मंत्री हैं, सभी सतारा या नासिक जिले के हैं। कोई भी कोंकण का नहीं है।

    दूसरी बात गौर करने की यह है कि महाराष्ट्र के तीनों भागों में कोई आर्थिक समानता नहीं है। मराठवाड़े की निजाम ने सर्वथा उपेक्षा ही की है। इस बात की क्या गारंटी है कि अन्य दो महाराष्ट्र उस महाराष्ट्र के हितों की देखभाल करेंगे, जिसे मैंने मध्य महाराष्ट्र की संज्ञा दी है।

    महाराष्ट्र के तीनों भागों में औद्योगिक समानता तीसरा मुद्दा है, जिस पर विचार किया जाना है। पश्चिमी महाराष्ट्र और पूर्वी महाराष्ट्र औद्योगिक दृष्टि से सुविकसित हैं। लेकिन मध्य महाराष्ट्र की क्या स्थिति है? उसके औद्योगिक विकास की क्या गारंटी है? क्या पश्चिमी महाराष्ट्र और पूर्वी महाराष्ट्र, मध्य महाराष्ट्र के औद्योगिक विकास में रूचि दिखाएंगे?

    चौथी बात जिस पर गौर किया जा सकता है, वह एक ओर तो यह है कि पूर्वी और पश्चिमी महाराष्ट्र और दूसरी ओर पूर्वी और मध्य महाराष्ट्र पूना में शिक्षा की असमानता है। उनके बीच की असमानता भी अच्छी खासी है। यदि मध्य महाराष्ट्र पूना विश्वविद्यालय के अधीन चला गया तो उसका भाग्य फूटा।

    मुझे मराठवाड़ा की भारी चिंता है। उस पर विगत 200 वर्षों से निजाम का शासन था। निजाम ने इस क्षेत्र की घोर उपेक्षा की और उसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली । मराठवाड़ा में कोई एक मील जमीन ऐसी नहीं मिलेगी, जहां नहरी सिंचाई होती हो। वहां के ताल्लुक क्षेत्रों में शायद ही कोई हाई स्कूल हो । निजाम की लोक सेवा में मराठवाड़ा के युवक का नाम - निशान नहीं मिलेगा। मैं अपनी जानकारी और अनुभव के आधार पर यह बात कह रहा हूं। लोग ने केवल गरीब हैं, बल्कि अज्ञानी भी हैं। उन्हें धनी-मानी लोगों ने दोनों तरफ से दबोच रखा है। जब उनके रोजगार के रास्ते बंद हो जाएंगे, तो उनकी और भी दुर्गति होगी।

    मैं यह सोचकर कांप उठता हूं कि जब मराठवाड़ा पूना विश्वविद्यालय के अधीन चला जाएगा, तो उसका क्या हश्र होगा। पूना विश्वविद्यालय के अधीन स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा का स्तर इतना ऊंचा है कि मराठवाड़ा का कोई लड़का शायद ही परीक्षा पास कर सके। पूर्ण संभव है कि संयुक्त महाराष्ट्र के लिए जिस प्रकार के पागलपन का प्रदर्शन किया जा रहा है, उससे अकेले और सबके लिए समान विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए पागलपन पैदा होगा।

    उधर संयुक्त महाराष्ट्र की रचना हुई और उधर पूना और नागपुर के ब्राह्मणों ने नौकरियों के लिए मराठवाड़ा पर धावा बोला।

    महाराष्ट्र के तीन भागों में विभक्त किए जाने का एक और कारण भी है।

    बंबई की विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 315 है, जिसमें से 149 सदस्य मराठी-भाषी हैं। बंबई की विधान परिषद में सदस्यों की कुल संख्या 72 है, जिसमें 34 मराठी भाषी हैं। जाहिर है कि बंबई राज्य का मुख्यमंत्री - मराठी भाषी होना चाहिए था । श्री हीरे मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए थे, लेकिन उन्हें कांग्रेस की आला कमान ने बिठा दिया। न केवल श्री हीरे को बिठा दिया गया, बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री के पद के लिए मोरारजी देसाई का नाम प्रस्तावित करने के लिए बाध्य किया गया। एक महाराष्ट्रीय नेता का यह कैसा निरादर थ। और यह भी देखने की बात है कि कांग्रेस की आला कमान की दृष्टि में महाराष्ट्रियों की राजनीतिक सूझबूझ का कितना मूल्य है? मराठा मंत्रियों की यही अक्षमता विषयों के उस विभाजन से भी स्पष्ट हो जाती है, जिसका निर्देश पहले किया जा चुका है।

    उपरिलिखित तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मराठों में राजनीतिक सूझबूझ की कमी है। उनमें कोई भी तिलक या गोखले या रानाडे जैसा प्रतिष्ठित नहीं हैं। आज महाराष्ट्रीय की कोई कीमत नहीं है। कांग्रेस में जो महाराष्ट्रीय हैं उनको कोई नहीं पूछता। इसलिए यह परमावश्यक है कि महाराष्ट्रियों को राजनीति में प्रशिक्षण दिया जाए । यह राजनीतिक प्रशिक्षण जनता को सत्ता का हस्तांतरण हो जाने के कारण बुनियादी महत्व का बन गया है। 'मराठा' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है: एक अर्थ में तो इससे तात्पर्य उन सब लोगों से होता है, जो मराठी भाषा बोलते हैं। दूसरे अर्थ में उसका अभिप्राय उन लोगों से होता है, जो जाति के मराठे हैं। वे सभी मराठे कहलाते हैं। लेकिन लोग मराठी बोलने वाले मराठों और जाति के मराठों में अंतर नहीं समझते।

    जो लोग महाराष्ट्र पर शासन करने वाले हैं, वे भाषा के कारण मराठे नहीं हैं, बल्कि मराठा जाति के हैं, चाहे ब्राह्मणों की आशाएं कुछ भी क्यों न हों। अब इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि मराठे राजनीतिक दृष्टि से सबसे अधिक पिछड़े हुए समुदाय के लोग हैं। यह एक बुनियादी बात है कि उन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यदि एक ही महाराष्ट्र हो तो केवल एक ही मराठे को मुख्यमंत्री के पद के लिए और पांच-छह को मंत्री पद के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि तीन महाराष्ट्र राज्य हों तो तीन मराठों को मुख्यमंत्री के रूप में और तीस मराठों के पद के लिए प्रशिक्षण दिया जा सकता है। हम अपने नेताओं को शिक्षित करने में सहायता देकर वास्तव में अपनी ही सेवा कर सकते हैं।

    मराठों को शिक्षित करने का एक ही तरीका है कि उन्हें अपनी क्षमताओं का विकास करने और उन क्षमताओं का उपयोग करने के लिए और अधिक अवसर प्रदान किए जाएं। तीन महाराष्ट्रों की रचना से ही यह संभव हो सकता है।

    एक कहानी सुनिए, जो अवसर के लिए बहुत प्रासंगिक है एक छोटी बच्ची का बाप उसे घुमाने के लिए जंगल में ले गया। बच्ची ने देखा कि बड़े पेड़ों की जड़ में छोटी-छोटी झाड़ियां उग आई हैं। जब वैसी ही झाड़ियां उसे हर पेड़ के नीचे दिखाई पड़ीं, तो उसने अपने बाप से पूछा कि बड़े पेड़ों के नीचे ये छोटी झाड़ियां बढ़ती क्यों नहीं। चूंकि बाप वनस्पति विज्ञानी नहीं था, इसलिए उसके प्रश्न का उत्तर न दे सका और उसने कहा, "अरे मैं क्या जानू?" लेकिन फिर भी उसने महसूस किया कि बच्ची का सवाल बहुत सार्थक है। वह किसी कालिज में अध्यापक था। दूसरे दिन जब वह कालिज गया तो उसने वनस्पति विज्ञानी के अपने साथ से वही प्रश्न किया । वनस्पति विज्ञानी ने उत्तर दिया, "अरे, इसका जवाब तो बहुत आसान है। बड़े वृक्ष सूर्य की सारी किरणों का फायदा खुद ही उठा लेते हैं और झाड़ियां किरणों से वंचित रह जाती हैं। यही कारण है कि वे पनप नहीं पातीं।" मराठवाड़ा के लोगों को इस कहानी से जो शिक्षा मिलती है, उसे नहीं भूलना चाहिए ।

    युक्त महाराष्ट्र के पक्ष में केवल एक ही तर्क है और वह यह कि यह रामायण में वर्णित, राम और भरत, दो भाइयों के लंबे विछोह के बाद हुए पुनर्मिलन जैसा है। यह मूर्खतापूर्ण तर्क है, जिस पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    कुछ ऐसे महाराष्ट्रीय भी हैं जो पश्चिमी महाराष्ट्र के साथ ऐसी राजनीतिक संधि करके संतुष्ट हैं, जिसमें उन्हें कुछ रियायतें दी गई हैं। संधियों का महत्व कागज की रद्दी से बढ़कर कुछ नहीं होता। उन्हें लागू नहीं किया जा सकता। राजनीतिक संधियां करने के बजाए जो लागू नहीं की जा सकतीं, क्या यह बेहतर नहीं है कि शक्ति हाथ में आ जाए?

     बंबई सरकार में महाराष्ट्रियों ने जो कुछ किया है, वह कितना घटिया और तुच्छ यदि महाराष्ट्रियों के अत्युन्नत ओर सुशिक्षितजनों का यह व्यवहार है तो मराठवाड़ा के लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है?

    मैं मराठवाड़ा या मध्य महाराष्ट्र के लोगों को यह परामर्श देना चाहता हूं कि अपने ही राज्य के लिए आग्रह करें, ताकि वे अपना भाग्य संवार सकें।