भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
अध्याय 5
उत्तर बनाम दक्षिण
आयोग ने संयुक्त प्रांत और बिहार में यथापूर्व स्थिति बनाए रखकर और उनके साथ एक नया और बड़ा राजस्थान समेत मध्य प्रदेश जोड़कर राज्यों के बीच केवल असमानता ही पैदा नहीं की है, ऐसा करके उसने उत्तर बनाम दक्षिण की एक नई समस्या भी खड़ी कर दी है।
उत्तर, हिन्दी-भाषी है। दक्षिण, अहिन्दी भाषी है। अधिकांश लोगों को यह भी नहीं मालूम है कि हिन्दी भाषी लोगों की संख्या क्या है। यह भारत की कुल जनसंख्या का 48 प्रतिशत है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कोई यह कहे बिना नहीं रह सकता कि आयोग के इस प्रयास का परिणाम उत्तर का समेकन और दक्षिण का विभाजन होगा।
क्या दक्षिण वाले उत्तर वालों का प्रभुत्व सहन कर सकते हैं?
अब यदि मैं जनता के सामने यह भेद खोल दूं कि जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने के प्रश्न को लेकर भारत के संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श हो रहा था, कांग्रेस दल में क्या हुआ तो इसे गोपनीयता भंग नहीं कहा जाएगा। कोई भी अनुच्छेद इतना विवादास्पद सिद्ध नहीं हुआ जितना के अनुच्छेद 115, जो उस प्रश्न से संबंधित था। किसी भी अनुच्छेद पर इतना विरोध नहीं था। किसी अन्य अनुच्छेद पर इतनी गरमा-गरमी नहीं हुई। लंबी बहस के बाद, जब इस प्रश्न पर मतगणना हुई तो पक्ष तथा विपक्ष, दोनों में 78 78 मत पड़े। इस बराबरी का कोई समाधान नहीं हो पाया। काफी समय के बाद जब यही मसला कांग्रेस दल की बैठक में पेश हुआ तो 77 के मुकाबिले में हिन्दी के पक्ष में 78 मत पड़े। हिन्दी ने राष्ट्रभाषा का स्थान एक मत से जीत लिया। मैं यह तथ्य अपनी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर प्रस्तुत कर रहा हूं क्योंकि प्रारूप समिति के अध्यक्ष के नाते मुझे कांग्रेस दल के अहाते में प्रवेश करने का अधिकार था।

इन तथ्यों से पता चलता है कि दक्षिण को उत्तर से कितनी अरुचि थी । यदि उत्तर अखंड रहे और दक्षिण का विघटन हो जाए और यदि उत्तर भारत की राजनीति को विषम रूप से प्रभावित करता रहा, तो यही अरुचि घृणा का रूप भी धारण कर सकती है (देखें मानचित्र 1) |
किसी राज्य को केंद्र में इतनी प्रधानता देना खतरनाक है। श्री पणिक्कर ने विषय के इस पक्ष का भी निर्देश किया है। अपने असहमति लेख में वह कहते हैं :
इकाइयों की समानता के संघीय सिद्धांत की अस्वीकृति से उत्पन्न वर्तमान असंतुलन का यह परिणाम हुआ कि उत्तर प्रदेश के इतर सभी राज्यों में अविश्वास और विद्वेष की भावना उत्पन्न हो गई है। न केवल दक्षिणी राज्यों में, बल्कि पंजाब, बंगाल और अन्यत्र भी आयोग के समक्ष यह विचार व्यक्त किया गया कि शासन के वर्तमान गठन के फलस्वरूप अखिल भारतीय विषयों में उत्तर प्रदेश की प्रधानता हो गई है। इस भावना के मौजूद होने से शायद ही कोई इन्कार कर सकेगा । कोई इस बात का भी खंडन नहीं करेगा कि यदि इस प्रकार की भावनाएं बनी रहीं और उनका कोई उपचार आज ही नहीं किया गया, तो इससे हमारी एकता को खतरा पैदा हो जाएगा।
उत्तर और दक्षिण में भारी अंतर है। उत्तर रूढ़िवादी है, तो दक्षिण प्रगतिशील । उत्तर में अंधविश्वासी हैं, तो दक्षिण में बुद्धिवादी । दक्षिण शिक्षा की दृष्टि से आगे हैं, तो उत्तर पिछड़ा हुआ । दक्षिण की संस्कृति आधुनिक है, तो उत्तर की संस्कृति प्राचीन ।
क्या प्रधानमंत्री नेहरू 15 अगस्त, 1947 को उस यज्ञ में नहीं बैठे थे, जो बनारस के ब्राह्मणों ने एक ब्राह्मण के स्वतंत्र और स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने के उपलक्ष में किया था। क्या उन्होंने वह राजदंड ग्रहण नहीं किया था, जो उन ब्राह्मणों ने उन्हें दिया था और वह गंगाजल नहीं पिया था, जो वे लेकर आए थे?
ऐसी कितनी स्त्रियां हैं, जिन्हें हाल ही में सती होने और अपने मृत पतियों की चिता पर बलि हो जाने के लिए विवश नहीं किया गया? क्या हाल ही में राष्ट्रपति ने बनारस जाकर ब्राह्मणों की पूजा नहीं की थी, उनका पाद प्रक्षलन करके जल पान नहीं किया?
उत्तर भारत में अब भी सती साध्वी और नंगे साधू मौजूद हैं। पिछले हरिद्वार मेले के अवसर पर नंगे साधुओं ने कैसा हंगामा किया था। क्या उत्तर प्रदेश में किसी ने उसका विरोध किया ?
उत्तर भारत का शासन भला दक्षिण वाले कैसे सहन कर सकते हैं? दक्षिण में उत्तर से अपने को पृथक करने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
श्री राजगोपालाचारी ने राज्य पुनर्गठन आयोग सिफारिशों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वक्तव्य दिया है, जो 27 नवम्बर, 1955 के 'टाइम्स आफ इंडिया' में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने कहा है
यदि राज्य पुनर्गठन संबंधी योजनाओं को अगले 15 वर्षों के लिए स्थगित करना असंभव है, तो केंद्र के पास एक ही विकल्प रह जाता है कि वह भारत पर ऐकिक राज्य के रूप में शासन करे ओर जिला अधिकारियों तथा जिला बोडों का काम क्षेत्रीय आयुक्तों की निगरानी में सीधे निपटाए
राष्ट्र की शक्ति को उन सीमाओं और खंडों के विवाद में नष्ट करना सर्वथा अनुचित होगा, जिन पर इतिहास- जन्य परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि ड्राइंग रूप में बैठकर विचार किया गया है।
अपने सामान्य विश्वासों के अतिरिक्त, मैं यह अनुभव करता हूं कि एक विशाल दक्षिणी राज्य की परमावश्यकता है, जिससे कि देश के उस भाग की राजनीतिक विशेषता को बनाए रखा जा सके। दक्षिण का तमिल, मलयालम और अन्य छोटे-छोटे राज्यों में टुकड़े कर देने का यही परिणाम होगा कि हरेक राज्य की अस्मिता धूमिल हो जाएगी और फलस्वरूप भारत की कुल मिलाकर हानि होगी ।
श्री राजगोपालाचारी ने अपने विचार पूरी तरह से व्यक्त नहीं किए हैं। लेकिन उन्होंने मुझसे अपनी बात पूरी तरह और खुलकर उस समय कही थी, जब वे राज्याध्यक्ष थे और मैं विधि मंत्री था, जिसे संविधान का प्रारूप तैयार करने का दायित्व सौंपा गया था। मैं श्री राजगोपालाचारी से अपनी सामान्य भेंट के लिए गया था, जो उस समय की परिपाटी थी । ऐसी ही एक भेंट में श्री राजगोपालाचारी ने उस संविधान का हवाला देते हुए, जिसका संविधान सभा निर्माण कर रही थी, मुझसे कहा, "आप भारी गलती कर रहे हैं। समस्त भारत के लिए एक परिसंघ, जिसमें सभी क्षेत्रों का समान प्रतिनिधित्व हो, सफल नहीं हो पाएगा। ऐसे परिसंघ में भारत का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हमेशा हिन्दी भाषी क्षेत्र से हुआ करेगा । आपको दो परिसंघों की व्यवस्था करनी चाहिए, एक परिसंघ उत्तर के लिए, एक दक्षिण के लिए और उत्तर तथा दक्षिण का एक संयुक्त परिसंघ, जिसके पास कानून बनाने के लिए तीन विषय हों और जिसमें दोनों परिसंघों का समान प्रतिनिधित्व हो ।"
ये श्री राजगोपालाचारी के वास्तविक विचार थे। मुझे लगा, जैसे आकाशवाणी हुई हो, क्योंकि ये विचार एक कांग्रेसी के अंतस्तल से निकले उद्गार थे। अब मैं श्री राजगोपालाचारी को भविष्यवक्ता मानता हूं क्योंकि उन्होंने भारत के उत्तर और दक्षिण में विभक्त हो जाने की भविष्यवाणी की थी। हमें श्री राजगोपालाचारी की भविष्यवाणी को झुठलाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।
यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि अमरीका में उत्तर और दक्षिण के बीच गृह युद्ध हुआ था। भारत के उत्तर और दक्षिण में भी गृह युद्ध छिड़ सकता है। इस प्रकार के संघर्ष का मार्ग समय प्रशस्त करेगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर और दक्षिण में भारी सांस्कृतिक मतभेद है और सांस्कृतिक मतभेद बहुत जल्दी भड़क जाते हैं।
उत्तर के समेकन और दक्षिण के विघटन की बात सोचते हुए आयोग ने यह महसूस नहीं किया कि वे केवल भाषायी समस्या का हल तलाश नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक राजनीतिक समस्या से जूझ रहे हैं। यदि इसी समय ऐसे संकट के निवारण के लिए कदम न उठाए गए, तो यह राजनेताओं के लिए अत्यंत लज्जास्पद बात होगी। लेकिन इसका उपचार कैसे हो ?