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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar

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11 मे 2023
Book
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बिंदु संख्या ( 8 ) और (9)

बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करने के प्रस्ताव के विपक्ष में दी जाने वाली आम दलीलें

     46. अब मैं उन दलीलों का विवेचन करूंगा, जिन पर प्रो. दांतवाला और प्रो. घीवाला जोर देते रहे हैं। उनके तर्क-वितर्क तो भाषावार प्रांतों के निर्माण के सिद्धांत के मूल पर ही कुठाराघात करने वाले हैं। इसी वजह से मुझे इस ज्ञापन के भाग 1 में ही उन पर विचार करना चाहिए था। पर चूंकि उनके तर्कों का लक्ष्य बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित न करने देना है इसलिए मैंने भी यह उचित समझा कि ज्ञापन के इसी भाग में उन पर विचार किया जाए।

     47. दोनों प्रो. के तर्कों का सार यह है कि भाषावार प्रांतों का गठन ठीक नहीं है। भाषावार प्रांतों के गठन के खिलाफ यह जो आवाज उठी है, उसे उठाने में बहुत देर कर दी गई। दोनों प्रोफेसर कब से इसके खिलाफ हैं, यह पता नहीं चल पाया है। क्या वे भाषा के आधार पर गुजरात के पुनर्गठन के भी विरुद्ध हैं इसे जो उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि भाषावार प्रांतों के गठन के सिद्धांत को तो वे मान्यता देते हैं, किन्तु जब उन्होंने देखा कि इसे मान लेने पर बंबई से हाथ धोना पड़ सकता है, क्योंकि इस सिद्धांत के आधार पर ही तो बंबई महाराष्ट्र में लिया जाएगा, तो अचानक वे बौखला उठे और इसका विरोध करने लगे। शायद यह एक ऐसा मामला है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने तर्कों को उपयुक्त न पाकर किसी ऐसे तर्क का सहारा लेने को बाध्य हो जाता है, जो उसी बात को अधिक सही तौर पर प्रमाणित कर देता है, जिसे वह छोड़ना चाहता था। फिर भी, मैं यहां उनके तर्क के सार का परीक्षण करने को तैयार हूं।

     48. प्रो. दांतवाला ने भाषावार प्रांतों के निर्माण के खिलाफ अपने मत की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन का सहारा लेते हुए उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'द हिस्ट्री आफ फ्रीडम एंड अदर ऐसेज' में संकलित 'ऐसेज आन नेशनेलिटी' से निम्नलिखत उद्धरण दिया है :

     "जिस तरह समाज लोगों से मिलकर बनता है, उसी तरह सभ्य जीवन की यह आवश्यक शर्त है कि एक राज्य में विभिन्न राष्ट्र मिलकर एक हो जाएं।"

 

     49. खेद है कि उपर्युक्त उद्धरण लार्ड एक्टन की छवि को पूरी तरह गलत ढंग से प्रस्तुत करता है। इस उद्धरण में एक पूरे अनुच्छेद की कुछ आरंभिक पंक्तियां ही दी गई हैं। पूरा अनुच्छेद यह है :

Maharashtra as a Linguistic Province - Dr Bhimrao Ambedkar

     "जिस तरह समाज लोगों से मिलकर बनता है, उसी तरह सभ्य जीवन की यह एक आवश्यक शर्त है कि एक राज्य में विभिन्न राज्य मिलकर एक हो जाएं। हीन प्रजातियां राजनीतिक संघ के रूप में बौद्धिक स्तर पर श्रेष्ठ प्रजातियों के साथ रहते हुए अपना विकास करती हैं। लुप्त होते और क्षीण होते राष्ट्रों में नवीन और जीवंत राष्ट्रों का स्पर्श पाकर नए जीवन का संचार होने लगता हैं। जिन राष्ट्रों में या तो निरंकुशता के मर्यादाहीन प्रभाव के कारण या लोकतंत्र के विघटनकारी तत्वों के कारण संगठन शक्ति और शासन की क्षमता लुप्त हो जाती है, जब वे किसी सबल और विकृत प्रजाति के अनुशासन के तले आ जाते हैं, तो उनमें वे शक्तियां पुनः जाग उठती हैं। केवल एक शासन के अधीन रहकर ही यह उर्वरक और संजीवनी प्रक्रिया फलित होती है। राज्य के कड़ाह में ही पककर यह अवलेह तैयार होता है, जिसका सेवन कर कोई राष्ट्र शक्तिशाली और ज्ञानवान हो जाता है और तब वह उन्हें मानवता के किसी अन्य अंश में संचारित कर सकता है।"

     50. यह समझ पाना मुश्किल है कि प्रो. दांतवाला ने उस अनुच्छेद के शेष अंश को उद्धत क्यों नहीं किया। मैं यह नहीं मानता कि सत्य को छिपाने और झूठ की फसल उगाने के लिए ऐसा कदम जानबूझ कर उठाया गया हैं तथ्य तो यह है कि इस आंशिक उद्धरण से लार्ड एक्टन का कथन सही रूप में प्रस्तुत नहीं हो सकता है। मैं यह समझने में अक्षम हूं कि प्रो. दांतवाला ने इसे उद्धत क्यों किया? बिल्कुल साफ बात है कि यदि हीन प्रजातियों को श्रेष्ठ प्रजातियों के साथ मिला दिया जाए, तो हीन प्रजातियों में परिष्कार हो सकता है। किन्तु प्रश्न तो यह है कि किसे हीन माना जाए और किस श्रेष्ठ | क्या गुजराती महाराष्ट्रवासियों से हीन हैं? या महाराष्ट्रवासी गुजरातियों से हीन हैं? दूसरी बात यह है कि गुजरातियों और महाराष्ट्रवासियों के बीच संसर्ग की वह कड़ी कौन सी है, जो दोनों का एकाकार कर सके ? प्रो. दांतवाला ने शायद इस प्रश्न पर विचार नहीं किया है। उन्होंने तो लार्ड एक्ट के निबंध में एक-दो वाक्य देखे और बस झपट पड़े उस अंश पर हो सकता है, इसका कारण यह रहा हो कि उनके तर्क की पुष्टि के लिए और कोई सामग्री उपलब्ध थी ही नहीं। बात तो बस इतनी भर है कि इस अनुच्छेद में ऐसी कोई बात नहीं कही गई है, जो भाषावार प्रांतों के गठन के सिद्धांत से मेल खाती हो ।

     51. प्रो. दांतवाला की दलीलों के बारे में बस इतना कहना पर्याप्त होगा। अब मैं प्रो. घीवाला द्वारा प्रतिपादित विचारों का परीक्षण करूंगा। प्रो. घीवाला ने भी अपने अभिमत की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन के कथन का सहारा लिया है। उन्होंने भी उपर्युक्त लेख का ही उद्धरण दिया है। उद्धरण वाला अनुच्छेद इस प्रकार है :

     "राष्ट्रीयता के अधिकारों का सबसे बड़ा शत्रु राष्ट्रीयता का आधुनिक सिद्धांत ही है। सैद्धांतिक स्तर पर राज्य और राष्ट्र, दोनों को समानुरूपी मान लेने के व्यावहारिक स्तर पर उस राज्य की सीमाओं में पाई जाने वाली अन्य सभी राष्ट्रिकताओं के स्तर को अधीनस्थ स्तर पा ला दिया जाता है। यह सिद्धांत अन्य राष्ट्रियकताओं को शासक राष्ट्र, जो स्वयं राज्य बन जाता है, की बराबरी का दर्जा नहीं देता, क्योंकि बराबरी का दर्जा देने पर तो वह राज्य फिर एक राष्ट्र नहीं रह पाएगा और तब एक राज्य एक राष्ट्र के सिद्धांत में विराधाभास नजर आने लगेगा। इसलिए उस प्रभुत्व-संपन्न निकाय में, जिसमें समुदाय के सभी अधिकारों पर दावा बना रहता है, मानवता और सभ्यता की मात्रा के अनुसार हीन प्रजातियों को या तो निर्मूल कर दिया जाता है या उन्हें गुलाम बना दिया जाता है या बहिष्कृत कर दिया जाता है या फिर पराधीनता के स्तर पर ले आया जाता है।"

     52. मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि विद्वान प्रोफेसर ने अपने विचारों की पुष्टि के लिए लार्ड एक्टन के नाम को क्यों घसीटा है। उपर्युक्त अनुच्छेद तो उनकी मान्यता की तनिक भी पुष्टि करता नहीं लगता हो सकता है कि एक बात उनके मन में घर कर गई हो। उन्होंने सोचा होगा कि यदि बंबई महाराष्ट्र में सम्मिलित हो गया, तो उस प्रांत में दो राष्ट्रिकताएं हो जाएंगी एक मराठी भाषियों की और दूसरी गुजराती चूंकि मराठी भाषी वर्ग शासक वर्ग होगा, इसलिए वह गुजराती भाषी वर्ग को भाषियों की अधीनस्थ स्तर पर ले आएगा। केवल इसी बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने लार्ड एक्टन के उपर्युक्त कथन को उद्धत करना उचित समझा होगा। ऐसी संभावना के लिए पूरी गुंजाइश है। उन्होंने समस्या को जिस रूप में प्रस्तुत किया है, उसके बारे में मेरी आपत्ति नहीं है। किन्तु उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके बारे में मैं घोर आपत्ति प्रकट करता हूं।

     53. पहली बात तो यह है कि भारत जैसे देश में जहां समाज पूरी तरह से संप्रदायों में बंटा हुआ है, चाहे जिस तरह से उसे प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटा जाए, हर क्षेत्र में हमेशा कोई न कोई समुदाय विशेष अपनी जनसंख्या के बल पर प्रभावशाली रहेगा ही रहेगा। चूंकि वह प्रभावशाली समुदाय होगा, इसलिए उस क्षेत्र को जो भी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, वह सब उसी समुदाय में निहित होगी। यदि बंबई सहित एकीकृत महाराष्ट्र प्रांत में मराठी-भाषी समुदाय गुजराती भाषी लोगों की तुलना में प्रभावशाली हो जाता है तो क्या ऐसी संभावना को केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित किया जा सकता है? क्या ऐसी परिघटना मराठी-भाषी लोगों के बीच संभव नहीं है? गुजरात प्रांत के पुनर्गठन के बाद क्या यही बात गुजरात पर लागू नहीं होगी? मराठी भाषी लोग भी मराठों और गैर-मराठी के रूप में पूरी तरह विभक्त है। चूंकि मराठा वर्ग प्रभावशाली है, इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि वह वर्ग गुजराती- भाषियों और गैर-मराठा, दोनों को ही अधीनस्थ श्रेणी पर ले आएगा। इसी तरह गुजरात के कुछ हिस्सों में अनाविल ब्राह्मण वर्ग प्रभावशाली है, तो कुछ अन्य क्षेत्रों में पाटीदार वर्ग । पूरी संभावना है कि अनाविल ब्राह्मण वर्ग और पाटीदार वर्ग, दोनों ही अन्य समुदायों को अपने-अपने क्षेत्रों में पछाड़ देंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि यह समस्या केवल महाराष्ट्र की समस्या नहीं है, यह तो एक आम समस्या अर्थात् अखिल भारतीय समस्या है।

     54. इस समस्या का समाधान क्या है? प्रो. घीवाला की मान्यता है कि यदि मिश्रित राज्य बना दिए जाएं तो समस्या हल हो सकती है। यह हल प्रो. घीवाला के मस्तिष्क की उपज नहीं है। उन्होंने इसे लार्ड एक्टन से ही ग्रहण किया है। मेरे मतानुसार निःसंदेह लार्ड एक्टन द्वारा सुझाया गया यह हल पूरी तरह गलत हैं। लार्ड एक्टन ने अपने मत की पुष्टि में आस्ट्रिया का उद्धरण दिया है। दुर्भाग्यवश आस्ट्रिया का जो हाल हुआ, उसे अपनी आंखों से देखने के पूर्व ही लार्ड एक्टन का निधन हो गया । आस्ट्रिया एक मिश्रित राज्य था। मिश्रित राज्य होने की वजह से लार्ड एक्टन के मतानुसार इसमें सभी राष्ट्रिकताएं सुरक्षित रहनी चाहिए थीं। पर सुरक्षित रहने के स्थान पर, उन सभी में फूट पड़ गई और परस्पर संघर्ष होने लगा। परिणाम जो हुआ, वह सबके सामने है। आस्ट्रिया खंड-खंड होकर बिखर गया। वास्तविक हल मिश्रित राज्य में निहित नहीं है। वह तो निहित है, निरपेक्ष राज्य में, जिसमें जनता के हाथ में सत्ता नहीं होती। जनता के नाम पर सत्ता का खेल चलता रहता है। क्या प्रो. घीवाला इस हल को अपनाने के लिए तैयार हैं? उनका क्या उत्तर होगा, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है।

     55. दूसरी बात यह है कि प्रो. घीवाला ने राष्ट्रिकता की परिभाषा को उलझा दिया है। एक ओर वे इस शब्द का प्रयोग सामाजिक अर्थ में करते हैं, दूसरी ओर उसी इसी को वे विधिक और राजनीतिक अर्थों में भी स्वीकार करते हैं। भाषावार प्रांतों के प्रसंग में भी लोग राष्ट्रिकता का नाम बार-बार दुहराते हैं। तब इस शब्द का प्रयोग केवल गैर - विधिक और गैर-राजनीतिक अर्थों में होता है। मेरी योजना में किसी पृ थक प्रांतीय राष्ट्रिकता के विकास के लिए गुंजाइश नहीं है। जब कभी अंकुरित होने के लक्षण नजर आएं, तो उसे नोच डालने में कोई दोष नहीं होगा। भाषावार प्रांतों की चर्चा करते समय सामान्यतः यह सुझाव दिया जाता है कि प्रांतों की भाषाओं को वहां की राजभाषाएं बनाया जाए। यदि यह प्रस्ताव मान भी लिया जाता है तो भी उन प्रांतों के साथ प्रभुत्व संपन्नता का वह विशेषण चस्पा नहीं किया जा सकता, जो स्वतंत्र राष्ट्रों के साथ जुड़ा होता है।

     56. वास्तव में, प्रो. घीवाला क्या चाहते हैं, इसे समझना मुश्किल है। मोटे तौर पर वे दो बातें चाहते हैं एक मिश्रित राज्य बनाए जाएं। दो वे यह भी चाहते हैं कि प्रभावशाली वर्ग इस स्थिति में न पहुंच पाए कि वह अन्य छोटे-छोटे वर्गों को अधीनता की श्रेणी में ले आए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भाषावार प्रांतों का गठन किस प्रकार आड़े आ सकता है, इसे मैं नहीं समझ पाया हूं। क्योंकि भाषाओं के आधार पर प्रांतों का गठन हो जाने के बाद भी

     (क) सभी प्रांतों में विभिन्न समुदायों का घालमेल बना रहेगा। यही तो मिश्रित राज्य होगा, जिसकी मांगें प्रो. घीवाला कर रहे हैं।

     (ख) यदि प्रो. घीवाला की यह मंशा है कि एक निश्चित संकल्पना वाला मिश्रित राज्य बने, जो छोटे-छोटे समुदायों या राष्ट्रिकताओं की रक्षा कर सके, तो ऐसी संभावना भी है। ऐसा राज्य उन्हें निश्चय ही केंद्र स्तर पर मिलेगा |

     मैं पहले ही कह चुका हूं कि मिश्रित राज्य न तो अच्छा राज्य होगा और न ही स्थायी राज्य । फिर भी, यदि प्रो. घीवाला को यह पसंद है तो वह किसी न किसी रूप में उनको मिल ही जाएगा, प्रांतों के स्तर पर भी और केंद्र के स्तर पर भी प्रांतों में उसका स्वरूप विभिन्न समुदायों के रूप में होगा और केंद्र में विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों के रूप में।


     57. उनके दूसरे लक्ष्य के बारे में कहूं तो कह सकता हूं कि दूसरी सुरक्षा उपलब्ध होगी। पहली सुरक्षा इस तरह से कि उनकी योजना के अनुसार ही नागरिकों को वह मिश्रित राज्य के रूप में उपलब्ध होगी। दूसरी यह कि पूरे देश में समान नागरिकता लागू होगी। प्रांतीय नागरिकता का प्रावधान नहीं होगा। महाराष्ट्र में बसे गुजराती भाषी को नागरिकता संबंधी वे सभी अधिकारी उपलब्ध होंगे, जो किसी मराठी भाषी को महाराष्ट्र में उपलब्ध हैं।

     इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रो. घीवाला के भाषा पर आधारित प्रांतों के गठन पर क्या आपत्ति हो सकती है?

     58. प्रो. घीवाला ने दो अन्य सुझाव भी दिए हैं: (1) यदि प्रांतों का पुनर्गठन किया  ही जाना है तो वह तार्किक आधार पर होना चाहिए न कि भाषायी आधार पर, और (2) राष्ट्रिकता को निजी वस्तु बनाया जाए।

     59. भाषा के आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन की तुलना में आर्थिक आधार पर (तार्किक आधार कहने का अभिप्रायः यही है) प्रांतों के पुनर्गठन की बात करना ऊपरी तौर पर अधिक वैज्ञानिक लगता है। पर मेरे मतानुसार, भाषावार प्रांतों का पुनर्गठन अवैज्ञानिक माने जाने के बावजूद, भारत के आर्थिक संसाधनों के तार्किक उपयोग के मार्ग में कैसे बाधक होगा यह स्पष्ट नहीं किया गया है। प्रांतीय सीमाएं होती हैं। आर्थिक संसाधनों के समुचित उपयोग में ये सीमाएं आर्थिक स्तर पर बाधाएं नहीं डालतीं। यदि स्थिति यह होती कि भाषावार प्रांतों के निर्माण की योजना शरारत भरी अर्थात् हानिकारक है। किन्तु ऐसी स्थिति तो है नहीं, जब तक भाषावार प्रांतों को इस बात की इजाजत नहीं दी जाती कि वे उस प्रांत में पाए जाने वाले संसाधनों का किसी भी सक्षम और इच्छुक व्यक्ति, संस्था या निकाय द्वारा दोहन किए जाने पर रोक लगा सकें, तब तक तो भाषावार प्रांत वे सभी लाभ देते रहेंगे, जो कोई भी तार्किक दृष्टि से गठित प्रांत दे सकता है।

     60. राष्ट्रिकता को निजी वस्तु बनाने और उसे धर्म के समान ही दर्जा देने के प्रस्ताव को अति आदर्शवादी किन्तु अव्यावहारिक मानते हुए रद्द कर दिया जाना चाहिए। इसे मान लेने पर अनेक प्रकार की प्रशासनिक कठिनाइयां या समस्याएं उभर आने का खतरा है। ऐसा तभी संभव है, जब सारा संसार एक हो जाए और मानव मात्र उसके नागरिक बन जाएं (वसुधैव कुटुंबकम्) ऐसी स्थिति में राष्ट्रिकता स्वतः ही लुप्त हो जाएगी, क्योंकि जब उसकी उपयोगिता रहेगी ही नहीं।

     61. अब तक मैंने केवल उन लोगों के अभिमतों पर ही विचार किया है, जो बंबई को महाराष्ट्र में मिलाने के पक्षपाती हैं। मैंने तो उन पर विचार केवल इसलिए किया है, ताकि मैं सामान्य जनता को उनक बहकावे में आकर गुमराह होने से बचा सकूं। ऐसा होने की पूरी संभावना दो कारणों से नजर आ रही थी। एक-जिन लोगों ने ये दलीलें दी हैं वे साधारण लोग नहीं है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। दो-जब प्रोफेसर गाडगिल ने बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा, इसके बाद ही ये प्रोफेसर लोग मुखर हुए। दुर्भाग्यवश, प्रोफेसर गाडगिल के विरोधियों के तर्कों को काटने के लिए अभी तक कोई व्यक्ति सामने नहीं आया। परिणामस्वरूप यह धारणा बनती जा रही थी कि प्रोफेसर गाडगिल के प्रतिद्वंद्वियों ने मैदान मार लिया है। इस धारणा को और अधिक पुख्ता न होने देना अत्यंत आवश्यक हो गया था।

सिक्के का दूसरा पहलू

     62. ऐसे भी कुछ तर्क हैं, जिनकी कल्पना प्रोफेसर गाडगिल के विरोधी नहीं कर सके थे, किन्तु जिन्हें इस दावे के पक्ष में कि बंबई का विलय महाराष्ट्र में होना चाहिए, न्यायपूवर्क और बलपूर्वक प्रस्तुत किया जा सकता है, हो सकता है कि ये तर्क आयोग को स्वयं ही सूझ जाएं, किन्तु मैं इस मामले को भाग्य के भरोसे छोड़ना नहीं चाहता, इसीलिए, मैं नीचे इनका भी विवेचन प्रस्तुत कर रहा हूं। हो सकता है कि मेरे इस प्रयास को आयोग वृथा प्रयत्न माने।