महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar
64. बंबई को महाराष्ट्र से अलग रखा जाए, इससे पहले यह सिद्ध किया जाना चाहिए कि क्या आर्थिक दृष्टि से बंबई आत्म निर्भर प्रांत है। मैं पहले ही बता चुका हूं कि यदि राजस्व और व्यय का समुचित लेखांकन किया जाए तो कराधान के वर्तमान स्तर के आधार पर बंबई एक आत्म-निर्भर प्रांत नहीं बन सकेगा। यदि ऐसा है तो फिर बंबई को एक अलग प्रांत बनाने का प्रस्ताव धराशायी हो जाना चाहिए। उड़ीसा और असम जैसे प्रांतों के साथ बंबई की तुलना करना अनुचित होगा। बंबई में प्रशासन का स्तर, जीवन का स्तर और परिणमतः मजदूरी / वेतन का स्तर सभी इतने अधिक ऊंचे हैं कि यदि वहां कराधान की दरें कितनी भी अधिक क्यों न बढ़ा दी जाएं, वह अपने खर्चे के लिए आवश्यक मात्रा में राजस्व नहीं जुटा पाएगा।
बृहत्तर बंबई के प्रस्ताव का उद्देश्य
65. बंबई प्रांत आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर हो सकेगा या नहीं, यह आशंका इसलिए भी बढ़ गई, क्योंकि बंबई सरकार ने अनुचित जल्दी दिखाते हुए तत्कालीन बंबई की सीमाओं में महाराष्ट्र के आसपास के हिस्सों को मिलाकर बृहत्तर बंबई का गठन कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य बंबई को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता और उद्देश्य हो भी क्या सकता है? जब तक बंबई महाराष्ट्र का हिस्सा बना रहे, तब तक तो मराठी भाषियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि महाराष्ट्र का कौन सा हिस्सा किस प्रशासनिक क्षेत्र में मिला दिया जाए। किन्तु जब बंबई को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बृहत्तर बंबई बनाकर एक अलग प्रांत बनाने की बात उठी तो मराठी भाषियों को अपने इलाकों से हाथ धोने की बात सहन नहीं हुई। अब देखना यह है कि बृहत्तर बंबई की योजना ने जो जिम्मेदारी राज्य पुनर्गठन आयोग पर डाली है, उसे वह कैसे निभाता है। क्या वह न्यायपूर्ण तरीके सेमराठी भाषियों को इस बात के लिए बाध्य कर सकेगा कि वे न केवल गुजरातियों की इस मांग के आगे झुक जाएं कि वे बंबई का मोह त्याग दें, पर उनकी यह अगली मांग भी माने लें कि बंबई को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अपने प्रांत के कुछ भू-भाग भी उन्हें समर्पित कर दें? आयोग को इस बारे में न्याय करना है। वह अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

66. महाराष्ट्र और बंबई न केवल एक-दूसरे पर आश्रित हैं, वरन् वस्तुतः वे एक और अविभाज्य हैं। इन दोनों का पृथक्करण दोनों के ही लिए घातक होगा। बंबई के लिए पानी और बिजली महाराष्ट्र से आते हैं। महाराष्ट्र का बुद्धिजीवी वर्ग बंबई में बसा हुआ है। बंबई को महाराष्ट्र से काटकर अलग करने की बात बंबई के आर्थिक जीवन को अनिश्चित या संकटपूर्ण बना देगी, साथ ही इससे महाराष्ट्र की आम जनता अपने बुद्धिजीवी वर्ग से कट कर रह जाएगी। तब उसे मार्गदर्शन और नेतृत्व किससे मिलेगा? वह तो कहीं की न
रहेगी।
पंच फैसला ही इसका समाधान
67. कुछ लोगों ने इस तरह का सुझाव भी दिया है कि बंबई की समस्या का समाधान मध्यस्थता यानी पंच फैसले से होना चाहिए। मैंने कभी इससे बेहूदा सुझाव नहीं सुना था । ऐसा करना वैसी ही बेहूदगी होगी, जैसी किसी दांपत्य-जीवन संबंधी विवाद के मामले को पंच फैसले पर छोड़ना दांपत्य जीवन का गठबंधन तो अत्यंत वैयक्तिक मामला है, जिसे कोई तीसरा नहीं सुलझा सकता। बाइबिल की उक्ति का प्रयोग करूं तो कह सकता हूं कि बंबई और महाराष्ट्र को तो ईश्वर ने ही मिलाया है अर्थात् इन दोनों का जन्म-जन्मान्तरों का संबंध है। कोई भी मध्यस्थ इन्हें विलग नहीं कर सकता। अगर प्राधिकार है तो केवल आयोग को । यही अभिकरण इस बारे में निर्णय दे सकता है। देखें, वह क्या करता है।
