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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar

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11 मे 2023
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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत  ( भाग 12 )- डॉ. भीमराव अम्बेडकर

बिंदु संख्या (6)

गुजराती - बंबई के व्यापार और उद्योग के मालिक

     36. यह तथ्य स्वीकार्य है कि गुजरातियों का व्यापार पर एकाधिकार है। पर, जैसा कि पहले बताया जा चुका है, यह भी सही है कि उनका यह एकाधिकार केवल इसलिए संभव हुआ है, क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें बंबई में बसाने के लिए कुछ विशेषाधिकार दिए थे और उन विशेषाधिकारों के फलस्वरूप ही उन्होंने बहुत लाभ कमाया। बंबई में व्यापार और उद्योग किसने खड़े किए और करवाए, यह विषय ऐसा है, जिसके लिए अधिक अनुसंधान की आवश्यकता नहीं है। गुजरातियों ने ही बंबई में व्यापार शुरू किया और उद्योग लगाए। इस कथन का वस्तुतः कोई आधार नहीं है। व्यापार और उद्योग धंधा तो यूरोपवासियों ने शुरू किया, न कि गुजरातियों ने। फिर भी जो लोग बार-बार यही रट लगाते रहते हैं, उन्हें अपना दावा दोहराने से पहले एक बार 'द टाइम्स आफ इंडिया डाइरेक्टरी' देख लेनी चाहिए। गुजरातियों ने तो केवल सौदागारों का काम किया है। सौदागर होने में और उद्योगपति होने में बड़ा फर्क है।

     37. जब एक बार यह तय हो गया कि बंबई महाराष्ट्र का ही हिस्सा है तो फिर बंबई को महाराष्ट्र प्रांत में मिलाने के दावे को इस दलील से खारिज नहीं किया जा सकता कि बंबई के व्यापार और उद्योगों के मालिक गुजराती हैं। मान लो, कोई व्यक्ति अपनी जमीन किसी के पास गिरवी रखे ओर वह ऋणदाता उस जमीन पर किसी प्रकार का टिकाऊ ढांचा खड़ा कर ले तो केवल इस आधार पर उस ऋणी व्यक्ति का उस जमीन पर दावा हट नहीं जाता। मान लो गुजरातियों ने ही बंबई में व्यापार और उद्योग लगाए तब भी क्या बंबई पर उनके दावे को जमीन गिरवी रखने वाले की तुलना में स्वीकार किया जा सकता है ?

Maharashtra as a Linguistic Province - Dr Bhimrao Ambedkar

    38. बंबई को महाराष्ट्र में मिलाया जाना चाहिए या नहीं इस समस्या को हल करते समय मेरी समझ में बंबई में किसने व्यापार और उद्योग स्थापित किए, यह प्रश्न उठाना बेमानी होगा। व्यापार और उद्योग पर एकाधिकार के सवाल पर आधारित यह तर्क वास्तव में एक राजनीतिक दलील भर है। इसका मतलब तो यह हुआ कि मालिकों को मजदूरों पर हुकूमत करने का हक है, न कि मजदूरों को मालिकों पर जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, वे शायद यह नहीं जानते कि वे किसकी मुखालफत कर रहे हैं। क्या वे इस दलील को केवल बंबई तक ही सीमित रखना चाहते हैं या यह भी चाहते हैं कि उनका यही तर्क और जगह भी लागू हो ?

    39. ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता, जिसकी वजह से यह कहा जा सके कि इस तर्क को अन्यत्र सार्वभौमिक तर्क के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिस तरह बंबई शहर का समाज मालिकों और मजदूरों के रूप में या पूंजीपतियों और वेतनभोगियों के रूप में बंटा हुआ है, वहीं स्थिति गुजरात में या कहें भारत के सभी प्रांतों में पाई जाती है। यदि बंबई के मालिकों और पूंजीपतियों को केवल इस तर्क पर संरक्षण मिलता है कि महाराष्ट्रवासी तो मजदूर वर्ग में आते हैं इसलिए बंबई को महाराष्ट्र में न मिलने दिया जाए, तो फिर ये तर्कदाता गुजरात के मजदूर वर्ग से गुजरात के ही पूंजीतियों को बचाने के लिए कौन-सा रास्ता सुझाएंगे। वकील और दांतवाला जैसे गुजराती प्रोफेसर लोग बंबई के गुजराती पूंजीपतियों के समर्थन से सिर खुजला - खुजलाकर जो दलीलें खोज रहे हैं, क्या उन्होंने कभी यह सोचने का भी कष्ट किया है कि गुजरात में ही वहां के मेहनतकश वर्ग से गुजराती पूंजीपतियों को किन तौर-तरीकों से बचाया जाए? क्या वे यह सुझाव देना चाहेंगे कि वयस्क मताधिकार की पद्धति को समाप्त कर दिया जाए? यदि वे मुख्यतः बंबई के ही गुजराती पूंजीपतियों को बचाना न चाह कर सामान्यतः सभी पूंजीपतियों को बचाना ही चाहते हैं, तब तो केवल यही एक रास्ता है।

    40. हां, एक तर्क ऐसा है, जिस पर ये प्रोफेसर लोग जोर दे सकते हैं। वह यह है कि जब बंबई महाराष्ट्र में सम्मिलित हो जाए तो बहुसंख्यक महाराष्ट्रवासी बंबई के इन गुजराती पूंजीपतियों से भेदभाव बरतेंगे। इस प्रकार के तर्क के पीछे छिपी हुई भावना को समझा जा सकता है। किन्तु इस तर्क को आगे करने वालों को दो बातें याद रखनी चाहिएं :

     (क) महाराष्ट्र ही केवल ऐसा स्थान नहीं है, जहां इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति तो कहीं भी उठ खड़ी हो सकती है। मैं बिहार का उद्धरण देना चाहता हूं। बिहार में कोयला पाया जाता है। कोयला मिलने वाली जमीनें बिहार की हैं। किन्तु कोयले की खानों के मालिक गुजराती काठियावाड़ी और यूरोपवासी हैं। क्या इस बात की संभावना नजर नहीं आती कि बिहारवासी इन गुजराती और कठियावाड़ी कोयला मालिकों से भी भेदभाव बरतेंगे? क्या कोयला पाए जाने वाले इन इलाकों को बिहार प्रांत से अलग करके कठियावाड़ी और गुजराती कोयला मालिकों के हित में इनका एक अलग प्रांत बनाया जा सकता है?

    (ख) भारत का संविधान बनाते समय इस संभावना को ध्यान में रखा गया है कि कहीं भी अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव पनप सकता है और इसलिए उसमें ऐसा न होने देने के लिए पर्याप्त प्रावधान किया गया है। मूल अधिकार दिए गए हैं, भेदभाव मिटाने के और क्षतिपूर्ति के प्रावधान हैं। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय तो हैं ही। जिनमें ये अधिकार अंतर्निहित हैं कि यदि किसी नागरिक कोई व्यक्ति या सरकार किसी प्रकार की हानि पहुंचाए, उसके प्रति अन्याय करे या उसे परेशान करे तो उनके खिलाफ याचिका दर्ज कराने पर उन्हें ऐसा करने से रोका या दंडित किया जा सकता है। भेदभाव की आशंका के खिलाफ बंबई के व्यापारी और उद्योगपति और क्या बचाव के साधन पाना चाहते हैं ?