महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar
33. नीमा पारेख की याचिका को किस तरह निपटाया गया, इसे जानने के लिए बंबई के डिप्टी गवर्नर के दिनांक 3 अप्रेल, 1677 के उत्तर को देखा जा सकता है, जिसकी पंक्तियां इस तरह थीं :
“आदेशनुसार हमने सीमा पारेख बनिए की याचिका में उल्लिखित मांगों पर विचार किया। यदि हम उन्हें ठीक से समझ पाए हैं तो हमें उन छूटों में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह की आशंका नजर नहीं आती। इन छूटों का उपभोग तो छोटे से छोटा व्यक्ति भी कर रहा है।
"पहली मांग को मानना सरल है, क्योंकि कंपनी के पास काफी जमीन खाली पड़ी है। जो बनिए या अन्य लोग यहां बसने को आते हैं, हम उन्हें रोज ही खाली जमीन देते रहते हैं। जहां तक दूसरी मांग का संबंध है, प्रत्येक व्यक्ति को उसके धार्मिक कृत्यों को पूरा करने की छूट मिली हुई है। उन्हें शादी विवाह की रस्में मनाने और भोज देने की अनुमति है ही। बनिए तो मृतकों के शवों को जलाते ही हैं, उनमें किसी प्रकार की बाधा नहीं आने दी जाती। हमने बनियों के घरों के पास किसी को न तो जीव हत्या की अनुमति दी हुई है और न ही कोई व्यक्ति किसी के घर या परिसर में बिना उसके मालिक की इजाजत घुस ही सकता है, लोगों को उनकी इच्छा के विपरीत ईसाई बनाने के लिए बाध्य करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि सारी दुनिया इसके औचित्य का प्रतिपादन करती है, न ही व्यक्ति को उसकी इच्छा के बिना कोई कार्य करने को बाध्य होना पड़ता है। कोई भी बनिया, ब्राह्मण, मूर या ऐसा कोई अन्य व्यक्ति निगरानी रखने और रखवाली करने का काम करने को बाध्य नहीं है। _ इसलिए नीमा की इस मांग को माना जा सकता है।

“चौथे अनुच्छेद वाली मांग वस्तुतः एक विशेषाधिकार है किन्तु वह किसी हिन्दू, ईसाई या किसी अन्य व्यक्ति को पहले से ही मिले अधिकार से अधिक की अपेक्षा नहीं करती। इसे कानून और न्याय के हाथों से छूट मांगना भी नहीं कहा जा सकता। इसमें तो बस इतनी भर मांग की गई है कि जो न्याय मिले, वह आदरपूर्वक मिलना चाहिए। इसके बारे में उसके मन में किसी प्रकार का संदेह नहीं रहना चाहिए। जहां तक उनके परस्पर मतभेदों को सुलझाने की बात है, महामना ने उनको ऐसा कर सकने का अधकिार पहले से ही दे रखा है।"
"जहां तक पांचवीं मांग का सवाल है, प्रति टन एक रुपए का लंगर शुल्क अब पूरी तरह उठा लिया गया है। अब सौ टन के लिए एक रुपए का नाममात्र का शुल्क लिया जाता है, जो इतना महत्वहीन है कि हम इसके लिए अड़े रहें। यह आवश्यक नहीं है। यदि वह हठ करता है तो इसका असर तो पड़ेगा ही। पर यह मामला इतना तुच्छ है और इसका संबंध केवल उसके जलयानों तक ही सीमित है, इसलिए इसे भी आसानी से माना जा सकता है।"
"यदि हम ठीक से समझ पाए हैं तो छठी सुविधा तो अन्य सभी लोगों को उपलब्ध है, उससे अधिक कुछ नहीं है। ....... यदि वह चाहता है कि जो सामान वह बेच नहीं पाए, उसका लदान करते समय या उसे उतारते समय उसके लिए उसे कस्टम न चुकाना पड़े तो ऐसा करने से कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने दो वर्षों के लिए कस्टम ड्यूटी से होने वाली आय का हिसाब किताब बना लिया है। हमारा विश्वास है कि उसके यहां बस जाने से होने वाला लाभ भी उस समय तक नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा, जब तक कि कस्टम फिर से कंपनी के हाथों में ना आ जाए ।"
"सातवीं मांग के बारे में यह कहा जा सकता है कि हमने कानून बना ही रखा है कि अगर कोई व्यक्ति एकाधिक लोगों का ऋणी हो तो जिस भी ऋणदाता के पक्ष में न्यायालय पहले फैसला सुनाएगा, उसी को पहले पूरे ऋण का भुगतान होगा। ऐसी स्थिति में न तो किसी व्यक्ति को यह मानना चाहिए कि उसके साथ अन्याय हुआ है और न ही कोई ऋणदाता एक बार भुगतान हो जाने के संबध में दावा करेगा, क्योंकि जब फैसला सुनाया जा चुका है, तब यह माना जाएगा कि कानूनी तौर से पूरा भुगतान किया जा चुका है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति दो व्यक्तियों का ऋणी हो और पहला व्यक्ति उसके खिलाफ मुकदमा दायर करता है और उसके बाद दूसरा व्यक्ति भी उसके खिलाफ मुकदमा दायर करता है, तब ऐसी स्थिति में किस कानून के अंतर्गत कर्जदार की संपत्ति को दूसरे ऋणदाता को दे सकते हैं। इसलिए उसे आश्वस्त किया जा सकता है कि हमारे कानून के अनुसार तेजी से उसके साथ न्याय किया जाएगा और यदि कर्जदार समर्थ है तो उसे पूरे ऋण का भुगतान करने को बाध्य किया जा सकता है और यदि वह पूरे ऋण का भुगतान न करेगा तो बकाया ऋण के एवज में उसे हवालात में रखा जा सकता है, जब तक कि महामना उसे छोड़ने की इजाजत न दें। ऐसी स्थिति आने पर हम यह मानते हैं कि उसे इससे संतोष हो जाएगा।"
"जहां तक आठवीं मांग का संबंध है, लड़ाई छिड़ जाने की स्थिति में धनी व्यक्ति को किले में जाने और अपनी संपत्ति व महत्व की चीजों को सुरक्षित रखने के लिए स्वतंत्रता है। मैं नहीं समझता कि वह धन, जवाहरात, महंगे कपड़े, घर में काम आने वाला सामान और मूल्यवान कपड़े जो कि कम जगह में रखे जा सकते हैं, के बजाए घटिया सामान से अपने किले को भर देगा। वह किले में अपनी पसंद की चीजें ला सकेगा और उसे व उसके परिवार के लिए अलग से एक गोदाम की भी व्यवस्था होगी।"
"नवीं और दसवीं मांग को हम एक साथ ले सकते हैं। केवल संख्या बढ़ाने के लिए ही याचिका में उन्हें अलग-अलग रखा गया है। ऐसा केवल यह दिखाने भर के लिए किया गया है कि वे कैसा जीवन जी रहे हैं, जब उन्हें यह भान होगा कि ऐसा उन्होंने हमारी सरकार की परीक्षा लेने भर के लिए किया है तो वे यह सोचकर हम पर हंसेंगे कि उन्होंने जितनी मांग की है, उससे कहीं अधिक स्वतंत्रता का तो वे पहले से ही उपभोग कर रहे हैं। क्योंकि उचित नोटिस देने पर तो प्रवेश या विकास की सुविधा छोटे से छोटे व्यक्ति को भी उपलब्ध है। जहां तक घोड़े रखने या बग्घी में सवार होने या ऐसा कोई अन्य सवाल है, उसे मन पसंद संख्या में उन्हें पालने या रखने की छूट दी जा सकती है और उसके सेवकों को भी मनपसंद हथियार धारण करने की अनुमति दी जा सकती है। यह छूट तो सभी को दी जा सकती है। कुछ भी खरीदने या बेचने की पूरी स्वतंत्रता तो हमने दे ही रखी है, क्योंकि हम जानते हैं कि यही तो व्यापार की कुंजी है।"
"अंत में उसने मांग की है कि उसे बिना किसी शुल्क के दस मन तम्बाकू रखने का अधिकार दिया जाए । यह सबसे भारी मांग है, जिससे सहमत होना सबसे कठिन काम लगता है। इसका कारण यह है कि इसे मान लेने पर अन्य अनेक किसान भी इस प्रकार की छूट प्राप्त करने की मांग करेंगे, क्योंकि दस मन तम्बाकू बेचने से उन्हें भारी नफा होने की संभावना है। इसलिए इस प्रार्थना को कैसे स्वीकार किया जाए, इसके बारे में हमारा ज्ञान सीमित है। मान्यवर आप ही इस बारे में हमसे अधिक अच्छा निर्णय ले सकते हैं। 12
34. उत्तर में सूरत परिषद ने 26 जून को लिखा : 13 "नीमा पारेख बनिए ने बंबई द्वीप में बसने के लिए अपनी याचिका में जो मांगे रखी हैं, उनके बारे में आपका उत्तर देखा। जब हम फिर से उसके संदर्भ में विचार करते हैं तो हमें लगता है कि मामले को इस तरह सुलझाने के लिए कि द्वीप में बिना किसी पूर्वाग्रह के वह आकर बसे हमें चाहिए कि हम उसकी इस मांग को मान लें कि उसे बिना शुल्क के प्रति वर्ष दस मन तम्बाकू द्वीप में लाने दिया जाएगा।"
12 नीमा पारेख ने यह नई मांग रखी है।
13 बॉबे गजेटियर, खंड 1, पृष्ठ 77