महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar
- महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत ( भाग 8 ) - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
बिंदु संख्या (4)
क्या गुजराती भाई बंबई के मूलवासी हैं?
31. इस प्रश्न की सभी वारीकियों पर हमें विचार कर लेना चाहिए। क्या गुजराती भाई बंबई के मूल निवासी हैं? यदि वे मूल निवासी नहीं हैं तो फिर वे बंबई में कैसे आए? उनकी संपत्ति का स्रोत क्या है? कोई गुजराती इस बात का दावा नहीं करेगा कि गुजराती लोग बंबई के मूल निवासी हैं। यदि वे यहां के मूल निवासी नहीं हैं तो फिर बंबई में आए कैसे? ठीक पुर्तगालियों, फ्रांसिसीयों, डचों और अंग्रेजों की तरह ही साहस दिखाते और जोखिम उठाते हुए उन्होंने रास्ता तय किया और वे यहां घुस आए। वे हर प्रकार का खतरा उठाने को तैयार थे। इतिहास इन प्रश्नों के जो उत्तर देता है, वे पूरी तरह स्पष्ट हैं। गुजराती भाई स्वेच्छा से बंबई नहीं आए थे। उन्हें तो ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर आढ़तिया बनाकर यहां लाए थे। वे यहां लाए गए, क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने अपनी पहली फैक्टरी सूरत में लगाई थी और अपना व्यापार चलाने के लिए उन्हें आढ़तियों के रूप में सूरतिया बनियों का अच्छा अनुभव हो गया था। तो गुजरातियों के बंबई - प्रवेश की कहानी की यहां से शुरूआत हुई। दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि गुजराती लोग अन्य व्यापारियों के साथ खुली और समान स्तर की प्रतियोगिता के आधार पर व्यापार करने के लिए बंबई नहीं आए थे। वे तो केवल उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों के रूप में यहां आए थे, जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से व्यापार करने के लिए कुछ विशेषाधिकार मिले हुए थे। उन्हें बंबई लाने के प्रस्ताव पर पहली बार सन् 1671 में सूबेदार (गवर्नर) अंगियर ने विचार किया था। यह तथ्य 'गजेटियर आफ बोंबे टाउन एंड आईलैंड, खंड 1 में इस तरह वर्णित है :*

बंबई के लाभ के लिए एक और योजना, जिसमें गवर्नर अंगियर ने खुद रुचि दिखाई है, यह है कि सूरत के बनियों को लाकर बंबई में बसाया जाए। लगता है कि महाजनों ने, अर्थात् सूरत के बनियों बिरादरी वालों ने बंबई आने के खतरों को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेषाधिकार पाने का आश्वासन मांगा हो। कंपनी सरकार ने महाजनों के इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी हो। 10 जनवरी को सूरत काउंसिल ने कपंनी को लिखा, “महाजन या बनियों की मुख्य काउंसिल आपके उस कृपापूर्वक उत्तर से बहुत संतुष्ट लगी, जिसे आपने सेम्सन जहाज से भेजी गई उनकी याचिका के उत्तर में भेजा था। इस याचिका में बंबई आने से संबंधित विशेषाधिकारों की मांगों का उल्लेख था। ऐसा लगता है कि वे फिर एक बार आपको तकलीफ देना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने आपके आढ़तिए भीमजी पारेख से आपको पत्र लिखवाया है, जिसमें उन्होंने अपनी यह इच्छा व्यक्त की है कि आपके हस्ताक्षरों और मोहर लगाकर उन्हें ये विशेषाधिकार प्रदान किए जाएं। इन विशेषाधिकारों को पाने के लिए उन्होंने अपने पत्र में कारण भी दिए हैं। उनका यह पत्र आपकी अन्य डाक के साथ फाल्कन नामक जहाज से भेजा जा रहा है। उनके इस प्रकार के अनुरोध की पुष्टि के लिए उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किए हैं, उनमें थोड़ा वजन है। उनका कहना है कि मान्य कंपनी तो कालातीत है और उसके अध्यादेशों में बल भी होता है, किन्तु कंपनी के प्रधान और परिषद के सदस्य तो बदलते रहते हैं और ऐसा देखा गया है कि उत्तरवर्ती प्रधान और सदस्य अपने पूर्ववर्तियों द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को बदल देते हैं, इसलिए उन्होंने आपकी सेवा में यह याचिका दी है और चाहते हैं कि आप उसे स्वीकृति प्रदान करने की कृपा करें। इस याचिका पर हमारी सादर सम्मति यह है कि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे आपको किसी तरह का नुकसान पहुंचने की गुंजाइश हो, उल्टे इसे मान लेने पर पर्याप्त लाभ होने की संभावना नजर आती है। इसलिए गुजारिश है कि आप जैसा उचित समझें, उन्हें सुविधाएं देने की अनुकम्पा करें। आशा है, आप इस याचिका का समुचित उत्तर शीघ्र देने की कृपा करेंगे। इससे उनको शांति मिलेगी और आपके हितों को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।
बोंबे गजेटियर, खंड 1 पृष्ठ 46-47