भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
भाग II
भाषावाद की सीमितताएं
अध्याय 3
भाषावार राज्य का पक्ष - विपक्ष
'एक राज्य, एक भाषा' लगभग हरेक राज्य का एक सार्वभौम लक्षण होता है। जर्मनी के संविधान की जांच कीजिए, फ्रांस का संविधान जांचिए, इटली के संविधान की परीक्षा कीजिए, इंग्लैंड का संविधान देखिए और संयुक्त राज्य अमरीका का संविधान देखिए । 'एक राज्य, एक भाषा' यही नियम है।
जहां कहीं भी इस नियम से विचलन हुआ है, वहीं राज्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। मिश्रित भाषावार राज्यों के उदाहरण प्राचीन आस्ट्रियन साम्राज्य और प्राचीन तुर्की साम्राज्य में मौजूद हैं। वे इसलिए नष्ट हो गए, क्योंकि वे बहुभाषी राज्य थे और बहुभाषी राज्यों के सभी गुणावगुण उनमें विद्यमान थे। भारत का भी यही हश्र होगा, अगर यह मिश्रित राज्यों का समूह बना रहा।
एक भाषी राज्य की स्थिरता और बहुभाषी राज्य की अस्थिरता के कारण सर्वथा स्पष्ट हैं। किसी भी राज्य की बुनियाद भाईचारे पर रखी जाती है। यह भाईचारा या सहानुभूति क्या है? संक्षेप में कहा जाए तो वह एकत्व की सामूहिक भावना की अनुभूति होती है, जो उन लोगों को, जिनमें यह भावना है, उन्हें यह अहसास दिलाती है कि वे आपस में भाई-भाई हैं। यह भावना दुधारी भावना होती है। यह किसी के अपनों के प्रति भाईचारे का भाव भी है और दूसरों के प्रति भाईचारे के अभाव की भावना भी। यह 'समजातीयता की चेतना' का भाव है जो एक ओर तो उन लोगों को, जिनमें यह भाव इतना प्रबल होता है कि वे आर्थिक संघर्षों या सामाजिक श्रेणीकरण से उत्पन्न सभी भेदभावों की अवहेलना करते हैं 'एकता के सूत्र में बांधता है, और दूसरी ओर उन्हें उन लोगों से अलग करता है, जो उनके समजातीय नहीं होते। यह किसी अन्य वर्ग के न होने की इच्छा को प्रकट करता है।
इस भाईचारे की भावना का अस्तित्व ही एक स्थिर और लोकतांत्रिक राज्य का आधार है।

भाषावार राज्य इतना आवश्यक क्यों है, उसका यह एक कारण है। लेकिन कोई राज्य एक भाषी ही क्यों हो, इसके कुछ अन्य कारण भी हैं। एक राज्य, एक भाषा का नियम क्यों आवश्यक है, इसके दो कारण हैं।
एक कारण तो यह है कि यदि राज्य में रहने वाले लोगों में भ्रातृत्व - भावना का अभाव हो तो लोकतंत्र बिना संघर्ष के चल ही नहीं सकता । नेतृत्व के लिए दो दलों में लड़ाई- झगड़े और प्रशासन में भेदभाव का व्यवहार, ये दो तत्व किसी भी मिश्रित भाषावार (द्विभाषी ) में सदा बने रहते हैं और उनका लोकतंत्र के साथ निर्वाह नहीं हो सकता ।
मिश्रित भाषायी राज्य में लोकतंत्र क्यों असफल रहता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण वर्तमान बंबई राज्य है। मुझे राज्य पुनर्गठन आयोग के इस सुझाव पर आश्चर्य होता है कि वर्तमान बंबई राज्य को यथावत् रहने दिया जाए, ताकि हम यह अनुभव प्राप्त कर सकें कि मिश्रित राज्य किस प्रकार उन्नति कर सकता है। बंबई विगत 20 वर्षों से मिश्रित भाषावार राज्य चला आ रहा है, जहां महाराष्ट्रियों और गुजरातियों में घोर शत्रता है, केवल विचार शून्य या अन्यमनस्क व्यक्ति ही इस प्रकार का मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव पेश कर सकता है। मिश्रित भाषावार राज्य में लोकतंत्र की असफलता का एक और दृष्टांत है, भूतपूर्व मद्रास राज्य । मिश्रित राज्य के रूप में संयुक्त भारत का गठन और भारत का भारत और पाकिस्तान के रूप में अनिवार्य विभाजन मिश्रित राज्य में लोकतंत्र संभव न होने के अन्य दृष्टांत हैं।
'एक राज्य, एक भाषा के नियम का अपनाया जाना क्यों आवश्यक है, इसका दूसरा कारण यह है कि जातीय तथा सांस्कृतिक विरोध का यही एकमात्र समाधान है।
तमिल आंध्रवासियों से और आंध्रवासी तमिलों से क्यों घृणा करते हैं? हैदराबाद के आध्रवासी महाराष्ट्रियों से और महाराष्ट्रीय आंध्रवासियों से क्यों घृणा करते हैं? इसका सीधा उत्तर है। ऐसा नहीं है कि उन दोनों में कोई स्वाभाविक वैर भाव है। घृणा का कारण यह है कि उन्हें एक-दूसरे के साथ-साथ रखा दिया गया है और वे सरकार जैसी भागीदारी के आम चक्र में भाग लेने के लिए बाध्य कर दिए गए हैं। इसके अलावा इस प्रश्न का कोई और उत्तर नहीं है।
जब तक यह जोर-जबरदस्ती आमने-सामने रहने वाली स्थिति बनी रहेगी, इन दोनों में शांति स्थापित नहीं होगी।
ऐसे लोग भी हैं, जो कनाडा, स्विटजरलैंड और दक्षिण अफ्रीका के उदाहरण देते हैं। सच तो यह है कि इन द्विभाषी राज्यों का अस्तित्व है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की प्रकृति और कनाडा, स्विटजरलैंड तथा दक्षिण अफ्रीका की प्रकृति सर्वथा भिन्न है। भारत की प्रकृति विभाजन की है तो स्विटजरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा की एकीकरण की ।
यह बात कि वे अब तक एक रहे हैं, स्वाभाविक घटना नहीं है। इसका कारण यह है कि ये दोनों कांग्रेस के अनुशासन से बंधे हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस कब तक टिकी रहेगी। कांग्रेस पंडित नेहरू से है और पंडित नेहरू कांग्रेस से लेकिन क्या पंडित नेहरू अमर हैं? जो भी व्यक्ति इन प्रश्नों पर गौर करेगा, वह इस बात को स्वीकार करेगा कि कांग्रेस 'सूरज और चांद की तरह सदा नहीं रहेगी। एक न एक दिन उसका अंत होगा। हो सकता है, उसका अगले निर्वाचन के पहले ही अंत हो जाए। जब ऐसा हो जाएगा तो बंबई राज्य में गृह युद्ध छिड़ जाएगा और उसके लिए प्रशासन चलाना दूभर हो जाएगा।
इसलिए हम दो कारणों से भाषावार राज्यों की स्थापना चाहते हैं। लोकतंत्र के लिए मार्ग प्रशस्त करने और जातीय तथा सांस्कृतिक तनाव को दूर करने के लिए ।
भाषावार राज्यों की स्थापना की दिशा में भारत सही मार्ग पर अग्रसर है। यह वही रास्ता है, जो सभी राज्यों ने अपनाया है। अन्य भाषावार राज्यों के संबंध में भी शुरू से ऐसा ही होता आया है। वहां तक भारत का संबंध हैं, यदि उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचना है तो उसे कुछ पीछे की ओर जाना होगा। लेकिन जिस रास्ते पर उसे चलना है, वह उसका जाना-परखा रास्ता है। यह वही रास्ता है, जिस पर दूसरे राज्य चल रहे हैं।
भाषावार राज्य के लाभ गिनवाने के बाद अब मुझे भाषावार राज्य के खतरों की ओर भी इंगित कर देना चाहिए ।
भाषावार राज्य, जिसकी राजभाषा उसकी क्षेत्रीय भाषा हो, बहुत आसानी से एक स्वतंत्र राष्ट्र बन सकता है। स्वाधीन राष्ट्र और स्वाधीन राज्य के बीच का मार्ग बहुत संकरा होता है। यदि यह हो जाए तो भारत वैसा आधुनिक भारत नहीं रहेगा, जैसा इस समय है, बल्कि मध्ययुगीन भारत बन जाएगा, जिसमें विभिन्न प्रकार के राज्य होंगे, जो प्रतिद्वंदिता और युद्ध में लगे रहेंगे।
जाहिर है कि भाषावार राज्यों के गठन में यह खतरा मौजूद है। लेकिन भाषावार राज्यों के न होने पर खतरा भी कुछ कम नहीं। जहां तक भाषावार राज्यों के गठन के खतरों का सवाल है, कोई बुद्धिमान और दृढ़ राजनेता उससे बचाव का रास्ता निकाल सकता है। लेकिन मिश्रित भाषावार राज्य के खतरे उनसे कहीं अधिक हैं और उन पर नियंत्रण करना किसी राजनेता के बस की बात नहीं होगी, चाहे वह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो।
इस खतरे का सामना कैसा किया जाए? मेरे विचार में इस खतरे से तभी निपटा जा सकता है, जब संविधान में यह व्यवस्था रखी जाए कि क्षेत्रीय भाषा किसी भी राज्य की राजभाषा नहीं होगी। राज्य की राजभाषा हिन्दी रहेगी और जब तक भारत इस प्रयोजन के लिए योग्य न हो जाए, अंग्रेजी बनी रहेगी। क्या भारतवासी इसे स्वीकार करेंगे? यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो भाषावार राज्य सहज ही देश के लिए खतरा बन जाएंगे।
एक भाषा जनता को एक सूत्र में बांध सकती है। दो भाषाएं निश्चय ही जनता में फूट डाल देंगी। यह एक अटल नियम है। भाषा, संस्कृति की संजीवनी होती है। चूंकि भारतवासी एकता चाहते हैं और एक समान संस्कृति विकसित करने के इच्छुक हैं, इसलिए सभी भारतीयों का यह भारी कर्तव्य है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा के रूप में अपनाएं।
कोई भी भारतीय, जो इस प्रस्ताव को भाषावार राज्य के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता, भारतीय कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। वह शत-प्रतिशत महाराष्ट्रीय, शत-प्रतिशत तमिल या शत-प्रतिशत गुजराती तो हो सकता है, किन्तु वह सही अर्थ में भारतीय नहीं हो सकता, चाहे भौगोलिक अर्थ में भारतीय हो । यदि मेरा सुझाव स्वीकार नहीं किया जाता तो भारत, भारत कहलाने का पात्र नहीं रहेगा। वह विभिन्न जातियों का एक समूह बन जाएगा, जो एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ाई-झगड़े और प्रतिस्पर्धा में रत रहेगा।
लगता है, भारत और भारतवासियों पर परमेश्वर का भारी प्रकोप है और वह कह रहा है, तुम भारतीयों में हमेशा फूट रहेगी और तुम हमेशा दास बने रहोगे
भारत के पाकिस्तान से अलग होने पर मुझे खुशी हुई। कहना चाहिए, पाकिस्तान की कल्पना मेरी ही थी। मैंने ही देश विभाजन की वकालत की थी, क्योंकि मैं यह महसूस करता था कि केवल विभाजन ही ऐसा विकल्प है, जिसके फलस्वरूप हिन्दू न केवल स्वाधीन हो सकेंगे, वरन् मुक्त भी। यदि भारत और पाकिस्तान एक ही राज्य में एकजुट रहते तो हिन्दू स्वाधीन तो हो जाते, किन्तु वे मुसलमानों के वशीभूत रहते । स्वाधीन हो जाने मात्र से भारत हिन्दुओं के दृष्टिकोण से स्वतंत्र भारत न रह पाता । यह एक देश की दो राष्ट्रों द्वारा संचालित सरकार बन जाती और इन दोनों में से मुसलमान ही निःसंदेह शासक जाति बन जाते और हिन्दू महासभा और जनसंघ मूक दर्शक बनकर रह जाते। जब देश का बंटवारा हुआ तो मैंने महसूस किया कि परमेश्वर अपना प्रकोप वापस लेने और भारत को संयुक्त, महान और समृद्ध बनाने के लिए सहमत हो गया है। लेकिन मुझे डर है कि यह प्रकोप फिर हो सकता है, क्योंकि मैं देख रहा हूं कि जो भाषावार राज्यों के गठन का समर्थन कर रहे हैं, उनके मन में यही है कि क्षेत्रीय भाषा को ही उनकी राजभाषा बनाया जाए ।
ऐसा संयुक्त भारत के आदर्श के लिए घातक होगा। यदि क्षेत्रीय भाषाएं राजभाषाएं बन गई तो भारत को एक संयुक्त देश बनाने और भारतीयों को पक्का भारतीय बनाने का आदर्श ही समाप्त हो जाएगा। मैं तो इसका हल ही सुझा सकता हूं। उस पर सोच-विचार करना भारतवासियों का काम है ।