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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar

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11 मे 2023
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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत  ( भाग 6)- डॉ. भीमराव अम्बेडकर

    26. इन दोनों बिंदुओं पर इतिहास और भूगोल, दोनों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जा सकता है। फिर भी मेरा दृढ़ निश्चय है कि इस मुद्दे का हल इतिहास की सहायता से नहीं निकाला जा सकता। पहली बात तो यह विचारणीय है कि निष्कर्ष निकालने हेतु आवश्यक आधार सामग्री का संग्रह करने के लिए हम कितना पीछे जाएं । निःसंदेह, अति पुरातन इतिहास तो इस मामले में हमारी मदद करने से रहा। हां, वर्तमान काल के भूत से हमें इस बारे में अवश्य सहायता मिल सकती है। किन्तु इस मुद्दे को प्रभावित करने वाला जो निष्कर्ष इस कालखंड के भरोसे निकाला जाएगा, उस पर भी लोग प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं। इतिहास सम्मत काल खंडों में जन समुदायों के बीच जो संपर्क ज्ञात हैं, वे सब विजेताओं और विजितों के बीच के हैं। भारत और यूरोप, दोनों पर यह बात लागू होती है। किन्तु इस प्रकार के संपर्कों के जो परिणाम निकले हैं, ये यूरोप और भारत में अलग-अलग प्रकार के रहे हैं। यूरोप में तो इस प्रकार के संपर्कों से परस्पर मेल न खाने वाले सामाजिक तत्वों के बीच समीकरण पैदा हुआ है। बार-बार के अंतर्वर्गीय विवाहों से मूल कुलों का उच्छेदन हो गया। एक भाषा विशेष ने, चाहे वह अत्यंत उपयोगी भाषा रही हो, चाहे सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा, उसने दूसरी भाषा को हटाकर उसकी जगह ले लेनी चाही। अगर एक ही देश में अनेक समयताएं हैं और उनमें से कोई सभ्यता अन्यों से श्रेष्ठ है, तो उसने उन सबों को हटा कर स्वतः ही उनका स्थान ले लिया। समीकरण की यह सहज प्रवृत्ति, जो यूरोप में दिखाई देती है, इतनी अधिक सबल है कि इसे प्रभावहीन करने के लिए कदम उठाने होंगे। भारत में कौन-सी प्रवृत्ति काम कर रही है? निश्चय ही यह ऐसे समीकरण के खिलाफ है। मुसलमानों ने हिन्दुओं पर विजय पाई । किन्तु मुसलमान मुसलमान ही रहे और हिन्दू हिन्दू ही । मराठों ने गुजरातियों को जीता और कुछ वर्षों तक उन पर राज भी किया। किन्तु गुजरातियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? कुछ भी नहीं गुजराती गुजराती ही रहे और मराठे मराठे ही। चालुक्यों ने मराठों को जीता और इसी तरह शिलहरों ने भी उन पर विजय पाई। किन्तु इन सभी के बीच समीकरण नहीं हो पाया। सभी वही बने रहे, जो वे पहले थे। जब स्थिति ऐसी रही है तो फिर भारत का इतिहास इस मामले में निर्णय तक पहुंचने में कैसे मदद कर सकता है? आंतरिक उथल-पुथल एवं बाह्य आक्रमणों का इतिहास कभी किसी दुःस्वप्र या गुजरी घटना से अधिक कुछ नहीं माना गया। यहां विजय अभियानों का कभी कोई अर्थ नहीं रहा और न इनसे कुछ भी सिद्ध हो सका।

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भूगोल का निर्णय ( अधिमत)

27. आइए, अब भूगोल का मुंह जोहें और उसका फैसला सुनें। भूगोल का साक्ष्य इतिहास के साक्ष्य से कहीं बेहतर लगता है। इसके लिए हमें बंबई की भौगोलिक अवस्थिति पर महाराष्ट्र प्रांत की अवस्थिति के प्रसंग में विचार करना पड़ेगा। महाराष्ट्र प्रांत के गठन के बाद वह आकार में त्रिकोण जैसा लगेगा। इस त्रिकोण की एक रूप रेखा भारत का पश्चिमी तट है, जो उत्तर में दमन से लेकर दक्षिण में कारवाड़ तक फैला है। बंबई शहर दमन और कारवाड़ की तटरेखा के बीच में स्थित है। गुराजत प्रांत दमन से शुरू होकर उसके उत्तर में फैला हुआ है, जबकि कन्नड़ प्रांत कारवाड़ से शुरू होता है और उससे दक्षिण की ओर फैलता जाता है। बंबई गुजरात के प्रारंभ बिंदु दमन से करीब 85 मील दक्षिण में है, तो कर्नाटक प्रांत के प्रारंभ बिंदु कारवाड़ से करीब 250 मील उत्तर में स्थित है। यदि दमन से कारवाड़ तक का अविच्छिन भू-भाग भौगोलिक दृष्टि से महाराष्ट्र का हिस्सा है, तो फिर बंबई का महाराष्ट्र का हिस्सा न मानना कहां तक उचित होगा? यह तो निर्विवाद रूप से प्राकृतिक तथ्य है, भूगोल ने ही बंबई को महाराष्ट्र का अंग बनाया है। जो लोग इस प्राकृतिक तथ्य को नकार कर उसे चुनौती देना चाहते हैं, वे चुनौती देते रहें । पूर्वाग्रहों से मुक्त बुद्धि वाले व्यक्ति तो इस निर्णायक साक्ष्य को स्वीकार करेंगे और यह मान लेंगे कि बंबई महाराष्ट्र का हिस्सा है।

बंबई और मराठा साम्राज्य

     28. यदि मराठों ने बंबई के भू-भाग को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया तो इससे भौगोलिक साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित निष्कर्षों की वैधता पर कोई आंच नहीं आती। यदि मराठों ने इसे जीतने की परवाह नहीं की तो इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि बंबई महाराष्ट्र का हिस्सा नहीं है। इससे तो केवल यही साबित होता है कि चूंकि मराठा शक्ति एक भू-शक्ति मात्र थी, इसलिए उसने एक बंदरगाह को जीतने में अपनी शक्ति का कभी दुरुपयोग नहीं किया।

    29. बिंदु संख्या (1) और (2) के बारे में फैसला हो जाने के बाद अब साबित करने का भार उन लोगों पर आ गया है, जो इस बात के लिए संघर्षरत् हैं कि बंबई को महाराष्ट्र में नहीं मिलाया जाना चाहिए। क्या उन्होंने अपना यह कर्तव्य पूरा किया है ? इसके बाद अब दूसरे बिंदुओं पर विचार की बारी आती है।

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