भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
अध्याय 2
भाषावाद की परकाष्ठा
पहले अध्याय में यह बताया गया कि राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों का एक परिणाम तो यह है कि आयोग ने जिन विभिन्न राज्यों के गठन का सुझाव दिया है, उनके आकार में असमानता है।
लेकिन इसके अलावा आयोग की सिफारिशों में एक और दोष भी है जो वैसे तो प्रच्छन्न है, लेकिन है वास्तविक, इसलिए कि उत्तर की भाषायी समस्या पर दक्षिण के संबंध में विचार नहीं किया गया। नीचे की सारणी से यह स्पष्ट हो जाएगा।
| दक्षिणी राज्य | मध्य राज्य | उत्तरी राज्य * | |||
| नाम | जनसंख्या (करोड़ों में) |
नाम | जनसंख्या (करोड़ों में) |
नाम | जनसंख्या (करोड़ों में) |
| मद्रास | 3.00 | महाराष्ट्र | 3.31 | उत्तर प्रदेश | 6.32 |
| केरल | 1.36 | गुजरात | 1.13 | बिहार | 3.85 |
| कर्नाटक | 1.90 | सौराष्ट्र | 0.4 | मध्य प्रदेश | 2.61 |
| आंध्र | 1.09 | कच्छ | 0.5 | राजस्थान | 1.60 |
| हैदराबाद | 1.13 | पंजाब | 1.72 | ||

भाषावार राज्यों के नाम पर भारत के विभाजन की जो योजना बनाई गई है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। यह उतनी अनपकारी नहीं है, जितनी आयोग इसे समझता है। इसमें जहर भरा है और यह जहर इसी समय निकल दिया जाना चाहिए ।
भारत संघ का स्वरूप केवल एक विचार प्रस्तुत करता है। यह किसी उपलब्धि का द्योतक नहीं है। ब्राइस ने अपनी पुस्तक 'अमरीकन कॉमनवेल्थ' में निम्नलिखित घटना का वर्णन किया है, जो बहुत शिक्षाप्रद है। उसने उसमें कहा है :
कुछ वर्ष पूर्व अमरीका का प्रोटेस्टेंट धर्माध्यक्षीय गिरजा अपने वार्षिक सम्मेलन में उपासना पद्धति पर पुनर्विचार करने में व्यस्त था। उसके विचार में यह वांछनीय था कि प्रार्थना के लिए छोटे वाक्यों की प्रार्थनाओं में सभी लोगों के लिए एक प्रार्थना का समावेश कर लिया जाए और न्यू इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित धर्मतत्वज्ञ ने इन शब्दों के समावेश का प्रस्ताव किया, 'हे प्रभु, हमारे राष्ट्र को आशीर्वाद दे ।' यह वाक्य एक दिन तीसरे पहर को तत्काल स्वीकार कर लिया गया, लेकिन दूसरे ही दिन यह फिर विचारार्थ प्रस्तुत हुआ । 'राष्ट्र' शब्द पर आम लोगों ने यह कहकर अनेक आपत्तियां उठाई कि इससे राष्ट्रीय एकता की अतिशय मान्यता का भाव प्रकट होता है, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया और उसके स्थान पर ये शब्द स्वीकार किए गए, 'हे प्रभु, इन संयुक्त राज्यों को आशीर्वाद दे ।'
भारत तो मानसिक तथा नैतिक दृष्टि से स्वयं को संयुक्त राज्य भारत कहलाने का पात्र भी नहीं है। भारत संघ तो संयुक्त राज्य भारत से अभी कोसों दूर है। लेकिन उत्तर के इस समेकन और दक्षिण के विभाजन से यह लक्ष्य सिद्ध नहीं हो सकता।
* मैंने कुछ केंद्र-स्थित राज्यों को इसलिए शामिल किया है कि भाषा की दृष्टि से वे एक-दूसरे से जुड़े हैं।