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महाराष्ट्र : एक भाषावार प्रांत - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Maharashtra as a Linguistic Province Dr Bhimrao Ambedkar

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11 मे 2023
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निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों की आवश्यकता

भाषा प्रांतों से संबंधित लेख

द टाइम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 23 अप्रैल, 1953 से


निरीक्षण तथा संतुलन के उपायों की आवश्यकता

    अंग्रेजों ने भारत पर 150 वर्षों से अधिक तक राज किया, पर उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि भाषावार राज्य बनाए जाएं, जब कि उस समय भी यह समस्या थी। बहुभाषी क्षेत्रों की सांस्कृतिक लालसा जानकर उस पर अमल करने की अपेक्षा उनकी अधिक रुचि केवल इस बात में थी कि प्रशासन स्थायी हो और पूरे देश में कानून और व्यवस्था बनी रहे। यह सही है कि उनके राज के अंतिम दिनों में उन्होंने भी यह महसूस किया कि उन्होंने जो प्रशासनिक व्यवस्था कायम की है, उसमें भाषाओं के लिहाज से भी कुछ न कुछ ताल-मेल होना आवश्यक है, कम से कम उन क्षेत्रों में तो किया जाना ही चाहिए, जहां भाषाओं की भिन्नता होने से उनमें परस्पर कशमकश दिखाई पड़ती है। इसलिए शायद भारत छोड़कर जाने से पहले उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे भाषा पर आधारित राज्य बना दिए । मान लो, यदि वे हमें छोड़कर न जाते और हम पर राज करते ही रहते तो वे अन्य क्षेत्रों को भी तार्किक दृष्टि से भाषावार राज्यों के रूप में पुनर्गठित करते ।

    अंग्रेजों ने भाषावार प्रांतों के निर्माण की बात सोची, इसके बहुत पहले ही श्री गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सन् 1920 में अपना जो संविधान बनाया, वह भाषावार प्रांतों पर आधारित था । इस प्रकार का संविधान बनाने के पीछे जो विचारधारा रही, वह उनकी स्थायी विचारधारा थी या लोगों को कांग्रेस की ओर आकृष्ट करने के लिए सोचा गया तात्कालिक प्रलोभन मात्र था, इसके बारे में अब अटकलें लगाना उचित नहीं होगा। पर हां, इस बात में तो संदेह नहीं है कि देर से ही सही पर अंग्रेजों को यह समझ में आ गया था कि भाषायी आधार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए और इसलिए उन्होंने इसे सीमित मात्रा में सही, पर कार्यरूप में परिणत तो किया ही ।

विरोध

    सन् 1945 तक तो कांग्रेस ने उस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया, जो 1920 में बने संविधान के अनुसार उसने स्वयं पैदा की थी। सन् 1945 में जब कांग्रेस के हाथ में शासन की बागडोर आई, तब इस जिम्मेदारी को निभाने का बोझ उस पर आ पड़ा। भाषावार प्रांतों के गठन के हाल ही के इतिहास पर नजर डालने से यह पता चलता है कि उस मामले की भाषावार प्रांतों के निर्माण का प्रस्ताव रखकर एक संसद सदस्य ने पहल की। सरकार की ओर से बहस का उत्तर देने की जिम्मेदारी मेरी थी। वरिष्ठ सत्ताधारियों की राय जानने के लिए मैंने उनसे विचार-विमर्श किया। यह बात विचित्र लग सकती है, किन्तु मुझे साफ पता चल गया कि हाइकमान भाषावार प्रांतों के निर्माण के कतई खिलाफ है। इन परिस्थितियों में यही ठीक समझा गया कि बहस का उत्तर यदि प्रधानमंत्री स्वयं दें तो ठीक रहेगा। बहस का उत्तर देते हुए प्रधानमंत्री ने सदन को यह आश्वासन दिया कि जल्दी ही आंध्र राज्य का गठन किया जाएगा। प्रधानमंत्री के इस आश्वासन के फलस्वरूप प्रस्ताव वापस ले लिया गया। फिर मामला वहीं शांत हो गया।

दूसरी बार

     संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के नाते मुझे दूसरी बार इस समस्या का सामना करना पड़ा। जब संविधान का प्रारूप तैयार हो चुका तो मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि प्रस्ताव पर हुई बहस के उत्तर में उन्होंने सदन को जो आश्वासन दिया था, उसको ध्यान में रखते हुए क्या मैं संविधान में "क" वर्ग के राज्यों में आंध्र को एक अलग राज्य के रूप में सम्मिलित कर दूं। उनका क्या उत्तर आया था, इसके बारे में और क्या हुआ, इसकी न तो मुझे याद है और न ही मेरे पास इस समय उसका कोई प्रमाण उपलब्ध है। किन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि तब संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यू.पी. के एक वकील श्री धर की अध्यक्षता में भाषावार प्रांतों के गठन पर विचार करने के लिए एक समिति बना दी ।

    यह धर समिति किसी और बात के लिए नहीं तो कम से कम एक बात के लिए तो अवश्य ही याद की जाती रहेगी। समिति ने यह कहा था कि भाषा के आधार पर चाहे महाराष्ट्र को एक अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, किन्तु बंबई को किसी भी हालत में महाराष्ट्र में सम्मिलित नहीं किया जाए। कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में उस रिपोर्ट (प्रतिवेदन) पर विचार हुआ। जयपुर कांग्रेस ने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई, जिसमें प्रधानमंत्री, श्री वल्लभभाई पटेल और डॉ. पट्टाभि सीतारमैया थे। उन्होंने जो रिपोर्ट दी, उसका सार यह है कि आंध्र प्रांत का अविलंब गठन किया जाए, किन्तु मद्रास शहर तमिलों के पास ही रहे। ब्यौरेवार बातें तय करने के लिए एक अन्य समिति बनाई गई, उसने भी कमोबेश सर्वसम्मति से रिपोर्ट दी। श्री प्रकाशम् सहित आंध्र के अनेक सदस्यों ने इस रिपोर्ट का विरोध किया। वे लोग किसी भी हालत में मद्रास पर अपने दावे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे । इस तरह इस मामले पर निर्णय नहीं किया जा सका ।

    इसके बाद श्री पोट्टी श्रीरामुलु वाली दुर्घटना हुई। श्रीरामुलु ने आंध्र प्रांत के लिए आत्मोत्सर्ग किया। शासक दल के कामकाज पर यह शर्मनाक टिप्पणी ही मानी जाएगी कि एक ऐसे काम के लिए श्रीरामुलु को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जिसकी वैधता को कांग्रेस मान चुकी थीं अब जिस नए आंध्र प्रांत के निर्माण की बात मानी जा चुकी थी, उसे स्वर्गवासी श्रीरामुलु की आत्मा के लिए प्रधानमंत्री द्वारा किया गया पिंडदान ही मानना होगा। क्या किसी अन्य देश में सरकार के इस तरह के काम को सहन किया जा सकता था? अब इसके बारे में बहस से क्या फायदा?

   मेरी राय में किसी भी भाषावार राज्य के अस्तित्व में आने से पहले तीन शर्तें पूरी होनी चाहिएं। पहली शर्त यह है कि वह राज्य आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर हो । संविधान बनाते समय देसी रियासतों के विलय के प्रश्न पर जब विचार किया गया तो इस नियम को नितांत अनिवार्य माना गया था। केवल उन्हीं देसी रियायतों को स्वतंत्र राज्यों का दर्जा दिया गया, जो आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर थी। शेष सभी को पड़ोसी राज्यों में मिला दिया गया।

सहारा जैसी स्थिति

    क्या प्रस्तावित आंध्र राज्य आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर है? न्यायमूर्ति श्री वांचु ने स्पष्ट रूप से यह माना था कि आंध्र राज्य का वार्षिक राजस्व घाटा पांच करोड़ रुपए होगा। क्या इस घाटे को कम करने के लिए आंध्र राज्य या तो नए कर लगाएगा या अपना खर्च कम करेगा? आंध्रवासियों पर ही इसका असर होगा। क्या इस घाटे की पूर्ति की जिम्मेदारी केंद्र अपने ऊपर लेगा? यदि हां, तो क्या यह जिम्मेदारी केवल प्रस्तावित आंध्र राज्य तक ही सीमित रहेगी या केंद्र ऐसे ही अन्य मामलों में भी जिम्मेदारी उठाएगा? इन प्रश्नों का जवाब मिलना चाहिए?

    नए आंध्र राज्य की राजधानी नियत नहीं की गई है। प्रसंगवश मैं कहना चाहूंगा कि मैंने यह कभी नहीं सुना कि कोई नया राज्य बना हो और यह तय नहीं हुआ हो कि उसकी राजधानी क्या होगी? श्री राजगोपालाचारी जो पक्के तमिल हैं, आंध्र राज्य की सरकार के प्रति इतना शिष्टाचार नहीं बरतेंगे कि उसे एक रात के लिए ही सही मद्रास शहर में टिकने दें, जैसा कि हिन्दू धर्म सभी हिन्दुओं को अपने अतिथियों के प्रति अपनाने की शिक्षा देता है। नई सरकार को अपना आवास स्वयं ढूंढना होगा और सरकार चालने के लिए अपने घर बनाने होंगे। इसके लिए वह कौन सी जगह चुनेगी ? खोखे खड़े करने के लिए पैसा कहां से आएगा? आंध्र तो सहारा के रेगिस्तान जैसा है, जहां कोई नखलिस्तान भी नहीं है। यदि उसकी सरकार इस सहारा में तत्कालिक शरण लेती है, तब भी आगे चलकर उसे किसी अधिक स्वास्थ्यप्रद स्थान में अपना लवाजमा ले जाना ही होगा। इस तरह इस अस्थायी मुख्यालय पर अनावश्यक खर्च करना होगा। क्या सरकार ने समस्या के इस पहलू पर भी विचार किया है? अभी से क्यों न उन्हें ऐसा स्थान आवंटित कर दिया जाए, जहां स्थायी तौर पर राजधानी रखने की संभावनाएं अधिक नजर आती हों।

    मेरी दृष्टि में राजधानी के लिए वारंगल सर्वाधिक उचित स्थान है। वह आंध्र की पुरानी राजधानी रहा है। यहां रेलवे जंक्शन है। यहां पर्याप्त संख्या में भवन भी उपलब्ध हैं। यह सही है कि यह शहर आंध्र के उस इलाके में स्थित है, जो हैदराबाद रियासत का हिस्सा है। सैद्धांतिक दृष्टि से तो यह होना चाहिए था कि विशालकाय और अष्टावक्र जैसे आकार वाली हैदराबाद रियासत का विभाजन किया जाता और अलग से एक पूर्ण आंध्र राज्य बनाया जाता। किन्तु यदि प्रधानमंत्री को इस प्रस्ताव पर अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा से कोई आपत्ति है। तो क्या वे हैदराबाद रियासत के आंध्र वाले (तेलगु भाषी) हिस्से में एक अंतःक्षेत्र (एन्क्लेव) बनाकर उसे नए आंध्र राज्य में नहीं मिला सकते? इस तरह वारंगल का मामला सुलझ सकता है। अंतः क्षेत्र बनाना भारत में कोई नई घटना नहीं होगी। किन्तु प्रधानमंत्री तो हैदराबाद में, और कश्मीर में भी विधि के विधान के विपरीत काम करने को कटिबद्ध हैं। मुझे विश्वास है कि उन्हें शीघ्र ही इसके परिणामों से सीख मिल जाएगी।

पहली शर्त

    यह केवल संयोग है। मुख्य बात तो यह है कि भाषा पर आधारित राज्य को आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर होना चाहिए । भाषावार राज्य के गठन का यह पहला विचारणीय बिंदु है। दूसरा बिंदु यह होगा कि हम इस बात का पूर्वानुमान लगा सकें कि भाषावार प्रांत में क्या होने वाला है। दुर्भाग्यवश किसी ने भारत की जनसंख्या के स्वरूप का सर्वेक्षण करने की ओर ध्यान नहीं दिया है। जनगणना की रिपोर्टों से हमें केवल इतना पता चलता है कि हिन्दू कितने हैं, मुसलमान कितने, यहूदियों और ईसाइयों की संख्या कितनी है, या फिर हम यह जान सकते हैं कि अछूतों की संख्या अमुक-अमुक है। ये रिपोर्टें केवल हमारी इतनी जानकारी बढ़ाती हैं कि भारत में ये ये धर्म प्रचलित हैं। धर्मों की संख्या जान लेने के अतिरिक्त इस प्रकार की सूचना का और कोई महत्व नहीं है। हम तो यह जानना चाहते हैं कि ये रिपोर्टें हमें यह बताएं कि भिन्न-भिन्न भाषा क्षेत्रों में जातियों का विभाजन कैसा है, किन्तु इनमें इस प्रकार की सूचना उपलब्ध नहीं होती। हमें अपने ज्ञान और जानकारी पर ही भरोसा करना पड़ता है। यदि यह कहूं कि किसी भाषा क्षेत्र में जातियों का विभाजन प्रायः इस तरह का होता है, अर्थात् उसमें एक या दो बहुसंख्यक घनी जातियां होती हैं और कुछ थोड़ी जातियां होती हैं, जो घनी जातियों के काबू में रहते हुए आश्रित जीवन व्यतीत करती हैं।

सामुदायिक या जातिगत बनावट

    मैं कुछ उदाहरण प्रस्तुत करूं पंजाब की बनावट देखें पूरे इलाके में जाटों का प्रभुत्व है। अछूत वर्ग के लोग उनके अधीन और उन पर आश्रित हैं। आंध्र का उदाहरण लें पूरे भाषा क्षेत्र में दो या तीन बड़े समुदाय छाए हुए हैं। वे या रेड्डी हैं, या कम्मा और कापू । वे सारी जमीन के मालिक हैं, सारे सरकारी पदों पर वे ही वे दिखाई देते हैं, या फिर सारा व्यवसाय उनके हाथों में है अछूत उन्हीं के सहारे अपनी गुजर-बसर करते हैं। महाराष्ट्र की स्थिति देखें : पूरे महाराष्ट्र के हर गांव में आपको मराठे भरपूर संख्या में मिलेंगे। वहां ब्राह्मणों, गूजरों, कोलियों और अछूतों की स्थिति दयनीय है। कभी समय था, जब ब्राह्मण और बनिए, निर्भीक जीवन यापन करते थे। किन्तु अब समय बदल गया है। श्री गांधी की हत्या के बाद ब्राह्मण और बनिए मराठों से छिपे छिपे रहते हैं और वे भागकर कस्बों और शहरों में बस गए हैं, क्योंकि वहां वे अपने आपको अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। केवल अभागे अछूत, कोली और माली ही बहुमत वाले मराठा समुदाय के अत्याचारों को सहन करने के लिए गांवों में बच रहे हैं। इस जातिगत बनावट को जो अनदेखा करेगा, वह स्वयं अपने जीवन को खतरे में डालने का जिम्मेदार होगा ।

    भाषावार प्रांतों में छोटे-छोटे समुदायों, अर्थात् अल्पसंख्यक जातियों का क्या भविष्य है। क्या वे विधायिका में चुने जाने की आशा रखें? क्या उन्हें राज्य सेवा में कोई पद मिलने की आशा है? उनकी आर्थिक उन्नति के लिए क्या कोई ध्यान देने वाला है? इन परिस्थितियों में भाषायी प्रांत के गठन का अर्थ होगा- स्वराज को किसी एक बहुसंख्यक समुदाय के हाथों में सौंप देना । श्री गांधी के स्वराज की क्या दुर्दशा है। जो लोग समस्या के इस पहलू को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते, वे इसे तभी भली-भांति समझेंगे, जब हम भाषायी राज्य जैसे शब्द का प्रयोग न कर जाट राज्य, रेड्डी राज्य या मराठा राज्य कहेंगे।

Maharashtra as a Linguistic Province - Dr Bhimrao Ambedkar

तीसरा मसला

    विचारणीय तीसरा मुद्दा यह है कि क्या भाषावार राज्यों के निर्माण का यह अर्थ लिया जाए कि एक भाषा बोलने वाले सभी लोगों को एक राज्य में इकट्ठा कर दिया जाएगा । क्या महाराष्ट्र राज्य में सभी मराठी भाषियों को एकत्रित किया जाना है। क्या सभी (तेलुगु - भाषी) आंध्र क्षेत्रों को आंध्र राज्य में मिला दिया जाएगा? एकत्रीकरण का यह प्रश्न केवल नइ इकाइयों से ही संबंधित नहीं है। इसका संबंध यू.पी., बिहार और पश्चिमी बंगाल जैसे भाषा पर आधारित वर्तमान प्रांतों से भी है। जैसा कि यू.पी. के प्रसंग में हुआ है, सभी हिन्दी भाषी लोगों को एक राज्य में समेकित करना क्यों आवश्यक है? जो ऐसे समेकन या एकत्रीकरण की मांग करते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अन्य राज्यों के साथ युद्ध करने जा रहे हैं। यदि समेकन से पृथकता का भाव पुष्ट होता हो तो आगे चलकर हमारा भारत ठीक उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जैसी स्थिति इस देश की मौर्य साम्राज्य के पतन या बिखराव के बाद हुई थी। क्या भाग्य हमें उसी ओर धकेल रहा है।

    इसका यह अर्थ नहीं कि भाषावार प्रांतों के गठन का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता । इसका तो अर्थ केवल इतना है कि भाषावार प्रांत का मुखौटा पहन कर कोई बहुसंख्यक समुदाय शक्ति का दुरुपयोग न करने पाए, अर्थात् भाषावार प्रांतों के निर्माण के साथ ही उन पर निरीक्षण और नियंत्रण के उपाय भी सोचने होंगे।

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