महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar
भाग IV
महाराष्ट्र और बंबई नगर
बंबई के बारे में विवाद
21. बंबई शहर को महाराष्ट्र में सम्मिलित किया जाए या नहीं, इस प्रश्न पर काफी विवाद है। बंबई के इंडियन मर्चेंट्स चैम्बर भवन में एक बैठक हुई, जिसमें साठ से अधिक लोगों ने भाग नहीं लिया। इसमें भाग लेने वालों में एक भारतीय ईसाई को छोड़कर शेष सभी केवल गुजराती भाषी व्यापारी और उद्योगपति थे । यद्यपि यह बैठक छोटी और एक विशिष्ट वर्ग से ही संबंधित थी, किन्तु इसकी कार्यवाही को भारत के सभी समाचार-पत्रों में प्रथम पृष्ठ पर महत्वपूर्ण स्थान मिला। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' तो इससे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने इस पर संपादकीय ही लिख मारा। इस संपादकीय में एक ओर जहां महाराष्ट्रवादियों के खिलाफ वक्ताओं ने जो विष उगला उसके बारे में केवल हल्क शब्दों में भर्त्सना की गई, किन्तु दूसरी ओर बंबई के भविष्य के बारे में इस बैठक में जो प्रस्ताव पारित हुआ, उसका समर्थन भी किया गया। इससे तो उस बात की सच्चाई फिर सामने आती है, जो आयरलैंड संबंधी विवाद के दौरान आयरलैंड के नेता रैडमंड को जवाब देते समय लॉर्ड बर्कन हैड ने कही थी कि कुछ मामलों में अल्पमत ही बहुमत बन जाता है। विवाद से संबंधित पक्ष तथा विपक्ष में दी गई दलीलों को सम्मिलित नहीं करता तो जाता। इस ज्ञापन में इसके दो कारण हैं मेरा यह ज्ञापन बुरी तरह से अधूरा ही रह एक तो यह कि वह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई और दूसरा यह कि इस बैठक में पारित प्रस्ताव को विश्वविद्यालयों के लब्धप्रतिष्ठ प्रोफेसरों का समर्थन मिला।

बंबई के बारे में प्रस्ताव
22. उस बैठक में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुआ :
(क) भाषावार प्रांतों के निर्माण का प्रश्न स्थगित कर दिया जाए, या
(ख) यदि इसे स्थगित न किया जा सके तो फिर बंबई शहर को एक अलग प्रांत बना दिया जाए।
एक तीसरा सुझाव यह भी था कि कोंकण को एक अलग प्रांत का दर्जा दिया जाए और बंबई उसकी राजधानी बने। इस प्रस्ताव के समर्थक न के बराबर थे। इसलिए इस पर यहां विचार करना निरर्थक होगा।
बंबई के बारे में जो भी निर्णय किया जाए वह अभी किए जाए
23. इस प्रस्ताव के उस अंश पर मेरी कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें यह कहा गया है कि भाषावार प्रांतों के पुनर्गठन का काम स्थगित कर दिया जाए, बशर्ते कि इस मुख्य प्रश्न का हल ढूंढ लिया जाए कि बंबई को महाराष्ट्र में सम्मिलित करना है या नहीं। यदि इस समस्या का समाधान हो जाता है तो फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस समझौते को कार्यरूप में परिणत करने में पांच वर्ष लगेंगे या दस वर्ष। किन्तु यह प्रस्ताव तो सरासर पलायनवादी सिद्ध होता है। इससे मसला हल नहीं होगा। यह तो विवाद को केवल टाल देने की बात कहता है मेरा तो मत है कि इस मुख्य समस्या का समाधान अविलंब किया जाए।
बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने का आधार
24. बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने के पक्ष में इन तर्कों पर बल दिया जा रहा है :
(क) बंबई कभी महाराष्ट्र का अंग नहीं रहा । 1
(ख) बंबई कभी मराठा साम्राज्य का अंग नहीं रहा । 2
(ग) बंबई शहर की जनसंख्या में मराठी भाषियों का बहुमत नहीं है। 3
(घ) गुजराती लोग बंबई के पुराने निवासी हैं। 4
(ड.) बंबई ऐसा व्यापारिक केंद्र है, जिसका संबंध महाराष्ट्र के बाहर एक बड़े भू- भाग से है इसलिए बंबई पर महाराष्ट्र का दावा ठीक नहीं है। बंबई तो सारे भारत का है। 5
(च) बंबई में रहने वाले गुजराती भाषियों ने ही बंबई के व्यापार और उद्योग में बढ़ोतरी की है। मराठी भाषी या महाराष्ट्र के निवासी तो केवल क्लर्की या कुलीगिरी करते हैं। व्यापार और उद्योग के मराठी भाषियों के राजनीतिक प्रभुत्व के मालिकों को अधिसंख्यक मेहनतकश तले रखना अनुचित होगा। 6
(छ) महाराष्ट्र बंबई को अपने में केवल इसलिए मिलाना चाहता है, ताकि वह बंबई की बेशी कमाई से अपना गुजर बसर कर सके ।7
(ज) कोई भी बहुभाषी राज्य (एक भाषी राज्य की तुलना में) बेहतर होता है । बहुभाषी होना अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता को चोट पहुंचाने वाला नहीं माना जाएगा ।8
(झ) प्रांतों का पुनर्गठन तार्किक आधार पर किया जाए न कि राष्ट्रीय आधार पर । 9
सबूत का दायित्व
25. इन बिन्दुओं की जांच से यह स्पष्ट हो जाता है कि बिंदु (1) और (2) इस अर्थ में प्राथमिक हैं कि इनसे हमें यह तय करने में सहायता मिलती है कि सबूत का भार किनके कंधों पर है। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि बंबई महाराष्ट्र का हिस्सा है, तो फिर इसे महाराष्ट्र से अलग करने के लिए सबूत देने का दायित्व अलगाववादियों पर आ जाता है न कि उन पर, जो इसे महाराष्ट्र का हिस्सा मानने का दावा करते हैं। इसलिए मैं पहले इन्हीं दो बिंदुओं का विवेचन करूंगा ।
1 प्रो. घीवला-फ्री प्रेस जरनल 6 सितम्बर, 1948 और प्रो. मोरेस-फ्री प्रेस जरनल 18 सितम्बर, 1948
2 वही
3 प्रो. सी. एन. वकील, फ्री प्रेस जरनल 21 सितम्बर, 1948
4 प्रो. घीवाला, फ्री प्रेस जरनल 6 सितम्बर, 1948
5 प्रो. सी. एन. वकील, फ्री प्रेस जरनल 11 सितम्बर, 1948
6 प्रो. सी. एन. वकील, बोंबे क्रोनिकल
7 प्रो. सी. एन. वकील, इंडिया मर्चेंट्स चेम्बर की बैठक में
8 प्रो. दांतवाला, फ्री प्रेस जरनल 1 सितम्बर, 1948
9 प्रो. धीवाला फ्री प्रेस जरनल 11 सितम्बर, 1948