महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar
बिंदु संख्या (7)
बंबई की अतिरिक्त आय पर महाराष्ट्र की दृष्टि
41. महाराष्ट्रवासियों की दृष्टि बंबई की अतिरिक्त आय पर है - यह आरोप लगाने से पहले यह तो सिद्ध हो जाना चाहिए कि बंबई अतिरिक्त आय वाला शहर है। बेशी आमद की जो बात उठी है, वह वास्तव में लेखे-जोखे की गड़बड़ी का नतीजा है। लेखे-जोखे में गड़बड़ी तब मानी जाएगी जब (1) गवर्नर और उसके अमले, (2) मंत्रियों और उनके अमलों, ( 3 ) धारासभा (4 ) न्यायपालिका (5) पुलिस और (6) पुलिस कमिश्नरों और शिक्षा निदेशकों जैसे प्रांतीय अमलों पर होने वाले सभी प्रकार के खर्चों को लेखांकन में सम्मिलित न किया जाए। यदि इन मदों पर होने वाले व्यय को भी जोड़ा जाए तो मुझे नहीं लगता कि कराधान की वर्तमान दरों के आधार पर बंबई को अतिरिक्त आय वाला शहर करार दिया जा सकता है। इसे तर्काभास ही माना जाएगा कि बंबई के लिए इन मदों पर होने वाले खर्च को तो महाराष्ट्र के नाम चढ़ाया जाता है और बंबई को इनसे मुक्त रखते हुए यह घोषित किया जाता है और तर्क दिया जाता है कि बंबई की आय उस पर होने वाले व्यय से अधिक है।
42. महाराष्ट्रीय बंबई को महाराष्ट्र में इसलिए मिलाना चाहते हैं, क्योंकि वे बंबई के अतिरिक्त राजस्व को अपने उपयोग में लाना चाहते हैं- यह कथन न केवल गलत है, वरन् महाराष्ट्रवासियों की नीयत पर भी शक पैदा करने वाला है। क्या वास्तव में उनकी नीयत खराब है? इसका उत्तर मेरे पास नहीं है, किन्तु मैं इतना जरूर जानता हूं कि उनका समाज व्यवसायी मनोवृत्ति वाला नहीं है। कुछ अन्य समुदायों की तरह वे पैसे को दांत से नहीं पकड़ते। मैं उन लोगों में से एक हूं जो यह मानते हैं कि यही सबसे बड़ा गुण भी है। उन्होंने रुपए-पैसे को कभी देवता की तरह नहीं पूजा। ऐसा करना उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इसलिए तो उनके प्रांत में बाहर वाले समुदाय आते गए और वहां के व्यापार और उद्योग के मालिक बन बैठे। मैं यह बात साबित कर चुका हूं कि बंबई वास्तव में अतिरिक्त आय वाला शहर नहीं है और न ही उनकी दृष्टि इस अतिरिक्त आय पर गड़ी हुई है।

43. किन्तु मान लो, महाराष्ट्रवासियों की नीयत यही है, तो भी इसमें दोष कहां है? बंबई की अतिरिक्त आय पर अन्य प्रांतों के लोगों की अपेक्षा उनका दावा अधिक कारगर है, क्योंकि वहां के व्यापार और उद्योगों की उन्नति के लिए मजदूरों की पूर्ति करने में उनका योगदान सर्वाधिक रहा है और भविष्य में भी रहेगा। कोई भी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इस बात को नकार नहीं सकता कि पूंजी लगाने वालों का उत्पादित संपत्ति पर जितना अधिकार होता है, उससे अधिक नहीं तो कम से कम बराबर का अधिकार तो मजदूर वर्ग का भी होता ही है।
44. दूसरी बात यह है कि बंबई की अतिरिक्त आय का उपभोग केवल महाराष्ट्रवासी ही नहीं करते, पूरा भारत करता है। आयकर, अधिकर आदि के रूप में बंबई से जो आमदनी केंद्र सरकार को होती है, वह सब केंद्र सरकार द्वारा अखिल भारतीय कार्यों के लिए खर्च की जाती है और इस तरह अन्य सभी प्रांत उससे लाभ उठाते हैं। यदि बंबई की अतिरिक्त आय को संयुक्त प्रांत वाले, बिहार वाले, असम वाले, उड़ीसा वाले, पश्चिम बंगाल वाले, पूर्वी पंजाब वाले और मद्रास वाले हजम कर जाते हैं तो प्रो. वकील के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। बस उन्हें आपत्ति है तो केवल इस बात से कि उसका कुछ हिस्सा महाराष्ट्रवासियों को क्यो मिलें। तब वे शोर मचाने लगते हैं। इसे तर्कपूर्ण नहीं माना जा सकता। इससे तो केवल उनकी महाराष्ट्रवासियों के प्रति घृणा ही झलकती है।
45. मान लो, बंबई का एक अलग प्रांत बन जाता हैं तब भी मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि प्रो. वकील बंबई की अतिरिक्त आय में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी को कैसे रोक पाएंगे। यदि बंबई से आयकर, अधिकर आदि के रूप में आमदनी होगी और ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से बंबई से प्राप्त राजस्व का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र को अवश्य मिलेगा। मैं ऊपर बता ही चुका हूं कि प्रो. वकील के तर्क में सार कम है, दुर्भावना या ईष्याभाव अधिक ।