भाषावार राज्यों के संबंध में विचार - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Thoughts on Linguistic States Book by Dr Bhimrao Ramji Ambedka
अध्याय 4
क्या एक भाषा के लिए एक ही राज्य होना आवश्यक है ?
भाषावार राज्य से क्या अभिप्राय है?
इससे अभिप्राय इन दो में से एक हो सकता है। इसका यह अर्थ हो सकता है कि एक भाषा-भाषियों को एक ही राज्य के अधिकार क्षेत्र में रखा जाए। इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि एक भाषा बोलने वाले लोगों को कई राज्यों में वर्गीकृत कर दिया जाए, बशर्ते कि प्रत्येक राज्य के अधिकार क्षेत्र में वे लोग रहें, जो एक ही भाषा बोलते हों। इनमें से कौन सी व्याख्या सही है?
आयोग का मत था कि एक ही भाषा बोलने वाले सभी लोगों के लिए एक ही राज्य का गठन एकमात्र नियम है, जिसका पालन किया जाए।
पाठक मानचित्र 1 पर दृष्टि डालें। उन्हें प्रथम दृष्टि में ही उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच असमानता दिखाई पड़ जाएगी। यह असमानता जबरदस्त है। छोटे राज्यों के लिए बड़े राज्यों का भार सहना असंभव हो जाएगा।
आयोग ने यह महसूस ही नहीं किया कि यह असमानता कितनी खतरनाक है। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रकार की असमानता संयुक्त राज्य अमरीका में मौजूद है। लेकिन इससे जो हानि हो सकती थी, उसका परिहार संयुक्त राज्य के संविधान के उपबंधों से हो गया है। संयुक्त राज्य के संविधान में ऐसे ही एक रक्षोपाय का निर्देश श्री पणिकर ने रिपोर्ट में अपने असहमति लेख में किया है (देखें सारणी 2 ) ।

मैं नीचे उनके असहमति लेख का उद्धरण दे रहा हूं :
मैं संघ के सफल संचालन के लिए यह आवश्यक समझता हूं कि इकाइयों में समुचित संतुलन बना रहे। यदि असमानता बहुत भारी हुई तो उससे न केवल संदेह और विद्वेष पैदा होगा, बल्कि उससे ऐसी शक्तियों को बल मिलेगा, जिनसे न केवल संघीय ढांचे ही को क्षति पहुंचेगी, वरन् देश की एकता भी खतरे में पड़ जाएगी। इस बात को सभी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। अधिकांश संघीय संविधानों में, जहां इकाई की जनसंख्या और संसाधनों को लेकर व्यापक विभिन्नता मौजूद है, इस विषय में सावधानी बरती गई है कि बड़े राज्यों के प्रभाव और प्राधिकार को सीमित रखा जाए। अतः यदि संयुक्त राज्य अमरीका का ही उदाहरण लिया जाए तो हम देखते हैं कि यद्यपि वहां के राज्यों में जनसंख्या और संसाधनों की दृष्टि से भारी अंतर है और न्यूयार्क राज्य की जनसंख्या नवाडा की जनसंख्या से कई गुना अधिक है, लेकिन संविधान के अनुसार सीनेट में प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
इसी मुद्दे पर श्री पणिकर ने सोवियत संघ ओर प्राचीन जर्मनी का भी निर्देश किया है।
उनका कहना है
सोवियत संघ में भी, जहां बृहत रूस की जनसंख्या संघ की अधिकांश अन्य इकाइयों की कुल जनसंख्या से अधिक है, राष्ट्रसभा में प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ा दी गई है, ताकि संघ की अन्य इकाइयों पर बड़ी इकाई की प्रधानता न हो जाए। बिस्मार्क के राज्य में भी यद्यपि जनसंख्या की दृष्टि से प्रशिया की प्रधानता थी, उसे संसद या राज्य सभा में उसके अधिकार से कम प्रतिनिधित्व (एक तिहाई से कम ) दिया गया था और उस संख्या का स्थायी अध्यक्ष पद बवेरिया को प्राप्त था, जो स्पष्ट रूप से यह प्रकट करता है कि यहां भी, जहां एक ही राज्य में राजनीतिक, सैनिक तथा आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण था, संघ के हित में यह आवश्यक समझा गया था, ताकि छोटी इकाइयों को अधिक महत्व दिया जाए और साथ प्रशिया का, जिसे लोक सभा (रीखास्टेग) में कहीं अधिक शक्तियां प्राप्त थीं। राज्यसभा (रीखस्राट) में अल्पमत की स्थिति रहे ।
श्री पणिकर ने अलबत्ता संयुक्त राज्य अमरीका के संविधान में असमानता की कुरीतियों के विरुद्ध एक अन्य रक्षोपाय का उल्लेख नहीं किया है। हमारे संविधान के अनुसार दोनों सदन प्राधिकार की दृष्टि से समान अधिकारी नहीं हैं। लेकिन संयुक्त राज्य के संविधान में स्थिति भिन्न है। संयुक्त राज्य अमरीका में दोनों सदन प्राधिकार की दृष्टि से समान हैं। यहां तक कि धन-विधेयकों के लिए भी सीनेट की सहमति आवश्यक होती है। भारत में ऐसा नहीं है। इससे जनसंख्या की असमानता में भारी अंतर पड़ जाता है।
राज्यों के बीच जनसंख्या और शक्ति की इस असमानता से देश की निश्चित रूप से हानि होती है। इसलिए इसकी रोकथाम के उपाय करना आवश्यक है।